खत्म हुआ निष्पक्षता का दौर: चुनाव आयोग की बची-कुची साख का अंतिम संस्कार'
'खत्म हुआ निष्पक्षता का दौर: चुनाव आयोग की बची-कुची साख का अंतिम संस्कार' भारत में एक दौर वह भी था जब चुनाव आयोग का नाम सुनते ही बड़े से बड़े राजनेताओं के पसीने छूट जाते थे, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के ज़माने में जनता को यह अटूट भरोसा था कि व्यवस्था चाहे जितनी भी रसूखदार हो, लोकतंत्र का यह पहरेदार किसी के आगे नहीं झुकेगा। लेकिन आज वह भरोसा इतिहास की धूल में मिल चुका है। हालिया मध्य प्रदेश और झारखंड के राज्यसभा चुनाव के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसने यह साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग अब अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को पूरी तरह खो चुका है। यह संस्था अब लोकतंत्र की रक्षक नहीं, बल्कि सत्ता की सहूलियत के हिसाब से पर्चियां काटने वाला एक सरकारी महकमा बनकर रह गई है। इस संस्था की साख खत्म होने का सबसे ताजा और पुख्ता सबूत मध्य प्रदेश में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन का रद्द होना है, एक ऐसे मामले में, जो कानूनी तौर पर पूरी तरह से एक सामान्य नोटिस था और जिस पर अदालत ने संज्ञान तक नहीं लिया था, आयोग के रिटर्निंग ऑफिसर ने महज़ 15 मिनट के भीतर उनका पर्चा खारिज कर दिया...