"संवत 2083: परंपरा, खगोल और हमारी साझी विरासत का नया पड़ाव"
"संवत 2083: परंपरा, खगोल और हमारी साझी विरासत का नया पड़ाव" (19 मार्च चैत्र नवरात्रारंभ, नव संवत्सर) समय का पहिया जब एक निश्चित बिंदु पर पहुँचता है, तो वह अपने साथ स्मृतियों और नई संभावनाओं का एक साझा कोलाज लेकर आता है। आज भारतीय काल-गणना का एक नया अध्याय यानी विक्रम संवत 2083 जुड़ गया है। इसे किसी विशेष श्रेष्ठता के भाव से देखने के बजाय, समय को मापने की एक प्राचीन और खगोलीय पद्धति की निरंतरता के रूप में देखा जाना चाहिए। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का यह दिन केवल पंचांग के पन्ने पलटने का नाम नहीं है, बल्कि यह उस खगोलीय गणना का हिस्सा है, जो सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर ऋतुओं के परिवर्तन को रेखांकित करती है। वसंत की विदाई और बढ़ती गर्मी के बीच प्रकृति में जो बदलाव दिखते हैं, वे इस बात का संकेत हैं कि जीवन का चक्र रुकता नहीं, बल्कि बदलता रहता है। पेड़ों पर आती नई कोपलें और रबी की पकती फसलें किसी महान उपलब्धि का प्रमाण नहीं, बल्कि एक सहज प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसे सदियों से मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है। इसी तिथि को जब इतिहास के...