"शक्तिशाली सेना बनाम खाली जेब: कूटनीति के चक्रव्यूह में फंसा अमेरिकी स्वाभिमान"
"शक्तिशाली सेना बनाम खाली जेब: कूटनीति के चक्रव्यूह में फंसा अमेरिकी स्वाभिमान" दुनिया के नक्शे पर जब भी युद्घ की आहट होती है, तो सबसे पहले व्हाइट हाउस की हलचलें तेज हो जाती हैं। लेकिन ये युद्घ अमेरिका के कुछ अलग है, और महंगा भी पड़ रहा है, एक तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी मिसाइलें ईरान के आसमान को चीर रही हैं, तो दूसरी तरफ पेंसिलवेनिया और ओहायो के गैस स्टेशनों पर खड़ा एक आम अमेरिकी नागरिक अपनी खाली होती जेब देख रहा है। आज की कड़वी सच्चाई यही है कि वाशिंगटन की सैन्य ताकत जितनी बढ़ रही है, वहां के आम आदमी का भरोसा अपनी सरकार और अपनी अर्थव्यवस्था पर उतना ही कम होता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका फर्स्ट का नारा तो दिया था, लेकिन आज का मंजर देखकर ऐसा लगता है जैसे युद्ध की जिद ने उस वादे को ही हाशिए पर धकेल दिया है। राजनीतिक गलियारों में आज ट्रंप की स्थिति किसी मज़ाक से कम नहीं रह गई है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने चिल्ला-चिल्लाकर कहा था कि वे अमेरिका को अंतहीन युद्धों से बाहर निकालेंगे, लेकिन आज वे खुद एक नए और भीषण युद्ध के नायक बने बैठे हैं। इसे नियति ...