'डॉ. अंबेडकर: जातियों के खांचो से कहीं बड़ा है 'राष्ट्र-शिल्पी' का कद'
'डॉ. अंबेडकर: जातियों के खांचो से कहीं बड़ा है 'राष्ट्र-शिल्पी' का कद' (डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती विशेष) प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल का सूर्य जब भारतीय क्षितिज पर उदय होता है, तो वह केवल एक महापुरुष की जन्मतिथि का संदेश नहीं लाता, बल्कि वह उस महान संकल्प का स्मरण कराता है जिसने आधुनिक भारत की नियति लिखी थी। डॉ. भीमराव अंबेडकर-एक ऐसा नाम, जो आज भारतीय जनमानस की चेतना में गहराई तक रचा-बसा है। देश के हर कस्बे, हर चौराहे और सरकारी कार्यालयों में उनकी प्रतिमाएं जीवंत हैं, उनके नीले झंडे और जयकारों के स्वर आसमान छूते हैं। लेकिन, इस भव्य उत्सव और नारों के कोलाहल के बीच एक अत्यंत गंभीर और चुभता हुआ प्रश्न मौन खड़ा है, क्या हमने वाकई उस इंसान को समझा, जिसने अपना पूरा जीवन 'न्याय', 'समता' और 'मानवता' की वेदी पर होम कर दिया? या फिर हमने अपनी सुविधा, स्वार्थ और संकुचित सोच के अनुसार उनकी विरासत के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं? डॉ. अंबेडकर की शख्सियत का असली करिश्मा उनकी अद्भुत विद्वत्ता, उनके फौलादी इरादों और सबसे बढ़कर उनके अडिग नैतिक साहस में छिपा था। वे केवल एक सं...