'अमिताभ बच्चन के दद्दू' ओमप्रकाश
हिन्दी सिनेमा का नायाब फनकार अमिताभ बच्चन के दद्दू
(अभिनेता ओमप्रकाश)
हिन्दी सिनेमा की जानदार फ़िल्मों में कई लोगों की भूमिका होती है. हम सब सिनेप्रेमी केवल और केवल फिल्म में मेन स्ट्रीम अभिनेता को याद रखते हैं. बांकी सब भुला देते हैं. एक अभिनेता फिल्म में अपने सहायक अभिनेता के कारण पूरा होता है ... ऐसे ही हिन्दी सिनेमा के सयाने हास्य अभिनेता, ओमप्रकाश जी नब्बे के दशक तक जिनको अमिताभ बच्चन का दद्दू कहा जाता था.कई बार ऐसा होता है, कई महान कलाकार अपनी कला के माध्यम से हमारे दिलो - दिमाग में रहते हैं. हमेशा सुपरस्टारों को याद रखा जाता है,लेकिन हम सिनेमा के सहायक स्टारों का जिक्र नहीं कर पाते,उन कॉमेडियन कलाकारों का जो फिल्म की आत्मा होते हैं. हिन्दी सिनेमा सुपरस्टारों के स्टारडम के चक्कर में उनको ही पूरी तवज्जो देने वाली फिल्म इंडस्ट्री ओमप्रकाश जी जैसे अभिनेताओं के बिना सिल्वर स्क्रीन चल नहीं सकती.
बहुमुखी कॉमेडियन ओमप्रकाश को भुला दिया गया. जो हमारे दिलों में बसते है, जिनका जिक्र होते ही हमारे चेहरे पर मुस्कान तैरने लगती है. ऐसे ही महान कॉमेडियन ओमप्रकाश जिनके सामने बड़े - बड़े अभिनेताओं को अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती थी. कमाल की टाइमिंग, ग़ज़ब का ह्यूमर सेंस, चेहरे से टपकती शराफत और हाथ घुमाकर बोलने का अंदाज़ उन्हें एक उत्तम श्रेणी का कलाकार बनाता था. महान कॉमेडियन स्टार जिन्होंने अपने चालीस साल की सिनेमाई यात्रा में पांच पीढ़ियों के अभिनेताओं के साथ बराबरी पर सिल्वर स्क्रीन साझा की. पहली पीढ़ी के सबसे बड़े सुपरस्टार देवानंद साहब, दिलीप कुमार, राज कपूर, दूसरी पीढ़ी के सुपरस्टार, राजेन्द्र कुमार, शम्मी कपूर, सुनील दत्त, तीसरी पीढ़ी के मनोज कुमार, धर्मेद्र, चौथी पीढ़ी के अमिताभ बच्चन पांचवीं पीढ़ी के ऋषि कपूर, अनिल कपूर, आदि के साथ अलग - अलग दौर में ओमप्रकाश जी अनवरत अपनी कॉमेडी एवं संजीदा रोल करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे.
यूँ तो ओमप्रकाश जी को कॉमेडियन के तौर पर जाना जाता था, लेकिन उनकी उपलब्धियों की हिट फ़िल्मों का दायरा इतना बड़ा था,कि सिल्वर स्क्रीन पर दूसरा कोई कॉमेडियन या अभिनेता दोहरा नहीं सका. ओमप्रकाश जी की डिमांड अपने दौर में मेनस्ट्रीम हीरो से भी ज्यादा होती थी, वो निर्देशकों की पहली पसंद थे. ओम जी के बारे में कहा जाता है कि वो पिछड़े लोगों का जीवन पर्दे पर उकेरते थे, जिनके अभिनय में आम इंसानी जिंदगियां झलकती थीं. उनके बोलने से ऐसे लगता था मानो अपने आसपास का कोई बुजुर्ग फ़िल्मों में चला गया है. बिल्कुल यथार्थवादी सिनेमा के सिरमौर कॉमेडियन का अब जिक्र कम ही होता है. उनको भुलाया जाना उनका नुकसान नहीं बल्कि आने वाली सिनेमाई पीढ़ियों का है... विचारणीय है, कहीं आने वाली पीढ़ियां इस बुजुर्ग अभिनेता की अभिनय कला से महरूम न रह जाएं.
हिन्दी सिनेमा में महानतम कल्ट फ़िल्मों में शुमार अंदाज़ में दिलीप कुमार, तेरे घर के सामने, में देवानंद, सरगम में राजकपूर, मिस मैरी, बहार, मनमौजी, में किशोर कुमार, पूरब - पश्चिम में मनोज कुमार, चुपके - चुपके में धर्मेंद्र, आदि के सामने उनके कालजयी अभिनय को भुलाया नहीं जा सकता है. अमिताभ बच्चन स्टार्टर शराबी में मुन्शी जी, नमक हलाल में अमिताभ बच्चन के दद्दू का किरदार हर सिने प्रेमी के दिमाग में अंकित है. अभिनेता ओमप्रकाश के स्पोंटेनीयस अभिनय इतना प्रासंगिक था, कि उनके द्वारा निभाया गया एक - एक किरदार पीढ़ी दर पीढ़ी दर्शकों के जेहन में अंकित रहा, आगे भी रहेगा. यूँ तो हम उनके ह्यूमर में अभिनय की टाइमिंग को याद करते हैं, लेकिन भावनात्मक उनका अविरल अभिनय में दर्शक डूब जाते थे.ओमप्रकाश जी का हंसता, गुदगुदाता, रुलाता, अभिनय केवल अभिनय ही नहीं था. उनके अभिनय में हर रंग, हर भाव की गहराई होती थी. हालाँकि उनके अभिनय में ज़िन्दगी की गहरी समझ और तहज़ीब का वो सरोकार जो हर इंसान की गहराई में पर्त दर पर्त छिपा रहता है.......प्रतिभाशाली अदाकार ओमप्रकाश जी का निजी जीवन फिल्मी था, उनका जीवन भी एक फिल्म की तरह अज़ीब पेचोख़म में चलता रहा है. उनके जीवन जैसी न रुकने वाली अविरल अभिनय की धारा पहली फिल्म से ही देखी जा सकती है.ओमप्रकाश का अभिनय इंसानी ज़िन्दगी को नजदीक से देखने के लिए काफी था
ओमप्रकाश अपने फिल्मी कॅरियर के शुरुआत में लाहौर में ही रहते थे, ओम प्रकाश जी तब तक ऑल इंडिया रेडियो में काम करते थे. रेडियो में काम करते हुए ओमप्रकाश की मुलाकात जाने - माने लेखक इम्तियाज अली से हुई.. इम्तियाज अली ने ही अनारकली फिल्म लिखी थी. लेखक इम्तियाज से मिलने के बाद ओमप्रकाश जी कुछ अच्छा होने की संभावना जग गई . फिर ओमप्रकाश जी ने ऑल इंडिया रेडियो की नौकरी छोड़ कर लाहौर छोड़कर कश्मीर चले गए. ओमप्रकाश सन 1944 में एक शादी में शिरकत करने पहुंचे. उसी शादी में प्रसिद्ध फ़िल्मकार दलसुख पंचोली भी पहुंचे. ओमप्रकाश ने एक फेमस किरदार फतेह के किरदार को करते हुए लोगों को खूब हंसाया, बहुत एंटरटेनमेंट किया, देखकर दलसुख पंचोली खूब मुतासिर हुए, उन्होंने सोच लिया इस युवक को अपनी फिल्म में काम दूँगा... फ़िल्मकार लाहौर लौट गए. ओमप्रकाश कश्मीर लौट गए. कुछ दिनों बाद ओमप्रकाश जी को एक टेलीग्राम मिला टेलीग्राम में लिखा था, "मैं फ़िल्मकार दलसुख पंचोली हूं आपको मेरी फिल्म में काम करना है तो लाहौर में मेरे ऑफिस आकर मिलिए. फिर ओमप्रकाश लाहौर उनके ऑफिस पहुंच गए, ऑफिस पहुंचकर उन्होंने फ़िल्मकार को फोन किया. फ़िल्मकार ने कहा कि मैंने किसी ओमप्रकाश को नहीं बुलाया, यह सुनकर ओमप्रकाश दुःखी हुए.
ओमप्रकाश सोचते हुए, बाहर निकल रहे थे, तो उन्हें प्राण साहब मिले, प्राण साहब ने पूछा तुम्हारा नाम क्या है? ओमप्रकाश ने पूरी कहानी सुनाई. प्राण साहब ने कहा कि पंचोली साहब मेरे दोस्त हैं, मैं उनसे मिलकर आ रहा हूं, वो सचमुच किसी तुम्हारे उस किरदार को जानते हैं वही उनके जेहन में अंकित है, तुम जाकर मिलो, प्राण साहब की बात सुनकर ओमप्रकाश जी खिल उठे, आख़िरकार पहली फिल्म दासी में उन्हें मेन रोल जिसमें उनका किरदार कॉमिक विलेन का मिल गया. फिल्म हिट हुई. फिल्म ने इतना फेम कमाया कि ओमप्रकाश भी प्रसिद्ध हो गए. कुछ दिनों बाद उनको एक टेलीग्राम मिला कि अब आपकी सेवा समाप्त होती है, अब आप जा सकते हैं, कुछ दिनों बाद इम्तियाज अली मिले इम्तियाज अली ने उन्हें एक रोल सुझाया वो रोल मिला गया फिल्म का नाम धमकी था,उस फिल्म में ओमप्रकाश जी ने खलनायक की भूमिका निभाई. कुछ दिनों बाद भारत का बंटवारा हो गया. ओमप्रकाश लाहौर छोड़कर भारत आ गए, तब उनकी दोस्ती बी आर चोपड़ा से हुई दोनों ने साथ - साथ संघर्ष किया. हिन्दी सिनेमा में उन्हें पहला काम "लखपति" फिल्म में विलेन का रोल मिला. अभिनेता के रूप में ओमप्रकाश की इस फिल्म से पहिचान बनी. सन 1949 में लाहौर, रात कि रानी, सावन भादों, चार दिन, आदि हिट फ़िल्मों के बाद अदाकार ओमप्रकाश स्थापित हुए. इन फ़िल्मों में उनकी अदाकारी से उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी. 50 के दशक में ओमप्रकाश हिन्दी सिनेमा के अभिनय अंग बन चुके थे. 50 का दशक ओमप्रकाश जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दशक था, इस पूरे दशक में ओमप्रकाश ने अपनी अदाकारी एवं निर्देशन आदि से हिन्दी सिनेमा का दिल बनकर धड़कने लगे थे. पचास के दशक में ओमप्रकाश एक शानदार निर्देशक बनकर उभरे. इसी दशक में ओमप्रकाश ने. मदारी, चोर बाज़ार, बहार, मरीन ड्राइव, मेम साब, आदि हिट फ़िल्मों में यादगार अभिनय दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा था. इसी दशक में ओमप्रकाश ने गेस्ट एपिरीयंस का नया अध्याय शारदा फिल्म से किया. इसी दशक में गेटवे ऑफ इंडिया, जैसी हिट फिल्म डायरेक्ट किया. 1959 में चाचा जिंदाबाद, कन्हैया जैसी हिट फिल्म का निर्माण किया. हावड़ा ब्रिज फिल्म में उनका कालजयी अभिनय आज भी सिने प्रेमियों को याद है. उनके अभिनय का ऐसा करिश्मा था, कि जिस किरदार को पर्दे जीते थे, वो अमर हो जाता था.
गोल्डन एरा के पहली पीढ़ी के सुपरस्टार देव साहब, दिलीप कुमार, राज कपूर, त्रिमूर्ति के साथ उनके कॉमिक, एवं संजीदगी के साथ भावनात्मक अभिनय के महान अध्याय बनते जा रहे थे. फिल्म मुनीम जी, भरोसा, हाफ टिकट, प्यार किए जा, दस लाख, तेरे घर के सामने, आदि फ़िल्मों से कॉमेडी के साथ संजीदगी अभिनय का ऐसा कॉकटेल पर्दे पर उकेरते थे, कि दर्शक कभी हंसते हुए लोटपोट हो जाते, वहीँ संजीदगी में रोने लगते तो डूब जाते. अदाकार ओमप्रकाश अब अदाकारी तक सीमित नहीं थे, वो फ़िल्मकार की भूमिका का भी सफल निर्वहन कर रहे थे. केवल कॉमिक अभिनेता कहकर बहुमुखी ओमप्रकाश जी की प्रतिभा को अनदेखा नहीं किया जा सकता. कैरेक्टर रोल में ओमप्रकाश जी की प्रतिभा एवं उनकी अदाकारी बौध्दिक स्तर की होती थी. वहीँ उनकी सरलता, एवं दर्शकों के अवचेतन मन में गहरी छाप छोड़ रही थी. खानदान, अमर प्रेम, पूरब पश्चिम, चिराग, दिल अपना और प्रीत पराई, जैसी हिट फिल्म में उनकी गंभीर, अदाकारी का पूरा सिलेबस है.
सत्तर के दशक में अब हिन्दी सिनेमा पूर्णता बदल चुका था, अब फ़िल्मों में जन - सरोकार न के बराबर बचा था, सत्तर के दशक से हिन्दी सिनेमा का पूरा का पूरा बाजारी करण हो गया था. नई - नई परिभाषाएं गढ़ी जा रहीं थीं. हिन्दी सिनेमा को विश्व में पहिचान दिलाने वाली पहली त्रिमूर्ति देवानंद साहब, दिलीप कुमार, राज कपूर आदि भी जमे हुए थे. वहीँ सत्तर के दशक के शुरुआती दौर में पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना प्रेम, रोमांस से हिन्दी सिनेमा में एक लकीर खींच रहे थे. वहीँ हीमैन धर्मेद्र की खौलती हुई अदाकारी, नए - नए अमिताभ बच्चन एंग्री यंग मैन बनकर पर्दे पर अपनी आग जला रहे थे. वहीँ एक तरफ सुनील दत्त, विनोद खन्ना डाकू बनकर भी हीरो बने रहे. सत्तर के दशक में हिन्दी सिनेमा में सुपरस्टारों की बाढ़ आ गई थी. सत्तर के दशक तक हिन्दी सिनेमा आदर्श जैसी बातेँ भूल चुका था, वो काम तब ही देता था, जब तक आप उनके साथ फिट बैठें, न जाने कितने सहायक अभिनेता दरकिनार कर दिए जाने के कारण तंगहाली में मोहताज होकर दुनिया से रुखसत कर चुके थे. वहीँ बूढे हो चले ओमप्रकाश जी के लिए अब नए नए कैरेक्टर रोल करने वाले अभिनेता चुनौती लेकर आए थे, तो ओमप्रकाश जी ने नए दौर में खुद को ढालने की चुनौती को स्वीकार किया, एवं अपने अभिनय की ऊंचाई को वहाँ तक पहुंचा दिया कि कोई मापक ही नहीं बचा था....
फिल्म गोपी में अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के बड़े भाई गिरधारी लाल की भूमिका में खड़े थे, इस रोल में ओमप्रकाश जी ने अपने कालजयी अभिनय से पूरी की पूरी सिल्वर स्क्रीन की तालियां बटोर ली थीं.... ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा था,"मेरे पूरे फिल्मी सफर में अगर नज़र दौड़ाई जाए तो पाता हूं कि फिल्म गोपी में ओमप्रकाश जी के सामने मैं बहुत ही लाचार था, यूँ तो दिलीप साहब महानतम अदाकार हैं, लेकिन ये शब्द उनके अपने आप में ओमप्रकाश जी के लिए किसी ऑस्कर से कम नहीं है. हिन्दी सिनेमा में इन शब्दों को हम सुनते ही रहते हैं कि फला ऐक्टर फला ऐक्टर पर भारी पड़ा, लेकिन दिलीप साहब के शब्द ओमप्रकाश जी को बहुमुखी प्रतिभा का अदाकार सिद्ध करती है.
सत्तर दशक खत्म होते तक सीनियर कैरेक्टर रोल करने वाले अभिनेताओं में ओमप्रकाश अब और ज्यादा प्रासंगिक हो रहे थे. उन्होंने खुद को बदल चुके सिनेमा में खुद को ढाल चुके थे. सत्तर के दशक में उन्होंने ने नए स्टारों के साथ ऐसा कदमताल किया, कि बूढे ओमप्रकाश का हंसता हुआ चेहरा लोगों को गुदगुदाने के साथ साथ ज़िन्दगी जीने के फलसफे सिखा रहे थे. नई पीढ़ी को संघर्ष, निष्ठा, ईमानदारी, से जीवन जीने की कला समझा रहे थे, वहीँ हौसला न सब्र आदि न छोड़ने का दूरदर्शी अभिनय करते हुए स्टारों एवं नए अभिनेत्रियों को भी सीख दे रहे थे. इसी भागमभाग में उनके हिस्से आई जोरु का गुलाम, रोटी, सुहाना सफर, पूरब पश्चिम, अमर प्रेम, बुड्ढा मिल गया, लोफर, नया दिन नई रात, आदि हिन्दी सिनेमा की कालजयी फ़िल्मों में जीवंत अभिनय किया.
ओमप्रकाश जी को अभी तक उसी तरह से सिर आँखों पर ले रहा था, यह उनका अपनी प्रतिभा थी, कि इस उम्र में भी वो सिल्वर स्क्रीन पर हर रंग जी रहे थे. वहीँ दूसरी तरफ चुपके - चुपके, अब्दुल्ला, आँधी, खुशबू, साहब बहादुर, नया दौर, गोलमाल, इन सब के बीच एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन को के साथ उनका खास रिश्ता ही बन गया था, हर फिल्म में अमिताभ बच्चन को संभालते हुए नजर आते. इस सुनहरे सफर की शुरुआत शुरुआत 1971 से होती है जिसमें अमिताभ बच्चन ओमप्रकाश जी का मर्डर करते हैं... उसके बाद अमिताभ बच्चन की पहली हिट फिल्म ज़ंजीर में डिसिल्वा का किरदार ओमप्रकाश जी ने जैसा किया वैसा किरदार दूसरा कोई कर ही नहीं सकता था.उस किरदार को कोई आज तक भूला नहीं है न भुलाया जा सकेगा. महान अभिनेता ओमप्रकाश जी एवं अमिताभ बच्चन एक - के पूरक बन चुके थे, दोनों की जुगलबंदी ने हिन्दी सिनेमा में एक युग स्थापित कर दिया था. सन 1975 में चुपके - चुपके में जीजा जी का किरदार वही 1977 अलाप फिल्म में एक - दूसरे के सामने खड़े बाप - बेटे का वो किरदार शराबी फिल्म में मुन्शी जी, एवं नमक हलाल में अमिताभ बच्चन के दददू का यादगार किरदार अमर हो गया, शायद ये रोल उनके लिए ही लिखे गए थे. ... उसके बाद ओमप्रकाश जी को हिन्दी सिनेमा में उनको अमिताभ बच्चन के दद्दू कहकर पुकारते थे.... यही उनके अभिनय की अमिट छाप थी.... जिसकी लकीरें कभी मिटाई नहीं जा सकती.
अस्सी के दशक में ओमप्रकाश अपने अभिनय को सुनहरे इतिहास को लिखते, अभिनय की सफ़लता के मापदंडों को सामने रखा. पांचवी पीढ़ी के सुपरस्टारों, अनिल कपूर, संजय दत्त, कमल हासन, ऋषि कपूर, मिथुन चक्रवर्ती, जैसे शानदार अभिनेताओं के साथ मिलकर सीनियर ओंप्र जी ने हिट फ़िल्मों की गाथा लिखी. उन फिल्म में आस-पास, प्रेम रोग, धरमकाँटा, आवारा बाप, काली बस्ती, चमेली की शादी, ईमानदार, हवालात, आदि सुपरहिट फ़िल्मों में काम करते हुए, पांच पीढ़ियों के हीरोज के साथ काम का सफ़र लंबा था. समय - समय पर निर्देशकों के व्यपारिक हितों का ध्यान रखते हुए खुद में बदलाव करते थे, इसलिए इतनी लंबी पारी खेल सके. उन्होंने जो अपनी सिनेमाई यात्रा में जो मुकाम हासिल किया वो संघर्ष की पराकाष्ठा थी. नब्बे के दशक में भी खूब सक्रिय रहे, कॅरियर उसी प्रवाह से दौड़ रहा था, कहते हैं अगर प्रारंभ है तो अंत भी होता है. नब्बे के दशक में ओमप्रकाश जी की पत्नी सहित उनके परिवार के पांच सदस्यों का इंतकाल हो चुका था, वहीँ उनके दौर के उनके दिल के बहुत करीब मित्रों में, प्रेमनाथ, जीवन, सुन्दर कन्हैयालाल, मुकरी, जैसे प्रिय मित्रो का एक साल के भीतर ही इंतकाल हो गया. मौत का यह तांडव से ओमप्रकाश जी के अन्दर लंबा सन्नाटा हो गया, उनके अंदर एक विरक्ति आ गई थी. बुढ़ापे में भी कॅरियर उफान पर था, लेकिन उन्होंने फ़िल्मों से अपनी दूरी बना ली. कभी न सिल्वर स्क्रीन पर लौटने के लिए... 19 दिसम्बर 1919 आज ही के दिन जन्मे ओमप्रकाश 21 फरवरी 1998 को इस फानी दुनिया से रुख़सत कर गए. ओमप्रकाश जी जैसा अभिनेता कभी मरता नहीं है, वो हमेशा अपने चरित्रों में जीता है. महान कॉमेडियन,बहुमुखी अभिनेता ओमप्रकाश जी आज भी हम सिने प्रेमियों के दिल में जिंदा हैं.....
दिलीप कुमार
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