'फोन की स्क्रीन से लेकर समाज तक फैलता उन्माद'
'फोन की स्क्रीन से लेकर समाज तक फैलता उन्माद' (18 जून हेट स्पीच के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस) रोज सुबह आँख खुलते ही हम सबसे पहले क्या करते हैं? तकिए के नीचे से फोन निकालते हैं और वॉट्सऐप या फेसबुक स्क्रॉल करने लगते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से सुबह-सुबह मूड फ्रेश होने की बजाय दिमाग खराब हो जाता है। स्क्रीन पर कोई न कोई ऐसा वीडियो या पोस्ट दिख ही जाती है, जहाँ लोग एक-दूसरे को गाली दे रहे होते हैं। कोई धर्म के नाम पर लड़ रहा है, कोई जाति के नाम पर, तो कोई अपनी पसंदीदा राजनीतिक पार्टी के चक्कर में सामने वाले को नीचा दिखा रहा है। पढ़े-लिखे लोग इसे 'हेट स्पीच' कहते हैं, पर सीधी भाषा में कहें तो यह सीधे-सीधे नफ़रत फैलाना और समाज में ज़हर घोलना है। कभी सोचा है कि जो भाषा हम अपनों से बात करने के लिए इस्तेमाल करते थे, वो आज दूसरों को ज़ख्म देने का औज़ार कैसे बन गई? अरे भाई, सीधा सा हिसाब है - आज नफ़रत का एक बहुत बड़ा धंधा चल रहा है। पुराने ज़माने में अगर दो लोगों की लड़ाई होती थी, तो मोहल्ले के चार लोग आकर बीच-बचाव कर देते थे और बात वहीं रफ़ा-दफ़ा हो जाती थी। लेकिन आज इंटरनेट औ...