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'डॉ. अंबेडकर: जातियों के खांचो से कहीं बड़ा है 'राष्ट्र-शिल्पी' का कद'

'डॉ. अंबेडकर: जातियों के खांचो से कहीं बड़ा है 'राष्ट्र-शिल्पी' का कद' (डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती विशेष) प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल का सूर्य जब भारतीय क्षितिज पर उदय होता है, तो वह केवल एक महापुरुष की जन्मतिथि का संदेश नहीं लाता, बल्कि वह उस महान संकल्प का स्मरण कराता है जिसने आधुनिक भारत की नियति लिखी थी। डॉ. भीमराव अंबेडकर-एक ऐसा नाम, जो आज भारतीय जनमानस की चेतना में गहराई तक रचा-बसा है। देश के हर कस्बे, हर चौराहे और सरकारी कार्यालयों में उनकी प्रतिमाएं जीवंत हैं, उनके नीले झंडे और जयकारों के स्वर आसमान छूते हैं। लेकिन, इस भव्य उत्सव और नारों के कोलाहल के बीच एक अत्यंत गंभीर और चुभता हुआ प्रश्न मौन खड़ा है, क्या हमने वाकई उस इंसान को समझा, जिसने अपना पूरा जीवन 'न्याय', 'समता' और 'मानवता' की वेदी पर होम कर दिया? या फिर हमने अपनी सुविधा, स्वार्थ और संकुचित सोच के अनुसार उनकी विरासत के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं? डॉ. अंबेडकर की शख्सियत का असली करिश्मा उनकी अद्भुत विद्वत्ता, उनके फौलादी इरादों और सबसे बढ़कर उनके अडिग नैतिक साहस में छिपा था। वे केवल एक सं...

जलियांवाला बाग: आज़ादी की वो कीमत, जिसे हिंदुस्तान कभी नहीं भूलेगा'

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'जलियांवाला बाग: आज़ादी की वो कीमत, जिसे हिंदुस्तान कभी नहीं भूलेगा'  इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो स्याही से नहीं, बल्कि इंसानी लहू से लिखी जाती हैं। 13 अप्रैल 1919 की वह मनहूस शाम भी एक ऐसी ही तारीख थी, जिसने न केवल पंजाब की मिट्टी को लाल किया, बल्कि सोए हुए समूचे हिंदुस्तान की सोई हुई आत्मा को भी झकझोर कर रख दिया। अमृतसर का वह छोटा सा मैदान, जिसे दुनिया आज 'जलियांवाला बाग' के नाम से जानती है, महज़ ईंट-पत्थरों का बना कोई स्मारक नहीं है। वह गवाह है उस अमानवीय बर्बरता का जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और वह प्रतीक है उस अटूट हौसले का जिसने दुनिया के सबसे बड़े ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की नींव रख दी थी। बैसाखी का पावन दिन था। पंजाब के गाँवों और शहरों में उत्सव का माहौल होना चाहिए था। लोग नए कपड़े पहनकर मेलों की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन अमृतसर की हवाओं में एक अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी। पूरा देश 'रोलेट एक्ट' जैसे काले कानून के खिलाफ गुस्से में उबल रहा था, जिसने बिना दलील और बिना वकील के किसी को भी जेल भेजने की ताक़त अंग्रेज़ों को दे दी थी। इसी अन...

सडकों पर ठहरी हुई ज़िंदगी: क्या हम इन मासूम बच्चों का बचपन देख पा रहे हैं?

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सडकों पर ठहरी हुई ज़िंदगी: क्या हम इन मासूम बच्चों का बचपन देख पा रहे हैं? शहरों की चकाचौंध भरी सड़कों पर दौड़ती गाड़ियाँ और काँच की ऊँची इमारतों से झाँकती कृत्रिम रोशनी विकास का बड़ा दावा करती हैं। लेकिन इसी चमक-धमक के बीच, ट्रैफिक सिग्नल की लाल बत्ती पर कुछ नन्हे हाथ आपकी कार के शीशे थपथपाते हैं। कोई हाथ में रंगीन गुब्बारे लिए खड़ा है, तो कोई महज़ चंद रुपयों के लिए पेन या रुमाल आपकी ओर बढ़ा देता है। आज 12 अप्रैल है—अंतर्राष्ट्रीय स्ट्रीट चिल्ड्रेन डे। यह दिन दुनिया भर में उन बच्चों के नाम समर्पित है, जिनका घर कोई चारदीवारी नहीं बल्कि तपती सड़कें और असुरक्षित फुटपाथ हैं। सवाल यह है कि क्या हम इन बच्चों को वाकई देख पा रहे हैं, या इन्हें सड़क के शोर का एक हिस्सा समझकर हर रोज़ नज़रअंदाज़ कर रहे हैं?सड़क पर रहने वाले इन बच्चों के लिए आसमान ही छत है और कंक्रीट का फुटपाथ ही बिछौना। इनके हिस्से में बचपन के खिलौने नहीं, बल्कि वह उत्तरदायित्व है जिसे उठाने की उम्र अभी इनकी हुई भी नहीं। एक तरफ जहाँ हम डिजिटल इंडिया और विश्व गुरु बनने का संकल्प दोहराते हैं, वहीं दूसरी ओर देश के हज़ारों बच्चे कूड़ा ब...

सत्यशोधक ज्योतिबा फुले: जिनके विचारों ने बदली समाज की दिशा'

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'सत्यशोधक ज्योतिबा फुले: जिनके विचारों ने बदली समाज की दिशा' इतिहास अक्सर उन लोगों को भूल जाता है जो किसी भव्य इमारत की नींव में ईंट बनकर समा जाते हैं। लेकिन जब-जब आधुनिक भारत में न्याय और बराबरी की बात होगी, ज्योतिबा फुले का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। फुले कोई पारंपरिक नेता नहीं थे, वे एक ऐसे दूरद्रष्टा शिक्षक थे जिन्होंने ब्लैकबोर्ड पर अक्षर लिखने से पहले समाज की कड़वी सच्चाइयों और गरीबों के आंसू पढ़ना सीखा था। आज हम जिस आधुनिक भारत में सांस ले रहे हैं, जहाँ महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और समाज का हर वर्ग तरक्की के सपने देख रहा है, उसकी पहली मजबूत ईंट 19वीं सदी में ज्योतिबा फुले ने ही रखी थी।वह एक ऐसा दौर था जब शिक्षा पर कुछ खास लोगों का एकाधिकार था और समाज की एक बहुत बड़ी आबादी अज्ञानता के घने अंधेरे में कैद थी। ज्योतिबा ने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि किसी को गुलाम बनाने के लिए लोहे की जंजीरें जरूरी नहीं होतीं, बल्कि उसे 'अशिक्षा' के पिंजरे में कैद रखना ही काफी होता है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से समाज को आईना दिखाते हुए कहा था- "शिक्षा के बिना इंसान...

'होम्योपैथी: मीठी गोलियों में छिपा आरोग्य का महासागर'

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'होम्योपैथी: मीठी गोलियों में छिपा आरोग्य का महासागर'  आज के दौर में जब हम सुबह उठते हैं, तो हमारा सामना प्रदूषण, मिलावट और तनाव से होता है। ऐसे में बीमारियां हमारे जीवन का हिस्सा बन गई हैं। आज दुनिया में चिकित्सा की कई पद्धतियां हैं, लेकिन डब्ल्यूएचओ के कुछ आंकड़े हमें चौंकाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, होम्योपैथी आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चिकित्सा पद्धति बन चुकी है। पूरी दुनिया में इसकी लोकप्रियता हर साल करीब 20 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है। अकेले हमारे देश भारत की बात करें, तो यहाँ लगभग 10 करोड़ से ज्यादा लोग अपनी छोटी-बड़ी बीमारियों के लिए पूरी तरह होम्योपैथी पर भरोसा करते हैं। यह भरोसा यूँ ही नहीं बना है, इसके पीछे इस पद्धति की सादगी और बिना किसी नुकसान के ठीक करने की ताकत छिपी है। अक्सर शरीर के अनजाने रोगों के लिए लोग सालों-साल इलाज कराते हैं। लाखों रुपए अस्पतालों और जांचों में खर्च कर देते हैं परिणाम के नाम सिर्फ चंद घंटों की राहत मिलती है। ऐसे में होम्योपैथी सस्ता और पक्का विकल्प बनकर सामने आती है। आयुष मंत्रालय की मानें तो होम्योपैथी का इलाज अन्य पद्धतियों के मुकाबले...

'हनक हारी, हौसला जीता: ट्रम्प के 'सरेंडर' और शाहबाज़ की बिसात की इनसाइड स्टोरी'

'हनक हारी, हौसला जीता: ट्रम्प के 'सरेंडर' और शाहबाज़ की बिसात की इनसाइड स्टोरी' इतिहास की बिसात पर जब अहंकार और आत्मसम्मान का टकराव होता है, तो अक्सर नतीजा बारूद की ताक़त नहीं, बल्कि इरादों की मजबूती तय करती है। आज दुनिया के फलक पर जो कुछ घट रहा है, वह डोनाल्ड ट्रम्प की उस तथाकथित 'मजबूत' छवि का विखंडन है, जिसे उन्होंने वर्षों की बयानबाजी से गढ़ा था। ट्रम्प, जो दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने का दावा करते थे, आज खुद अपनी ही बिछाई बिसात पर एक 'मज़ाक' बनकर रह गए हैं। यह जंग बारूद की नहीं, बल्कि रसूख और जज्बात की थी, जहाँ ट्रम्प की धमकियाँ ईरान के संकल्प के सामने बेअसर साबित हुईं। वाशिंगटन के सत्ता के गलियारों में आज वह शोर नहीं है, जो कभी ईरान को नेस्तनाबूद करने के दावों से गूंजता था। इसके बजाय, वहां एक ऐसी खामोशी है जो किसी बड़ी हार को स्वीकार करने से पहले छाई रहती है। वर्तमान परिदृश्य में जो सबसे बड़ी सुगबुगाहट है, वह है दो हफ्ते के लिए थमा हुआ 'सीज़फायर' कहने को तो यह युद्ध की मशीनरी पर लगा एक अस्थायी ब्रेक है, लेकिन हकीकत की गहराई में झांकें तो य...

"असेंबली का वह धमाका और आज की बहरी व्यवस्था"

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"असेंबली का वह धमाका और आज की बहरी व्यवस्था" इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें केवल घटनाओं का ब्यौरा नहीं, बल्कि एक गहरे सवाल की तरह दर्ज होती हैं। आज ही के दिन वर्ष 1929 की वह सुबह, जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम के साथ पर्चे फेंके थे, तो उनका उद्देश्य हिंसा नहीं बल्कि एक मूक और बहरी सत्ता को लोक-हित की आवाज़ सुनाना था। आज दशकों बाद जब हम अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं के बदलते स्वरूप को देखते हैं, तो एक टीस उठती है कि क्या व्यवस्था की सुनने की क्षमता समय के साथ फिर से कम हो गई है? वह धमाका बहरों को जगाने के लिए था, लेकिन आज की राजनीति के शोर में एक आम नागरिक की संयमित और तर्कपूर्ण आवाज़ कहीं खोती नज़र आती है। लोकतंत्र की बुनियाद उसकी संस्थाओं की निष्पक्षता और उनकी स्वायत्तता पर टिकी होती है। जब चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर जनता के बीच संशय उत्पन्न होने लगे, तो यह किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। एक निष्पक्ष निर्णायक की भूमिका तब संदिग्ध लगने लगती है जब उसके निर्णय एकपक्षीय झुकाव का संकेत देने लगें। क्या ह...