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दुनिया दीवानी फुटबॉल की, अब हमारी बारी!

दुनिया दीवानी फुटबॉल की, अब हमारी बारी! (25 मई विश्व फुटबॉल दिवस)  फुटबॉल दुनिया का ऐसा खेल है, जिसे समझने के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं है, फ़ुटबाल किसी भी भाषा में आए समझ आता है। मैदान पर पैर की एक जादुई ड्रिबल, एक सटीक पास और नेट से टकराती गेंद - यह वह रोमांच है जो दुनिया के हर कोने को एक धागे में पिरो देता है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र ने 25 मई को आधिकारिक तौर पर 'विश्व फुटबॉल दिवस' घोषित किया है। यह फैसला सिर्फ इस खेल की लोकप्रियता का जश्न नहीं है, बल्कि इस बात का सम्मान है कि फुटबॉल दुनिया में शांति, एकजुटता और युवाओं को जोड़ने का सबसे खूबसूरत जरिया है। जब पूरी दुनिया इस खेल के रंग में रंगी है, तब भारत के लिए यह दिन एक नई ऊर्जा और बड़े सपनों के साथ आगे बढ़ने का अवसर है। अक्सर कहा जाता है कि भारत सिर्फ क्रिकेट का दीवाना है, लेकिन सच यह है कि हमारे देश में फुटबॉल को लेकर एक खामोश क्रांति आकार ले रही है। कोलकाता के मैदानों का पारंपरिक जोश हो, केरल की गलियों की दीवानगी हो या पूर्वोत्तर के पहाड़ों से निकलती नई प्रतिभाएं - फुटबॉल का जज्बा हमारी रगों में तेजी से दौड़ रहा...

मायावती की निष्क्रियता : क्या खत्म हो जाएगी बसपा?

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मायावती की निष्क्रियता : क्या खत्म हो जाएगी बसपा? उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक समय ऐसा था जब मायावती का नाम सुनते ही विरोधी दल अपनी रणनीति बदलने लगते थे। लेकिन आज जमीनी हकीकत पूरी तरह बदल चुकी है। देश की सियासत में यह चर्चा बहुत तेज है कि मायावती की जमीनी स्तर पर बढ़ती निष्क्रियता और पार्टी का लगातार गिरता वोट बैंक बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा को खत्म होने की कगार पर ले आया है। नौबत यहां तक आ गई है कि बसपा से उसका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी कभी भी छिन सकता है। अगर हम आंकड़ों को देखें, तो बसपा की हालत इस समय सबसे खराब दौर में है। देश और उत्तर प्रदेश के चारो सदनों को मिलाकर देखें तो पार्टी के पास अब नाममात्र के नेता बचे हैं। लोकसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ने वाली बसपा का खाता तक नहीं खुला और देश के सबसे बड़े सदन में उसकी सीटें आज शून्य हैं। देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा में बसपा का सिर्फ एक सांसद बचा है, जिनका कार्यकाल नवंबर 2026 में खत्म हो जाएगा। इसके बाद बसपा का कोई नया सांसद राज्यसभा नहीं जा पाएगा क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास विधायक ही न...

पूर्व पीएम राजीव गांधी की शहादत का वह सबक हमें कितना याद है?

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पूर्व पीएम राजीव गांधी की शहादत का वह सबक हमें कितना याद है? (21 मई राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस)  हर साल 21 मई को पूरा देश राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस मनाता है। अखबारों की रस्मी खबरों और सरकारी बयानों के बीच क्या हम कभी सोचते हैं कि इस दिन की असली जरूरत क्या है? 21 मई हमारे इतिहास का वह काला दिन है जिसने देश की सुरक्षा और राजनीति को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। इसी दिन तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी रैली के दौरान लिट्टे की आत्मघाती हमलावर ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी थी। वह धमाका सिर्फ एक नेता की मौत नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला था, जिसने देश को हिलाकर रख दिया। इस दर्दनाक हादसे के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया। राजीव गांधी के बलिदान को याद रखने और देश को इस खतरे के खिलाफ एकजुट करने के लिए हर साल 21 मई को आधिकारिक तौर पर यह दिवस मनाने की शुरुआत हुई। इस दिवस की स्थापना के पीछे का रणनीतिक संदेश बिल्कुल साफ था - देश को सचेत करना कि नफरत और कट्टरता की राजनीति राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने को कितना गहर...

केरल से कांग्रेस आलाकमान का संदेश: जमीनी नेताओं को मिलेगी कमान'

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'केरल से कांग्रेस आलाकमान का संदेश: जमीनी नेताओं को मिलेगी कमान'  केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की बंपर जीत के बाद कांग्रेस आलाकमान ने एक बहुत बड़ा और सकारात्मक राजनीतिक फैसला लिया है।  दिल्ली दरबार ने किसी भी गुटबाजी के आगे न झुकते हुए केरल के लोकप्रिय नेता वी. डी. सतीशन को नया मुख्यमंत्री चुनकर देश भर के कार्यकर्ताओं को एक ठोस संदेश दिया है। यह संदेश जनता की तरफ से नहीं, बल्कि खुद कांग्रेस नेतृत्व की ओर से आया है, जिसने यह जता दिया है कि अब पार्टी पुराने ढर्रे और गलतियों से सबक सीख चुकी है। आलाकमान का यह कदम साफ इशारा करता है कि संगठन को मजबूत करने के लिए अब केवल जमीन पर पसीना बहाने वाले चेहरों को ही तवज्जो दी जाएगी।कांग्रेस के इतिहास में लंबे समय से एक बड़ी कमजोरी रही है, जहां जमीन पर रात-दिन काम करने वाले जनप्रिय नेताओं की जगह दिल्ली में लॉबिंग करने वाले नेताओं को कमान सौंप दी जाती थी। मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावों में जनता और कार्यकर्ता दिल से चाहते थे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे ऊर्जावान युवाओ...

भगत सिंह के 'मस्तिष्क' शहीद सुखदेव को हमने कितना याद रखा?

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भगत सिंह के 'मस्तिष्क' शहीद सुखदेव को हमने कितना याद रखा?  इतिहास की एक अजीब फितरत होती है। वह कभी-कभी किसी महानायक के महाकाय प्रभाव में उसके सबसे बड़े मददगार और हमसफर को परदे के पीछे धकेल देता है। 23 मार्च 1931 की शाम को जब लाहौर की सेंट्रल जेल में तीन नौजवान फांसी के फंदे की तरफ बढ़ रहे थे, तब भारत की जुबान पर एक नाम ऐसा चढ़ा कि बाकी दो नाम उसके साए में थोड़े सिमट गए। हम बात कर रहे हैं क्रांति के तीन शहीदों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की। इस अटूट तिकड़ी में भगत सिंह क्रांति का चमकता हुआ चेहरा थे और राजगुरु अचूक निशानेबाज, लेकिन इन सबके पीछे जो बेहद शांत, गंभीर और तीखा दिमाग काम कर रहा था, वह नाम था क्रांतिकारी सुखदेव थापर का।  आज 15 मई को उनकी जयंती पर यह सोचना बहुत जरूरी है कि इस जमीनी रणनीतिकार को हमने अपनी यादों और इतिहास में कितना स्थान दिया। पंजाब के लायलपुर में जन्मे सुखदेव और भगत सिंह सिर्फ साथ में देश के लिए लड़ने वाले साथी नहीं थे, बल्कि दोनों के बीच एक बेहद गहरी और बेमिसाल दोस्ती थी। लाहौर के नेशनल कॉलेज के दिनों से शुरू हुआ यह स...

गाली जब स्वैग बन जाए, तो समझो समाज अभद्र हो चला है

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'गाली जब स्वैग बन जाए, तो समझो समाज अभद्र हो चला है' (14 मई राष्ट्रीय शालीनता दिवस)  आज 14 मई है। कैलेंडर कहता है कि आज 'राष्ट्रीय शालीनता दिवस' है। सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि क्या अब शालीन रहने के लिए भी कोई खास दिन तय करना पड़ेगा? लेकिन अपने आसपास की डिजिटल दुनिया, सोशल मीडिया के कमेंट बॉक्स और टीवी बहसों के शोर को देखिए, तो अहसास होगा कि शायद आज के दौर में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। हम तरक्की तो बहुत कर रहे हैं, चांद पर पहुंच रहे हैं, लेकिन हमारी जुबान और व्यवहार से तमीज का रंग उतरता जा रहा है। खासकर इंटरनेट की दुनिया में तो ऐसा लगता है जैसे बदतमीजी करना ही नया फैशन या 'कूल' दिखने का जरिया बन गया है। हमारे बुजुर्ग कहते थे कि इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों या उसकी दौलत से नहीं, बल्कि उसकी बोली से होती है। शब्द इंसान के भीतर के संस्कारों का आईना होते हैं। लेकिन आज की हकीकत कुछ और ही है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स ने हमें एक 'नकाब' दे दिया है।  मोबाइल स्क्रीन के पीछे छिपे हम लोग खुद को बहुत ब...

क्या हम 'आर्थिक आपातकाल' की दहलीज पर हैं?

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क्या हम 'आर्थिक आपातकाल' की दहलीज पर हैं? पीएम मोदी ने हैदराबाद के मंच से देशवासियों के सामने सात अपीलें रखीं, जो केवल राजनीतिक भाषण नहीं था, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के बदलते मिजाज का एक बड़ा संकेत था। मोदी का यह कहना कि 'एक साल तक सोना खरीदने से बचें', 'विदेशी यात्राएं टालें' और 'पेट्रोल-डीजल की खपत कम करें', सुनने में तो नागरिकों से किया गया एक साधारण अनुरोध लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपे आर्थिक अर्थ बेहद गहरे और गंभीर हैं। वहीं, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का यह कहना कि 'ये अपीलें सरकार की नाकामियों का सबसे बड़ा कबूलनामा हैं', राहुल का यह कहना कोई छोटी बात नहीं है। क्या वाकई भारत किसी बड़े आर्थिक भंवर की ओर बढ़ रहा है या फिर यह आने वाले किसी वैश्विक तूफान से पहले की महज एक सावधानी है। पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को 120 डॉलर प्रति बैरल के पार हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत तेल आयात करता है, और जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो उसका सीधा...