फ़ारस: राख से उठता इंकलाब
'ईरान' जिसे हम अक्सर टीवी की चीखती खबरों और हेडलाइन्स के चश्मे से देखते हैं. पर सच ये है कि ईरान सिर्फ एक मुल्क का नक्शा नहीं है, ये तो एक हज़ारों साल पुरानी एक सभ्यता है, इस्फहान की वो नीली टाइलें हों या हाफ़िज़ की पुरानी नज़्में.. इस मिट्टी ने दुनिया को खूबसूरती का असली सलीका सिखाया है. पर आज का ईरान एक अजीब सी कशमकश में है, एक तरफ वो बेटियाँ हैं जिनकी हँसी पर पहरे लगा दिए गए, और दूसरी तरफ वो देश की संप्रभुता को बचाने की एक बेमिसाल ज़िद भी है. ये कोई धर्म की जंग नहीं है, ये तो बस 'रसूख' और ताकत का एक अंधा खेल है, जहाँ ताकतवर हुक्मरान लोगों को शतरंज की बिसात पर प्यादों की तरह बिछा देते हैं. मैं आज उस ईरान के साथ खड़ा हूँ जो अपना सुकून, अपनी खुशियाँ, अपनी आने वाली नस्लें... सब कुछ हार रहा है. पर एक चीज़ है जो उसने अब भी अपनी मुट्ठी में दबाकर रखी है जो है उसका 'स्वाभिमान.... फ़ारस: राख से उठता इंकलाब गूंजती है आज भी तख्त-ए-जमशेद के खंडहरों में वो एक पुरानी आहट जो याद दिलाती है कि तख्त बनते और उजड़ते रहते हैं पर मिट्टी की अना कभी नहीं मरती इस्फ...