'सड़क पर छात्र, कठघरे में सिस्टम: शांतिपूर्ण मार्च पर पैलेट गन और लाठियों का प्रहार'
'सड़क पर छात्र, कठघरे में सिस्टम: शांतिपूर्ण मार्च पर पैलेट गन और लाठियों का प्रहार' लोकतंत्र में अपनी असहमति और असंतोष की आवाज उठाना नागरिकों का सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार है। जब देश के युवा और पढ़े-लिखे छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो वे किसी दंगे, उपद्रव या अशांति के इरादे से नहीं, बल्कि अपने भविष्य, अधिकारों और न्याय की वाजिब मांग के लिए आते हैं। लेकिन हाल ही में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर जो कुछ देखने को मिला, उसने देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने, पुलिसिया कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था के बड़े-बडे दावों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा आयोजित संसद मार्च के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने जो कार्रवाई की, वह केवल भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास नहीं, बल्कि बर्बरता की आखिरी हद थी। छात्रों का यह मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाने के लिए शुरू हुआ था। लेकिन जैसे ही यह मार्च आगे बढ़ा, दिल्ली पुलिस ने इसे रोकने के लिए बेहद आक्रामक और दमनकारी रुख अपनाया। पुलिस प्रशासन ने बाद में यह ...