"डिजिटल दौर में शब्द-साधना: किताबों की ओर लौटता युवा मन"
"डिजिटल दौर में शब्द-साधना: किताबों की ओर लौटता युवा मन" दिल्ली की ठिठुरती हुई जनवरी की सुबह और भारत मण्डपम की भव्यता के बीच एक अलग ही संसार बसा हुआ है। यहाँ की फिजाओं में केवल कागज और ताजी स्याही की खुशबू नहीं है, बल्कि यह उन उम्मीदों की महक है जो बताती हैं कि तकनीक के शोर के बीच भी इंसान का अपनी जड़ों से जुड़ाव बना हुआ है। विश्व पुस्तक मेला 2026 केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक महाकुंभ बन गया है। सबसे सुखद दृश्य यह है कि इस मेले की असली रौनक आज का युवा और छोटे बच्चे हैं। अक्सर यह चिंता जताई जाती है कि 'रील' और 'शॉर्ट वीडियो' के इस दौर में एकाग्रता खत्म हो रही है, लेकिन यहाँ उमड़ी यह भीड़ गवाही दे रही है कि दुनिया अभी बची रहेगी, क्योंकि यहाँ का युवा पन्नों के सन्नाटे को मोबाइल के शोर पर तरजीह दे रहा है। यह देखना दिल को सुकून देता है कि आज की पीढ़ी केवल समकालीन लेखकों तक सीमित नहीं है। स्टालों पर घूमते हुए जब आप देखते हैं कि युवा मुंशी प्रेमचंद के 'गोदान' के पात्रों की बात कर रहे हैं या हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' के दर्शन...