Posts

'सड़क पर छात्र, कठघरे में सिस्टम: शांतिपूर्ण मार्च पर पैलेट गन और लाठियों का प्रहार'

'सड़क पर छात्र, कठघरे में सिस्टम: शांतिपूर्ण मार्च पर पैलेट गन और लाठियों का प्रहार'  लोकतंत्र में अपनी असहमति और असंतोष की आवाज उठाना नागरिकों का सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार है। जब देश के युवा और पढ़े-लिखे छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो वे किसी दंगे, उपद्रव या अशांति के इरादे से नहीं, बल्कि अपने भविष्य, अधिकारों और न्याय की वाजिब मांग के लिए आते हैं। लेकिन हाल ही में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर जो कुछ देखने को मिला, उसने देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने, पुलिसिया कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था के बड़े-बडे दावों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा आयोजित संसद मार्च के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने जो कार्रवाई की, वह केवल भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास नहीं, बल्कि बर्बरता की आखिरी हद थी। छात्रों का यह मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाने के लिए शुरू हुआ था। लेकिन जैसे ही यह मार्च आगे बढ़ा, दिल्ली पुलिस ने इसे रोकने के लिए बेहद आक्रामक और दमनकारी रुख अपनाया। पुलिस प्रशासन ने बाद में यह ...

प्रधान का इस्तीफा और सौ सियासी डर: 'जेन ज़ी' के चक्रव्यूह में घिरी मोदी सरकार!

'प्रधान का इस्तीफा और सौ सियासी डर: 'जेन ज़ी' के चक्रव्यूह में घिरी मोदी सरकार' भारत का लोकतंत्र इस समय एक अभूतपूर्व चौराहे पर खड़ा है। देश के कोने-कोने में छात्रों का एक ऐसा स्वतःस्फूर्त और विशाल आंदोलन खड़ा हो गया है, जिसने सत्ता के गलियारों को हिलाकर रख दिया है। नीट और अन्य बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाओं ने देश के नौजवानों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। यह केवल किसी एक परीक्षा की विफलता का मामला नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं के भरोसे, उनकी दिन-रात की कड़ी मेहनत और सुनहरे भविष्य की सुरक्षा की लड़ाई बन चुका है। इसी गुस्से के बीच देश की संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ है, जो पूरी तरह से इस छात्र आंदोलन की आंच में झुलस रहा है और देश की सर्वोच्च पंचायत पूरी तरह ठप हो चुकी है। मानसून सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष ने छात्रों के समर्थन में संसद के दोनों सदनों में सरकार को पूरी तरह घेरने का कड़ा रुख अपनाया है। सत्र के पहले दिन से ही नीट पेपर लीक और छात्र आंदोलन के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा में भारी हंगामा देखने को मिल रहा है। विपक्ष इस म...

सड़क पर छात्र, बहरी सरकार और न्यायपालिका : फिर कैसा लोकतंत्र?

Image
सड़क पर छात्र, बहरी सरकार और न्यायपालिका : फिर कैसा लोकतंत्र? आज देश का युवा और छात्र वर्ग गहरे संकट में है। जब भी इतिहास में बड़े बदलाव हुए हैं, उनकी शुरुआत हमेशा कॉलेजों से ही हुई है। छात्र देश का भविष्य होते हैं, कोई अपराधी नहीं। लेकिन आज जब देश का छात्र अपनी पढ़ाई, परीक्षाओं में धांधली या रोजगार की मांग लेकर सड़कों पर उतरता है, तो उसके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। एक तरफ सरकार उनकी जायज मांगों को सुनने से मना कर देती है, तो दूसरी तरफ उन पर पुलिस की लाठियां और आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं। सरकार बातचीत के बजाय दमन का रास्ता चुन रही है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो जनता आखिर कहां जाए? एक सच्चे लोकतंत्र की खूबी यह होती है कि वहां विरोध प्रदर्शनों का सम्मान किया जाता है। सरकार का कर्तव्य है कि वह प्रदर्शनकारी छात्रों को बुलाए, उनकी समस्याओं को समझे और मिलकर रास्ता निकाले। लेकिन मौजूदा समय में संवाद की जगह पूरी तरह खत्म हो चुकी है। सत्ता में बैठे लोग इतने अहंकारी हो चुके हैं कि उन्हें जनता की आवाज सिर्फ एक शोर लगती है। जब युवाओं से शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिका...

'लोकतंत्र में हक मांगना गुनाह नहीं, फिर जंतर-मंतर पर छात्रों का बर्बर दमन क्यों?'

'लोकतंत्र में हक मांगना गुनाह नहीं, फिर जंतर-मंतर पर छात्रों का बर्बर दमन क्यों?'  अपने ही देश के बच्चों को सड़कों पर जानवरों की तरह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाए, उन पर आंसू गैस के गोले दागे जाएं और उनका खून बहाया जाए, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था के भीतर की इंसानियत मर चुकी है।  कल, यानी 20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ भी हुआ, वह किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह को कंपा देने के लिए काफी है। नीट जैसी बड़ी परीक्षा में हुई धांधली और पेपर लीक के खिलाफ देश के कोने-कोने से आए हजारों छात्र सिर्फ एक पारदर्शी भविष्य और इंसाफ की गुहार लगा रहे थे। मगर संसद के मानसून सत्र के पहले दिन जब इन बेकसूर बच्चों ने संसद चलो मार्च शुरू किया, तो सरकार ने उनके स्वागत में बैरिकेडिंग की दीवारें, कटीले तार और पुलिस की बेरहम लाठियां खड़ी कर दीं। सवाल सीधा और बहुत कड़वा है - इस खौफनाक दमन की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? दिल्ली पुलिस कोई स्वतंत्र संस्था नहीं है, वह सीधे तौर पर देश के केंद्रीय गृह मंत्रालय के इशारे पर काम करती है। नई दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा और उनके प्रशासनिक आला ...

ज़िंदगी और कूटनीति: शतरंज सिर्फ खेल नहीं, जीने का सलीका है'

Image
'ज़िंदगी और कूटनीति: शतरंज सिर्फ खेल नहीं, जीने का सलीका है'  (20 जुलाई अंतर्राष्ट्रीय शतरंज दिवस)  जब खेल खत्म होता है, तो राजा और प्यादा दोनों एक ही डिब्बे में बंद कर दिए जाते हैं। शतरंज की बिसात का यह सबसे सीधा नियम, असल में हमारी जिंदगी का भी सबसे बड़ा कड़वा सच है। आज दुनिया 'अंतर्राष्ट्रीय शतरंज दिवस' मना रही है लेकिन यकीन मानिए, यह महज किसी एक खेल का जश्न नहीं है। यह तो इंसानी दिमाग के उस अनोखे जादू का सम्मान है, जो लकड़ी के चंद टुकड़ों और 64 खानों के भीतर पूरी कायनात के फैसले तय कर देता है। आज के इस दौर में, जब मोबाइल की रील्स और शॉर्ट्स ने हमारी गहराई से सोचने की आदत को लगभग खत्म कर दिया है, शतरंज की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। एक मजे की बात देखिए, जिस खेल को आज पूरी दुनिया कूटनीति और दिमाग की सबसे बड़ी कसौटी मानती है, उसकी असली जड़ें हमारे अपने हिंदुस्तान में हैं। सदियों पहले हमारे पुरखे इसे 'चतुरंग' कहते थे। भारत की मिट्टी से निकला यह खेल दुनिया भर का चक्कर लगाकर आज वापस अपने घर में एक नए अवतार में लौट आया है। आज जब हम इस खेल को देखते हैं, तो...

सत्ता नहीं सुनने वाली! तो फ़िर बार - बार अपनी जान दांव पर क्यों लगा रहे हैं सोनम वांगचुक?

सत्ता नहीं सुनने वाली! तो फ़िर बार - बार अपनी जान दांव पर क्यों लगा रहे हैं सोनम वांगचुक? यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर चुका है, उसे अपने ही देश में न्याय मांगने के लिए बार-बार भूखा बैठना पड़ रहा है। सोनम वांगचुक, जिन्होंने कुछ समय पहले लद्दाख की बर्फीली वादियों और वहां के नाजुक पर्यावरण को बचाने के लिए शून्य से नीचे के तापमान में हफ्तों लंबा अनशन किया था, आज वही वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर भीषण गर्मी में अपनी जान दांव पर लगाए हुए हैं। इस बार उनका अनशन केवल लद्दाख के अधिकारों के लिए नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों युवा छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने और देश की परीक्षा प्रणाली में लगे 'पेपर लीक' के घुन को साफ करने के लिए है। यह पहली बार नहीं है जब सोनम वांगचुक ने किसी बड़े मकसद के लिए पानी और नमक पर दिन गुजारे हैं। इससे पहले लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा दिलाने के आंदोलन के दौरान उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसी सख्त धाराओं के तहत महीनों तक जेल की सलाखें भी झेलन...

बाढ़ से आज़ादी कब?

Image
बाढ़ से आज़ादी कब? आज़ादी के 79वें साल में भी देश की 60% बाढ़ का बोझ ढोते बिहार, असम और यूपी मानसून आते ही देश के बड़े हिस्से में खुशियों की फुहारें बरसती हैं, मोर नाचते हैं और किसान मल्हार गाते हैं। ठीक इसी समय पूरा देश अगस्त के महीने में आज़ादी का जश्न मनाने की तैयारियों में डूब जाता है। तिरंगे लहराए जाते हैं और लालकिले की प्राचीर से विकास के बड़े-बड़े दावे गूंजते हैं। लेकिन भारत के तीन राज्यों - बिहार, असम और उत्तर प्रदेश के करोड़ों लोगों के लिए आसमान से बरसने वाली यह पहली बूंद और आज़ादी का यह महीना किसी उत्सव की शुरुआत नहीं, बल्कि उनकी सामूहिक आपदा लेकर आता है। नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की रिपोर्ट चीख-चीख कर कहती है कि देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा अकेले ये तीन राज्य मिलकर सहते हैं। साल 2026 आ चुका है, दिल्ली के वातानुकूलित और आलीशान दफ्तरों में बैठकर चांद-मंगल पर बस्तियां बसाने और 'आत्मनिर्भर भारत' के नारे गढ़े जा रहे हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन तीन राज्यों की आधी आबादी को हर साल जीते-जी जल-समाधि लेने के लिए छोड़ दिया जाता है। जिस देश क...