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'दलबदल की राजनीति : विचारधारा पर भारी सत्ता की भूख'

'दलबदल की राजनीति : विचारधारा पर भारी सत्ता की भूख'  भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का बिखरना और उनके नेताओं का पाला बदलना आज एक ऐसा कड़वा सच बन चुका है, जिसने लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को हिलाकर रख दिया है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी की टूट के बाद अब पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर मची रार ने देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हाल ही में टीएमसी के करीब 20 बागी सांसदों का दिल्ली में भाजपा के मंत्रियों से मिलना और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के पास जाना यह साफ दिखाता है कि परदे के पीछे की सियासी खिचड़ी पूरी तरह पक चुकी है। सवाल केवल टीएमसी का नहीं है, बल्कि यह समझने का है कि आखिर चुनाव बीतते ही क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं की अंतरात्मा अचानक कैसे जाग जाती है? जब तक पार्टी सत्ता में रहती है या उसकी ताकत बनी रहती है, तब तक नेतृत्व की सारी कमियां और तानाशाही इन नेताओं को क्यों नहीं दिखतीं? अगर हम इस पूरे प्रकरण का कानूनी सच देखें, तो संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी सांसद की सदस्यता सीधे तौर पर रद्द हो सकती है। लेकिन इस कानून में एक बहुत बड़ा ...

नेहरू फोबिया बनाम मोदी ब्रांडिंग: कुर्सी के बाद क्या बचेगा?

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नेहरू फोबिया बनाम मोदी ब्रांडिंग: कुर्सी के बाद क्या बचेगा? भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिन्हें समय के साथ लोग भूल नहीं पाते, बल्कि उनकी याद और मजबूत हो जाती है। देश के पहले प्रधानमंत्री स्वतंत्रता सेनानी पंडित जवाहरलाल नेहरू एक ऐसा ही नाम हैं। आज उन्हें गुजरे 60 साल से ज्यादा का समय हो चुका है, फिर भी देश की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। सच तो यह है कि आज उनके विरोधी भी सुबह से शाम तक नेहरू का नाम लिए बिना अपनी राजनीति नहीं चमका पाते। नफरत या विरोध के बहाने ही सही, नेहरू को लगातार याद करना उनकी इसी बड़ी ताकत को दिखाता है। दूसरी तरफ आज देश की सत्ता पर काबिज पीएम नरेंद्र मोदी हैं, अक्सर उनके समर्थक और उनकी पीआर टीम उनकी तुलना नेहरू से करने की कोशिश करती है। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है - क्या आज से 60 साल बाद कोई उन्हें इस तरह याद करेगा? क्या खुद उनकी अपनी पार्टी भाजपा उन्हें उस आदर के साथ याद रखेगी जो स्थान कांग्रेस में हमेशा नेहरू का रहा है? राजनीति का एक कड़वा सच है कि जो साख केवल सत्ता और डर पर टिकती है, वह कुर्सी जाते ही खत्म हो जाती है। आज भाज...

खत्म हुआ निष्पक्षता का दौर: चुनाव आयोग की बची-कुची साख का अंतिम संस्कार'

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'खत्म हुआ निष्पक्षता का दौर: चुनाव आयोग की बची-कुची साख का अंतिम संस्कार' भारत में एक दौर वह भी था जब चुनाव आयोग का नाम सुनते ही बड़े से बड़े राजनेताओं के पसीने छूट जाते थे, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के ज़माने में जनता को यह अटूट भरोसा था कि व्यवस्था चाहे जितनी भी रसूखदार हो, लोकतंत्र का यह पहरेदार किसी के आगे नहीं झुकेगा। लेकिन आज वह भरोसा इतिहास की धूल में मिल चुका है।  हालिया मध्य प्रदेश और झारखंड के राज्यसभा चुनाव के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसने यह साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग अब अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को पूरी तरह खो चुका है। यह संस्था अब लोकतंत्र की रक्षक नहीं, बल्कि सत्ता की सहूलियत के हिसाब से पर्चियां काटने वाला एक सरकारी महकमा बनकर रह गई है। इस संस्था की साख खत्म होने का सबसे ताजा और पुख्ता सबूत मध्य प्रदेश में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन का रद्द होना है, एक ऐसे मामले में, जो कानूनी तौर पर पूरी तरह से एक सामान्य नोटिस था और जिस पर अदालत ने संज्ञान तक नहीं लिया था, आयोग के रिटर्निंग ऑफिसर ने महज़ 15 मिनट के भीतर ...

'कब थमेगी नन्हे हाथों से मजदूरी?'

'कब थमेगी नन्हे हाथों से मजदूरी?'  (12 जून बाल श्रम निषेध दिवस)  यह हमारे समाज का एक ऐसा कड़वा सच है जिसे हम रोज देखते हैं और देखकर भी आगे बढ़ जाते हैं. एक तरफ वे बच्चे हैं जो सुबह-सुबह अच्छे कपड़े पहनकर, भारी-भारी बैग टांगे स्कूल जाते दिखते हैं. उनकी आंखों में ढेर सारे सपने होते हैं. वहीं दूसरी तरफ, ठीक उसी सड़क के पार किसी दुकान या ढाबे पर कोई छोटा सा बच्चा जूठे बर्तन साफ कर रहा होता है. उसके हाथ काम करते-करते थक चुके होते हैं और उसके चेहरे पर सिर्फ एक ही डर होता है कि कहीं मालिक डांट न दे.  यह कहानी किसी एक शहर की नहीं है, हमारे आस-पास हर जगह यही हाल है. हर साल 12 जून को हम 'बाल श्रम निषेध दिवस' मनाकर सोच लेते हैं कि हमने अपना फर्ज पूरा कर दिया, लेकिन सच तो यह है कि एक दिन तय कर देने से इन बच्चों की जिंदगी नहीं बदलती. बचपन का मतलब क्या होता है? बचपन यानी बिना किसी टेंशन के जीना, दोस्तों के साथ खेलना, मिट्टी में खेलना और बस मजे करना. लेकिन जब इन्हीं नन्हे हाथों में खिलौनों या किताबों की जगह भारी ईंटें, चाय के कप या साफ-सफाई का झाड़ू थमा दिया जाता है, तो सिर्फ एक बच्चा...

'कब होगा राहुल गांधी का निष्पक्ष राजनीतिक मूल्यांकन?'

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'कब होगा राहुल गांधी का निष्पक्ष राजनीतिक मूल्यांकन?'  राजनीति में किसी नेता की छवि को बनाने और बिगाड़ने का खेल नया नहीं है। लेकिन जो खेल राहुल गांधी के साथ खेला गया, उसकी मिसाल पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में नहीं मिलती। एक पूरे तंत्र ने, असीमित पैसे और सोशल मीडिया की ताकत के दम पर, बरसों तक उनकी एक खास तरह की छवि गढ़ने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। सुबह से शाम तक मुख्यधारा के मीडिया और ट्रोल सेना का बस एक ही काम था—राहुल गांधी को खारिज करना। लेकिन वक्त की सबसे अच्छी बात यह है कि वह हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आज जब हम भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों को देखते हैं, तो हवा का रुख बदला हुआ साफ महसूस होता है।एक निष्पक्ष नजरिए से देखें तो यह बात हैरान करती है कि पिछले एक दशक से अधिक समय से जो पार्टी सत्ता में बैठी है, उसके निशाने पर आज भी विपक्ष का एक नेता ही क्यों सबसे ऊपर रहता है?  देश में कोई भी मुद्दा हो, बेरोजगारी की बात हो या महंगाई की, जवाब सत्ता से मांगा जाना चाहिए, लेकिन यहाँ हर सवाल का रुख मुड़कर राहुल गांधी की तरफ कर दिया जाता है। यह राजनीतिक क...

डिजिटल आक्रामकता के जाल में फंसा बचपन'

'डिजिटल आक्रामकता के जाल में फंसा बचपन'  (4 जून आक्रामकता के शिकार मासूम बच्चों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस)  आजकल घरों में शाम के वक्त एक खामोश नजारा दिखाई देता है। पूरा परिवार एक ही कमरे में, एक ही सोफे पर साथ बैठा होता है, लेकिन आपस में कोई बातचीत नहीं होती। सब के सब चुपचाप अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में खोए रहते हैं। माता-पिता भी इस बात से बड़े खुश और बेफिक्र रहते हैं कि उनका बच्चा बाहर धूप या धूल-मिट्टी में नहीं घूम रहा है, बल्कि घर के अंदर आराम से सुरक्षित बैठा है। लेकिन क्या कभी हमने ठंडे दिमाग से बैठकर यह सोचने की कोशिश की है कि स्क्रीन में अपनी आंखें गड़ाए बैठा हमारा यह मासूम बच्चा अंदर ही अंदर किस मानसिक दौर से गुजर रहा है? कहीं उसके नन्हें दिमाग पर नकारात्मक असर तो नहीं हो रहा?  हर साल 4 जून को पूरी दुनिया में 'आक्रामकता के शिकार मासूम बच्चों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस' मनाया जाता है। पुराने जमाने में जब इस दिन की चर्चा होती थी, तो बच्चों पर अत्याचार का सीधा सा मतलब लड़ाई-झगड़े, युद्ध, दंगे या फिर फैक्ट्रियों में होने वाली बाल-मजूदरी से लगाया जाता था। लेकिन आज के इस ...

'कांग्रेस पार्टी में कुर्सी की जिद, बगावती बुढ़ापा और बिखरी साख'

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'कांग्रेस पार्टी में कुर्सी की जिद, बगावती बुढ़ापा और बिखरी साख' भारतीय राजनीति का एक सीधा सा नियम है। एक समझदार नेता वह नहीं है जिसे सिर्फ आगे बढ़ना आता हो, बल्कि वह है जिसे यह पता हो कि कब और कितनी इज्जत के साथ दो कदम पीछे हट जाना है। आज की आपाधापी और कुर्सी से चिपके रहने की राजनीति के बीच, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने जो समझदारी दिखाई है, वह काबिले तारीफ है। उन्होंने देश के बाकी बुजुर्ग नेताओं को एक ऐसा सधा हुआ संदेश दिया है, जो न सिर्फ उनकी इज्जत को बढ़ाता है बल्कि दूसरों के लिए एक सबक भी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि पार्टी अब शायद दिग्विजय सिंह को दोबारा राज्यसभा नहीं भेजेगी। अमूमन ऐसे मोड़ पर बड़े-बड़े नेता या तो बगावत पर उतर आते हैं या फिर कोने में बैठकर नाराजगी जताने लगते हैं। लेकिन दिग्गी राजा ने जिस अक्लमंदी से अपनी साख और सम्मान को बनाए रखा है, वह उनकी राजनीतिक परिपक्वता को दिखाता है। लोकतंत्र में कोई उनकी विचारधारा से अलग सोच रख सकता है, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ और सही टाइमिंग के मामल...