'लोकतंत्र में हक मांगना गुनाह नहीं, फिर जंतर-मंतर पर छात्रों का बर्बर दमन क्यों?'
'लोकतंत्र में हक मांगना गुनाह नहीं, फिर जंतर-मंतर पर छात्रों का बर्बर दमन क्यों?' अपने ही देश के बच्चों को सड़कों पर जानवरों की तरह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाए, उन पर आंसू गैस के गोले दागे जाएं और उनका खून बहाया जाए, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था के भीतर की इंसानियत मर चुकी है। कल, यानी 20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ भी हुआ, वह किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह को कंपा देने के लिए काफी है। नीट जैसी बड़ी परीक्षा में हुई धांधली और पेपर लीक के खिलाफ देश के कोने-कोने से आए हजारों छात्र सिर्फ एक पारदर्शी भविष्य और इंसाफ की गुहार लगा रहे थे। मगर संसद के मानसून सत्र के पहले दिन जब इन बेकसूर बच्चों ने संसद चलो मार्च शुरू किया, तो सरकार ने उनके स्वागत में बैरिकेडिंग की दीवारें, कटीले तार और पुलिस की बेरहम लाठियां खड़ी कर दीं। सवाल सीधा और बहुत कड़वा है - इस खौफनाक दमन की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? दिल्ली पुलिस कोई स्वतंत्र संस्था नहीं है, वह सीधे तौर पर देश के केंद्रीय गृह मंत्रालय के इशारे पर काम करती है। नई दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा और उनके प्रशासनिक आला ...