भगत सिंह के 'मस्तिष्क' शहीद सुखदेव को हमने कितना याद रखा?
भगत सिंह के 'मस्तिष्क' शहीद सुखदेव को हमने कितना याद रखा? इतिहास की एक अजीब फितरत होती है। वह कभी-कभी किसी महानायक के महाकाय प्रभाव में उसके सबसे बड़े मददगार और हमसफर को परदे के पीछे धकेल देता है। 23 मार्च 1931 की शाम को जब लाहौर की सेंट्रल जेल में तीन नौजवान फांसी के फंदे की तरफ बढ़ रहे थे, तब भारत की जुबान पर एक नाम ऐसा चढ़ा कि बाकी दो नाम उसके साए में थोड़े सिमट गए। हम बात कर रहे हैं क्रांति के तीन शहीदों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की। इस अटूट तिकड़ी में भगत सिंह क्रांति का चमकता हुआ चेहरा थे और राजगुरु अचूक निशानेबाज, लेकिन इन सबके पीछे जो बेहद शांत, गंभीर और तीखा दिमाग काम कर रहा था, वह नाम था क्रांतिकारी सुखदेव थापर का। आज 15 मई को उनकी जयंती पर यह सोचना बहुत जरूरी है कि इस जमीनी रणनीतिकार को हमने अपनी यादों और इतिहास में कितना स्थान दिया। पंजाब के लायलपुर में जन्मे सुखदेव और भगत सिंह सिर्फ साथ में देश के लिए लड़ने वाले साथी नहीं थे, बल्कि दोनों के बीच एक बेहद गहरी और बेमिसाल दोस्ती थी। लाहौर के नेशनल कॉलेज के दिनों से शुरू हुआ यह स...