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वॉइस ऑफ वर्सटैलिटी आशा भोसले: शास्त्रीयता की जड़ों से ग्लोबल पॉप के शिखर तक'

'वॉइस ऑफ वर्सटैलिटी आशा भोसले: शास्त्रीयता की जड़ों से ग्लोबल पॉप के शिखर तक' हिंदी सिनेमा के सौ साल से ज्यादा के सफर में अगर कोई एक ऐसी आवाज़ है जो बचपन की लोरियों से लेकर जवानी की मस्ती और बुढ़ापे की संजीदगी तक हमारे साथ रही है, तो वो है आशा ताई... आशा भोसले। अक्सर कहा जाता है कि महानता की छाँव में अपना वजूद बनाना सबसे मुश्किल होता है। आशा जी के सामने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की वह हिमालय जैसी शख्सियत थी, जिसकी धमक पूरी दुनिया में थी। लेकिन आशा भोसले ने उस छाँव में रुकने के बजाय अपनी एक ऐसी स्वतंत्र राह चुनी, जहाँ वे खुद एक मुकम्मल शिखर थीं।  आशा जी की सबसे बड़ी खूबी उनकी 'वर्सटैलिटी' यानी बहुमुखी प्रतिभा है। उन्होंने कभी खुद को किसी एक सांचे में नहीं ढलने दिया। संगीत के उस दौर में जब गायिकाओं के लिए कुछ खास दायरे तय थे, तब आशा जी ने उन सब सीमाओं को लांघ दिया। एक तरफ 'उमराव जान' की वो रूहानी गजलें हैं - 'इन आँखों की मस्ती के' या 'दिल चीज़ क्या है'-जिनमें उन्होंने नज़ाकत की पराकाष्ठा को छुआ, तो दूसरी तरफ 'पिया तू अब तो आजा' और 'दम मारो दम...

'नारी शक्ति वंदन: आधी आबादी का हक या 2029 का चुनावी दांव?

'नारी शक्ति वंदन: आधी आबादी का हक या 2029 का चुनावी दांव? यदि महिलाएं सशक्त होती हैं और देश के शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़ती है, तो हमारे लोकतंत्र और समाज के लिए इससे बेहतर भला और क्या होगा। आधी आबादी को उनका हक मिलना सिर्फ न्याय नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है। लेकिन जब हम महिला आरक्षण से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और इसके कानूनी पेचीदगियों को देखते हैं, तो साफ नजर आता है कि सरकार की मंशा इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। ऐसा लगता है कि इसे वास्तविक सशक्तिकरण के बजाय एक राजनीतिक हथियार के तौर पर अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इस कानून की सबसे बड़ी और बुनियादी कमी इसका शर्तों में बंधा होना है। सरकार ने बिल तो पास कर दिया, लेकिन इसके साथ एक ऐसी शर्त जोड़ दी जिसने इसे फिलहाल एक भविष्य का वादा बनाकर छोड़ दिया है। कानून के मुताबिक, आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना होगी और उसके आधार पर सीटों का नया बंटवारा यानी परिसीमन होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस लंबी प्रक्रिया के कारण यह आरक्षण 2029 या शायद 2034 तक खिंच सकता है। सवाल यह उठता है कि अगर नीयत साफ थी, तो इसे ...

'कैनवास पर जिंदगी: जब कला और नवाचार बनते हैं बदलाव की भाषा'

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'कैनवास पर जिंदगी: जब कला और नवाचार बनते हैं बदलाव की भाषा' (15 अप्रैल विश्व कला दिवस)  कहते हैं कि कोरे कागज पर जब पहली बार कोई टेढ़ी-मेढ़ी लकीर खींची जाती है, तो वह महज एक आकृति नहीं होती, बल्कि इंसान के भीतर पल रहे एक विचार का पहला भौतिक जन्म होता है। वह पहली लकीर गवाह होती है उस छटपटाहट की, जो कुछ नया रचने के लिए हमारे भीतर हमेशा मचलती रहती है। आज का समय केवल सूचनाओं का नहीं, बल्कि उन सूचनाओं को खूबसूरती से पेश करने और उनसे नए रास्ते तलाशने का है। कला और नवाचार, ये दो ऐसे शब्द हैं जो सुनने में तो अलग-अलग क्षेत्रों के लगते हैं, लेकिन असल में ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कला जहाँ हमें संवेदनाओं से भरती है, वहीं नवाचार उन संवेदनाओं को समाधान में बदल देता है।              भारतीय परिदृश्य में देखें तो कला कभी भी केवल दिखाने या सजाने की वस्तु नहीं रही, बल्कि यह हमारे जीवन जीने का एक अभिन्न ढंग रही है। हमारे देश के गाँवों की कच्ची दीवारों पर जब कोई महिला बिना किसी औपचारिक डिग्री के अपनी उंगलियों से 'मधुबनी' या 'वरली' के जरि...

'डॉ. अंबेडकर: जातियों के खांचो से कहीं बड़ा है 'राष्ट्र-शिल्पी' का कद'

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'डॉ. अंबेडकर: जातियों के खांचो से कहीं बड़ा है 'राष्ट्र-शिल्पी' का कद' (डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती विशेष) प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल का सूर्य जब भारतीय क्षितिज पर उदय होता है, तो वह केवल एक महापुरुष की जन्मतिथि का संदेश नहीं लाता, बल्कि वह उस महान संकल्प का स्मरण कराता है जिसने आधुनिक भारत की नियति लिखी थी। डॉ. भीमराव अंबेडकर-एक ऐसा नाम, जो आज भारतीय जनमानस की चेतना में गहराई तक रचा-बसा है। देश के हर कस्बे, हर चौराहे और सरकारी कार्यालयों में उनकी प्रतिमाएं जीवंत हैं, उनके नीले झंडे और जयकारों के स्वर आसमान छूते हैं। लेकिन, इस भव्य उत्सव और नारों के कोलाहल के बीच एक अत्यंत गंभीर और चुभता हुआ प्रश्न मौन खड़ा है, क्या हमने वाकई उस इंसान को समझा, जिसने अपना पूरा जीवन 'न्याय', 'समता' और 'मानवता' की वेदी पर होम कर दिया? या फिर हमने अपनी सुविधा, स्वार्थ और संकुचित सोच के अनुसार उनकी विरासत के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं? डॉ. अंबेडकर की शख्सियत का असली करिश्मा उनकी अद्भुत विद्वत्ता, उनके फौलादी इरादों और सबसे बढ़कर उनके अडिग नैतिक साहस में छिपा था। वे केवल एक सं...

जलियांवाला बाग: आज़ादी की वो कीमत, जिसे हिंदुस्तान कभी नहीं भूलेगा'

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'जलियांवाला बाग: आज़ादी की वो कीमत, जिसे हिंदुस्तान कभी नहीं भूलेगा'  इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो स्याही से नहीं, बल्कि इंसानी लहू से लिखी जाती हैं। 13 अप्रैल 1919 की वह मनहूस शाम भी एक ऐसी ही तारीख थी, जिसने न केवल पंजाब की मिट्टी को लाल किया, बल्कि सोए हुए समूचे हिंदुस्तान की सोई हुई आत्मा को भी झकझोर कर रख दिया। अमृतसर का वह छोटा सा मैदान, जिसे दुनिया आज 'जलियांवाला बाग' के नाम से जानती है, महज़ ईंट-पत्थरों का बना कोई स्मारक नहीं है। वह गवाह है उस अमानवीय बर्बरता का जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और वह प्रतीक है उस अटूट हौसले का जिसने दुनिया के सबसे बड़े ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की नींव रख दी थी। बैसाखी का पावन दिन था। पंजाब के गाँवों और शहरों में उत्सव का माहौल होना चाहिए था। लोग नए कपड़े पहनकर मेलों की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन अमृतसर की हवाओं में एक अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी। पूरा देश 'रोलेट एक्ट' जैसे काले कानून के खिलाफ गुस्से में उबल रहा था, जिसने बिना दलील और बिना वकील के किसी को भी जेल भेजने की ताक़त अंग्रेज़ों को दे दी थी। इसी अन...

सडकों पर ठहरी हुई ज़िंदगी: क्या हम इन मासूम बच्चों का बचपन देख पा रहे हैं?

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सडकों पर ठहरी हुई ज़िंदगी: क्या हम इन मासूम बच्चों का बचपन देख पा रहे हैं? शहरों की चकाचौंध भरी सड़कों पर दौड़ती गाड़ियाँ और काँच की ऊँची इमारतों से झाँकती कृत्रिम रोशनी विकास का बड़ा दावा करती हैं। लेकिन इसी चमक-धमक के बीच, ट्रैफिक सिग्नल की लाल बत्ती पर कुछ नन्हे हाथ आपकी कार के शीशे थपथपाते हैं। कोई हाथ में रंगीन गुब्बारे लिए खड़ा है, तो कोई महज़ चंद रुपयों के लिए पेन या रुमाल आपकी ओर बढ़ा देता है। आज 12 अप्रैल है—अंतर्राष्ट्रीय स्ट्रीट चिल्ड्रेन डे। यह दिन दुनिया भर में उन बच्चों के नाम समर्पित है, जिनका घर कोई चारदीवारी नहीं बल्कि तपती सड़कें और असुरक्षित फुटपाथ हैं। सवाल यह है कि क्या हम इन बच्चों को वाकई देख पा रहे हैं, या इन्हें सड़क के शोर का एक हिस्सा समझकर हर रोज़ नज़रअंदाज़ कर रहे हैं?सड़क पर रहने वाले इन बच्चों के लिए आसमान ही छत है और कंक्रीट का फुटपाथ ही बिछौना। इनके हिस्से में बचपन के खिलौने नहीं, बल्कि वह उत्तरदायित्व है जिसे उठाने की उम्र अभी इनकी हुई भी नहीं। एक तरफ जहाँ हम डिजिटल इंडिया और विश्व गुरु बनने का संकल्प दोहराते हैं, वहीं दूसरी ओर देश के हज़ारों बच्चे कूड़ा ब...

सत्यशोधक ज्योतिबा फुले: जिनके विचारों ने बदली समाज की दिशा'

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'सत्यशोधक ज्योतिबा फुले: जिनके विचारों ने बदली समाज की दिशा' इतिहास अक्सर उन लोगों को भूल जाता है जो किसी भव्य इमारत की नींव में ईंट बनकर समा जाते हैं। लेकिन जब-जब आधुनिक भारत में न्याय और बराबरी की बात होगी, ज्योतिबा फुले का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। फुले कोई पारंपरिक नेता नहीं थे, वे एक ऐसे दूरद्रष्टा शिक्षक थे जिन्होंने ब्लैकबोर्ड पर अक्षर लिखने से पहले समाज की कड़वी सच्चाइयों और गरीबों के आंसू पढ़ना सीखा था। आज हम जिस आधुनिक भारत में सांस ले रहे हैं, जहाँ महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और समाज का हर वर्ग तरक्की के सपने देख रहा है, उसकी पहली मजबूत ईंट 19वीं सदी में ज्योतिबा फुले ने ही रखी थी।वह एक ऐसा दौर था जब शिक्षा पर कुछ खास लोगों का एकाधिकार था और समाज की एक बहुत बड़ी आबादी अज्ञानता के घने अंधेरे में कैद थी। ज्योतिबा ने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि किसी को गुलाम बनाने के लिए लोहे की जंजीरें जरूरी नहीं होतीं, बल्कि उसे 'अशिक्षा' के पिंजरे में कैद रखना ही काफी होता है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से समाज को आईना दिखाते हुए कहा था- "शिक्षा के बिना इंसान...