'हिन्दी सिनेमा का लवर बॉय'

'हिन्दी सिनेमा का लवर बॉय' 

ऋषि कपूर 

ऋषि कपूर एक बेहतरीन अदाकार थे. ग्रेट शो मैन राज कपूर का बेटा छोटी सी उम्र में सिल्वर स्क्रीन पर चमके अपनी खूबसूरती अपनी लवर बॉय की इमेज के साथ हिन्दी सिनेमा के प्रभावी कलाकारों में शुमार हो गए. आज भी ऋषि कपूर की दीवानगी उनके प्रशंसकों में देखी जा सकती है. ऋषि कपूर की मुस्कान उनकी शख्सियत में चार चांद लगाती थी. ऋषि कपूर बहुत ही मुँहफट इंसान थे. अपनी सिनेमाई ज़िन्दगी से बरअक्स सामाजिक, व्यवहारिक जीवन में थोड़ा कन्फ्यूज्ड दिखे. फ़िर चाहे खुद ही पूरे जीवन अपनी फ़िल्मों से धर्मनिरपेक्षता, भाइचारे का संदेश देते रहे. अपने निजी जीवन में धर्मनिरपेक्ष होते हुए आपसी भाइचारे को प्रगाढ़ करने के लिए भी संदेश देते थे. मुझे व्यक्तिगत रूप से ऋषि कपूर जब कन्फ्यूज्ड दिखे जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी एवं गांधी परिवार पर निशाना साधते हुए कहा कि देश की सार्वजनिक संपत्तियों को गांधी परिवार के नाम पर रखते हुए सब कुछ उनके नाम पर रख दिया गया. विपरित दूसरी परिस्तिथियों में उन्होंने देश की दक्षिणपंथी विचार धारा की पार्टी बीजेपी का समर्थन करते हुए नरेंद मोदी को देश जोड़ने वाला महान धर्मनिरपेक्ष नेता बताया. समय - समय पर नरेंद्र मोदी की तारीफें, वहीँ गांधी परिवार पर लगातार निशाना साधते हुए, ऋषि कपूर ने सिद्ध किया कि या तो वो जान बूझकर कर रहे हैं, या कन्फ्यूज्ड थे. कोई बहुत सेकुलर व्यक्ति नरेन्द्र मोदी को धर्मनिरपेक्ष कैसे कह सकता है!! या तो तथ्यों की जानकारी नहीं है या फ़िर जानबूझकर कर रहे थे. सामाजिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति को देखना पड़ता है, बोलने से पहले समझना चाहिए कि हम क्या बोल रहे हैं. अन्यथा ये तो यही बात हो गई कि 'चे ग्वेरा' की टी शर्ट पहनकर कोई बीजेपी की टोपी पहने हुए नारे लगाए, और पूछने पर कहे कि मैं नहीं जानता चे कौन है. मैंने तो अपना बदन ढंक रखा है. इसी मासूमियत का फ़ायदा उठाकर आज किसी ने सामाजिक नफ़रत की भावनाओं का प्रचार किया है. शायद ऋषि कपूर को इसका ज्ञान नहीं था. 

हालांकि ऋषि कपूर अपने बयानों को लेकर कहते थे 
"मेरे ट्वीट्स चुटकी भर नमक की तरह हैं. जिन्हे किसी को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है. मेरे ट्वीट में लिखी बातों को दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है. ट्वीट्स मैं अपने मजे के लिए करता हूं. सोशल मीडिया अपने विचारों और नजरिए को सामने रखने के लिए हैं, और मैं वही काम करता हूं. किसी भी विषय को लेकर किया गया मेरा ट्वीट मेरा अपना नजरिया होता है. मैं जानता हूं कि हर बार मैं कोई गलत बात लिख देता हूं. लेकिन मैं जो भी बात ट्विटर पर लिखता हूं. वो बातें मेरे दिल से आती हैं. मैं कोई बात बना कर नहीं लिखता". 

जिंदादिली तो ठीक है, सामाजिक जीवन में व्यक्ति को सजग रहना चाहिए. ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा 'खुल्लमखुल्ला' में अपनी ज़िन्दगी के एक पहलू पर प्रकाश डाला है. उन्होंने कई बार कहा भी है कि मैंने बॉबी फिल्म के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड 30 हज़ार में खरीदा था. इसमे कितनी सच्चाई है, यह कहना मुश्किल है, लेकिन ऋषि कपूर की परिपक्वता पर सवाल ज़रूर उठते हैं. 1970 में राज कपूर साहब अर्थिक रूप से दिवालिया हो चुके थे. इससे पहले ऋषि कपूर ने सिर्फ पिता की दो फ़िल्मों में छोटे छोटे से रोल किए थे. अब सवाल उठता है कि आज से 50 साल पहले ऋषि कपूर को 30 हज़ार कहाँ से मिले? राज कपूर साहब ने खुद ही कहा था कि प्राण साहब ने एक रुपया लेकर फिल्म में काम करते हुए दोस्ती निभाई थी. वहीँ सुपरस्टार राजेश खन्ना को देने के लिए राज कपूर साहब के पास इतने पैसे नहीं थे कि उनको साईन करते! इससे पहले ऋषि कपूर ने इतनी बड़ी रकम कहाँ से कमा ली थी?? इसीलिए कहते हैं सामाजिक जीवन में कम ही बोलिए लेकिन प्रभावी बोलना चाहिए. हो सकता है उनके फैन्स को यह सच लगे लेकिन यह पहलू बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है. बात तथ्यात्मक हो तो ठीक लगती है. 

हालांकि ऋषि कपूर की सिनेमाई ज़िन्दगी बहुत सफल रही है. उन्होंने पहली फिल्म बॉबी से ही अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए सिद्ध कर दिया था, कि वो राज कपूर के बेटे के रूप में लॉन्च ज़रूर हुए थे, लेकिन चार दशक से ज्यादा सफल अभिनय की दुनिया में टिकना केवल और केवल प्रतिभा के कारण ही सम्भव था. ऋषि कपूर पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर पिता राज कपूर साहब की फिल्म श्री 420 से दिखे थे. ऋषि को श्री 420 के ‘प्यार हुआ, इकरार हुआ’ गाने में दो अन्य बच्चों के साथ बारिश में चलते हुए देखा जा सकता है. ऋषि कपूर ने यह शॉट ज़िन्दगी में पहली बार दिया था. इस फिल्म में नरगिस जी ने रोते हुए ऋषि कपूर को चाकलेट देकर मनाया था. 
1970 में, ऋषि कपूर ने अपने पिता राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ से शुरुआत की, जहां उन्होंने अपने ही पिता की बचपन की भूमिका निभाई थी. 1973 में, फिल्म ‘बॉबी’ में डिंपल कपाड़िया के साथ उनकी पहली मुख्य भूमिका थी. वहीँ युवाओं के बीच ऋषि कपूर लवर बॉय के रूप में लोकप्रिय हुए. ऋषि कपूर अमिताभ बच्चन के लगभग दौर में सिनेमा में आए थे. सिनेमा का ट्रेंड बदल गया था. राजेश खन्ना जैसे सुपरस्टार मद्धम पड़ते जा रहे थे. वहीँ ऋषि कपूर बॉबी, लैला मजनू, जैसी फ़िल्मों से खुद को प्रभावी बनाए हुए थे. ऋषि कपूर बहुत बड़े सुपरस्टार तो नहीं थे, लेकिन उनकी सिल्वर स्क्रीन पर मौजूदगी बहुत उम्दा होती थी. सत्तर के दशक में अमिताभ बच्चन एवं राजेश खन्ना दोनों के कारण सिनेमा दो तरह से दिखने लगा था. फ़िल्में भी वैसे ही रची जा रहीं थीं. वहीँ ऋषि कपूर की फ़िल्मों का अपना क्लास था. 1974-1997 तक, ऋषि कपूर ने सोलो लीड वाली फिल्में करते गए. केवल 11 फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया. 11 हिट फिल्में थीं- बॉबी, लैला मजनू, रफू चक्कर, सरगम, कर्ज, प्रेम रोग, नगीना, हनीमून, बंजारन, हिना और बोल राधा बोल. साल 1974-1981 तक, ऋषि कपूर ने अपनी होने वाली पत्नी नीतू कपूर के साथ जोड़ी बनाई, लेकिन इस जोड़ी ने खास कमाल नहीं किया. नीतू कपूर के साथ केवल मल्टी-स्टार्टर फिल्में हिट हुईं- खेल खेल में, कभी कभी, अमर अकबर एंथनी, पति पत्नी और वो, दुनिया मेरी जेब में... आदि

 ऋषि कपूर की एक ख़ासियत यह रही है कि अमिताभ बच्चन के साथ मल्टी स्टार्टर फ़िल्मों में भी खूब चमके. वहीँ दूसरे ऐक्टर गुम हो गए. ऋषि कपूर भाई - दोस्त आदि के किरदारों में अपना वज़ूद कायम करने में सफल रहे हैं. 90 के दशक में ऋषि कपूर की फिल्म दीवाना, दामिनी और ईना मीना डिका सफल रही थी. ऋषि कपूर को दो प्रमुख नायक फिल्मों- हम किसी से कम नहीं, बदलते रिश्ते, आप के दीवाने, सागर में कई बार लीड रोल भूमिकाएं मिलीं थीं. 1999 में, ऋषि कपूर ने फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ का डायरेक्शन किया. साल 2000 में, उन्होंने फिल्म ‘करोबार: द बिजनेस ऑफ लव’ में अपनी आखिरी रोमांटिक लीड की, जो फ्लॉप रही. मुख्य भूमिका के रूप में कई बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होने के बाद, ऋषि कपूर ने दो हज़ार के दशक में सहायक भूमिकाएँ करना शुरू किया था. 

ऋषि कपूर अपनी फिल्मों में खास तरह के स्वेटर पहनने के लिए जाने जाते थे. जो हमेशा के लिए एवरग्रीन स्टाइल बन गया. ज्यादातर फिल्मों में वह कलरफुल स्वेटर्स में ही नजर आते थे. दिलचस्प बात यह है कि ऋषि कपूर का यह सिग्नेचर स्टाइल था. जिसमें वह भी खुद को काफी आत्मविश्वास से प्रस्तुत करते थे. धीरे-धीरे अभिनेता का यह स्वेटर लुक स्टाइल स्टेटमेंट ही बन गया. स्वेटर को लेकर ऋषि कपूर का प्यार फिल्म ‘चांदनी’ में देखने को मिला. इस फिल्म में वह स्वेटर पहनकर एक्ट्रेस श्रीदेवी संग बर्फीली वादियों में रोमांस करते नजर आए थे. जिसके बाद से उन्हें स्वेटरमैन के नाम से भी पुकारा जाने लगा. कहा जाता है कि जो स्वेटर ऋषि कपूर एक बार पहन लेते थे, वह फिर कभी उसे दोबारा नहीं पहनते थे. स्वेटर और जैकेट में ऋषि कपूर का लुक काफी लोकप्रिय हुआ था. ऋषि कपूर की नकल करने के लिए लोग दुकानों में उन जैसे ही स्टाइल की स्वेटर और जैकेट खरीदने पहुंच जाया करते थे. जिसकी वजह से स्वेटर और जैकेट की डिमांड में एकदम से उछाल आ गया. ऋषि कपूर का स्वेटर और जैकेट की नकल का रंग धीरे-धीरे और अभिनेताओं में भी चढ़ने लगा. बाद में सिनेमा में भी उनके लुक को लोग स्टाइल करने लगे. अभिनेता को स्वेटर पहनना कितना पसंद था. इस बात से पता चलता है. ऋषि कपूर ने आखिरी फिल्म ‘शर्माजी नमकीन’ में भी अभिनेता स्वेटर और गले में मफलर पहने ही दिखाई दिए थे. अंतिम फिल्म में भी ऋषि कपूर अपने सिग्नेचर स्टाइल में देखे जा सकते हैं.

कुछ हीरो फिल्मों में बने रहने के लिए कैरेक्टर रोल करने लगते हैं. कैरेक्टर रोल में अदाकारी दिखाने के लिए भरपूर मौका होता है. या निर्माता निर्देशक के रूप में अपनी दूसरी पारी की शुरुआत करते हैं, लेकिन बहुत कम ही सफल हो पाते हैं. राजेश खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा की दूसरी पारी असफल रही है. वहीँ शम्मी कपूर, दिलीप साहब, अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की दूसरी पारी सफल रही. कमबैक ऐक्टर के रूप में अगर देखा जाए तो ऋषि कपूर की दूसरी पारी भी बेहतरीन रही है. पहली पारी में जहां लवर बॉय के रूप में सभी के प्रिय कलाकार बने रहे. वहीँ दूसरी पारी में एक से बढ़कर एक परिपक्व भूमिकाओं से सिद्ध कर दिया कि ऋषि कपूर एक हरफ़नमौला अदाकार हैं. अग्निपथ फ़िल्म में रऊफ़ लाला का किरदार निभाने वाले ऋषि कपूर फ़िल्म अग्निपथ से ऋषि कपूर की बॉलीवुड में दूसरी पारी का आगाज़ था.

ऋषि कपूर की दूसरी पारी की फ़िल्में ज़रूर देखना चाहिए. तब समझ आता है कि वो दिल से सेकुलर तबियत के इंसान थे, लेकिन बाद में उन्होंने खुद को अपरिपक्व सिद्ध किया. 
अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म मुल्क में ऋषि कपूर ने मुराद अली मोहम्मद की भूमिका निभाई, जो नफरत और कट्टरता के शिकार एक मुस्लिम परिवार के मुखिया थे. इस फिल्म में ऋषि कपूर बहुत ही आला अभिनय कर गए. एक अकेले लड़ाई लड़ने वाले एक संवेदनशील, इंसान की भूमिका में उन्होंने भारत के असल मुसलमान की भूमिका के लिए कभी भुलाए नहीं जा सकते. 

102 नॉट ऑउट, अग्निपथ, लक बाय चांस, दो दूनी चार, देव डी, कपूर एंड संस, औरंगजेब जैसी फ़िल्मों में बढ़ती उम्र के साथ कैरेक्टर रोल में यादगार रहे हैं. ऋषि कपूर खुद कहते थे "पहली पारी में मैंने एक जैसे रोल किए. पहले फेज में कोई वेरायटी नहीं थी, लेकिन दूसरे फेज में मैं खुद नए - नए प्रयोग करता हूँ. अब ऐसे रोल करते हुए कुछ अपने फिल्मी सफर पर कह सकता हूं, कि थोड़ा लालची होता जा रहा हूं. मैंने ज़िन्दगी में कभी ऑडिशन नहीं दिया, लेकिन अमिताभ बच्चन के साथ 102 नॉट आउट में मैंने ऑडिशन दिया. अब मैं फ़िल्मों में अपनी मनमानी नहीं करता क्योंकि निर्देशक अपनी स्टोरी को अपने मुताबिक अगर काम ले तो फिल्म सही तैयार होती है. ऋषि कपूर की ज़िन्दगी खट्टी - मीठी रही है. अपने सामाजिक जीवन में ऋषि कपूर बेबाक, कन्फ्यूज्ड दिखते रहें हों. हो सकता है, उनको भारत सरकार से कोई बड़ा सम्मान न मिलने का कारण भी रहा है, वो हमेशा इस बात से दुखी रहते थे, कि मुझे पद्मश्री तक नहीं मिला. सेकुलर तबियत के इंसान होते हुए भी नरेंद्र मोदी की तारीफें भी कुछ इसी तरफ इशारा करती हैं, हालांकि नरेन्द्र मोदी सरकार ने भी ऋषि कपूर को कोई पद्म सम्मान नहीं दिया.

विनोद खन्ना की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए ऋषि कपूर ने कहा था 'विनोद खन्ना इतने बड़े सुपरस्टार आज उनको कोई कंधा देने के लिए चार लोग भी नहीं दिख रहे. कभी मेरे साथ भी ऐसे ही होगा कि मुझे भी कन्धा देने के लिए चार लोग नहीं होंगे. ऋषि कपूर कोविड-19 के समय भारी बीमारी के बाद 30 अप्रैल 2020 को इस दुनिया से रुख़सत कर गए. ऋषि कपूर ने जो भी कुछ कहा हो, जो भी विवादित मुद्दों पर अपने बयानों से छौंक लगाया हो, भले ही विवादित बयानों के ज़रिए कुछ सनसनी फैलाई हो, लेकिन उनकी सिनेमाई यात्रा अभूतपूर्व रही है. ऋषि कपूर तीन पीढ़ियों को प्यार सिखाने वाले कई पीढ़ियों को जोड़ने के सूत्रधार रहे हैं. वो अपनी रचनात्मक जीवन के लिए हमेशा याद रहेंगे.

दिलीप कुमार

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