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'भागमभाग की ज़िन्दगी में अपनों से दूर होते 'घर के बुजुर्ग'

'भागमभाग की ज़िन्दगी में अपनों से दूर होते 'घर के बुजुर्ग' (1 अक्टूबर अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस)  सुबह-शाम के वक्त किसी भी कॉलोनी के पार्क या मंदिर के चबूतरे या सीढ़ियों पर देखिए। वहाँ आपको बेंच पर अकेले बैठे कुछ बुजुर्ग मिल जाएंगे, जो बिना किसी काम के बस बैठे रहते हैं। वहां से गुजरने वाले हर इंसान को देखते हैं, फिर छोटी-छोटी चीजों पर डिस्कशन भी करते हैं। कभी उनके पास सिर्फ दो मिनट के लिए बैठकर देखिएगा। शुरुआत भले ही मौसम या राजनीति से हो, लेकिन जैसे ही उन्हें लगता है कि सामने वाला वाकई उनकी बात सुन रहा है, उनके भीतर से इंट्रेस्टिंग कहानियां निकलने लगती हैं। वे अपने दौर के ऐसे-ऐसे दिलचस्प किस्से और अपनी जवानी के संघर्ष सुनाने लगते हैं कि आप दंग रह जाएंगे। कई बार तो उनके हास्य का पुट और मजाक करने का अंदाज इतना खूबसूरत होता है कि हमारे आज के चुटकुले उनके सामने फीके लगने लगते हैं। वे बूढ़े बुजुर्ग जीती-जागती किताबें हैं, जिन्हें बस कोई अदब से पलटने वाला चाहिए। यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हमारे ही समाज का सच है। हालिया आंकड़ों की मानें तो देश में साठ साल से ऊपर के बुजुर्गों की स...

संवादों की मोहताज नहीं कला: तकनीकी शोर के बीच मूक सिनेमा का कालजयी दर्शन

संवादों की मोहताज नहीं कला: तकनीकी शोर के बीच मूक सिनेमा का कालजयी दर्शन (29 सितंबर विश्व मूक सिनेमा दिवस) आज का सिनेमा आधुनिक तकनीक, डॉल्बी साउंड और भारी-भरकम विजुअल इफेक्ट्स के शोर से भरा हुआ है। ऐसे दौर में क्या हम उस सिनेमा की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ न संवाद थे, न बैकग्राउंड स्कोर और न ही बोलते चिल्लाते हुए  किरदार?  आज 29 सितंबर को विश्व मूक फिल्म दिवस है। यह दिन सिनेमा के इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि अभिनय की उस शुद्धतम कला को समझने का मौका है, जहाँ संवादों की अभिव्यक्ति के बिना  सिर्फ आंखों और चेहरों से कहानियां पर्दे पर उतरती थीं। सिनेमा का एक बुनियादी सच यह है कि मेथड ऐक्टिंग के लिए आवाज की जरूरत कभी नहीं रही। संवाद केवल कहानी आगे बढ़ाने का जरिया हैं, लेकिन असल अभिनय सीधे दर्शक की आत्मा को छूता है। इसका सबसे बड़ा और कालजयी उदाहरण गुलज़ार की फिल्म 'कोशिश' है। इस फिल्म में संजीव कुमार और जया बच्चन ने एक मूक-बधिर कपल की भूमिका निभाई थी। पूरी फिल्म में दोनों ने अपनी जुबां से एक शब्द भी नहीं बोला, लेकिन अपनी आंखों के ठहराव, हाथों के कोमल इशारों और चेहरे की मर्मस...

बम पिस्तौल से क्रांति नहीं आती : शहीदे आज़म भगत सिंह

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बम पिस्तौल से क्रांति नहीं आती : शहीदे आज़म भगत सिंह भगत सिंह: खुद में संपूर्ण, विचारों में अमर (28 सितंबर शहीद भगत सिंह जयन्ती)  शहीदे आज़म भगत सिंह: वैचारिक क्रांति का वो नाम, जो आज भी हर दिल में धड़कता है जो समाज में बदलाव देखना चाहता है। जब भी हम भगत सिंह के बारे में सोचते हैं, हमारे ज़हन में एक जाबांज़ नौजवान की छवि उभरती है, जिसके हाथ में पिस्तौल है और आंखों में आज़ादी का सपना। लेकिन यह छवि उनके विराट व्यक्तित्व का केवल एक छोटा सा हिस्सा है। भगत सिंह सिर्फ एक जाबांज़ क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे एक गहरे विचारक, दार्शनिक और दूरदर्शी राजनेता थे, जिनका बौद्धिक स्तर अपने समय से बहुत आगे था।  आमतौर पर भगत सिंह को केवल हिंसा और हथियारों से जोड़कर देखा जाता है, जो कि उनके साथ एक बड़ा अन्याय है। वे कभी भी हिंसा के अंध-समर्थक नहीं थे। उन्होंने अदालत में अपने ऐतिहासिक बयान में साफ कहा था, 'क्रांति से हमारा तात्पर्य अंततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसे किसी तरह का ख़तरा न हो।' उनके लिए अहिंसा का मतलब कायरता नहीं था, बल्कि वे मानते थे कि जब शोषक सत्ता बहर...

शिक्षा और समाज सुधार के शिल्पकार: ईश्वरचंद्र विद्यासागर और उनका प्रासंगिक चिंतन

शिक्षा और समाज सुधार के शिल्पकार: ईश्वरचंद्र विद्यासागर और उनका प्रासंगिक चिंतन (26 सितंबर ईश्वर चंद्र विद्यासागर जयंती)    किसी समाज के पढ़े-लिखने का असली पैमाना क्या है? क्या केवल साक्षरता के आंकड़े बढ़ जाना या बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर लेना ही विकास है? आज 26 सितंबर को जब हम ईश्वरचंद्र विद्यासागर को याद कर रहे हैं, तो हमें उनके जीवन के इसी बुनियादी सवाल से शुरुआत करनी होगी।  विद्यासागर के लिए ज्ञान केवल पन्नों पर लिखी बातें या कमरों में बैठकर की जाने वाली चर्चा नहीं था। वे मानते थे कि शिक्षा का असली काम समाज के सबसे कमजोर और आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन को व्यावहारिक रूप से बदलना है। जब तक कोई सीख जमीन पर उतरकर किसी इंसान का जीवन बेहतर नहीं बनाती, तब तक वह केवल बौद्धिक विलासिता है। विद्यासागर के समय का सामाजिक ढांचा बहुत संकीर्ण और जातिगत भेदभाव से भरा हुआ था। पढ़ाई-लिखाई जैसी बुनियादी जरूरत पर कुछ गिने-चुने रसूखदार लोगों का कब्जा था, जिससे समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा तरक्की की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ था। संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में उनके प्रश...

कागज़ी आंकड़ों और राशन की कतार के बीच: कहाँ खड़ा है आख़िरी आदमी?

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कागज़ी आंकड़ों और राशन की कतार के बीच: कहाँ खड़ा है आख़िरी आदमी?  (25 सितम्बर अंत्योदय दिवस, दीनदयाल उपाध्याय की जयंती)  हर साल 25 सितंबर को देश में 'अंत्योदय दिवस' मनाया जाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर शुरू किए गए इस दिवस का एक प्रशासनिक और सामाजिक लक्ष्य समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का आर्थिक और सामाजिक उत्थान करना है।  2014 में जब केंद्र सरकार ने इस दिवस को आधिकारिक रूप से मनाने की घोषणा की थी, तब उद्देश्य यही था कि विकास की नीतियां केवल शहरी और संपन्न वर्ग तक सीमित न रहें, बल्कि देश के सुदूर गांवों और वंचित तबकों तक पहुंचे। लेकिन आज इस व्यवस्थागत सफर के एक दशक से अधिक समय बाद, यह आत्मनिरीक्षण करना जरूरी है कि हमारी योजनाएं ज़मीन पर कितनी प्रभावी साबित हुई हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय दर्शन किसी जटिल आर्थिक सिद्धांत पर आधारित नहीं था, बल्कि वह बेहद व्यावहारिक था। उनका मानना था कि किसी भी कल्याणकारी राज्य की सफलता का पैमाना उसकी सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर या बड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण नहीं हो सकता। विकास का ...

'14 अगस्त: आजादी के जश्न के पीछे छिपा देश के बंटवारे का वो गहरा दर्द'

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'14 अगस्त: आजादी के जश्न के पीछे छिपा देश के बंटवारे का वो गहरा दर्द'  हम हर साल 15 अगस्त को तिरंगा फहराते हैं, राष्ट्रगान गाते हैं और आजादी का राष्ट्रीय पर्व मनाते हैं। बेशक, यह हर हिंदुस्तानी के लिए गर्व का सबसे बड़ा दिन है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस ऐतिहासिक खुशी की बुनियाद किस त्रासदी पर रखी गई थी? 15 अगस्त की उस सुबह से ठीक एक दिन पहले, यानी 14 अगस्त 1947 की रात को देश ने एक ऐसी त्रासदी झेली थी, जिसकी कसक आज भी इतिहास के सीने में दफ्न है। यही वजह है कि अब देश हर साल 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाता है। यह दिन उल्लास से पहले उस गहरे सन्नाटे और चीखों को याद करने का है, जिसने हमारे भूगोल के साथ-साथ करोड़ों दिलों को भी दो हिस्सों में काट दिया था। स्वतंत्रता और विभाजन, दोनों एक साथ आए। यह एक ऐसा अजीब संयोग था जहां एक तरफ बरसों की गुलामी की बेड़ियां टूट रही थीं, तो दूसरी तरफ अपने ही घरों में सदियों से साथ रह रहे लोग अचानक एक-दूसरे के लिए अजनबी बन रहे थे। सरहद पर खींची गई एक मामूली सी लकीर ने रातों-रात ...

आत्मनिर्भर भारत की असली पहचान है हथकरघा'

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'आत्मनिर्भर भारत की असली पहचान है हथकरघा'  आजकल हम जब भी कपड़े खरीदने की सोचते हैं, तो सीधे बड़े-बड़े मॉल या नामी ब्रांड्स के शोरूम की तरफ भागते हैं। लेकिन इस चकाचौंध में हम अपने ही देश के गाँवों में रची उस जादुई कला को भूल जाते हैं, जो सिर्फ हाथों के हुनर से कोरे धागों में जान फूंक देती है। हर साल सात अगस्त को मनाया जाने वाला 'राष्ट्रीय हथकरघा दिवस' कोई सरकारी रस्म नहीं है। यह दिन हमारे देश के उन लाखों बुनकरों के टैलेंट और मेहनत को सलाम करने का मौका है, जो सदियों से भारत को अपनी कला से सजा रहे हैं। इस दिन का हमारी आज़ादी की लड़ाई से बहुत गहरा नाता है। जब अंग्रेजों ने हमारे देश को बांटने की कोशिश की, तो सात अगस्त के दिन ही कोलकाता से 'स्वदेशी आंदोलन' की शुरुआत हुई थी। उस समय विदेशी कपड़ों को जलाकर अपने देश के हाथ से बने कपड़ों को अपनाना अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बना था। इसी ऐतिहासिक दिन को याद रखने के लिए सरकार ने करीब एक दशक पहले इस दिवस को मनाने का फैसला किया। तब से यह दिन सिर्फ इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि अपने गाँव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करन...