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"भाजपा के 47 साल: शिखर पर जीत, सिद्धांतों पर सवाल"

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"भाजपा के 47 साल: शिखर पर जीत, सिद्धांतों पर सवाल" 6 अप्रैल 1980 को मुंबई के समंदर किनारे जब अटल बिहारी वाजपेयी ने अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा का उद्घोष किया था, तो वह केवल एक चुनावी नारा नहीं बल्कि एक वैकल्पिक राजनीति का संकल्प था। आज 2026 में जब भारतीय जनता पार्टी अपना 47वां स्थापना दिवस मना रही है, तो इसमें कोई दो राय नहीं कि वह दुनिया के सबसे बड़े और अजेय नजर आने वाले राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित हो चुकी है। लेकिन इस अभूतपूर्व सफलता के ऊंचे बुर्ज पर बैठकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कुछ बुनियादी सवाल आज भी पार्टी की उस अलग तरह के दल वाली छवि का पीछा कर रहे हैं। क्या सत्ता के इस विशाल साम्राज्य को खड़ा करने की प्रक्रिया में वे आदर्श कहीं पीछे छूट गए हैं, जो इस दल की नींव में रखे गए थे? भारतीय राजनीति के इस लंबे सफर में भाजपा ने शून्य से शिखर तक की जो यात्रा तय की है, वह संगठनात्मक कौशल का अद्भुत उदाहरण तो है, पर क्या यह सफर अपनी मूल शुचिता को भी साथ लेकर चल पाया है? भाजपा की वैचारिक यात्रा का मूल आधार अंत्योदय और सांस्कृतिक राष...

ट्रंप की मज़बूर 'एग्जिट' चाल, ईरान का भीषण प्रहार और इज़रायल की अग्निपरीक्षा'

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'ट्रंप की मज़बूर 'एग्जिट' चाल, ईरान का भीषण प्रहार और इज़रायल की अग्निपरीक्षा' आज मध्य-पूर्व के तपते और बारूद की गंध से भरे रेगिस्तान में इतिहास की सबसे खतरनाक पटकथा लिखी जा रही है और दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ अमेरिका जैसी महाशक्ति की 'हेकड़ी' ईरान के फौलादी इरादों के सामने पस्त पड़ती दिखाई दे रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो व्हाइट हाउस की कुर्सी संभालते ही ईरान को 'पत्थर युग' में भेजने की गर्जना कर रहे थे, आज उसी ईरान की अभूतपूर्व सैन्य दृढ़ता और अचूक मिसाइल तकनीक के सामने खुद को बुरी तरह फंसा हुआ पा रहे हैं। ट्रंप का हालिया और चौंकाने वाला बयान, जिसमें उन्होंने अगले 2 से 3 हफ्तों के भीतर ईरान से अपनी सेना को बाहर निकालने की बात कही है, दरअसल कोई सोची-समझी कूटनीतिक जीत नहीं बल्कि एक हारी हुई बाजी से सुरक्षित निकलने की छटपटाहट है क्योंकि अमेरिका की वैश्विक दादागिरी अब ईरान के आत्मसम्मान और उसकी मज़बूत सैन्य घेराबंदी के सामने धराशायी हो चुकी है। ट्रंप जो खुद को दुनिया का 'सर्वश्रेष्ठ डील मेकर' कहते थे, आज ईरान की शर्तों के साम...

क्षितिज के पार: लहरों पर लिखती भारत की नई शौर्यगाथा'

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'क्षितिज के पार: लहरों पर लिखती भारत की नई शौर्यगाथा' उफनती लहरें, गहरा नीला समंदर और क्षितिज पर डूबता सूरज—ये दृश्य अक्सर हमें सुकून देते हैं, लेकिन इसी असीम विस्तार के पीछे छिपी है एक राष्ट्र के स्वाभिमान और समृद्धि की वह कहानी, जिसे हम 'राष्ट्रीय समुद्री दिवस' के रूप में याद करते हैं। यह दिन केवल एक तारीख भर नहीं है, बल्कि यह उस साहस का उत्सव है जिसने सदियों पहले विदेशी बेड़ियों को तोड़कर खुले समुद्र में अपनी पहचान दर्ज की थी। कल्पना कीजिए उस दौर की, जब समंदर पर केवल फिरंगियों का राज हुआ करता था। उनके जहाज चलते थे, उनके नियम चलते थे और हमारी अपनी विरासत कहीं किनारे पर खड़ी असहाय नजर आती थी। ऐसे में एक हिंदुस्तानी जहाज, 'एसएस लॉयल्टी', मुंबई के तट से लंदन के लिए निकलता है। वह सिर्फ लकड़ी और लोहे का ढांचा नहीं था, वह करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का वह पुल था जिसने दुनिया को बता दिया कि भारत की सीमाएं केवल जमीन तक सीमित नहीं हैं। वह यात्रा एक विद्रोह थी, एक घोषणा थी कि अब हम लहरों के साथ बहेंगे नहीं, बल्कि उन्हें अपनी दिशा में मोड़ेंगे। आज जब हम पीछे मुड़कर देखत...

'भीड़ में भी अपनी अलग दुनिया बसाए इन मासूमों को पहचानिए'

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'भीड़ में भी अपनी अलग दुनिया बसाए इन मासूमों को पहचानिए'  (02 अप्रैल 'विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस')  दुनिया की इस भागदौड़ और शोर-शराबे में जब हम 'सामान्य' होने का दिखावा कर रहे होते हैं, तब हमारे बीच ही कुछ ऐसे मासूम चेहरे होते हैं जिनकी अपनी एक खामोश और अलग दुनिया होती है। 2 अप्रैल का दिन कैलेंडर में 'विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस' के रूप में दर्ज है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम वाकई इस शब्द के पीछे के मर्म को समझते हैं? ऑटिज्म, जिसे हिंदी में 'स्वलीनता' कहते हैं, कोई बीमारी नहीं है। यह तो कुदरत का एक अलग अंदाज है, जहाँ किसी बच्चे के सोचने, समझने और दूसरों से जुड़ने का तरीका हमसे थोड़ा अलग होता है। अक्सर हम ऐसे बच्चों को देखकर या तो नजरें चुरा लेते हैं या फिर उन पर 'बेचारा' होने का ठप्पा लगा देते हैं। समाज की यही सहानुभूति दरअसल उनके लिए सबसे बड़ा पिंजरा बन जाती है। हमें समझने की जरूरत है कि ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्ति को हमारी दया की नहीं, बल्कि हमारे साथ और सम्मान की जरूरत है। वे दुनिया को वैसे नहीं देखते जैसे हम और आप देखते हैं। ...

रंगमंच: वह 'ऑफलाइन' दुनिया, जहाँ इमोजी नहीं, असली आँसू बहते हैं

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रंगमंच: वह 'ऑफलाइन' दुनिया, जहाँ इमोजी नहीं, असली आँसू बहते हैं (3 अप्रैल हिन्दी रंगमंच दिवस)  हिंदी रंगमंच को लेकर हमारे समाज में एक अजीब सी रूमानी किस्म की सहानुभूति है, जो अक्सर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ही खत्म हो जाती है। 3 अप्रैल का दिन हम 'हिंदी रंगमंच दिवस' के नाम पर दर्ज तो कर लेते हैं, लेकिन क्या हम उस बेचैनी को समझ पा रहे हैं जो इस कला की जड़ों में है? 1868 में जब बनारस के मंच पर 'जानकी मंगल' नाटक खड़ा हुआ था, तो वह कोई मनोरंजन का साधन भर नहीं था। वह एक भाषा का अपने वजूद के लिए किया गया ऐलान था। आज डेढ़ सौ साल बाद, हम उस ऐलान की गूँज को डिजिटल शोर के बीच खो चुके हैं। रंगमंच असल में मनुष्य के भीतर की उस आदिम भूख का नाम है, जो कैमरे की आंख से बचकर सीधे साक्षात इंसान से आंख मिलाना चाहती है। यह कला किसी रीटेक की मोहताज नहीं है और न ही यहाँ कोई एडिटिंग टेबल गलतियों को सुधारने के लिए बैठी है। सिनेमा हमें एक 'निर्मित सत्य' दिखाता है, जहाँ निर्देशक तय करता है कि आपको क्या देखना है। इसके उलट रंगमंच एक 'लोकतांत्रिक अनुभव' है। मंच पर खड़ा अभिनेता अपन...

फ़ारस: राख से उठता इंकलाब

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'ईरान' जिसे हम अक्सर टीवी की चीखती खबरों और हेडलाइन्स के चश्मे से देखते हैं. पर सच ये है कि ईरान सिर्फ एक मुल्क का नक्शा नहीं है, ये तो एक हज़ारों साल पुरानी एक सभ्यता है, इस्फहान की वो नीली टाइलें हों या हाफ़िज़ की पुरानी नज़्में..  इस मिट्टी ने दुनिया को खूबसूरती का असली सलीका सिखाया है.  पर आज का ईरान एक अजीब सी कशमकश में है, एक तरफ वो बेटियाँ हैं जिनकी हँसी पर पहरे लगा दिए गए, और दूसरी तरफ वो देश की संप्रभुता को बचाने की एक बेमिसाल ज़िद भी है. ये कोई धर्म की जंग नहीं है, ये तो बस 'रसूख' और ताकत का एक अंधा खेल है, जहाँ ताकतवर हुक्मरान लोगों को शतरंज की बिसात पर प्यादों की तरह बिछा देते हैं.  मैं आज उस ईरान के साथ खड़ा हूँ जो अपना सुकून, अपनी खुशियाँ, अपनी आने वाली नस्लें... सब कुछ हार रहा है. पर एक चीज़ है जो उसने अब भी अपनी मुट्ठी में दबाकर रखी है जो है उसका 'स्वाभिमान.... फ़ारस: राख से उठता इंकलाब गूंजती है आज भी तख्त-ए-जमशेद के खंडहरों में वो एक पुरानी आहट जो याद दिलाती है कि तख्त बनते और उजड़ते रहते हैं पर मिट्टी की अना कभी नहीं मरती  इस्फ...

'वर्धमान से भगवान महावीर : करुणा और आत्म-विजय की एक अंतहीन यात्रा'

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'वर्धमान से भगवान महावीर : करुणा और आत्म-विजय की एक अंतहीन यात्रा'   आज की यह सुनहरी सुबह अपने साथ एक बहुत ही गहरा और पावन संदेश लेकर आई है, क्योंकि आज 31 मार्च है और पूरा देश भगवान महावीर की जयंती का उत्सव मना रहा है। यह दिन महज एक तारीख नहीं, बल्कि खुद के भीतर झांकने का एक सुनहरा अवसर है जो हमें उस महापुरुष की याद दिलाता है जिसने महलों के सुख को तिनके की तरह त्याग दिया था। बिहार के वैशाली की वह पावन भूमि, जहाँ राजकुमार वर्धमान का जन्म हुआ था, आज भी उस त्याग की गवाह है जिसने एक राजकुमार को 'महावीर' बना दिया। तीस साल की छोटी सी उम्र में जब उन्होंने राजसी वैभव छोड़ा, तो उन्हें किसी राज्य की नहीं बल्कि उस सत्य की तलाश थी जो इंसान को जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त कर सके। बारह वर्षों की कठिन तपस्या और मौन साधना के बाद उन्हें जो 'कैवल्य ज्ञान' प्राप्त हुआ, वह केवल जैन धर्म के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए एक संजीवनी बनकर उभरा। महावीर का सबसे क्रांतिकारी संदेश था 'जीओ और जीने दो', जो सुनने में जितना सरल है, जीवन में उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण। उनक...