झुलसती प्रकृति और बेपटरी होता मौसम: क्या हम प्रकृति की कराह सुन पा रहे हैं?
झुलसती प्रकृति और बेपटरी होता मौसम: क्या हम प्रकृति की कराह सुन पा रहे हैं? 'विश्व मौसम विज्ञान दिवस' विकास की जिस अंधी और चमकदार राह पर हम आज सरपट दौड़ रहे हैं, वह दरअसल कुदरत के साथ किए गए एक बहुत बड़े विश्वासघात की कीमत पर खड़ी है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ सफलता की ऊँचाई को कंक्रीट के मीनारों से नापा जा रहा है, लेकिन उस ऊँचाई के नीचे दबती जा रही मिट्टी और सिसकता वातावरण अब किसी की प्राथमिकता में नहीं है। समस्या केवल तापमान बढ़ने की नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक अनुशासन के पूरी तरह ध्वस्त होने की है, जो सदियों से जीवन का आधार रहा है। आज का मनुष्य अपनी कृत्रिम सुख-सुविधाओं में इतना आत्ममुग्ध है कि उसे ऊपर तने उस 'थके हुए आकाश' की कराह सुनाई नहीं देती, जो अब और बोझ सहने की शक्ति खो चुका है। मौसम का यह बेपटरी होता मिजाज दरअसल हमारे भीतर बढ़ते उस असीमित लालच का प्रतिबिंब है, जिसे हमने 'प्रगति' का नाम दे रखा है। जब चैत्र की शुरुआत में ही सूरज की किरणें झुलसाने लगें, तो इसे महज भौगोलिक परिवर्तन मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। यह प्रकृति का वह मौन लेकिन तीखा विरोध...