शिक्षा और समाज सुधार के शिल्पकार: ईश्वरचंद्र विद्यासागर और उनका प्रासंगिक चिंतन
शिक्षा और समाज सुधार के शिल्पकार: ईश्वरचंद्र विद्यासागर और उनका प्रासंगिक चिंतन (26 सितंबर ईश्वर चंद्र विद्यासागर जयंती) किसी समाज के पढ़े-लिखने का असली पैमाना क्या है? क्या केवल साक्षरता के आंकड़े बढ़ जाना या बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर लेना ही विकास है? आज 26 सितंबर को जब हम ईश्वरचंद्र विद्यासागर को याद कर रहे हैं, तो हमें उनके जीवन के इसी बुनियादी सवाल से शुरुआत करनी होगी। विद्यासागर के लिए ज्ञान केवल पन्नों पर लिखी बातें या कमरों में बैठकर की जाने वाली चर्चा नहीं था। वे मानते थे कि शिक्षा का असली काम समाज के सबसे कमजोर और आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन को व्यावहारिक रूप से बदलना है। जब तक कोई सीख जमीन पर उतरकर किसी इंसान का जीवन बेहतर नहीं बनाती, तब तक वह केवल बौद्धिक विलासिता है। विद्यासागर के समय का सामाजिक ढांचा बहुत संकीर्ण और जातिगत भेदभाव से भरा हुआ था। पढ़ाई-लिखाई जैसी बुनियादी जरूरत पर कुछ गिने-चुने रसूखदार लोगों का कब्जा था, जिससे समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा तरक्की की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ था। संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में उनके प्रश...