समंदर रो रहा है और हम सो रहे हैं
'समंदर रो रहा है और हम सो रहे हैं' (08 जून विश्व महासागर दिवस) शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसे समंदर किनारे बैठना अच्छा न लगता हो। पानी की उठती-गिरती लहरें, ठंडी हवा और दूर तक फैला नीला पानी हर किसी का मन मोह लेता है। लेकिन क्या कभी हम यह सोचते हैं कि जिस समंदर को हम सिर्फ घूमने-फिरने की जगह समझते हैं, वो असल में हमारी हर सांस से जुड़ा हुआ है? आज 8 जून को पूरी दुनिया विश्व महासागर दिवस मना रही है। यह दिन सिर्फ अख़बारों में बधाई देने या भाषण झाड़ने का दिन नहीं है। यह दिन एक चेतावनी है उस समंदर की तरफ से, जो इंसानों की गलतियों की वजह से अब धीरे-धीरे बीमार पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने इस बार रीइमेजिन यानी फिर से सोचने की बात कही है, जो हमें याद दिलाती है कि अगर समंदर नहीं बचा, तो हमारा वजूद भी नहीं बचेगा। किताबों में तो लिख दिया जाता है कि धरती पर सत्तर प्रतिशत पानी है। लेकिन आसान भाषा में समझें तो यह समंदर हमारे ग्रह के फेफड़े हैं। हम जो सांस लेते हैं, उसकी आधी से ज़्यादा ऑक्सीजन समंदर के छोटे-छोटे पौधों से आती है, न कि सिर्फ जंगलों से। दुनिया का मौसम बदलना, टाइम पर बारिश हो...