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उत्तर भारत में आखिर कब तक 'पुराने चेहरों' के मोह में उलझी रहेगी कांग्रेस?

उत्तर भारत में आखिर कब तक 'पुराने चेहरों' के मोह में उलझी रहेगी कांग्रेस? आज की तारीख में राजनीति को देखें, तो कांग्रेस और भाजपा के बीच की जंग अब एक नए मोड़ पर है। एक तरफ दक्षिण भारत है, जहाँ राहुल गांधी ने गजब की मैच्योरिटी दिखाई है। तमिलनाडु में जब सुपरस्टार थलापति विजय ने अपनी नई पार्टी टीवीके के साथ मैदान मारा, तो राहुल ने किसी 'बड़े भाई' की अकड़ दिखाने के बजाय उन्हें सम्मान दिया। यह राहुल की ही रणनीति थी कि भाजपा को रोकने के लिए वहां एक ऐसी लामबंदी हुई कि पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन तक को कहना पड़ा कि 'छह महीने तक विजय से कोई सवाल नहीं होगा'। कल जब विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो कांग्रेस वहां एक उदार साथी के रूप में खड़ी थी। कर्नाटक, तेलंगाना और केरल में अपनी पकड़ मजबूत कर कांग्रेस ने दक्षिण को अपना अभेद्य किला बना लिया है। लेकिन, जैसे ही हम विंध्य पर्वत पार कर उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में आते हैं, कहानी एकदम उलट जाती है। सवाल वही है जो दांव समंदर किनारे फिट है, वह गंगा यमुना के मैदानों में आकर फेल क्यों हो जाता है? उत्तर भारत में कांग्रेस का वोट शेयर...

अस्थमा की वैश्विक त्रासदी: सबसे ज़्यादा भारत में दुनिया की 46% मौतें

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अस्थमा की वैश्विक त्रासदी: सबसे ज़्यादा भारत में दुनिया की 46% मौतें  शहर की भागती भीड़ में अगर आप किसी चौराहे पर खड़े होकर गौर करें, तो आपको हर पांचवें-छठे बच्चे के कंधे पर लटके स्कूल बैग के किनारे से एक प्लास्टिक का 'इनहेलर' झांकता मिल जाएगा। यह आज की वह कड़वी हकीकत है जिसे हम विकास की चकाचौंध में अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। हमने आलीशान हाईवे और चमकते एक्सप्रेस-वे तो बना लिए, हाथ में 5जी मोबाइल भी थाम लिया, लेकिन उसी हाथ में हमारे बच्चों के लिए नेबुलाइजर की पाइपें भी थमा दीं। हम विकास की ऐसी दौड़ में शामिल हो गए हैं जहां बैंक बैलेंस तो बढ़ रहा है, लेकिन फेफड़ों की उम्र घट रही है। आज 'विश्व अस्थमा दिवस' पर जब दुनिया इलाज की पहुंच की बात कर रही है, तो हमें यह पूछना होगा कि क्या हम वाकई बीमारी का इलाज ढूंढ रहे हैं या उस जड़ को ही खाद-पानी दे रहे हैं जो इस बीमारी को पैदा कर रही है?अस्थमा अब केवल जेनेटिक या 'पुरानी बीमारी' नहीं रह गई है। यह विशुद्ध रूप से एक 'इकोलॉजिकल क्राइम' यानी पर्यावरण के खिलाफ किए ग...

'क्या भारत दो-दलीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है?'

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'क्या भारत दो-दलीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है?'  भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी बात निकलकर आई है, जिसे समझना जरूरी हो गया है। कभी 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा लगाने वाली भाजपा का ये सियासी जुमला लगता था, लेकिन आज की हकीकत देखें तो यह 'क्षेत्रीय दल मुक्त भारत' के एक बड़े प्लान की तरह नजर आता है। भाजपा की रणनीति अब स्पष्ट हो चली है, वह पहले बड़े प्यार से किसी क्षेत्रीय दल की ‘बांह’ पकड़ती है, उसके साथ मिलकर सरकार बनाती है, वहाँ का गुणा गणित समझती है, उसके घर के भीतर तक अपनी पैठ बनाती है और फिर धीरे से उसी साथी को किनारे लगाकर अपना झंडा गाड़ देती है। नीतीश कुमार हों या उद्धव ठाकरे, नवीन पटनायक हों या बादल परिवार... इन सब की कहानियाँ एक ही पैटर्न पर लिखी गई हैं। बिहार को ही देख लीजिए, जहाँ नीतीश कुमार कभी 'बड़े भाई' हुआ करते थे और भाजपा उनके पीछे चला करती थी। लेकिन आज पासा पूरी तरह पलट चुका है; भाजपा बिहार की सबसे बड़ी ताकत बन गई है और नीतीश अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराष्ट्र में जिस शिवसेना ने भाजपा को उंगल...

मोबाइल की चकाचौंध में गुम हुआ बचपन'

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'मोबाइल की चकाचौंध में गुम हुआ बचपन'  आज की शाम किसी भी मोहल्ले के पार्क या कॉलोनी के पास से गुज़रिए, एक सन्नाटा मिलेगा, वह शोर-शराबा, बच्चों के चहकने की आवाज़े, और पकड़म-पकड़ाई के खेल अब न के बराबर दिखते हैं। अगर कुछ बच्चे नजर भी आते हैं, तो अक्सर वे किसी बेंच पर एक साथ बैठे, सिर झुकाए मोबाइल की स्क्रीन में खोए रहते हैं। उनके अंगूठे स्क्रीन पर तेज़ी से चल रहे होते हैं, जहाँ उनका डिजिटल खिलाड़ी मैदान पर बहुत तेज़ दौड़ रहा होता है, लेकिन हकीकत में उनके अपने पैर थमे हुए हैं।  यह मंजर आज की उस कड़वी हकीकत को बताता है जहाँ बचपन खेल के मैदानों से कटकर पांच इंच की स्क्रीन में सिमट गया है। 7 मई का दिन पूरी दुनिया में विश्व एथलेटिक्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। तारीखों के हिसाब से देखें तो यह दिन खेलों को बढ़ावा देने का एक मौका हो सकता है, लेकिन समाज के नाते यह दिन हमसे कुछ सवाल पूछता है। सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या हमारे जीवन से मैदान और मिट्टी का रिश्ता टूट रहा है? एथलेटिक्स कोई भारी-भरकम शब्द नहीं है, यह तो हम सबकी बुनियादी फितरत है। दौड़ना, कूदना और अपनी पूरी ताकत से ...

'आजादी का मोल तो जान लिया, पर नागरिक होने का फर्ज कब सीखेंगे

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'आजादी का मोल तो जान लिया, पर नागरिक होने का फर्ज कब सीखेंगे?'  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 10 मई की तारीख महज एक घटना नहीं, बल्कि एक हमारी चेतना के उदय का प्रतीक है। संयोग देखिए कि वर्ष 1857 के उस रविवार और आज के रविवार में एक अद्भुत समानता है - वही तारीख और वही दिन। लेकिन इस समानता के बीच समय का एक लंबा फासला है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिस आजादी की नींव मेरठ की उन गलियों में रखी गई थी, उसे एक नागरिक के तौर पर हमने कितना समझा है। 10 मई 1857 की उस शाम मेरठ छावनी में जब भारतीय सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल फूंका, तो वह केवल एक सैन्य बगावत नहीं थी। वह बरसों से दबे हुए उस गुस्से की आवाज थी, जो ब्रिटिश शासन के जुल्म और बेइज्जती के खिलाफ पनप रहा था। अक्सर कहा जाता है कि बगावत चर्बी वाले कारतूसों की वजह से हुई, लेकिन असल में यह लड़ाई अपनी मिट्टी और अपनी पहचान को बचाने की थी। सोचिए, उस दौर में न तो आज की तरह मोबाइल फोन थे और न ही इंटरनेट। उन सैनिकों के पास लड़ने के लिए न तो बहुत आधुनिक हथियार थे और न ही सुख-सुविधाएं। इसके बावजू...

संवैधानिक संस्थानों पर गहराता संदेह और बदलता सियासी मिजाज'

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'संवैधानिक संस्थानों पर गहराता संदेह और बदलता सियासी मिजाज'  भारतीय लोकतंत्र आज एक दोराहे पर है, जहां चुनाव के नतीजों से ज्यादा चर्चा चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादाओं की हो रही है। देश की राजनीति में हाल के दिनों में जो कुछ घटा है—चाहे वह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और राज्यपाल के बीच का अभूतपूर्व टकराव हो, या फिर विपक्षी नेताओं का जेल जाना - इन सबने आम जनता के मन में कई गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं। क्या हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं वास्तव में स्वतंत्र हैं? या फिर सत्ता की बिसात पर मोहरे अब संस्थानों की गरिमा से बड़े हो गए हैं? सबसे पहले बात करते हैं पश्चिम बंगाल की। वहां संवैधानिक संकट जिस मोड़ पर पहुंचा है, वह भारतीय संसदीय इतिहास के लिए एक चिंताजनक अध्याय है। ममता बैनर्जी ने चुनाव हारने के बाद साफ कह दिया कि हम हारे नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग ने हमें हराया है, मैं इस्तीफा नहीं दूंगी, राज्यपाल चाहें तो मुझे सस्पेंड कर दें, मैं चुनावी प्रक्रिया में धांधली के मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाऊँगी या फिर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट जाऊँगी' यह पहली बार हुआ है जब किसी मु...

वॉइस ऑफ वर्सटैलिटी आशा भोसले: शास्त्रीयता की जड़ों से ग्लोबल पॉप के शिखर तक'

'वॉइस ऑफ वर्सटैलिटी आशा भोसले: शास्त्रीयता की जड़ों से ग्लोबल पॉप के शिखर तक' हिंदी सिनेमा के सौ साल से ज्यादा के सफर में अगर कोई एक ऐसी आवाज़ है जो बचपन की लोरियों से लेकर जवानी की मस्ती और बुढ़ापे की संजीदगी तक हमारे साथ रही है, तो वो है आशा ताई... आशा भोसले। अक्सर कहा जाता है कि महानता की छाँव में अपना वजूद बनाना सबसे मुश्किल होता है। आशा जी के सामने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की वह हिमालय जैसी शख्सियत थी, जिसकी धमक पूरी दुनिया में थी। लेकिन आशा भोसले ने उस छाँव में रुकने के बजाय अपनी एक ऐसी स्वतंत्र राह चुनी, जहाँ वे खुद एक मुकम्मल शिखर थीं।  आशा जी की सबसे बड़ी खूबी उनकी 'वर्सटैलिटी' यानी बहुमुखी प्रतिभा है। उन्होंने कभी खुद को किसी एक सांचे में नहीं ढलने दिया। संगीत के उस दौर में जब गायिकाओं के लिए कुछ खास दायरे तय थे, तब आशा जी ने उन सब सीमाओं को लांघ दिया। एक तरफ 'उमराव जान' की वो रूहानी गजलें हैं - 'इन आँखों की मस्ती के' या 'दिल चीज़ क्या है'-जिनमें उन्होंने नज़ाकत की पराकाष्ठा को छुआ, तो दूसरी तरफ 'पिया तू अब तो आजा' और 'दम मारो दम...