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डिजिटल आक्रामकता के जाल में फंसा बचपन'

'डिजिटल आक्रामकता के जाल में फंसा बचपन'  (4 जून आक्रामकता के शिकार मासूम बच्चों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस)  आजकल घरों में शाम के वक्त एक खामोश नजारा दिखाई देता है। पूरा परिवार एक ही कमरे में, एक ही सोफे पर साथ बैठा होता है, लेकिन आपस में कोई बातचीत नहीं होती। सब के सब चुपचाप अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में खोए रहते हैं। माता-पिता भी इस बात से बड़े खुश और बेफिक्र रहते हैं कि उनका बच्चा बाहर धूप या धूल-मिट्टी में नहीं घूम रहा है, बल्कि घर के अंदर आराम से सुरक्षित बैठा है। लेकिन क्या कभी हमने ठंडे दिमाग से बैठकर यह सोचने की कोशिश की है कि स्क्रीन में अपनी आंखें गड़ाए बैठा हमारा यह मासूम बच्चा अंदर ही अंदर किस मानसिक दौर से गुजर रहा है? कहीं उसके नन्हें दिमाग पर नकारात्मक असर तो नहीं हो रहा?  हर साल 4 जून को पूरी दुनिया में 'आक्रामकता के शिकार मासूम बच्चों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस' मनाया जाता है। पुराने जमाने में जब इस दिन की चर्चा होती थी, तो बच्चों पर अत्याचार का सीधा सा मतलब लड़ाई-झगड़े, युद्ध, दंगे या फिर फैक्ट्रियों में होने वाली बाल-मजूदरी से लगाया जाता था। लेकिन आज के इस ...

'कांग्रेस पार्टी में कुर्सी की जिद, बगावती बुढ़ापा और बिखरी साख'

'कांग्रेस पार्टी में कुर्सी की जिद, बगावती बुढ़ापा और बिखरी साख' भारतीय राजनीति का एक सीधा सा नियम है। एक समझदार नेता वह नहीं है जिसे सिर्फ आगे बढ़ना आता हो, बल्कि वह है जिसे यह पता हो कि कब और कितनी इज्जत के साथ दो कदम पीछे हट जाना है। आज की आपाधापी और कुर्सी से चिपके रहने की राजनीति के बीच, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने जो समझदारी दिखाई है, वह काबिले तारीफ है। उन्होंने देश के बाकी बुजुर्ग नेताओं को एक ऐसा सधा हुआ संदेश दिया है, जो न सिर्फ उनकी इज्जत को बढ़ाता है बल्कि दूसरों के लिए एक सबक भी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि पार्टी अब शायद दिग्विजय सिंह को दोबारा राज्यसभा नहीं भेजेगी। अमूमन ऐसे मोड़ पर बड़े-बड़े नेता या तो बगावत पर उतर आते हैं या फिर कोने में बैठकर नाराजगी जताने लगते हैं। लेकिन दिग्गी राजा ने जिस अक्लमंदी से अपनी साख और सम्मान को बनाए रखा है, वह उनकी राजनीतिक परिपक्वता को दिखाता है। लोकतंत्र में कोई उनकी विचारधारा से अलग सोच रख सकता है, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ और सही टाइमिंग के मामले में वे आज भी बेजोड़ हैं। वे जानते हैं कि जब हव...

समंदर रो रहा है और हम सो रहे हैं

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'समंदर रो रहा है और हम सो रहे हैं' (08 जून विश्व महासागर दिवस)  शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसे समंदर किनारे बैठना अच्छा न लगता हो। पानी की उठती-गिरती लहरें, ठंडी हवा और दूर तक फैला नीला पानी हर किसी का मन मोह लेता है। लेकिन क्या कभी हम यह सोचते हैं कि जिस समंदर को हम सिर्फ घूमने-फिरने की जगह समझते हैं, वो असल में हमारी हर सांस से जुड़ा हुआ है? आज 8 जून को पूरी दुनिया विश्व महासागर दिवस मना रही है। यह दिन सिर्फ अख़बारों में बधाई देने या भाषण झाड़ने का दिन नहीं है। यह दिन एक चेतावनी है उस समंदर की तरफ से, जो इंसानों की गलतियों की वजह से अब धीरे-धीरे बीमार पड़ रहा है।  संयुक्त राष्ट्र ने इस बार रीइमेजिन यानी फिर से सोचने की बात कही है, जो हमें याद दिलाती है कि अगर समंदर नहीं बचा, तो हमारा वजूद भी नहीं बचेगा। किताबों में तो लिख दिया जाता है कि धरती पर सत्तर प्रतिशत पानी है। लेकिन आसान भाषा में समझें तो यह समंदर हमारे ग्रह के फेफड़े हैं। हम जो सांस लेते हैं, उसकी आधी से ज़्यादा ऑक्सीजन समंदर के छोटे-छोटे पौधों से आती है, न कि सिर्फ जंगलों से। दुनिया का मौसम बदलना, टाइम...

'प्रदूषण पर भाषण बहुत हुए, अब घर के कोने से साइकिल निकालिए'

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'प्रदूषण पर भाषण बहुत हुए, अब घर के कोने से साइकिल निकालिए'  (03 जून विश्व साइकिल दिवस)  आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब हर व्यक्ति समय की कमी और तनाव की शिकायत करता है, तब एक बेहद साधारण और किफायती समाधान हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है। वह समाधान है - साइकिल। आज 3 जून को पूरी दुनिया 'विश्व साइकिल दिवस' मना रही है। यह दिन किसी आधुनिक आविष्कार का जश्न नहीं, बल्कि उस सादगी और उपयोगिता को याद करने का अवसर है, जिसे हमने विकास की अंधी दौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया है। जब पूरी दुनिया महंगे ईंधन, ट्रैफिक जाम और जहरीले धुएं से हांफ रही है, तब साइकिल एक सुगम साधन की तरह नजर आती है। यह कोई साधारण सवारी नहीं, बल्कि बिना धुएं वाली वह मूक क्रांति है जो व्यक्ति की सेहत, जेब और धरती तीनों को एक साथ संवार सकती है।  आजकल की जीवनशैली को देखें तो हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आती हैं। घर से महज दो कदम दूर सब्जी की दुकान या दूध की डेयरी तक जाने के लिए भी लोग तुरंत मोटरसाइकिल या कार की चाबी उठा लेते हैं। नतीजा यह हुआ है कि शहरों की हवा भारी हो चुकी है, सड़कों पर पैदल चलने की जगह...

क्या गुंडागर्दी ही अब नई राजनीति है?

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क्या गुंडागर्दी ही अब नई राजनीति है? पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला बेहद परेशान करने वाला है। लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं हो सकती, फिर चाहे वह किसी भी नेता या दल के खिलाफ क्यों न हो। मतभेद अपनी जगह हैं, राजनीति अपनी जगह है, लेकिन जब बात मारपीट, कपड़े फाड़ने और जानलेवा हमलों तक पहुंच जाए, तो समझ लेना चाहिए कि हमारा समाज और हमारी राजनीति बहुत गलत दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।  किसी भी सभ्य समाज में ऐसी हरकतों को सही नहीं ठहराया जा सकता। बंगाल को हमेशा से एक बेहद खास राज्य माना गया है। यह रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की धरती है। इस मिट्टी से हमेशा ज्ञान, कला, संस्कृति और बड़े-बड़े विचारों की खुशबू आती रही है। बंगाल के लोग अपनी तेज बुद्धि और वैचारिक बहस के लिए जाने जाते हैं। लेकिन आज उसी बंगाल से जब रोज-रोज राजनीतिक हिंसा, मारपीट और बमबाजी की खबरें आती हैं, तो दिल दहल जाता है। ऐसा लगता है कि जैसे पुरानी पहचान कहीं खो गई है और उसकी जगह सिर्फ सत्ता की भूख ने ले ली है। आखिर ऐसा कैसे हो गया कि जिस धरती को देश का मार्गदर...

'सवालों से बचती सत्ता और घुटनों पर बैठा मीडिया'

'सवालों से बचती सत्ता और घुटनों पर बैठा मीडिया'  (30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस)  30 मई को भारत में हर साल हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमारे देश में हिंदी भाषा में पहला अखबार शुरू होने की याद में मनाया जाता है। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने साल 1826 में इसे कोलकाता से शुरू किया था। उस दौर में पत्रकारिता का एक ही मकसद था, देश को आजाद कराना और समाज को जगाना। लेकिन आज जब हम इस दिन को मनाते हैं, तो खुशी से ज्यादा हमारे मन में एक चिंता होती है। आज की पत्रकारिता उस ऊंचे रास्ते से बहुत दूर आ चुकी है। आज हमारा मीडिया और पत्रकारिता का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। पत्रकारिता को कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, जिसका काम जनता की आवाज को सरकार तक पहुंचाना और सरकार की कमियों को सामने लाना था। लेकिन आज ऐसा लगता है कि यह स्तंभ कमजोर हो चुका है। अखबारों और टीवी चैनलों पर अब जनता के असली मुद्दे, जैसे गरीबी, बेरोजगारी, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य गायब हो चुके हैं। इसकी जगह दिन-रात धर्म के नाम पर विवाद, राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई और गैर-जरूरी सनसनीखेज खबरें दिखाई जाती हैं। ...

'अब नाम नहीं, काम चलेगा: कर्नाटक से कांग्रेस का सशक्त संदेश'

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'अब नाम नहीं, काम चलेगा: कर्नाटक से कांग्रेस का सशक्त संदेश' कांग्रेस पार्टी आजकल जिस तरह धड़ाधड़ और कड़े फैसले ले रही है, उसकी जरूरत उसे बहुत पहले से थी। राजनीति का एक सीधा नियम है - जो नेता वक्त की चाल को नहीं समझ पाता, वो धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है। हाल के दिनों में कांग्रेस आलाकमान ने जो फैसले लिए हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि अब पार्टी में कोई भी नेता संगठन से बड़ा नहीं है। यह बदलाव कांग्रेस के उन आम कार्यकर्ताओं के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है, जो जमीन पर रहकर दिन-रात मेहनत करते हैं। एक पुराना दौर था जब कांग्रेस में फैसले लेने में बहुत देर लगाई जाती थी। बड़े नेताओं की जिद के आगे आलाकमान को झुकना पड़ता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। राजस्थान का उदाहरण सबके सामने है, पार्टी कभी अशोक गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसा सबसे बड़ा और सम्मानजनक पद देना चाहती थी। लेकिन उस समय उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का मन नहीं था। उन्होंने वक्त की मांग को नहीं समझा। नतीजा यह हुआ कि समय बदला और आज उन्हें संगठन में एक महासचिव बनने के लिए भी कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। राजनीति का यही दस्तूर है -...