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'तीन तलाक कानून: आधी आबादी को डर से आज़ादी मिलने के निहितार्थ'

'तीन तलाक कानून: आधी आबादी को डर से आज़ादी मिलने के निहितार्थ'  (1 अगस्त मुस्लिम महिला अधिकार दिवस)  देश की संसद ने जब एक झटके में तीन तलाक कहने की सदियों पुरानी प्रथा पर कानूनन रोक लगाई, तो उसे महज़ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं माना गया। वह देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के लिए एक नए सवेरे जैसी उम्मीद थी। हालांकि यह सोचना ज़रूरी हो जाता है कि ज़मीन पर इस कानून से कितना बड़ा बदलाव आया है और समाज में इसे लेकर पहले और अब की स्थिति में क्या अंतर आया है। यह बदलाव सिर्फ कानूनी पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारे सामाजिक ताने-बाने और महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों पर पड़ा है।  कानून बनने से पहले की हकीकत बेहद डरावनी थी। मुस्लिम महिलाओं के सिर पर हमेशा एक अदृश्य तलवार लटकी रहती थी। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक पुराने सर्वे के मुताबिक, करीब बाइस प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं को यह भी पता नहीं होता था कि उनके शौहर ने उन्हें कब तलाक दे दिया। कोई फोन पर, कोई व्हाट्सएप मैसेज पर, तो कोई मामूली गुस्से में आकर तीन बार 'तलाक' बोलकर सालों पुराना रिश्ता पल भर में तोड़ देता था...

साहित्य के अमर शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद और उनकी कालजयी विरासत

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'साहित्य के अमर शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद और उनकी कालजयी विरासत'  31  जुलाई मुंशी प्रेमचंद जयंती (राष्ट्रीय लेखक दिवस) आज इकतीस जुलाई को हिंदी और उर्दू साहित्य के सबसे बड़े लेखक मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। जब हम प्रेमचंद का नाम सुनते हैं तो हमारे दिमाग में एक ऐसे सीधे-साधे इंसान की तस्वीर उभरती है जिसने हमेशा आम जनता की बात की। उन्होंने राजा-रानियों और परियों की काल्पनिक कहानियों को छोड़कर समाज के सबसे गरीब और बेबस लोगों को अपनी लेखनी का हीरो बनाया। प्रेमचंद केवल कहानियां लिखने वाले लेखक नहीं थे बल्कि वे अपने समय से बहुत आगे की सोचने वाले एक सच्चे युग दृष्टा थे। उन्होंने समाज को देखने और समझने का एक नया नजरिया दिया। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने करीब सौ साल पहले जिन सामाजिक बुराइयों और इंसानी स्वभाव को पहचाना था वे सारी बातें आज भी हमारे समाज में सच साबित हो रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए एक ऐसी साहित्यिक विरासत हमारे बीच छोड़ी है जो हमेशा हमारा रास्ता रोशन करती रहेगी। प्रेमचंद के पूरे साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी और जमीन से जुड़ी स...

'सावधान! 'घर बैठे कमाई' वाला वो एक मैसेज आपको बना सकता है डिजिटल गुलाम'

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'सावधान! 'घर बैठे कमाई' वाला वो एक मैसेज आपको बना सकता है डिजिटल गुलाम' 30 जुलाई (मानव तस्करी विरोधी दिवस)  घर बैठे मोबाइल से कमाएं रोज के पांच हजार रुपए! आजकल फेसबुक, इंस्टाग्राम या व्हाट्सएप खोलते ही ऐसे लुभावने मैसेज हर तरफ तैरते हुए दिख जाते हैं। मंदी और बेरोजगारी के इस दौर में जब जेब तंग हो, तो ऐसे विज्ञापन किसी वरदान या लॉटरी जैसे लगते हैं। लेकिन जरा ठहरिए! जिस लिंक पर आप एक 'क्लिक' करने जा रहे हैं, वो आपको अमीर बनाने का रास्ता नहीं, बल्कि एक ऐसे दलदल का रास्ता है जहाँ से आप कंगाल और बर्बाद होकर ही बाहर निकलेंगे। हर साल 30 जुलाई को दुनिया भर में 'मानव तस्करी के खिलाफ विश्व दिवस' मनाया जाता है।  जब भी हम मानव तस्करी का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में पुरानी फिल्मों जैसा कोई सीन आता है - जैसे किसी का जबरन किडनैप कर लेना, किसी मासूम को बंधक बनाकर मजदूरी कराना या भीख मंगवाना। लेकिन आज के इस चमचमाते डिजिटल जमाने में अपराधियों ने अपना तरीका पूरी तरह बदल लिया है। आज का सबसे नया और खतरनाक सच है 'साइबर स्लेवरी' ...

छात्रों पर बर्बरता की जिम्मेदारी कौन लेगा??

छात्रों पर बर्बरता की जिम्मेदारी कौन लेगा??  लोकतंत्र में अपनी असहमति और असंतोष की आवाज उठाना नागरिकों का सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार है। जब देश के युवा और पढ़े-लिखे छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो वे किसी दंगे, उपद्रव या अशांति के इरादे से नहीं, बल्कि अपने भविष्य, अधिकारों और न्याय की वाजिब मांग के लिए आते हैं। लेकिन हाल ही में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर जो कुछ देखने को मिला, उसने देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने, पुलिसिया कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था के बड़े-बडे दावों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा आयोजित संसद मार्च के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने जो कार्रवाई की, वह केवल भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास नहीं, बल्कि बर्बरता की आखिरी हद थी। छात्रों का यह मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाने के लिए शुरू हुआ था। लेकिन जैसे ही यह मार्च आगे बढ़ा, दिल्ली पुलिस ने इसे रोकने के लिए बेहद आक्रामक और दमनकारी रुख अपनाया। पुलिस प्रशासन ने बाद में यह नैरेटिव बनाने की पुरजोर कोशिश की कि प्रदर्शनक...

प्रधान का इस्तीफा और सौ सियासी डर: 'जेन ज़ी' के चक्रव्यूह में घिरी मोदी सरकार!

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'प्रधान का इस्तीफा और सौ सियासी डर: 'जेन ज़ी' के चक्रव्यूह में घिरी मोदी सरकार' भारत का लोकतंत्र इस समय एक अभूतपूर्व चौराहे पर खड़ा है। देश के कोने-कोने में छात्रों का एक ऐसा स्वतःस्फूर्त और विशाल आंदोलन खड़ा हो गया है, जिसने सत्ता के गलियारों को हिलाकर रख दिया है। नीट और अन्य बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाओं ने देश के नौजवानों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। यह केवल किसी एक परीक्षा की विफलता का मामला नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं के भरोसे, उनकी दिन-रात की कड़ी मेहनत और सुनहरे भविष्य की सुरक्षा की लड़ाई बन चुका है। इसी गुस्से के बीच देश की संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ है, जो पूरी तरह से इस छात्र आंदोलन की आंच में झुलस रहा है और देश की सर्वोच्च पंचायत पूरी तरह ठप हो चुकी है। मानसून सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष ने छात्रों के समर्थन में संसद के दोनों सदनों में सरकार को पूरी तरह घेरने का कड़ा रुख अपनाया है। सत्र के पहले दिन से ही नीट पेपर लीक और छात्र आंदोलन के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा में भारी हंगामा देखने को मिल रहा है। विपक्ष इस म...

सड़क पर छात्र, बहरी सरकार और न्यायपालिका : फिर कैसा लोकतंत्र?

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सड़क पर छात्र, बहरी सरकार और न्यायपालिका : फिर कैसा लोकतंत्र? आज देश का युवा और छात्र वर्ग गहरे संकट में है। जब भी इतिहास में बड़े बदलाव हुए हैं, उनकी शुरुआत हमेशा कॉलेजों से ही हुई है। छात्र देश का भविष्य होते हैं, कोई अपराधी नहीं। लेकिन आज जब देश का छात्र अपनी पढ़ाई, परीक्षाओं में धांधली या रोजगार की मांग लेकर सड़कों पर उतरता है, तो उसके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। एक तरफ सरकार उनकी जायज मांगों को सुनने से मना कर देती है, तो दूसरी तरफ उन पर पुलिस की लाठियां और आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं। सरकार बातचीत के बजाय दमन का रास्ता चुन रही है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो जनता आखिर कहां जाए? एक सच्चे लोकतंत्र की खूबी यह होती है कि वहां विरोध प्रदर्शनों का सम्मान किया जाता है। सरकार का कर्तव्य है कि वह प्रदर्शनकारी छात्रों को बुलाए, उनकी समस्याओं को समझे और मिलकर रास्ता निकाले। लेकिन मौजूदा समय में संवाद की जगह पूरी तरह खत्म हो चुकी है। सत्ता में बैठे लोग इतने अहंकारी हो चुके हैं कि उन्हें जनता की आवाज सिर्फ एक शोर लगती है। जब युवाओं से शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिका...

'लोकतंत्र में हक मांगना गुनाह नहीं, फिर जंतर-मंतर पर छात्रों का बर्बर दमन क्यों?'

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'लोकतंत्र में हक मांगना गुनाह नहीं, फिर जंतर-मंतर पर छात्रों का बर्बर दमन क्यों?'  अपने ही देश के बच्चों को सड़कों पर जानवरों की तरह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाए, उन पर आंसू गैस के गोले दागे जाएं और उनका खून बहाया जाए, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था के भीतर की इंसानियत मर चुकी है।  कल, यानी 20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ भी हुआ, वह किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह को कंपा देने के लिए काफी है। नीट जैसी बड़ी परीक्षा में हुई धांधली और पेपर लीक के खिलाफ देश के कोने-कोने से आए हजारों छात्र सिर्फ एक पारदर्शी भविष्य और इंसाफ की गुहार लगा रहे थे। मगर संसद के मानसून सत्र के पहले दिन जब इन बेकसूर बच्चों ने संसद चलो मार्च शुरू किया, तो सरकार ने उनके स्वागत में बैरिकेडिंग की दीवारें, कटीले तार और पुलिस की बेरहम लाठियां खड़ी कर दीं। सवाल सीधा और बहुत कड़वा है - इस खौफनाक दमन की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? दिल्ली पुलिस कोई स्वतंत्र संस्था नहीं है, वह सीधे तौर पर देश के केंद्रीय गृह मंत्रालय के इशारे पर काम करती है। नई दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा और उनके प्...