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केरल से कांग्रेस आलाकमान का संदेश: जमीनी नेताओं को मिलेगी कमान'

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'केरल से कांग्रेस आलाकमान का संदेश: जमीनी नेताओं को मिलेगी कमान'  केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की बंपर जीत के बाद कांग्रेस आलाकमान ने एक बहुत बड़ा और सकारात्मक राजनीतिक फैसला लिया है।  दिल्ली दरबार ने किसी भी गुटबाजी के आगे न झुकते हुए केरल के लोकप्रिय नेता वी. डी. सतीशन को नया मुख्यमंत्री चुनकर देश भर के कार्यकर्ताओं को एक ठोस संदेश दिया है। यह संदेश जनता की तरफ से नहीं, बल्कि खुद कांग्रेस नेतृत्व की ओर से आया है, जिसने यह जता दिया है कि अब पार्टी पुराने ढर्रे और गलतियों से सबक सीख चुकी है। आलाकमान का यह कदम साफ इशारा करता है कि संगठन को मजबूत करने के लिए अब केवल जमीन पर पसीना बहाने वाले चेहरों को ही तवज्जो दी जाएगी।कांग्रेस के इतिहास में लंबे समय से एक बड़ी कमजोरी रही है, जहां जमीन पर रात-दिन काम करने वाले जनप्रिय नेताओं की जगह दिल्ली में लॉबिंग करने वाले नेताओं को कमान सौंप दी जाती थी। मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावों में जनता और कार्यकर्ता दिल से चाहते थे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे ऊर्जावान युवाओ...

भगत सिंह के 'मस्तिष्क' शहीद सुखदेव को हमने कितना याद रखा?

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भगत सिंह के 'मस्तिष्क' शहीद सुखदेव को हमने कितना याद रखा?  इतिहास की एक अजीब फितरत होती है। वह कभी-कभी किसी महानायक के महाकाय प्रभाव में उसके सबसे बड़े मददगार और हमसफर को परदे के पीछे धकेल देता है। 23 मार्च 1931 की शाम को जब लाहौर की सेंट्रल जेल में तीन नौजवान फांसी के फंदे की तरफ बढ़ रहे थे, तब भारत की जुबान पर एक नाम ऐसा चढ़ा कि बाकी दो नाम उसके साए में थोड़े सिमट गए। हम बात कर रहे हैं क्रांति के तीन शहीदों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की। इस अटूट तिकड़ी में भगत सिंह क्रांति का चमकता हुआ चेहरा थे और राजगुरु अचूक निशानेबाज, लेकिन इन सबके पीछे जो बेहद शांत, गंभीर और तीखा दिमाग काम कर रहा था, वह नाम था क्रांतिकारी सुखदेव थापर का।  आज 15 मई को उनकी जयंती पर यह सोचना बहुत जरूरी है कि इस जमीनी रणनीतिकार को हमने अपनी यादों और इतिहास में कितना स्थान दिया। पंजाब के लायलपुर में जन्मे सुखदेव और भगत सिंह सिर्फ साथ में देश के लिए लड़ने वाले साथी नहीं थे, बल्कि दोनों के बीच एक बेहद गहरी और बेमिसाल दोस्ती थी। लाहौर के नेशनल कॉलेज के दिनों से शुरू हुआ यह स...

गाली जब स्वैग बन जाए, तो समझो समाज अभद्र हो चला है

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'गाली जब स्वैग बन जाए, तो समझो समाज अभद्र हो चला है' (14 मई राष्ट्रीय शालीनता दिवस)  आज 14 मई है। कैलेंडर कहता है कि आज 'राष्ट्रीय शालीनता दिवस' है। सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि क्या अब शालीन रहने के लिए भी कोई खास दिन तय करना पड़ेगा? लेकिन अपने आसपास की डिजिटल दुनिया, सोशल मीडिया के कमेंट बॉक्स और टीवी बहसों के शोर को देखिए, तो अहसास होगा कि शायद आज के दौर में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। हम तरक्की तो बहुत कर रहे हैं, चांद पर पहुंच रहे हैं, लेकिन हमारी जुबान और व्यवहार से तमीज का रंग उतरता जा रहा है। खासकर इंटरनेट की दुनिया में तो ऐसा लगता है जैसे बदतमीजी करना ही नया फैशन या 'कूल' दिखने का जरिया बन गया है। हमारे बुजुर्ग कहते थे कि इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों या उसकी दौलत से नहीं, बल्कि उसकी बोली से होती है। शब्द इंसान के भीतर के संस्कारों का आईना होते हैं। लेकिन आज की हकीकत कुछ और ही है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स ने हमें एक 'नकाब' दे दिया है।  मोबाइल स्क्रीन के पीछे छिपे हम लोग खुद को बहुत ब...

क्या हम 'आर्थिक आपातकाल' की दहलीज पर हैं?

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क्या हम 'आर्थिक आपातकाल' की दहलीज पर हैं? पीएम मोदी ने हैदराबाद के मंच से देशवासियों के सामने सात अपीलें रखीं, जो केवल राजनीतिक भाषण नहीं था, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के बदलते मिजाज का एक बड़ा संकेत था। मोदी का यह कहना कि 'एक साल तक सोना खरीदने से बचें', 'विदेशी यात्राएं टालें' और 'पेट्रोल-डीजल की खपत कम करें', सुनने में तो नागरिकों से किया गया एक साधारण अनुरोध लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपे आर्थिक अर्थ बेहद गहरे और गंभीर हैं। वहीं, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का यह कहना कि 'ये अपीलें सरकार की नाकामियों का सबसे बड़ा कबूलनामा हैं', राहुल का यह कहना कोई छोटी बात नहीं है। क्या वाकई भारत किसी बड़े आर्थिक भंवर की ओर बढ़ रहा है या फिर यह आने वाले किसी वैश्विक तूफान से पहले की महज एक सावधानी है। पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को 120 डॉलर प्रति बैरल के पार हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत तेल आयात करता है, और जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो उसका सीधा...

उत्तर भारत में आखिर कब तक 'पुराने चेहरों' के मोह में उलझी रहेगी कांग्रेस?

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उत्तर भारत में आखिर कब तक 'पुराने चेहरों' के मोह में उलझी रहेगी कांग्रेस? आज की तारीख में राजनीति को देखें, तो कांग्रेस और भाजपा के बीच की जंग अब एक नए मोड़ पर है। एक तरफ दक्षिण भारत है, जहाँ राहुल गांधी ने गजब की मैच्योरिटी दिखाई है। तमिलनाडु में जब सुपरस्टार थलापति विजय ने अपनी नई पार्टी टीवीके के साथ मैदान मारा, तो राहुल ने किसी 'बड़े भाई' की अकड़ दिखाने के बजाय उन्हें सम्मान दिया। यह राहुल की ही रणनीति थी कि भाजपा को रोकने के लिए वहां एक ऐसी लामबंदी हुई कि पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन तक को कहना पड़ा कि 'छह महीने तक विजय से कोई सवाल नहीं होगा'। कल जब विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो कांग्रेस वहां एक उदार साथी के रूप में खड़ी थी। कर्नाटक, तेलंगाना और केरल में अपनी पकड़ मजबूत कर कांग्रेस ने दक्षिण को अपना अभेद्य किला बना लिया है। लेकिन, जैसे ही हम विंध्य पर्वत पार कर उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में आते हैं, कहानी एकदम उलट जाती है। सवाल वही है जो दांव समंदर किनारे फिट है, वह गंगा यमुना के मैदानों में आकर फेल क्यों हो जाता है? उत्तर भारत में कांग्रेस...

अस्थमा की वैश्विक त्रासदी: सबसे ज़्यादा भारत में दुनिया की 46% मौतें

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अस्थमा की वैश्विक त्रासदी: सबसे ज़्यादा भारत में दुनिया की 46% मौतें  शहर की भागती भीड़ में अगर आप किसी चौराहे पर खड़े होकर गौर करें, तो आपको हर पांचवें-छठे बच्चे के कंधे पर लटके स्कूल बैग के किनारे से एक प्लास्टिक का 'इनहेलर' झांकता मिल जाएगा। यह आज की वह कड़वी हकीकत है जिसे हम विकास की चकाचौंध में अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। हमने आलीशान हाईवे और चमकते एक्सप्रेस-वे तो बना लिए, हाथ में 5जी मोबाइल भी थाम लिया, लेकिन उसी हाथ में हमारे बच्चों के लिए नेबुलाइजर की पाइपें भी थमा दीं। हम विकास की ऐसी दौड़ में शामिल हो गए हैं जहां बैंक बैलेंस तो बढ़ रहा है, लेकिन फेफड़ों की उम्र घट रही है। आज 'विश्व अस्थमा दिवस' पर जब दुनिया इलाज की पहुंच की बात कर रही है, तो हमें यह पूछना होगा कि क्या हम वाकई बीमारी का इलाज ढूंढ रहे हैं या उस जड़ को ही खाद-पानी दे रहे हैं जो इस बीमारी को पैदा कर रही है?अस्थमा अब केवल जेनेटिक या 'पुरानी बीमारी' नहीं रह गई है। यह विशुद्ध रूप से एक 'इकोलॉजिकल क्राइम' यानी पर्यावरण के खिलाफ किए ग...

'क्या भारत दो-दलीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है?'

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'क्या भारत दो-दलीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है?'  भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी बात निकलकर आई है, जिसे समझना जरूरी हो गया है। कभी 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा लगाने वाली भाजपा का ये सियासी जुमला लगता था, लेकिन आज की हकीकत देखें तो यह 'क्षेत्रीय दल मुक्त भारत' के एक बड़े प्लान की तरह नजर आता है। भाजपा की रणनीति अब स्पष्ट हो चली है, वह पहले बड़े प्यार से किसी क्षेत्रीय दल की ‘बांह’ पकड़ती है, उसके साथ मिलकर सरकार बनाती है, वहाँ का गुणा गणित समझती है, उसके घर के भीतर तक अपनी पैठ बनाती है और फिर धीरे से उसी साथी को किनारे लगाकर अपना झंडा गाड़ देती है। नीतीश कुमार हों या उद्धव ठाकरे, नवीन पटनायक हों या बादल परिवार... इन सब की कहानियाँ एक ही पैटर्न पर लिखी गई हैं। बिहार को ही देख लीजिए, जहाँ नीतीश कुमार कभी 'बड़े भाई' हुआ करते थे और भाजपा उनके पीछे चला करती थी। लेकिन आज पासा पूरी तरह पलट चुका है; भाजपा बिहार की सबसे बड़ी ताकत बन गई है और नीतीश अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराष्ट्र में जिस शिवसेना ने भाजपा को उंगल...