काका - पुष्पा का अमर प्रेम

अमर प्रेम

राजेश खन्ना फिल्म अमर प्रेम में बंगाली धोती - कुर्ते की पोशाक पहने संवाद बोलते हैं - "पुष्पा ए पुष्पा मुझसे तुम्हारे आंसू नहीं देखे जाते .. पुष्पा आई हेट टियर्स ये आंसू पोंछ डालो बोलते हुए खुद भी रोते हैं एवं उनकी नायिका पुष्पा (शर्मिला टैगोर) भी रोती हैं. उसके साथ ही हमारे जैसे दर्शक भी रोते हैं.. राजेश खन्ना को रोने वाला अदाकार बोला गया है, लेकिन यह भी सच है कि आंसू कमजोरी नहीं बल्कि भावुकता में रोते हुए प्रेमी के एक सुरक्षित एहसास देते हैं. आज भी रोते हुए लोगों को सांत्वना देने के नाम पर राजेश खन्ना का यह डायलॉग सुनाया जाता है. इसी प्रेम की प्रतिमूर्ति राजेश खन्ना थे.... बहुत याद आते हैं, इसीलिए आज उनको क्यों न फिल्म अमर प्रेम के जरिए याद किया जाए, जो जो हर प्रेमी को आदर्शवाद सिखाता है, अपितु सामाजिक संकीर्णता पर भी गंभीर चोट करते थे. 

सुपरस्टार राजेश खन्ना ने हिन्दी सिनेमा में एक ऐसे युग के अगुवाकार अभिनेता थे, जिनके युग में सिर्फ और सिर्फ पर्दे पर प्रेम और ही झलकता था. उन्होंने एक ऐसे युग को सम्भाला जिसे राज कपूर, देवानंद साहब, दिलीप साहब आदि दिग्गजों ने जिसे गढ़ा था. सुपरस्टार राजेश खन्ना का युग अमर हो गया है. 1969-1971 के दौरान अविस्मरणीय युग था, छोटा सा था, लेकिन लेकिन उनका जादू हमेशा कायम रहा, और रहेगा. करिश्मा अभी भी है और हमें बार-बार पुरानी यादों के साथ बहा ले जाता है. राजेश खन्ना ने बहुत सारी फ़िल्मों में यादगार अदाकारी से अमर कर दिया था, लेकिन सबसे ज्यादा वो अपने सिनेमाई 'अमर प्रेम' के कारण याद आते हैं.राजेश खन्ना प्रेम, रोमांस की फ़िल्मों के ब्रांड एंबेसडर थे, अपनी अदाकारी से संवेदना का ऐसा प्रवाह बहाते थे, जिसमें संवेदनशील दर्शकों की आँखे भर जाती थीं, आज भी वही तिलिस्म है.

गीत "चिंगारी कोई भड़के " राजेश खन्ना के दिल दहला देने वाले अभिनय के साथ उत्कृष्ट पटकथा और सिनेमैटोग्राफी का एक उत्कृष्ट प्रदर्शन है. जिसने साबित कर दिया है कि वे क्यों सुपरस्टार थे, जिन्होंने अपनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली सिल्वर स्क्रीन पर अदाकारी की. चांदनी रात में नाव में उनका शानदार और मंत्रमुग्ध करने वाला अभिनय निर्देशन के लिहाज से सूक्ष्म कल्पना के सर्वोत्तम है. इस गीत के बोल और संगीत एक अत्यंत आत्मकेंद्रित व्यक्ति की भावनाओं को भी प्रतिध्वनित कर सकते हैं. जब भी कोई इस गीत को देखता है ...... तो कुछ ऐसा पाता है जो हाल ही में जीवंत होता है जो आत्मा के भीतर गहराई तक हलचल करता है. राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आरडी बर्मन की तिकड़ी ने इस जादुई सम्मोहन गीत के साथ फिल्म को सुपरचार्ज कर दिया था. यहअमर प्रेम के सारे के सारे गीत दार्शनिक स्तर पर हैं, जिनमे संवेदना बहती है. हिन्दी सिनेमा बहुत सारे युग हुए हैं एक त्रिमूर्ति का युग रोमांटिक, भावुकता को पर्दे पर उतारते थे, उस त्रिमूर्ति का नाम राजेश खन्ना - आरडी बर्मन - किशोर कुमार के रूप में याद आते हैं. यह एक ऐसा युग था, जिसमें संगीत के लिहाज से उदात्त रचाया गया है. इसीलिए अमर प्रेम फिल्म में हावड़ा ब्रिज के नीचे कश्ती में सवार शर्मिला एवं राजेश खन्ना गाते हैं-

"चिंगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाये
सावन जो अगन लगाये, उसे कौन बुझाये
पतझड़ जो बाग़ उजाड़े, वो बाग़ बहार खिलाये
जो बाग़ बहार में उजड़े, उसे कौन खिलाये
चिंगारी कोई भड़के...आज भी हावड़ा ब्रिज को देखते हुए ये दोनों अमर प्रेम वाले प्रेमी जोड़े की तस्वीर जेहन में आती है, हर प्रेमी प्रेमिका के जेहन में एक बार ही सही ये नौका की सवारी अपनी प्रेमिका के साथ ज़रूर मिले, कहानी ऐसे हो, कि दर्शकों के जेहन में हमेशा के लिए अंकित हो जाए. पहले तो इस गीत को फिल्माने की इजाज़त ही नहीं मिली, बाद में राजेश खन्ना के बड़े प्रशंसक पुलिस प्रशासक ने इजाजत दे दी.. एक यह भी दौर था.


माना तूफाँ के आगे, नहीं चलता ज़ोर किसी का
मौजों का दोष नहीं है, ये दोष है और किसी का
मझधार में नैय्या डोले, तो माझी पार लगाये
माझी जो नाव डुबोए
उसे कौन बचाये..... उस सुनहरे गीतों का गहन मतलब होता था, सिर्फ झूमना नहीं था. इस गीत की अंतरा में आर डी बर्मन का क्लासिकल संगीत दार्शनिकता के बहाव में ले जाता है, जहां राजेश खन्ना अपने प्रेम की सारी संवेदना प्रकट करते हैं.


कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना
छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना ) - २
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...... राजेश खन्ना पुष्पा शर्मिला टैगोर से गाते हुए कहते हैं - पुष्पा (शर्मिला टैगोर) बहुत ही संकोची नज़र से देखते हुए बचती है, सामाजिक उस लकीर को तोड़ना नहीं चाहती, सामाजिक रूप से जिसे नाजायज संबद्ध कहा जाता है, चाहे भले ही वो भावनापूर्ण ही क्यों न हो! हमारे समाज में प्रेम के लिए कोई गुंजाइश नहीं है

तब राजेश खन्ना इस दोहरे समाज पर चोट करते हुए गाते हैं, ध्यान रहे आवाज़ किशोर कुमार की है.
कुछ रीत जगत की ऐसी है, हर एक सुबह की शाम हुई - २
तू कौन है, तेरा नाम है क्या, सीता भी यहाँ बदनाम हुई
फिर क्यूँ संसार की बातों से, भीग गये तेरे नयना
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना
छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना
कुछ तो लोग कहेंगे ...
 साफ - साफ कह रहे हैं, इस दुनिया की परवाह मत करो ये दोहरा समाज़ सिर्फ ताने दे सकता है, खाने के लिए रोटी नहीं दे सकता.. और तुम क्या इसने जिसे माता सीता कहा उसे भी इसने बदकिरदार कहा था, इसकी परवाह मत करो.. तब शर्मिला शायद कहना चाहती है कि मैं तो वेश्या हूं, आप क्यों बदनाम होना चाहते हैं -

हमको जो ताने देते हैं, हम खोए हैं इन रंगरलियों में - २
हमने उनको भी छुप छुपके, आते देखा इन गलियों में
ये सच है झूठी बात नहीं, तुम बोलो ये सच है ना
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना
छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना
कुछ तो लोग कहेंगे ... तुम इसकी चिंता मत करो, जो मुझे गलत कहते हैं उनमे मुझमे बहुत फर्क़ है, वो यह कि वो रात में आते हैं, मैं रात के अंधेरे की आड़ नहीं लेता, उन्हें शरीर चाहिए मुझे सुकून...
अमर प्रेम सन 1972 में रिलीज़ हुई शक्ति सामंत की फ़िल्म है. शक्ति सामंत ने मुहब्बत को बड़े ही दार्शनिक, आधुनिक अंदाज़ में पर्दे पर उतारा है. आम तौर पर उनका जिक्र महानता के स्तर पर होता नहीं है, लेकिन उन्होंने प्रेम को पर्दे पर खूब साकार किया है, उसके लिए उनको हजार सलाम तो बनते हैं. अमर प्रेम आज के दौर में दम तोड़ते हुए मानवीय मूल्यों को फिर से स्थापित करने की कहानी है, जो बताती है कि प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती. प्रेम किसी को भी किसी से भी हो सकता है. प्रेम को आप सिर्फ़ रिश्ते में नहीं बांध सकते. राजेश खन्ना, विनोद मेहरा, शर्मिला टैगोर, सुजीत कुमार, ओमप्रकाश की बेहतरीन अदाकारी ने इस फ़िल्म को हिन्दी सिनेमा के लिए मील का पत्थर बना दिया था. फ़िल्मों के जानकर आज भी इस फ़िल्म की बात करते हैं. शक्ति सामंत और राजेश खन्ना ने एक साथ कुछ अन्य फ़िल्मों में भी काम किया और इनकी सारी फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर अच्छा प्रदर्शन किया था. इस फ़िल्म ने भी अच्छी कमाई की और दर्शकों ने इस फ़िल्म के कहानी, गीत-संगीत और अभिनय वाले पहलू को भी ख़ूब सराहा था.इस महान फिल्म में रेड लाइट एरिया के जीवन और नैतिक मूल्यों की मार्मिक कहानी को व्यंग्यपूर्ण पर्दे पर उतारा गया है.मैं बंगाली साहित्य का एवं सिनेमाई दृष्टि का बहुत बड़ा फैन हूं, मुझे बंगाली फिल्मकारों की दार्शनिकता आकर्षित करती है. बंगाल ने एवं वहाँ के साहित्यकारों, फिल्मकारों ने जो योगदान दिया है, दरअसल उसी को हिन्दी सिनेमा का गोल्डन एरा कहा गया है... बंगाल की पृष्टभूमि से निकलने वाली कहानियों का स्तर आला है. उन कहानियों में चरित्र-चित्रण, कथानक की गहराई, मानवीय भावनाओं की ईमानदारी कहीं भी पाई जाने वाली बेहतरीन कहानियों में से एक है. अमर प्रेम फिल्म भी बंगाली फिल्म के ऊपर ही बनाई गई थी.

शर्मिला टैगोर फिल्म में शानदार हैं, उनका रोल यादगार है, फिल्म उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन राजेश खन्ना अराधना के बाद इसमे भी बाज़ी मार ले जाते हैं. विनोद मेहरा बड़े हो चुके नंदू का किरदार बहुत उम्दा निभाते हैं. इस फिल्म के निर्माण के दौरान एक प्रमुख सुपरस्टार बनने के बावजूद राजेश खन्ना आनंद-बाबू को बहुत अधिक विश्वसनीयता प्रदान करते हैं. ओमप्रकाश को देखना हमेशा आनंददायी होता है, हालांकि उनकी भूमिका बहुत छोटी है. आरडी बर्मन और किशोर कुमार बेहतरीन संगीत के साथ शीर्ष पर हैं! शक्ति सामंत को मेरा दिल से सलाम, कि उन्होंने इस फिल्म को सिल्वर स्क्रीन पर उतारा. जो भी सिनेमाई फैन्स राजेश खन्ना को पसंद नहीं करते उन्हें अमर प्रेम ज़रूर देखना चाहिए इस फिल्म के बाद वो भी काका की अदाकारी के तिलिस्म से निकल नहीं पाएंगे... फिर कोई कहानी जल्द......... 


दिलीप कुमार

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