ज़िंदगी और कूटनीति: शतरंज सिर्फ खेल नहीं, जीने का सलीका है'
'ज़िंदगी और कूटनीति: शतरंज सिर्फ खेल नहीं, जीने का सलीका है' (20 जुलाई अंतर्राष्ट्रीय शतरंज दिवस) जब खेल खत्म होता है, तो राजा और प्यादा दोनों एक ही डिब्बे में बंद कर दिए जाते हैं। शतरंज की बिसात का यह सबसे सीधा नियम, असल में हमारी जिंदगी का भी सबसे बड़ा कड़वा सच है। आज दुनिया 'अंतर्राष्ट्रीय शतरंज दिवस' मना रही है लेकिन यकीन मानिए, यह महज किसी एक खेल का जश्न नहीं है। यह तो इंसानी दिमाग के उस अनोखे जादू का सम्मान है, जो लकड़ी के चंद टुकड़ों और 64 खानों के भीतर पूरी कायनात के फैसले तय कर देता है। आज के इस दौर में, जब मोबाइल की रील्स और शॉर्ट्स ने हमारी गहराई से सोचने की आदत को लगभग खत्म कर दिया है, शतरंज की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। एक मजे की बात देखिए, जिस खेल को आज पूरी दुनिया कूटनीति और दिमाग की सबसे बड़ी कसौटी मानती है, उसकी असली जड़ें हमारे अपने हिंदुस्तान में हैं। सदियों पहले हमारे पुरखे इसे 'चतुरंग' कहते थे। भारत की मिट्टी से निकला यह खेल दुनिया भर का चक्कर लगाकर आज वापस अपने घर में एक नए अवतार में लौट आया है। आज जब हम इस खेल को देखते हैं, तो...