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'14 अगस्त: आजादी के जश्न के पीछे छिपा देश के बंटवारे का वो गहरा दर्द'

'14 अगस्त: आजादी के जश्न के पीछे छिपा देश के बंटवारे का वो गहरा दर्द'  हम हर साल 15 अगस्त को तिरंगा फहराते हैं, राष्ट्रगान गाते हैं और आजादी का राष्ट्रीय पर्व मनाते हैं। बेशक, यह हर हिंदुस्तानी के लिए गर्व का सबसे बड़ा दिन है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस ऐतिहासिक खुशी की बुनियाद किस त्रासदी पर रखी गई थी? 15 अगस्त की उस सुबह से ठीक एक दिन पहले, यानी 14 अगस्त 1947 की रात को देश ने एक ऐसी त्रासदी झेली थी, जिसकी कसक आज भी इतिहास के सीने में दफ्न है। यही वजह है कि अब देश हर साल 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाता है। यह दिन उल्लास से पहले उस गहरे सन्नाटे और चीखों को याद करने का है, जिसने हमारे भूगोल के साथ-साथ करोड़ों दिलों को भी दो हिस्सों में काट दिया था। स्वतंत्रता और विभाजन, दोनों एक साथ आए। यह एक ऐसा अजीब संयोग था जहां एक तरफ बरसों की गुलामी की बेड़ियां टूट रही थीं, तो दूसरी तरफ अपने ही घरों में सदियों से साथ रह रहे लोग अचानक एक-दूसरे के लिए अजनबी बन रहे थे। सरहद पर खींची गई एक मामूली सी लकीर ने रातों-रात करोड़ों लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़...

आत्मनिर्भर भारत की असली पहचान है हथकरघा'

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'आत्मनिर्भर भारत की असली पहचान है हथकरघा'  आजकल हम जब भी कपड़े खरीदने की सोचते हैं, तो सीधे बड़े-बड़े मॉल या नामी ब्रांड्स के शोरूम की तरफ भागते हैं। लेकिन इस चकाचौंध में हम अपने ही देश के गाँवों में रची उस जादुई कला को भूल जाते हैं, जो सिर्फ हाथों के हुनर से कोरे धागों में जान फूंक देती है। हर साल सात अगस्त को मनाया जाने वाला 'राष्ट्रीय हथकरघा दिवस' कोई सरकारी रस्म नहीं है। यह दिन हमारे देश के उन लाखों बुनकरों के टैलेंट और मेहनत को सलाम करने का मौका है, जो सदियों से भारत को अपनी कला से सजा रहे हैं। इस दिन का हमारी आज़ादी की लड़ाई से बहुत गहरा नाता है। जब अंग्रेजों ने हमारे देश को बांटने की कोशिश की, तो सात अगस्त के दिन ही कोलकाता से 'स्वदेशी आंदोलन' की शुरुआत हुई थी। उस समय विदेशी कपड़ों को जलाकर अपने देश के हाथ से बने कपड़ों को अपनाना अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बना था। इसी ऐतिहासिक दिन को याद रखने के लिए सरकार ने करीब एक दशक पहले इस दिवस को मनाने का फैसला किया। तब से यह दिन सिर्फ इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि अपने गाँव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करन...

'तीसरे विश्वयुद्ध की आहट और हिरोशिमा का सबक'

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'तीसरे विश्वयुद्ध की आहट और हिरोशिमा का सबक'  (6 अगस्त हिरोशिमा दिवस)  इक्यासी साल पहले छह अगस्त उन्नीस सौ पैंतालीस को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा पर जो परमाणु बम गिराया था, वह सिर्फ एक शहर की तबाही नहीं थी। उसने चंद सेकेंड में लाखों लोगों को मार डाला और जो बचे, वे पीढ़ियों तक घिसट-घिसट कर मरने के लिए मजबूर हो गए। आज भी जब हम उस दिन की कल्पना करते हैं तो सबसे बड़ा डर यह है कि दुनिया फिर से उसी रास्ते पर चल पड़ी है। चारों तरफ बस लड़ाई-झगड़े और तनाव का माहौल है। रूस और यूक्रेन के बीच सालों से चल रही जंग रुकने का नाम नहीं ले रही है। उधर पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल, हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के बीच का झगड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसा लगता है कि दुनिया के बड़े देश किसी भी दिन एक दूसरे पर परमाणु हमला कर देंगे। मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार बहुत पते की बात कही थी कि मैं यह तो नहीं जानता कि तीसरा विश्वयुद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और लाठियों से लड़ा जाएगा। उनका यह कथन आज की कड़वी सच्चाई है। इस पूरी बर्बादी के पीछे साफ तौर पर अम...

बिहार में पीके का 'पॉवर प्ले' हिट, दतिया में बीजेपी पर भारी पड़ी कांग्रेस

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'बिहार में पीके का 'पॉवर प्ले' हिट, दतिया में बीजेपी पर भारी पड़ी कांग्रेस' राजनीति में समय का पहिया कब घूम जाए, कोई नहीं कह सकता। कुछ महीनों पहले ही बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का खाता तक नहीं खुला था। अधिकांश प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी और आलोचकों ने मान लिया था कि पर्दे के पीछे से रणनीति बनाने वाले पीके जमीन पर फेल हो गए हैं। लेकिन बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने एक ही झटके में पूरी कहानी बदल दी। प्रशांत किशोर ने किसी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के बजाय सीधे दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के गढ़ में सेंध लगा दी। बांकीपुर सीट पर पिछले तीन दशकों से भाजपा का एकछत्र राज था, जिसे ढहाकर प्रशांत किशोर ने 19 हजार से ज्यादा वोटों से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इस इकलौती जीत ने बिहार की राजनीति में एक बिल्कुल नया अध्याय शुरू कर दिया है। पीके की इस जीत पर अब पुरानी सियासी कड़वाहट भी पिघलती दिख रही है। राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और बेटी रोहिणी आचार्य ने खुले दि...

'चंदा चोरी पर घिर रही थी भाजपा, विपक्ष ने 'भगवा' लाकर खुद के पैर पर मार ली कुल्हाड़ी'

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'चंदा चोरी पर घिर रही थी भाजपा, विपक्ष ने 'भगवा' लाकर खुद के पैर पर मार ली कुल्हाड़ी'  राजनीति में एक बहुत पुरानी कहावत है कि जब आपका विरोधी खुद गलती कर रहा हो, तो उसके रास्ते में कभी नहीं आना चाहिए। लेकिन विपक्ष के सलाहकारों को शायद यह बुनियादी बात समझ नहीं आती। वे अक्सर विरोधी के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि खुद ही कुल्हाड़ी उठाकर अपने पैर पर मार लेते हैं। शुक्रवार की घटना को ही देख लीजिए। एक तरफ चंदा चोरी के मुद्दे पर सत्ता पक्ष पूरी तरह बैकफुट पर था। जनता के बीच गंभीर सवाल तैर रहे थे और सरकार के पास कोई साफ जवाब नहीं था। यह एक ऐसा बना-बनाया मुद्दा था, जिसे विपक्ष आसानी से अपने पक्ष में भुना सकता था। लेकिन ठीक इसी मोड़ पर विपक्ष के किसी परम ज्ञानी रणनीतिकार ने अपना दिमाग चलाया। उन्होंने चंदा चोरी के एक ड्रामे में भगवा कपड़े पहने एक संत को चोर के रूप में पेश कर दिया। नतीजा क्या हुआ? जो मुद्दा भ्रष्टाचार, पारदर्शिता और जनता की गाढ़ी कमाई की लूट का था, वह पलक झपकते ही बदल गया। अब वह 'सनातन के अपमान' का नैरेटिव बन गया । अब उल्टा विपक्ष हाथ ज...

'तीन तलाक कानून: आधी आबादी को डर से आज़ादी मिलने के निहितार्थ'

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'तीन तलाक कानून: आधी आबादी को डर से आज़ादी मिलने के निहितार्थ'  (1 अगस्त मुस्लिम महिला अधिकार दिवस)  देश की संसद ने जब एक झटके में तीन तलाक कहने की सदियों पुरानी प्रथा पर कानूनन रोक लगाई, तो उसे महज़ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं माना गया। वह देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के लिए एक नए सवेरे जैसी उम्मीद थी। हालांकि यह सोचना ज़रूरी हो जाता है कि ज़मीन पर इस कानून से कितना बड़ा बदलाव आया है और समाज में इसे लेकर पहले और अब की स्थिति में क्या अंतर आया है। यह बदलाव सिर्फ कानूनी पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारे सामाजिक ताने-बाने और महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों पर पड़ा है।  कानून बनने से पहले की हकीकत बेहद डरावनी थी। मुस्लिम महिलाओं के सिर पर हमेशा एक अदृश्य तलवार लटकी रहती थी। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक पुराने सर्वे के मुताबिक, करीब बाइस प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं को यह भी पता नहीं होता था कि उनके शौहर ने उन्हें कब तलाक दे दिया। कोई फोन पर, कोई व्हाट्सएप मैसेज पर, तो कोई मामूली गुस्से में आकर तीन बार 'तलाक' बोलकर सालों पुराना रिश्त...

साहित्य के अमर शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद और उनकी कालजयी विरासत

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'साहित्य के अमर शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद और उनकी कालजयी विरासत'  31  जुलाई मुंशी प्रेमचंद जयंती (राष्ट्रीय लेखक दिवस) आज इकतीस जुलाई को हिंदी और उर्दू साहित्य के सबसे बड़े लेखक मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। जब हम प्रेमचंद का नाम सुनते हैं तो हमारे दिमाग में एक ऐसे सीधे-साधे इंसान की तस्वीर उभरती है जिसने हमेशा आम जनता की बात की। उन्होंने राजा-रानियों और परियों की काल्पनिक कहानियों को छोड़कर समाज के सबसे गरीब और बेबस लोगों को अपनी लेखनी का हीरो बनाया। प्रेमचंद केवल कहानियां लिखने वाले लेखक नहीं थे बल्कि वे अपने समय से बहुत आगे की सोचने वाले एक सच्चे युग दृष्टा थे। उन्होंने समाज को देखने और समझने का एक नया नजरिया दिया। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने करीब सौ साल पहले जिन सामाजिक बुराइयों और इंसानी स्वभाव को पहचाना था वे सारी बातें आज भी हमारे समाज में सच साबित हो रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए एक ऐसी साहित्यिक विरासत हमारे बीच छोड़ी है जो हमेशा हमारा रास्ता रोशन करती रहेगी। प्रेमचंद के पूरे साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी और जमीन से जुड़ी स...