'सिमटते वन और सिसकती सांसें: अब तो जागिए!
'सिमटते वन और सिसकती सांसें: अब तो जागिए! सुबह की पहली किरण के साथ जब खिड़की खुलती है, तो वह ताजी हवा अब महसूस नहीं होती जो कभी बचपन की यादों का हिस्सा थी। कारण साफ है, हमारी खिड़कियों के बाहर अब पेड़ों की कतारें नहीं, बल्कि कंक्रीट की ऊँची और बेजान दीवारें खड़ी हैं। पुराने समय में घर के बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि एक पेड़ लगाना सौ यज्ञ करने के बराबर है। तब पेड़ सिर्फ लकड़ी का बेजान ढांचा नहीं, बल्कि परिवार का एक जीता-जाता सदस्य हुआ करते थे। नीम की दातुन से लेकर पीपल की शीतल छांव तक, हमारा पूरा जीवन इन वनों की गोद में बीता है। लेकिन आज की तस्वीर डराने वाली है। हमने विकास की अंधी दौड़ में उन 'कुदरती फेफड़ों' को काट दिया है जो हमें मुफ्त में ऑक्सीजन देते थे। शहर अब धीरे-धीरे 'तंदूर' बनते जा रहे हैं। मार्च के महीने में ही मई जैसी तपिश का अहसास होने लगा है। यह प्रकृति की सिसकी है, जिसे हम अपनी सुख-सुविधाओं के शोर में सुन नहीं पा रहे। जब कोई जंगल कटता है, तो केवल पेड़ नहीं गिरते, बल्कि हजारों परिंदों के पुस्तैनी आशियाने भी उजड़ जाते हैं। वह गौरैया जो कभी हमारे आंगन में फुदकत...