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सत्ता नहीं सुनने वाली! तो फ़िर बार - बार अपनी जान दांव पर क्यों लगा रहे हैं सोनम वांगचुक?

सत्ता नहीं सुनने वाली! तो फ़िर बार - बार अपनी जान दांव पर क्यों लगा रहे हैं सोनम वांगचुक? यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर चुका है, उसे अपने ही देश में न्याय मांगने के लिए बार-बार भूखा बैठना पड़ रहा है। सोनम वांगचुक, जिन्होंने कुछ समय पहले लद्दाख की बर्फीली वादियों और वहां के नाजुक पर्यावरण को बचाने के लिए शून्य से नीचे के तापमान में हफ्तों लंबा अनशन किया था, आज वही वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर भीषण गर्मी में अपनी जान दांव पर लगाए हुए हैं। इस बार उनका अनशन केवल लद्दाख के अधिकारों के लिए नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों युवा छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने और देश की परीक्षा प्रणाली में लगे 'पेपर लीक' के घुन को साफ करने के लिए है। यह पहली बार नहीं है जब सोनम वांगचुक ने किसी बड़े मकसद के लिए पानी और नमक पर दिन गुजारे हैं। इससे पहले लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा दिलाने के आंदोलन के दौरान उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसी सख्त धाराओं के तहत महीनों तक जेल की सलाखें भी झेलन...

बाढ़ से आज़ादी कब?

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बाढ़ से आज़ादी कब? आज़ादी के 79वें साल में भी देश की 60% बाढ़ का बोझ ढोते बिहार, असम और यूपी मानसून आते ही देश के बड़े हिस्से में खुशियों की फुहारें बरसती हैं, मोर नाचते हैं और किसान मल्हार गाते हैं। ठीक इसी समय पूरा देश अगस्त के महीने में आज़ादी का जश्न मनाने की तैयारियों में डूब जाता है। तिरंगे लहराए जाते हैं और लालकिले की प्राचीर से विकास के बड़े-बड़े दावे गूंजते हैं। लेकिन भारत के तीन राज्यों - बिहार, असम और उत्तर प्रदेश के करोड़ों लोगों के लिए आसमान से बरसने वाली यह पहली बूंद और आज़ादी का यह महीना किसी उत्सव की शुरुआत नहीं, बल्कि उनकी सामूहिक आपदा लेकर आता है। नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की रिपोर्ट चीख-चीख कर कहती है कि देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा अकेले ये तीन राज्य मिलकर सहते हैं। साल 2026 आ चुका है, दिल्ली के वातानुकूलित और आलीशान दफ्तरों में बैठकर चांद-मंगल पर बस्तियां बसाने और 'आत्मनिर्भर भारत' के नारे गढ़े जा रहे हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन तीन राज्यों की आधी आबादी को हर साल जीते-जी जल-समाधि लेने के लिए छोड़ दिया जाता है। जिस देश क...

समान नागरिक संहिता: कानूनी सुधार की नीयत या राजनीतिक बिसात?

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समान नागरिक संहिता: कानूनी सुधार की नीयत या राजनीतिक बिसात? भारत की राजनीति में समान नागरिक संहिता एक ऐसा विषय है, जो जब भी सामने आता है, अपने साथ बहसों का एक नया दौर शुरू हो जाता है। उत्तराखंड में इसे लागू किए जाने के बाद, अब देश के सबसे बड़े आर्थिक और राजनीतिक केंद्र महाराष्ट्र ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में इस कानून का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय समिति का गठन किया है। सरकार की कोशिश है कि आगामी सत्रों में ही इस विधेयक को विधानसभा में पेश कर दिया जाए। लेकिन क्या देश के सबसे अधिक सामाजिक और आर्थिक विविधता वाले राज्यों में से एक में इसे लागू करना इतना सीधा रास्ता है? या फिर इस कदम की टाइमिंग के पीछे चुनावी समीकरणों की कोई गहरी बिसात बिछी है?  जब हम सरकार के इस फैसले को बारीकी से देखते हैं, तो इसके दोनों पहलुओं को निष्पक्षता से तौलना बहुत जरूरी हो जाता है। इसके समर्थक इसे संविधान के अनुच्छेद 44 में दर्ज नीति निदेशक तत्वों के तहत 'एक राष्ट्र, एक कानून' के ...

'कद्दावर नेताओं के 'पंख कतरने' का खेल: दतिया ने खोली भाजपा की पोल'

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'कद्दावर नेताओं के 'पंख कतरने' का खेल: दतिया ने खोली भाजपा की पोल'  भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूरी राजनीति जिस एक मजबूत धुरी पर टिकी है, उसे 'अनुशासन' कहा जाता है। संघ और भाजपा की कार्यप्रणाली में बगावत या खुले विद्रोह को कभी भी स्वीकार नहीं किया गया। यहाँ यह सिद्धांत पत्थर की लकीर माना जाता है कि नेता से बड़ा दल होता है और दल से बड़ा देश। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश के दतिया की सड़कों पर जो अभूतपूर्व नजारा दिखा, उसने इस पारंपरिक राजनीतिक सोच और कैडर के अनुशासन को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उपचुनाव का उम्मीदवार बनाना पार्टी के भीतर सुलग रही उस अंदरूनी कलह को सरेआम बाहर ले आया, जिसे अब तक दिल्ली और भोपाल के बंद कमरों में दबाकर रखने की पूरी कोशिश की जा रही थी। दतिया में जो कुछ भी हुआ, वह केवल एक टिकट कटने का सतही विरोध नहीं था। वह असल में एक ताकतवर क्षेत्रीय क्षत्रप के जमीनी प्रभाव और शक्ति का खुला प्रदर्शन था। नेशनल हाईवे-44 पर समर्थकों द्वारा किया गया 12 घंटे क...

यूरोप की भयानक गर्मी भारत के लिए आख़िरी अल्टीमेटम है

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'यूरोप की भयानक गर्मी भारत के लिए आख़िरी अल्टीमेटम है'  यूरोप का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में बर्फ के पहाड़, सुहावना मौसम और ठंडी हवाएं आने लगती हैं। लेकिन आज वही यूरोप भीषण गर्मी की आग में बुरी तरह झुलस रहा है। जिन देशों के लोगों ने अपने जीवन में कभी पंखा, कूलर या एयर कंडीशनर की जरूरत तक महसूस नहीं की थी, वहां अब पारा 45 डिग्री के पार जा रहा है। सड़कें पिघल रही हैं, नदियां  सूख रही हैं और जंगलों में भीषण आग लगी हुई है। सबसे डरावनी बात यह है कि इस जानलेवा गर्मी की वजह से वहां हजारों लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। भारत के लोग सोच सकते हैं कि हमारे यहां तो 40 या 45 डिग्री तापमान होना आम बात है, फिर यूरोप में इतना हंगामा क्यों मचा है। असल में यूरोप के सारे मकान ठंड से बचने के हिसाब से बने हैं। ये मकान इस तरह तैयार किए जाते हैं कि बाहर की गर्मी को अंदर ही रोक लें। अब जब वहां अचानक इतनी भयंकर गर्मी पड़ रही है, तो ये मकान भट्टी की तरह तपने लगे हैं। वहां की केवल बीस प्रतिशत आबादी के पास ही घरों में एयर कंडीशनर हैं, इसलिए लोग इस अचानक आई मुसीबत को झेल नहीं पा रहे हैं। यूरोप का...

अकेले क्यों थकना, जब साथ मिलकर बदल सकते हैं जमाना!

अकेले क्यों थकना, जब साथ मिलकर बदल सकते हैं जमाना! (04 जुलाई अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस)  सोचिए, अगर हाथ की सिर्फ एक उंगली से किसी भारी चीज को उठाने की कोशिश करें, तो क्या होगा? शायद उंगली में मोच आ जाएगी। लेकिन जब पांचों उंगलियां मिलकर मुट्ठी बन जाती हैं, तो ताकत कई गुना बढ़ जाती है। बस यही सीधा सा फंडा है सहकारिता का। आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर 'मैं, मेरा और मुझे' में खोए रहते हैं। लेकिन साल में एक दिन ऐसा आता है जो हमें याद दिलाता है कि जिंदगी की असली गाड़ी अकेले नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने से ही सुचारू रूप से चलती है। जुलाई का पहला शनिवार इसी एकता और भाईचारे के नाम होता है, जिसे लोग तकनीकी भाषा में अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस कह देते हैं। बहुत से लोग इस भारी-भरकम शब्द को सुनकर कन्फ्यूज हो जाते हैं, लेकिन इसका मतलब बहुत ही सीधा है - एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ना। हमारे समाज में हर किसी के पास बहुत सारा पैसा या बड़ी-बड़ी सिफारिशें नहीं होतीं। किसी के पास कोई छोटा सा हुनर होता है, तो किसी के पास थोड़ी सी जमीन। अब अकेले दम पर तो बड़ा बिजनेस खड़ा करना मुमकि...

'एनडीए कुनबे में सांसद बढ़े पर बढ़ गया अंदरूनी असंतोष'

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'एनडीए कुनबे में सांसद बढ़े पर बढ़ गया अंदरूनी असंतोष'  भारतीय राजनीति में इस समय एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। विपक्ष के सांसदों की टूट-फूट से सत्ताधारी  एनडीए का कुनबा लगातार बड़ा हो रहा है। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि सरकार पहले से कहीं अधिक मजबूत और सुरक्षित हो चुकी है। लेकिन जब हम दिल्ली के राजनीतिक गलियारों और संसद के आंकड़ों की गहराई में जाते हैं, तो कहानी कुछ और ही नजर आती है। बाहर से ताकतवर दिख रही इस सरकार के भीतर तनाव की एक नई लहर दौड़ गई है।  साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत का जाजुई आंकड़ा नहीं छू सकी थी। तब एनडीए ने 293 सीटों के साथ सरकार का गठन किया था। सरकार को टिकाए रखने के लिए 272 सांसदों की जरूरत होती है। हाल के दिनों में विपक्षी खेमे, खासकर टीएमसी और शिवसेना, जैसे दलों से सांसदों के पाला बदलने के कारण अब एनडीए का आंकड़ा 313 के पार पहुंच चुका है। सीधे गणित से देखें तो अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इस सरकार को गिराना विपक्ष के लिए पूरी तरह असंभव है। सरकार गिरने का कोई तात्कालिक खतरा नहीं है, इसलि...