संवादों की मोहताज नहीं कला: तकनीकी शोर के बीच मूक सिनेमा का कालजयी दर्शन
संवादों की मोहताज नहीं कला: तकनीकी शोर के बीच मूक सिनेमा का कालजयी दर्शन (29 सितंबर विश्व मूक सिनेमा दिवस) आज का सिनेमा आधुनिक तकनीक, डॉल्बी साउंड और भारी-भरकम विजुअल इफेक्ट्स के शोर से भरा हुआ है। ऐसे दौर में क्या हम उस सिनेमा की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ न संवाद थे, न बैकग्राउंड स्कोर और न ही बोलते चिल्लाते हुए किरदार? आज 29 सितंबर को विश्व मूक फिल्म दिवस है। यह दिन सिनेमा के इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि अभिनय की उस शुद्धतम कला को समझने का मौका है, जहाँ संवादों की अभिव्यक्ति के बिना सिर्फ आंखों और चेहरों से कहानियां पर्दे पर उतरती थीं। सिनेमा का एक बुनियादी सच यह है कि मेथड ऐक्टिंग के लिए आवाज की जरूरत कभी नहीं रही। संवाद केवल कहानी आगे बढ़ाने का जरिया हैं, लेकिन असल अभिनय सीधे दर्शक की आत्मा को छूता है। इसका सबसे बड़ा और कालजयी उदाहरण गुलज़ार की फिल्म 'कोशिश' है। इस फिल्म में संजीव कुमार और जया बच्चन ने एक मूक-बधिर कपल की भूमिका निभाई थी। पूरी फिल्म में दोनों ने अपनी जुबां से एक शब्द भी नहीं बोला, लेकिन अपनी आंखों के ठहराव, हाथों के कोमल इशारों और चेहरे की मर्मस...