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'तीसरे विश्वयुद्ध की आहट और हिरोशिमा का सबक'

'तीसरे विश्वयुद्ध की आहट और हिरोशिमा का सबक'  (6 अगस्त हिरोशिमा दिवस)  इक्यासी साल पहले छह अगस्त उन्नीस सौ पैंतालीस को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा पर जो परमाणु बम गिराया था, वह सिर्फ एक शहर की तबाही नहीं थी। उसने चंद सेकेंड में लाखों लोगों को मार डाला और जो बचे, वे पीढ़ियों तक घिसट-घिसट कर मरने के लिए मजबूर हो गए। आज भी जब हम उस दिन की कल्पना करते हैं तो सबसे बड़ा डर यह है कि दुनिया फिर से उसी रास्ते पर चल पड़ी है। चारों तरफ बस लड़ाई-झगड़े और तनाव का माहौल है। रूस और यूक्रेन के बीच सालों से चल रही जंग रुकने का नाम नहीं ले रही है। उधर पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल, हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के बीच का झगड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसा लगता है कि दुनिया के बड़े देश किसी भी दिन एक दूसरे पर परमाणु हमला कर देंगे। मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार बहुत पते की बात कही थी कि मैं यह तो नहीं जानता कि तीसरा विश्वयुद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और लाठियों से लड़ा जाएगा। उनका यह कथन आज की कड़वी सच्चाई है। इस पूरी बर्बादी के पीछे साफ तौर पर अम...

बिहार में पीके का 'पॉवर प्ले' हिट, दतिया में बीजेपी पर भारी पड़ी कांग्रेस

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'बिहार में पीके का 'पॉवर प्ले' हिट, दतिया में बीजेपी पर भारी पड़ी कांग्रेस' राजनीति में समय का पहिया कब घूम जाए, कोई नहीं कह सकता। कुछ महीनों पहले ही बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का खाता तक नहीं खुला था। अधिकांश प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी और आलोचकों ने मान लिया था कि पर्दे के पीछे से रणनीति बनाने वाले पीके जमीन पर फेल हो गए हैं। लेकिन बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने एक ही झटके में पूरी कहानी बदल दी। प्रशांत किशोर ने किसी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के बजाय सीधे दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के गढ़ में सेंध लगा दी। बांकीपुर सीट पर पिछले तीन दशकों से भाजपा का एकछत्र राज था, जिसे ढहाकर प्रशांत किशोर ने 19 हजार से ज्यादा वोटों से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इस इकलौती जीत ने बिहार की राजनीति में एक बिल्कुल नया अध्याय शुरू कर दिया है। पीके की इस जीत पर अब पुरानी सियासी कड़वाहट भी पिघलती दिख रही है। राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और बेटी रोहिणी आचार्य ने खुले दि...

'चंदा चोरी पर घिर रही थी भाजपा, विपक्ष ने 'भगवा' लाकर खुद के पैर पर मार ली कुल्हाड़ी'

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'चंदा चोरी पर घिर रही थी भाजपा, विपक्ष ने 'भगवा' लाकर खुद के पैर पर मार ली कुल्हाड़ी'  राजनीति में एक बहुत पुरानी कहावत है कि जब आपका विरोधी खुद गलती कर रहा हो, तो उसके रास्ते में कभी नहीं आना चाहिए। लेकिन विपक्ष के सलाहकारों को शायद यह बुनियादी बात समझ नहीं आती। वे अक्सर विरोधी के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि खुद ही कुल्हाड़ी उठाकर अपने पैर पर मार लेते हैं। शुक्रवार की घटना को ही देख लीजिए। एक तरफ चंदा चोरी के मुद्दे पर सत्ता पक्ष पूरी तरह बैकफुट पर था। जनता के बीच गंभीर सवाल तैर रहे थे और सरकार के पास कोई साफ जवाब नहीं था। यह एक ऐसा बना-बनाया मुद्दा था, जिसे विपक्ष आसानी से अपने पक्ष में भुना सकता था। लेकिन ठीक इसी मोड़ पर विपक्ष के किसी परम ज्ञानी रणनीतिकार ने अपना दिमाग चलाया। उन्होंने चंदा चोरी के एक ड्रामे में भगवा कपड़े पहने एक संत को चोर के रूप में पेश कर दिया। नतीजा क्या हुआ? जो मुद्दा भ्रष्टाचार, पारदर्शिता और जनता की गाढ़ी कमाई की लूट का था, वह पलक झपकते ही बदल गया। अब वह 'सनातन के अपमान' का नैरेटिव बन गया । अब उल्टा विपक्ष हाथ ज...

'तीन तलाक कानून: आधी आबादी को डर से आज़ादी मिलने के निहितार्थ'

'तीन तलाक कानून: आधी आबादी को डर से आज़ादी मिलने के निहितार्थ'  (1 अगस्त मुस्लिम महिला अधिकार दिवस)  देश की संसद ने जब एक झटके में तीन तलाक कहने की सदियों पुरानी प्रथा पर कानूनन रोक लगाई, तो उसे महज़ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं माना गया। वह देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के लिए एक नए सवेरे जैसी उम्मीद थी। हालांकि यह सोचना ज़रूरी हो जाता है कि ज़मीन पर इस कानून से कितना बड़ा बदलाव आया है और समाज में इसे लेकर पहले और अब की स्थिति में क्या अंतर आया है। यह बदलाव सिर्फ कानूनी पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारे सामाजिक ताने-बाने और महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों पर पड़ा है।  कानून बनने से पहले की हकीकत बेहद डरावनी थी। मुस्लिम महिलाओं के सिर पर हमेशा एक अदृश्य तलवार लटकी रहती थी। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक पुराने सर्वे के मुताबिक, करीब बाइस प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं को यह भी पता नहीं होता था कि उनके शौहर ने उन्हें कब तलाक दे दिया। कोई फोन पर, कोई व्हाट्सएप मैसेज पर, तो कोई मामूली गुस्से में आकर तीन बार 'तलाक' बोलकर सालों पुराना रिश्ता पल भर में तोड़ देता था...

साहित्य के अमर शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद और उनकी कालजयी विरासत

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'साहित्य के अमर शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद और उनकी कालजयी विरासत'  31  जुलाई मुंशी प्रेमचंद जयंती (राष्ट्रीय लेखक दिवस) आज इकतीस जुलाई को हिंदी और उर्दू साहित्य के सबसे बड़े लेखक मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। जब हम प्रेमचंद का नाम सुनते हैं तो हमारे दिमाग में एक ऐसे सीधे-साधे इंसान की तस्वीर उभरती है जिसने हमेशा आम जनता की बात की। उन्होंने राजा-रानियों और परियों की काल्पनिक कहानियों को छोड़कर समाज के सबसे गरीब और बेबस लोगों को अपनी लेखनी का हीरो बनाया। प्रेमचंद केवल कहानियां लिखने वाले लेखक नहीं थे बल्कि वे अपने समय से बहुत आगे की सोचने वाले एक सच्चे युग दृष्टा थे। उन्होंने समाज को देखने और समझने का एक नया नजरिया दिया। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने करीब सौ साल पहले जिन सामाजिक बुराइयों और इंसानी स्वभाव को पहचाना था वे सारी बातें आज भी हमारे समाज में सच साबित हो रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए एक ऐसी साहित्यिक विरासत हमारे बीच छोड़ी है जो हमेशा हमारा रास्ता रोशन करती रहेगी। प्रेमचंद के पूरे साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी और जमीन से जुड़ी स...

'सावधान! 'घर बैठे कमाई' वाला वो एक मैसेज आपको बना सकता है डिजिटल गुलाम'

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'सावधान! 'घर बैठे कमाई' वाला वो एक मैसेज आपको बना सकता है डिजिटल गुलाम' 30 जुलाई (मानव तस्करी विरोधी दिवस)  घर बैठे मोबाइल से कमाएं रोज के पांच हजार रुपए! आजकल फेसबुक, इंस्टाग्राम या व्हाट्सएप खोलते ही ऐसे लुभावने मैसेज हर तरफ तैरते हुए दिख जाते हैं। मंदी और बेरोजगारी के इस दौर में जब जेब तंग हो, तो ऐसे विज्ञापन किसी वरदान या लॉटरी जैसे लगते हैं। लेकिन जरा ठहरिए! जिस लिंक पर आप एक 'क्लिक' करने जा रहे हैं, वो आपको अमीर बनाने का रास्ता नहीं, बल्कि एक ऐसे दलदल का रास्ता है जहाँ से आप कंगाल और बर्बाद होकर ही बाहर निकलेंगे। हर साल 30 जुलाई को दुनिया भर में 'मानव तस्करी के खिलाफ विश्व दिवस' मनाया जाता है।  जब भी हम मानव तस्करी का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में पुरानी फिल्मों जैसा कोई सीन आता है - जैसे किसी का जबरन किडनैप कर लेना, किसी मासूम को बंधक बनाकर मजदूरी कराना या भीख मंगवाना। लेकिन आज के इस चमचमाते डिजिटल जमाने में अपराधियों ने अपना तरीका पूरी तरह बदल लिया है। आज का सबसे नया और खतरनाक सच है 'साइबर स्लेवरी' ...

छात्रों पर बर्बरता की जिम्मेदारी कौन लेगा??

छात्रों पर बर्बरता की जिम्मेदारी कौन लेगा??  लोकतंत्र में अपनी असहमति और असंतोष की आवाज उठाना नागरिकों का सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार है। जब देश के युवा और पढ़े-लिखे छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो वे किसी दंगे, उपद्रव या अशांति के इरादे से नहीं, बल्कि अपने भविष्य, अधिकारों और न्याय की वाजिब मांग के लिए आते हैं। लेकिन हाल ही में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर जो कुछ देखने को मिला, उसने देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने, पुलिसिया कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था के बड़े-बडे दावों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा आयोजित संसद मार्च के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने जो कार्रवाई की, वह केवल भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास नहीं, बल्कि बर्बरता की आखिरी हद थी। छात्रों का यह मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाने के लिए शुरू हुआ था। लेकिन जैसे ही यह मार्च आगे बढ़ा, दिल्ली पुलिस ने इसे रोकने के लिए बेहद आक्रामक और दमनकारी रुख अपनाया। पुलिस प्रशासन ने बाद में यह नैरेटिव बनाने की पुरजोर कोशिश की कि प्रदर्शनक...