'कब थमेगी नन्हे हाथों से मजदूरी?'
'कब थमेगी नन्हे हाथों से मजदूरी?' (12 जून बाल श्रम निषेध दिवस) यह हमारे समाज का एक ऐसा कड़वा सच है जिसे हम रोज देखते हैं और देखकर भी आगे बढ़ जाते हैं. एक तरफ वे बच्चे हैं जो सुबह-सुबह अच्छे कपड़े पहनकर, भारी-भारी बैग टांगे स्कूल जाते दिखते हैं. उनकी आंखों में ढेर सारे सपने होते हैं. वहीं दूसरी तरफ, ठीक उसी सड़क के पार किसी दुकान या ढाबे पर कोई छोटा सा बच्चा जूठे बर्तन साफ कर रहा होता है. उसके हाथ काम करते-करते थक चुके होते हैं और उसके चेहरे पर सिर्फ एक ही डर होता है कि कहीं मालिक डांट न दे. यह कहानी किसी एक शहर की नहीं है, हमारे आस-पास हर जगह यही हाल है. हर साल 12 जून को हम 'बाल श्रम निषेध दिवस' मनाकर सोच लेते हैं कि हमने अपना फर्ज पूरा कर दिया, लेकिन सच तो यह है कि एक दिन तय कर देने से इन बच्चों की जिंदगी नहीं बदलती. बचपन का मतलब क्या होता है? बचपन यानी बिना किसी टेंशन के जीना, दोस्तों के साथ खेलना, मिट्टी में खेलना और बस मजे करना. लेकिन जब इन्हीं नन्हे हाथों में खिलौनों या किताबों की जगह भारी ईंटें, चाय के कप या साफ-सफाई का झाड़ू थमा दिया जाता है, तो सिर्फ एक बच्चा...