'चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल: अर्जित लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट'
'चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल: अर्जित लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट' लोकतंत्र में वोट सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक और सत्ता के बीच का वह पवित्र भरोसा है जिसकी ईमानदारी बनाए रखने का जिम्मा चुनाव आयोग पर होता है। लेकिन जब मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर देश की सडकें आंदोलन से गूंजने लगें और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गायब होने के आरोप लगें, तो सवाल सिर्फ एक संस्था की कार्यप्रणाली पर नहीं उठता। सवाल उस अर्जित लोकतंत्र की बुनियाद पर जाकर टिक जाता है, जिसे हमने दशकों के भरोसे से सींचा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर मुंबई के शिवाजी पार्क तक जो नौजवान सड़कों पर उतरे हैं, उसे सामान्य राजनीतिक ड्रामा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। छात्र संगठनों, विपक्षी पार्टियों और युवाओं के इस देशव्यापी विरोध प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया है कि मामला अब जनता के बुनियादी अधिकारों से जुड़ चुका है। इस पूरे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग के अपने आधिकारिक आंकड़े हैं। आयोग द्वारा चलाए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी मतदाता सूची सुधार अभियान के तहत अब तक ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से कर...