उत्तर भारत में आखिर कब तक 'पुराने चेहरों' के मोह में उलझी रहेगी कांग्रेस?
उत्तर भारत में आखिर कब तक 'पुराने चेहरों' के मोह में उलझी रहेगी कांग्रेस? आज की तारीख में राजनीति को देखें, तो कांग्रेस और भाजपा के बीच की जंग अब एक नए मोड़ पर है। एक तरफ दक्षिण भारत है, जहाँ राहुल गांधी ने गजब की मैच्योरिटी दिखाई है। तमिलनाडु में जब सुपरस्टार थलापति विजय ने अपनी नई पार्टी टीवीके के साथ मैदान मारा, तो राहुल ने किसी 'बड़े भाई' की अकड़ दिखाने के बजाय उन्हें सम्मान दिया। यह राहुल की ही रणनीति थी कि भाजपा को रोकने के लिए वहां एक ऐसी लामबंदी हुई कि पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन तक को कहना पड़ा कि 'छह महीने तक विजय से कोई सवाल नहीं होगा'। कल जब विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो कांग्रेस वहां एक उदार साथी के रूप में खड़ी थी। कर्नाटक, तेलंगाना और केरल में अपनी पकड़ मजबूत कर कांग्रेस ने दक्षिण को अपना अभेद्य किला बना लिया है। लेकिन, जैसे ही हम विंध्य पर्वत पार कर उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में आते हैं, कहानी एकदम उलट जाती है। सवाल वही है जो दांव समंदर किनारे फिट है, वह गंगा यमुना के मैदानों में आकर फेल क्यों हो जाता है? उत्तर भारत में कांग्रेस का वोट शेयर...