'दलबदल की राजनीति : विचारधारा पर भारी सत्ता की भूख'
'दलबदल की राजनीति : विचारधारा पर भारी सत्ता की भूख' भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का बिखरना और उनके नेताओं का पाला बदलना आज एक ऐसा कड़वा सच बन चुका है, जिसने लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को हिलाकर रख दिया है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी की टूट के बाद अब पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर मची रार ने देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हाल ही में टीएमसी के करीब 20 बागी सांसदों का दिल्ली में भाजपा के मंत्रियों से मिलना और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के पास जाना यह साफ दिखाता है कि परदे के पीछे की सियासी खिचड़ी पूरी तरह पक चुकी है। सवाल केवल टीएमसी का नहीं है, बल्कि यह समझने का है कि आखिर चुनाव बीतते ही क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं की अंतरात्मा अचानक कैसे जाग जाती है? जब तक पार्टी सत्ता में रहती है या उसकी ताकत बनी रहती है, तब तक नेतृत्व की सारी कमियां और तानाशाही इन नेताओं को क्यों नहीं दिखतीं? अगर हम इस पूरे प्रकरण का कानूनी सच देखें, तो संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी सांसद की सदस्यता सीधे तौर पर रद्द हो सकती है। लेकिन इस कानून में एक बहुत बड़ा ...