Posts

रंगमंच का वो कबीर चला गया... अलविदा नाना!

रंगमंच का वो कबीर चला गया... अलविदा नाना! किताबों की बातें करने वाले, हमेशा दिल से जीने वाले नाना। इतने बड़े फनकार बने आप, पूरी दुनिया ने आपकी अदाकारी को सलाम किया और 'सम्पूर्ण अदाकार' का खिताब दिया, लेकिन आप अपनी आख़िरी सांस तक वही ठेठ गाँव के सीधे-सादे फक्कड़ इंसान ही रहे। अपनी ही मस्ती में, अपनी ही रफ्तार से चलने वाले एक अलबेले मुसाफ़िर। जिसकी अपनी एक अलग ही दुनिया थी।  आपकी वो सादगी और बेलौस अंदाज़ ऐसा था कि बड़े से बड़े लोग आपके सामने मद्धम पड़ जाते थे। कमाल का था आपका रूतबा। जब दिल किया, किसी की भी खुलकर तारीफ़ कर दी और जब गुस्सा आया, तो सामने कोई भी हो, बिना डरे खरी-खरी सुना दी। आपका कोई तय ढर्रा या बंदिश नहीं थी, न किसी दल में न दलदल में। आपकी तो बस एक ही अपनी विचारधारा थी इंसानियत, मानवता, सद्भाव और प्रेम। इस बेढंगी दुनिया में एक शानदार इंसान रहे हैं आप। आपको एक अभिनेता से बढ़कर एक खरे इंसान के रूप में याद किया जाएगा। सचमुच आप सिनेमा के कबीर थे। इतनी शोहरत और नेशनल अवॉर्ड्स, नागरिक सम्मान सहित बड़े बड़े अवॉर्ड जीतने के बाद भी आप अक्सर कितनी मासूमियत से कहते थे, 'या...

'रंगमंच का वो कबीर चला गया... अलविदा नाना'

Image
'रंगमंच का वो कबीर चला गया... अलविदा नाना'  किताबों की बातें करने वाले, हमेशा दिल से जीने वाले नाना। इतने बड़े फनकार बने आप, पूरी दुनिया ने आपकी अदाकारी को सलाम किया और 'सम्पूर्ण अदाकार' का खिताब दिया, लेकिन आप अपनी आख़िरी सांस तक वही ठेठ गाँव के सीधे-सादे इंसान ही रहे। अपनी ही मस्ती में, अपनी ही रफ्तार से चलने वाले एक अलबेले मुसाफ़िर। जिसकी अपनी एक अलग ही दुनिया थी। आपकी वो सादगी और बेलौस अंदाज़ ऐसा था कि बड़े से बड़े लोग आपके सामने मद्धम पड़ जाते थे। कमाल का था आपका रूतबा। जब दिल किया, किसी की भी खुलकर तारीफ़ कर दी और जब गुस्सा आया, तो सामने कोई भी हो, बिना डरे खरी-खरी सुना दी। आपका कोई तय ढर्रा या बंदिश नहीं थी, न किसी दल में न दलदल में। आपकी तो बस एक ही अपनी विचारधारा थी - प्रेम, सद्भाव और मानवता। इस बेढंगी दुनिया में एक शानदार इंसान रहे हैं आप। आपको एक अभिनेता से बढ़कर एक खरे इंसान के रूप में याद किया जाएगा। सचमुच आप सिनेमा के कबीर थे। इतनी शोहरत और नेशनल अवॉर्ड्स जीतने के बाद भी आप अक्सर कितनी मासूमियत से कहते थे, 'यार, मुझे...

'अक्षरों की उलझन में बच्चे : डिस्लेक्सिया की इनसाइड स्टोरी'

Image
'अक्षरों की उलझन में बच्चे : डिस्लेक्सिया की इनसाइड स्टोरी' (08 अक्टूबर विश्व डिस्लेक्सिया दिवस)  मान लीजिए, एक सात-आठ साल का बच्चा अपनी कॉपी लेकर बैठा है। आप उसे बी लिखने को कहते हैं, वह डी लिख देता है। आप उसे छह लिखने को बोलते हैं, वह नौ बना देता है। आप दो बार डांटते हैं, तीसरी बार हाथ उठा देते हैं। आपको लगता है कि वह जानबूझकर कर रहा है, उसका मन सिर्फ फोन चलाने या खेलने में है। लेकिन हो सकता है उस बच्चे को आपकी बात समझ ही न आ रही हो? उसे कॉपी के पन्ने पर लिखे शब्द सीधे दिखने के बजाय तैरते हुए या उल्टे दिखाई दे रहे हों? बस इसी उलझन का नाम डिस्लेक्सिया है। इसे समझने के लिए कोई डॉक्टर बनने की ज़रूरत नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो हमारा और आपका दिमाग अक्षरों को देखकर तुरंत पहचान लेता है। लेकिन कुछ बच्चों का दिमाग इन अक्षरों को थोड़ा अलग तरीके से देखता है। यह कोई बीमारी नहीं है कि डॉक्टर के पास गए, सिरप पिलाया और बच्चा ठीक हो गया। यह दिमाग की अपनी एक बनावट है जो जन्म से ही ऐसी होती है। बच्चा न तो पागल है, न मंदबुद्धि है और न ही कामचोर। उसका दिमाग बस एक अलग सॉफ्टवेयर ...

सफेद सोने का संकट और किसानों की जमीनी हकीकत

Image
सफेद सोने का संकट और किसानों की जमीनी हकीकत विशेष लेख  (07 अक्टूबर विश्व कपास दिवस)  भारत के कृषि और औद्योगिक ढांचे में कपास केवल एक व्यापारिक फसल नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। देश के करीब 60 लाख किसान सीधे तौर पर इसकी खेती से जुड़े हैं, जबकि कपड़ा उद्योग के माध्यम से यह सेक्टर 4 से 5 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। राष्ट्रपिता गांधी जी ने कहा था कि भारत का उद्धार उसके कताई चक्र और खादी में निहित है, जो देश के करोड़ों भूखे लोगों को आजीविका दे सकता है। गांधी जी का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है। 7 अक्टूबर को विश्व कपास दिवस के वैश्विक आयोजन के बीच, भारतीय कपास क्षेत्र के सरकारी आंकड़ों और खेतों के कड़वे सच के बीच के फासले का तटस्थ विश्लेषण बेहद जरूरी हो जाता है। वैश्विक परिदृश्य में भारत कपास के बुवाई क्षेत्र के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर है। देश के लगभग 114.82 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती की जाती है। उत्पादन की दृष्टि से भारत, चीन के बाद विश्व में दूसरे पायदान पर आता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, च...

'चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल: अर्जित लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट'

Image
'चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल: अर्जित लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट'  लोकतंत्र में वोट सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक और सत्ता के बीच का वह पवित्र भरोसा है जिसकी ईमानदारी बनाए रखने का जिम्मा चुनाव आयोग पर होता है। लेकिन जब मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर देश की सडकें आंदोलन से गूंजने लगें और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गायब होने के आरोप लगें, तो सवाल सिर्फ एक संस्था की कार्यप्रणाली पर नहीं उठता। सवाल उस अर्जित लोकतंत्र की बुनियाद पर जाकर टिक जाता है, जिसे हमने दशकों के भरोसे से सींचा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर मुंबई के शिवाजी पार्क तक जो नौजवान सड़कों पर उतरे हैं, उसे सामान्य राजनीतिक ड्रामा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। छात्र संगठनों, विपक्षी पार्टियों और युवाओं के इस देशव्यापी विरोध प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया है कि मामला अब जनता के बुनियादी अधिकारों से जुड़ चुका है। इस पूरे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग के अपने आधिकारिक आंकड़े हैं। आयोग द्वारा चलाए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी मतदाता सूची सुधार अभियान के तहत अब तक ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से कर...

'भागमभाग की ज़िन्दगी में अपनों से दूर होते 'घर के बुजुर्ग'

Image
'भागमभाग की ज़िन्दगी में अपनों से दूर होते 'घर के बुजुर्ग' (1 अक्टूबर अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस)  सुबह-शाम के वक्त किसी भी कॉलोनी के पार्क या मंदिर के चबूतरे या सीढ़ियों पर देखिए। वहाँ आपको बेंच पर अकेले बैठे कुछ बुजुर्ग मिल जाएंगे, जो बिना किसी काम के बस बैठे रहते हैं। वहां से गुजरने वाले हर इंसान को देखते हैं, फिर छोटी-छोटी चीजों पर डिस्कशन भी करते हैं। कभी उनके पास सिर्फ दो मिनट के लिए बैठकर देखिएगा। शुरुआत भले ही मौसम या राजनीति से हो, लेकिन जैसे ही उन्हें लगता है कि सामने वाला वाकई उनकी बात सुन रहा है, उनके भीतर से इंट्रेस्टिंग कहानियां निकलने लगती हैं। वे अपने दौर के ऐसे-ऐसे दिलचस्प किस्से और अपनी जवानी के संघर्ष सुनाने लगते हैं कि आप दंग रह जाएंगे। कई बार तो उनके हास्य का पुट और मजाक करने का अंदाज इतना खूबसूरत होता है कि हमारे आज के चुटकुले उनके सामने फीके लगने लगते हैं। वे बूढ़े बुजुर्ग जीती-जागती किताबें हैं, जिन्हें बस कोई अदब से पलटने वाला चाहिए। यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हमारे ही समाज का सच है। हालिया आंकड़ों की मानें तो देश में साठ साल से ऊपर के बु...

संवादों की मोहताज नहीं कला: तकनीकी शोर के बीच मूक सिनेमा का कालजयी दर्शन

Image
संवादों की मोहताज नहीं कला: तकनीकी शोर के बीच मूक सिनेमा का कालजयी दर्शन (29 सितंबर विश्व मूक सिनेमा दिवस) आज का सिनेमा आधुनिक तकनीक, डॉल्बी साउंड और भारी-भरकम विजुअल इफेक्ट्स के शोर से भरा हुआ है। ऐसे दौर में क्या हम उस सिनेमा की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ न संवाद थे, न बैकग्राउंड स्कोर और न ही बोलते चिल्लाते हुए  किरदार?  आज 29 सितंबर को विश्व मूक फिल्म दिवस है। यह दिन सिनेमा के इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि अभिनय की उस शुद्धतम कला को समझने का मौका है, जहाँ संवादों की अभिव्यक्ति के बिना  सिर्फ आंखों और चेहरों से कहानियां पर्दे पर उतरती थीं। सिनेमा का एक बुनियादी सच यह है कि मेथड ऐक्टिंग के लिए आवाज की जरूरत कभी नहीं रही। संवाद केवल कहानी आगे बढ़ाने का जरिया हैं, लेकिन असल अभिनय सीधे दर्शक की आत्मा को छूता है। इसका सबसे बड़ा और कालजयी उदाहरण गुलज़ार की फिल्म 'कोशिश' है। इस फिल्म में संजीव कुमार और जया बच्चन ने एक मूक-बधिर कपल की भूमिका निभाई थी। पूरी फिल्म में दोनों ने अपनी जुबां से एक शब्द भी नहीं बोला, लेकिन अपनी आंखों के ठहराव, हाथों के कोमल इशारों और चे...