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"नवाचार की शक्ति: रमन के 'सवाल' से विज्ञान के 'संकल्प' तक"

"नवाचार की शक्ति: रमन के 'सवाल' से विज्ञान के 'संकल्प' तक"  आज 28 फरवरी का दिन पूरे भारत के लिए गौरव और आत्मसम्मान का प्रतीक है, क्योंकि आज हम राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मना रहे हैं। यह दिन महान भारतीय भौतिक विज्ञानी सर सी.वी. रमन की उस अद्भुत खोज 'रमन प्रभाव' को समर्पित है, जिसने पूरी दुनिया की वैज्ञानिक समझ को एक नई दिशा दी और भारत को भौतिकी के क्षेत्र में पहला नोबेल पुरस्कार दिलाया। अक्सर हम विज्ञान को केवल बंद कमरों की प्रयोगशालाओं और जटिल सूत्रों का समूह मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में विज्ञान हमारी जिज्ञासा और सत्य की खोज का दूसरा नाम है। सर रमन का सफर हमें सिखाता है कि बड़े आविष्कारों के लिए केवल महंगे उपकरणों की नहीं, बल्कि एक पैनी नजर और कुछ नया सोचने के जुनून की जरूरत होती है। समुद्र के पानी का रंग नीला क्यों होता है, इस एक साधारण से सवाल ने उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी खोजों में से एक तक पहुँचा दिया। यह जानना दिलचस्प है कि जिस उपकरण से उन्होंने इतनी बड़ी खोज की, उसकी कुल लागत उस समय मात्र 200 रुपये के आसपास थी, जो आज के युग के लिए एक बड़ी प्रेरणा है क...

एआई से परहेज करेंगे तो पिछड़ेंगे, उपयोग सीखेंगे तो जीतेंगे

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एआई से परहेज करेंगे तो पिछड़ेंगे, उपयोग सीखेंगे तो जीतेंगे आज के दौर में 'एआई' (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) एक ऐसा शब्द बन गया है जो चर्चा में तो बहुत है, लेकिन इसे लेकर आम आदमी के मन में डर और उत्साह दोनों हैं। सरल भाषा में कहें तो एआई एक ऐसी 'दिमागी मशीन' है जिसे इंसान ने बनाया है ताकि वह मशीनों को इंसान की तरह सोचने, समझने और काम करने की ताकत दे सके। जैसे सदियों पहले पहिए ने इंसान की गति बदली और फिर ट्रैक्टर ने खेतों में बैलों की जगह ली, वैसे ही एआई अब हमारे सोचने और काम करने के ढंग को पूरी तरह बदल रहा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह जादुई मशीन हमारे लिए वरदान साबित होगी, या यह एक ऐसा अभिशाप है जो हमें पीछे धकेल देगा? अगर हम फायदे की बात करें, तो एआई एक बहुत बड़ा वरदान बनकर उभरा है। एक आम मजदूर, कारीगर या किसान के लिए यह किसी सच्चे और जानकार साथी जैसा है। मान लीजिए, कोई किसान अपनी फसल की फोटो मोबाइल से खींचता है, तो एआई तकनीक उसे तुरंत बता सकती है कि फसल में कौन सी बीमारी लगी है और कौन सी दवा छिड़कनी चाहिए। जो भाई-बहन पढ़-लिख नहीं सकते, वे अब मोबाइल से अपनी...

"सत्ता के शिखर पर सड़ती नैतिकता: एपस्टीन फाइल्स और सफ़ेदपोश दरिंदगी"

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"सत्ता के शिखर पर सड़ती नैतिकता: एपस्टीन फाइल्स और सफ़ेदपोश दरिंदगी" आज जब हम सभ्यता के शिखर पर होने का दंभ भरते हैं, तब 'जेफरी एपस्टीन' जैसी फाइलें हमारे सामूहिक विवेक पर एक गहरा घाव दे जाती हैं। एपस्टीन फाइल्स केवल कुछ नामों की सूची नहीं है, बल्कि यह उस सड़ी-गली मानसिकता का कच्चा चिट्ठा है, जो सत्ता, पैसे और रसूख के नशे में अंधे होकर मानवता को शर्मसार करती रही है। यह मामला दिखाता है कि कैसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोग—चाहे वे राजनीतिज्ञ हों, व्यवसायी हों या वैज्ञानिक—एक ऐसे घृणित चक्र का हिस्सा थे, जहाँ मासूमियत का व्यापार होता था। वैश्विक परिदृश्य में देखें तो एपस्टीन का द्वीप 'लिटिल सेंट जेम्स' आधुनिक युग के नरक जैसा था। अमेरिका से लेकर यूरोप तक के बड़े-बड़े नाम इस दलदल में फँसे नजर आते हैं। अमेरिकी अदालती दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों के अनुसार, पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू, डोनाल्ड ट्रम्प, वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग और अरबपति बिल गेट्स जैसे रसूखदार व्यक्तियों के नाम इस प्रकरण से जुड़ने से पूरी दुनिया सन्न रह गई। यह कड़व...

"भारत की खुशहाली और आर्थिक मजबूती का आधार: केंद्रीय उत्पाद शुल्क"

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"भारत की खुशहाली और आर्थिक मजबूती का आधार: केंद्रीय उत्पाद शुल्क"  भारत की आर्थिक प्रगति के पीछे उन हजारों हाथों का योगदान है, जो देश के राजस्व को मजबूत करने के लिए दिन-रात काम करते हैं। इन्हीं प्रयासों को सम्मान देने और आम जनता को कर व्यवस्था के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल 24 फरवरी को देश में एक विशेष अवसर के रूप में इस दिन को मनाया जाता है। यह समय हमारे देश की वित्तीय व्यवस्था के लिए एक मील का पत्थर है, क्योंकि इसी दिन साल 1944 में केंद्रीय उत्पाद शुल्क और नमक कानून बनाया गया था। भले ही आज के दौर में टैक्स की प्रणालियां बदल गई हों और जीएसटी ने एक बड़ा स्थान ले लिया हो, लेकिन देश की तरक्की में उत्पाद शुल्क का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। एक आम नागरिक के मन में अक्सर यह सवाल आता है कि आखिर टैक्स चुकाने से उसे क्या मिलता है। इसका जवाब बहुत ही सरल और सुंदर है। जब देश की फैक्ट्रियों में सामान बनता है और उस पर सरकार को शुल्क मिलता है, तो वही पैसा घूमकर समाज के कल्याण के लिए वापस आता है। हमारे गाँव और शहरों को जोड़ने वाली पक्की सड़कें, अंधेरे को दूर करती बिजली की रोशनी, सरकारी अस्...

"डिजिटल दौर में शब्द-साधना: किताबों की ओर लौटता युवा मन"

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 "डिजिटल दौर में शब्द-साधना: किताबों की ओर लौटता युवा मन" दिल्ली की ठिठुरती हुई जनवरी की सुबह और भारत मण्डपम की भव्यता के बीच एक अलग ही संसार बसा हुआ है। यहाँ की फिजाओं में केवल कागज और ताजी स्याही की खुशबू नहीं है, बल्कि यह उन उम्मीदों की महक है जो बताती हैं कि तकनीक के शोर के बीच भी इंसान का अपनी जड़ों से जुड़ाव बना हुआ है। विश्व पुस्तक मेला 2026 केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक महाकुंभ बन गया है। सबसे सुखद दृश्य यह है कि इस मेले की असली रौनक आज का युवा और छोटे बच्चे हैं। अक्सर यह चिंता जताई जाती है कि 'रील' और 'शॉर्ट वीडियो' के इस दौर में एकाग्रता खत्म हो रही है, लेकिन यहाँ उमड़ी यह भीड़ गवाही दे रही है कि दुनिया अभी बची रहेगी, क्योंकि यहाँ का युवा पन्नों के सन्नाटे को मोबाइल के शोर पर तरजीह दे रहा है। यह देखना दिल को सुकून देता है कि आज की पीढ़ी केवल समकालीन लेखकों तक सीमित नहीं है। स्टालों पर घूमते हुए जब आप देखते हैं कि युवा मुंशी प्रेमचंद के 'गोदान' के पात्रों की बात कर रहे हैं या हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' के दर्शन...

वेदांत से युवा शक्ति का अभ्युदय और स्वामी विवेकानंद का कालजयी दर्शन

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वेदांत से युवा शक्ति का अभ्युदय और स्वामी विवेकानंद का कालजयी दर्शन (12 जनवरी राष्ट्रीय युवा दिवस व स्वामी विवेकानंद जयंती पर विशेष लेख)  भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को वैश्विक पटल पर गौरवान्वित करने वाले युगपुरुष स्वामी विवेकानंद की जयंती, 12 जनवरी, देश के इतिहास में केवल एक तिथि नहीं बल्कि एक ऊर्जावान उत्सव है। जिसे हम राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं, वह वास्तव में उस महामानव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है जिसने सोए हुए भारत को उसकी अंतर्निहित शक्तियों से परिचित कराया। विवेकानंद ने जिस वेदांत दर्शन की व्याख्या की, वह हिमालय की गुफाओं तक सीमित रहने वाला शुष्क ज्ञान नहीं था, बल्कि वह एक 'व्यावहारिक वेदांत' था जो खेत-खलिहानों, कारखानों और युवाओं के अंतर्मन में क्रांति लाने का सामर्थ्य रखता था। उन्होंने शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में जब 'मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों' कहकर संबोधन शुरू किया, तो वह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि अद्वैत वेदांत की वह अनुभूति थी जो पूरी सृष्टि को एक परिवार मानती है। उनके दर्शन का मूल आधार यह था कि प्रत्येक आत्मा दिव्य ह...

मोस्ट लविंग पर्सन इन दी यूनिवर्स"

"मोस्ट लविंग पर्सन इन दी यूनिवर्स"  किसी भी फिल्म एवं अभिनेता के सफल होने के लिए अच्छी कहानी, उम्दा संगीत एवं निर्देशक की दूरदर्शी सोच का होना जरूरी होता है. अपने शुरुआती दौर से ही शाहरुख कहानियों का चयन बहुत सोच-समझकर करते थे. शाहरुख फ़िल्म की कहानी समझते, देखते थे, इस फिल्म की कहानी से दर्शक जुड़ पाएंगे क्या? डीडीएलजे, वीर - जारा दोनों फ़िल्मों का चयन शाहरुख की सिनेमाई समझ को दर्शाता है. इसमे शाहरुख ऐक्टिंग को यथार्थवाद से जोड़ने में सफल दिखते हैं. डीडीएलजे, वीर - जारा की कहानी एक उदेश्य के तहत लिखी गईं.  डीडीएलजे का राज लंदन में पला-बढ़ा जो बहुत आधुनिक था. अपनी प्रेमिका के कहने पर भी सिमरन को भगाने के लिए तैयार नहीं था. वह उसके पिता की आज्ञा चाहता है. लंदन में पला बढ़ा राज भारतीय संस्कृति को बचाने की बात कर रहा था, हालांकि उससे हो नहीं पा रहा था, फिर भी वो गिरते - पड़ते सभी का दिल जीत गया.. यही कारण रहा शाहरुख खान को सिने प्रेमियों ने पलकों पर बिठा लिया था. लोग जानना चाहते हैं कि डीडीएलजेे की आपार सफ़लता का राज क्या है, आम तौर पर फ़िल्मों में हीरो मार - धाड़ करके नायिका क...