'भीड़ में भी अपनी अलग दुनिया बसाए इन मासूमों को पहचानिए'
'भीड़ में भी अपनी अलग दुनिया बसाए इन मासूमों को पहचानिए' (02 अप्रैल 'विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस') दुनिया की इस भागदौड़ और शोर-शराबे में जब हम 'सामान्य' होने का दिखावा कर रहे होते हैं, तब हमारे बीच ही कुछ ऐसे मासूम चेहरे होते हैं जिनकी अपनी एक खामोश और अलग दुनिया होती है। 2 अप्रैल का दिन कैलेंडर में 'विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस' के रूप में दर्ज है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम वाकई इस शब्द के पीछे के मर्म को समझते हैं? ऑटिज्म, जिसे हिंदी में 'स्वलीनता' कहते हैं, कोई बीमारी नहीं है। यह तो कुदरत का एक अलग अंदाज है, जहाँ किसी बच्चे के सोचने, समझने और दूसरों से जुड़ने का तरीका हमसे थोड़ा अलग होता है। अक्सर हम ऐसे बच्चों को देखकर या तो नजरें चुरा लेते हैं या फिर उन पर 'बेचारा' होने का ठप्पा लगा देते हैं। समाज की यही सहानुभूति दरअसल उनके लिए सबसे बड़ा पिंजरा बन जाती है। हमें समझने की जरूरत है कि ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्ति को हमारी दया की नहीं, बल्कि हमारे साथ और सम्मान की जरूरत है। वे दुनिया को वैसे नहीं देखते जैसे हम और आप देखते हैं। ...