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फ़ारस: राख से उठता इंकलाब

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'ईरान' जिसे हम अक्सर टीवी की चीखती खबरों और हेडलाइन्स के चश्मे से देखते हैं. पर सच ये है कि ईरान सिर्फ एक मुल्क का नक्शा नहीं है, ये तो एक हज़ारों साल पुरानी एक सभ्यता है, इस्फहान की वो नीली टाइलें हों या हाफ़िज़ की पुरानी नज़्में..  इस मिट्टी ने दुनिया को खूबसूरती का असली सलीका सिखाया है.  पर आज का ईरान एक अजीब सी कशमकश में है, एक तरफ वो बेटियाँ हैं जिनकी हँसी पर पहरे लगा दिए गए, और दूसरी तरफ वो देश की संप्रभुता को बचाने की एक बेमिसाल ज़िद भी है. ये कोई धर्म की जंग नहीं है, ये तो बस 'रसूख' और ताकत का एक अंधा खेल है, जहाँ ताकतवर हुक्मरान लोगों को शतरंज की बिसात पर प्यादों की तरह बिछा देते हैं.  मैं आज उस ईरान के साथ खड़ा हूँ जो अपना सुकून, अपनी खुशियाँ, अपनी आने वाली नस्लें... सब कुछ हार रहा है. पर एक चीज़ है जो उसने अब भी अपनी मुट्ठी में दबाकर रखी है जो है उसका 'स्वाभिमान.... फ़ारस: राख से उठता इंकलाब गूंजती है आज भी तख्त-ए-जमशेद के खंडहरों में वो एक पुरानी आहट जो याद दिलाती है कि तख्त बनते और उजड़ते रहते हैं पर मिट्टी की अना कभी नहीं मरती  इस्फ...

'वर्धमान से भगवान महावीर : करुणा और आत्म-विजय की एक अंतहीन यात्रा'

'वर्धमान से भगवान महावीर : करुणा और आत्म-विजय की एक अंतहीन यात्रा'   आज की यह सुनहरी सुबह अपने साथ एक बहुत ही गहरा और पावन संदेश लेकर आई है, क्योंकि आज 31 मार्च है और पूरा देश भगवान महावीर की जयंती का उत्सव मना रहा है। यह दिन महज एक तारीख नहीं, बल्कि खुद के भीतर झांकने का एक सुनहरा अवसर है जो हमें उस महापुरुष की याद दिलाता है जिसने महलों के सुख को तिनके की तरह त्याग दिया था। बिहार के वैशाली की वह पावन भूमि, जहाँ राजकुमार वर्धमान का जन्म हुआ था, आज भी उस त्याग की गवाह है जिसने एक राजकुमार को 'महावीर' बना दिया। तीस साल की छोटी सी उम्र में जब उन्होंने राजसी वैभव छोड़ा, तो उन्हें किसी राज्य की नहीं बल्कि उस सत्य की तलाश थी जो इंसान को जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त कर सके। बारह वर्षों की कठिन तपस्या और मौन साधना के बाद उन्हें जो 'कैवल्य ज्ञान' प्राप्त हुआ, वह केवल जैन धर्म के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए एक संजीवनी बनकर उभरा। महावीर का सबसे क्रांतिकारी संदेश था 'जीओ और जीने दो', जो सुनने में जितना सरल है, जीवन में उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण। उनके दर्शन की न...

'मैनेजमेंट गुरु हनुमान: असंभव को संभव बनाने की शक्ति एवं संकल्प'

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'मैनेजमेंट गुरु हनुमान: असंभव को संभव बनाने की शक्ति एवं संकल्प' आज जब चैत्र मास की पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी पूरी आभा के साथ आकाश में उदित होगा, तो धरती पर एक ऐसी ऊर्जा का संचार होगा जो सदियों से भारतीय जनमानस के रोम-रोम में बसी है। यह दिन केवल एक कैलेंडर की तिथि नहीं है, बल्कि उस महाशक्ति के अवतरण का उत्सव है जिसे हम 'हनुमान' कहते हैं। हनुमान जी का व्यक्तित्व किसी परिचय का मोहताज नहीं है; वे घर-घर के रक्षक, संकटों के नाशक और हर व्याकुल हृदय के परम साथी हैं। उनकी महिमा का गान जितना सरल है, उनका जीवन दर्शन उतना ही गहरा और प्रेरणादायी है। उनकी सबसे बड़ी सुंदरता उनकी निस्वार्थ भक्ति में छिपी है। उन्होंने दुनिया को सिखाया कि ईश्वर को पाने के लिए किसी कठिन आडंबर की नहीं, बल्कि 'निर्मल मन' और 'पूर्ण समर्पण' की आवश्यकता होती है। एक ओर जहाँ उनके पास लंका को भस्म करने और समुद्र को एक छलांग में लांघने की असीम शक्ति थी, वहीं दूसरी ओर वे प्रभु राम के चरणों में एक अबोध बालक की भांति विनत रहते थे। उनकी शक्ति म...

"शक्तिशाली सेना बनाम खाली जेब: कूटनीति के चक्रव्यूह में फंसा अमेरिकी स्वाभिमान"

"शक्तिशाली सेना बनाम खाली जेब: कूटनीति के चक्रव्यूह में फंसा अमेरिकी स्वाभिमान" दुनिया के नक्शे पर जब भी युद्घ की आहट होती है, तो सबसे पहले व्हाइट हाउस की हलचलें तेज हो जाती हैं। लेकिन ये युद्घ अमेरिका के कुछ अलग है, और महंगा भी पड़ रहा है, एक तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी मिसाइलें ईरान के आसमान को चीर रही हैं, तो दूसरी तरफ पेंसिलवेनिया और ओहायो के गैस स्टेशनों पर खड़ा एक आम अमेरिकी नागरिक अपनी खाली होती जेब देख रहा है। आज की कड़वी सच्चाई यही है कि वाशिंगटन की सैन्य ताकत जितनी बढ़ रही है, वहां के आम आदमी का भरोसा अपनी सरकार और अपनी अर्थव्यवस्था पर उतना ही कम होता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका फर्स्ट का नारा तो दिया था, लेकिन आज का मंजर देखकर ऐसा लगता है जैसे युद्ध की जिद ने उस वादे को ही हाशिए पर धकेल दिया है। राजनीतिक गलियारों में आज ट्रंप की स्थिति किसी मज़ाक से कम नहीं रह गई है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने चिल्ला-चिल्लाकर कहा था कि वे अमेरिका को अंतहीन युद्धों से बाहर निकालेंगे, लेकिन आज वे खुद एक नए और भीषण युद्ध के नायक बने बैठे हैं। इसे नियति ...

"गैस की किल्लत या सिस्टम की सुस्ती? वैश्विक संकट में पिसती जनता"

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"गैस की किल्लत या सिस्टम की सुस्ती? वैश्विक संकट में पिसती जनता" दुनिया के मानचित्र पर जब भी किसी देश की सीमाएं सुलगती हैं, तो उसकी लपटें हजारों मील दूर बैठे एक भारतीय परिवार की रसोई तक पहुँचने में देर नहीं लगातीं। आज की वैश्वीकृत दुनिया में सरहदों पर गिरा हर बम हमारी जेब में एक अदृश्य छेद कर देता है। एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ सरकारी प्रेस रिलीज और दावे सब कुछ सामान्य होने की बात कह रहे हैं, तो दूसरी तरफ हकीकत यह है कि मोहल्लों की दुकानों और गैस एजेंसियों के बाहर स्टॉक खत्म होने की तख्तियां लटक रही हैं। सत्ता के गलियारों से जब यह बयान आता है कि देश में गैस की कोई कमी नहीं है, तो यह सुनकर उस कतार में खड़े आम आदमी को सुकून कम और खीझ ज्यादा होती है, जो पिछले कई दिनों से अपने गैस कनेक्शन के रिफिल होने का इंतजार कर रहा है। सवाल यह है कि अगर गैस की कमी नहीं है, तो फिर वह आम आदमी के चूल्हे तक पहुँच क्यों नहीं रही? राजनीति और कूटनीति की वह बारीक परत है जिसे समझना जरूरी है। सरकार का यह तर्क तकनीकी रूप से सही हो सकता है कि हमारे पास पर्याप्त भंडारण है,...

"एक घंटा अंधेरा: भविष्य की सुनहरी रोशनी का वैश्विक संकल्प"

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"एक घंटा अंधेरा: भविष्य की सुनहरी रोशनी का वैश्विक संकल्प"  (28 मार्च अर्थ ऑवर का वैश्विक संकल्प)  प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से एक अटूट डोर से बंधा रहा है, लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हमने उस डोर को इतना खींच दिया है कि अब उसके टूटने की आहट साफ सुनाई देने लगी है। इसी आहट को पहचानने और दुनिया को एक धागे में पिरोने का नाम है—अर्थ ऑवर। हर साल मार्च के आखिरी शनिवार को दुनिया भर के करोड़ों लोग अपनी मर्जी से अपने घरों और दफ्तरों की लाइटें एक घंटे के लिए बंद कर देते हैं। यह केवल बिजली बचाने का कोई तकनीकी काम नहीं है, बल्कि यह धरती के प्रति हमारी कृतज्ञता और चिंता का एक सामूहिक प्रदर्शन है। 28 मार्च की वह शाम जब घड़ी की सुइयां एक खास वक्त पर आकर ठहरेंगी और शहर की चकाचौंध को एक सुकून भरी खामोशी निगल लेगी, तब वह अंधेरा हमें डराएगा नहीं, बल्कि हमें आईना दिखाएगा। सोचिए, जिस सूरज की रोशनी और जिस हवा के झोंकों ने हमें जीवन दिया, आज वही हवा जहरीली हो रही है और वही मौसम बेईमान हो चुके हैं। हम एक ऐसी सभ्यता बन गए हैं जिसने उजाले की इतनी हसरत पाल ली कि हम सितारों भरी काली...

झुलसती प्रकृति और बेपटरी होता मौसम: क्या हम प्रकृति की कराह सुन पा रहे हैं?

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झुलसती प्रकृति और बेपटरी होता मौसम: क्या हम प्रकृति की कराह सुन पा रहे हैं? 'विश्व मौसम विज्ञान दिवस' विकास की जिस अंधी और चमकदार राह पर हम आज सरपट दौड़ रहे हैं, वह दरअसल कुदरत के साथ किए गए एक बहुत बड़े विश्वासघात की कीमत पर खड़ी है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ सफलता की ऊँचाई को कंक्रीट के मीनारों से नापा जा रहा है, लेकिन उस ऊँचाई के नीचे दबती जा रही मिट्टी और सिसकता वातावरण अब किसी की प्राथमिकता में नहीं है। समस्या केवल तापमान बढ़ने की नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक अनुशासन के पूरी तरह ध्वस्त होने की है, जो सदियों से जीवन का आधार रहा है। आज का मनुष्य अपनी कृत्रिम सुख-सुविधाओं में इतना आत्ममुग्ध है कि उसे ऊपर तने उस 'थके हुए आकाश' की कराह सुनाई नहीं देती, जो अब और बोझ सहने की शक्ति खो चुका है। मौसम का यह बेपटरी होता मिजाज दरअसल हमारे भीतर बढ़ते उस असीमित लालच का प्रतिबिंब है, जिसे हमने 'प्रगति' का नाम दे रखा है। जब चैत्र की शुरुआत में ही सूरज की किरणें झुलसाने लगें, तो इसे महज भौगोलिक परिवर्तन मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। यह प्रकृति का वह मौन लेकिन तीखा विरोध...