"सुशासन के शिखर से सियासी शून्य तक नीतीश कुमार के ऐतिहासिक अवसान की दास्तां"
"सुशासन के शिखर से सियासी शून्य तक नीतीश कुमार के ऐतिहासिक अवसान की दास्तां" नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के एक ऐसे विलक्षण चरित्र हैं, जिन्हें इतिहास 'क्या हो सकता था' और 'क्या हो गए' के बीच के द्वंद्व के रूप में याद रखेगा। 2005 में जब उन्होंने बिहार की सत्ता संभाली, तो वह केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के एक नए विजन और सुशासन के प्रतीक बनकर उभरे थे। 2005 से 2010 का वह स्वर्ण काल आज भी बिहार के मानस पटल पर अंकित है, जब उन्होंने 'जंगलराज' की राख से एक नए बिहार की नींव रखी थी। उस दौर में नीतीश कुमार का कद इतना विराट था कि उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे स्वाभाविक और योग्य दावेदार माना जाता था। उनकी तुलना अक्सर बड़े सुधारकों से की जाती थी, लेकिन आज का परिदृश्य कुछ और ही कहानी बयां करता है। नीतीश की सबसे बड़ी ताकत उनका प्रशासनिक विजन था। उन्होंने दिखा दिया था कि इच्छाशक्ति हो तो बिहार जैसे जटिल राज्य की कानून-व्यवस्था को बदला जा सकता है। सड़कों का जाल बिछाना, स्कूल की बच्चियों को साइकिल बांटकर सामाजिक क्रांति लाना और पंचायत चुनावों में महिलाओं...