वॉइस ऑफ वर्सटैलिटी आशा भोसले: शास्त्रीयता की जड़ों से ग्लोबल पॉप के शिखर तक'
'वॉइस ऑफ वर्सटैलिटी आशा भोसले: शास्त्रीयता की जड़ों से ग्लोबल पॉप के शिखर तक' हिंदी सिनेमा के सौ साल से ज्यादा के सफर में अगर कोई एक ऐसी आवाज़ है जो बचपन की लोरियों से लेकर जवानी की मस्ती और बुढ़ापे की संजीदगी तक हमारे साथ रही है, तो वो है आशा ताई... आशा भोसले। अक्सर कहा जाता है कि महानता की छाँव में अपना वजूद बनाना सबसे मुश्किल होता है। आशा जी के सामने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की वह हिमालय जैसी शख्सियत थी, जिसकी धमक पूरी दुनिया में थी। लेकिन आशा भोसले ने उस छाँव में रुकने के बजाय अपनी एक ऐसी स्वतंत्र राह चुनी, जहाँ वे खुद एक मुकम्मल शिखर थीं। आशा जी की सबसे बड़ी खूबी उनकी 'वर्सटैलिटी' यानी बहुमुखी प्रतिभा है। उन्होंने कभी खुद को किसी एक सांचे में नहीं ढलने दिया। संगीत के उस दौर में जब गायिकाओं के लिए कुछ खास दायरे तय थे, तब आशा जी ने उन सब सीमाओं को लांघ दिया। एक तरफ 'उमराव जान' की वो रूहानी गजलें हैं - 'इन आँखों की मस्ती के' या 'दिल चीज़ क्या है'-जिनमें उन्होंने नज़ाकत की पराकाष्ठा को छुआ, तो दूसरी तरफ 'पिया तू अब तो आजा' और 'दम मारो दम...