"मशीनी सांसें और मानवीय गरिमा: जीवन-मृत्यु के बीच का नैतिक धर्मसंकट"
"मशीनी सांसें और मानवीय गरिमा: जीवन-मृत्यु के बीच का नैतिक धर्मसंकट" जीवन की परिभाषा केवल धड़कनों के चलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें चेतना और मानवीय गरिमा का होना अनिवार्य है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हरीश राणा के मामले में 'पैसिव यूथेनेशिया' यानि निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति देना, कानून के शुष्क पन्नों से निकलकर मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर लिया गया एक अत्यंत साहसी और ऐतिहासिक फैसला है। पिछले 13 वर्षों से कोमा में पड़े हरीश का मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम विज्ञान के सहारे किसी व्यक्ति को 'जीवित' रख रहे हैं या उसे 'मरने' की अनुमति न देकर उसकी गरिमा का अपमान कर रहे हैं? इस पूरी बहस के केंद्र में 'माइंड डेड' की वह भयावह स्थिति है, जिसे समझना आज के दौर में हर किसी के लिए अनिवार्य हो गया है। चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट करता है कि जब मस्तिष्क का वह हिस्सा पूरी तरह नष्ट हो जाता है जो चेतना और श्वसन को नियंत्रित करता है, तो व्यक्ति केवल एक भौतिक शरीर रह जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज न तो स्पर्श महसूस कर सकता है, न कोई आवाज़ ...