'कद्दावर नेताओं के 'पंख कतरने' का खेल: दतिया ने खोली भाजपा की पोल'

'कद्दावर नेताओं के 'पंख कतरने' का खेल: दतिया ने खोली भाजपा की पोल' 

भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूरी राजनीति जिस एक मजबूत धुरी पर टिकी है, उसे 'अनुशासन' कहा जाता है। संघ और भाजपा की कार्यप्रणाली में बगावत या खुले विद्रोह को कभी भी स्वीकार नहीं किया गया। यहाँ यह सिद्धांत पत्थर की लकीर माना जाता है कि नेता से बड़ा दल होता है और दल से बड़ा देश। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश के दतिया की सड़कों पर जो अभूतपूर्व नजारा दिखा, उसने इस पारंपरिक राजनीतिक सोच और कैडर के अनुशासन को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उपचुनाव का उम्मीदवार बनाना पार्टी के भीतर सुलग रही उस अंदरूनी कलह को सरेआम बाहर ले आया, जिसे अब तक दिल्ली और भोपाल के बंद कमरों में दबाकर रखने की पूरी कोशिश की जा रही थी। दतिया में जो कुछ भी हुआ, वह केवल एक टिकट कटने का सतही विरोध नहीं था। वह असल में एक ताकतवर क्षेत्रीय क्षत्रप के जमीनी प्रभाव और शक्ति का खुला प्रदर्शन था। नेशनल हाईवे-44 पर समर्थकों द्वारा किया गया 12 घंटे का चक्काजाम, पुलिस प्रशासन पर पथराव और भाजपा जिला अध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाहा सहित पूरी जिला कार्यकारिणी का सामूहिक इस्तीफा देना किसी भी अनुशासित राजनीतिक दल की चूलें हिलाने के लिए काफी है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि इतनी बड़ी सामूहिक अनुशासनहीनता, हिंसक प्रदर्शन और खुलेआम पार्टी विरोधी कदम उठाने के बाद भी केंद्रीय या प्रदेश नेतृत्व की तरफ से किसी भी नेता या कार्यकर्ता पर कोई बड़ी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई। यह वही भाजपा है जो छोटे से छोटे आंतरिक विरोध पर भी तुरंत निलंबन और निष्कासन का चाबुक चला देती है, लेकिन दतिया के मामले में नेतृत्व ने रहस्यमयी चुप्पी साधे रखी। यह चुप्पी ही साफ बयां करती है कि शीर्ष नेतृत्व भी इस क्षत्रप के जमीनी रसूख को नजरअंदाज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। हालांकि, इस पूरे सियासी ड्रामे का अगला अंक और भी दिलचस्प मोड़ पर आ गया। भोपाल में मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष से बंद कमरे में हुई गंभीर मुलाकात के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा के सुर अचानक बदल गए। जो समर्थक कल तक सड़कों पर टायर जलाकर आगजनी कर रहे थे, उनके सर्वमान्य नेता ने अचानक एक वीडियो संदेश जारी कर पार्टी के फैसले को सिर-आंखों पर लेने की बात कह दी। नरोत्तम मिश्रा ने न सिर्फ अपने कार्यकर्ताओं से शांति की भावुक अपील की, बल्कि भाजपा प्रत्याशी के नामांकन में खुद शामिल होने की बड़ी घोषणा भी कर दी। राजनीति और सत्ता के गलियारों को समझने वाले भली-भांति जानते हैं कि यह वैचारिक हृदय परिवर्तन स्वेच्छा से नहीं हुआ है। इसके पीछे संगठन का वह भारी आंतरिक दबाव काम कर रहा है, जिसे भाजपा की भाषा में 'अनुशासन की कड़वी घुट्टी' कहा जाता है। यह पूरा घटनाक्रम भाजपा के भीतर लंबे समय से पक रही एक बहुत बड़ी और गहरी अंदरूनी कलह की ओर इशारा करता है। 

आज की नई भाजपा में केंद्रीय नेतृत्व यानी दिल्ली दरबार का एकाधिकार और प्रभाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ चुका है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों को तय करने से लेकर छोटे से छोटे उपचुनाव के टिकटों का फैसला अब पूरी तरह से दिल्ली की कसौटी और सर्वे रिपोर्ट के आधार पर तय होता है। इस नई केंद्रित व्यवस्था में सबसे बड़ा और गहरा झटका उन क्षेत्रीय क्षत्रपों को लगा है, जिनका सूबों में अपना एक अलग, मजबूत और रौबदार सियासी साम्राज्य हुआ करता था। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के युग की विदाई के बाद से ही सूबे के कद्दावर नेताओं को धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीति से पूरी तरह किनारे करने या राजनीतिक रूप से 'निपटाने' का एक मौन सिलसिला लगातार जारी है। लेकिन शीर्ष नेतृत्व की यह कूटनीति अब अपने साथ एक बहुत बड़ा और गंभीर राजनीतिक जोखिम भी लेकर आ रही है। बड़े और स्थापित चेहरों को इस तरह दरकिनार करके नए, अनुभवहीन लेकिन आज्ञाकारी चेहरों को जबरन आगे बढ़ाने की इस अति-महत्वाकांक्षी रणनीति से पार्टी के भीतर का पुराना कैडर भीतर ही भीतर सुलग रहा है। जो अंतर्कलह और असंतोष कभी केवल कोर कमेटी की बैठकों या बंद कमरों में दबी जुबान में जाहिर होता था, वह अब दतिया जैसी हिंसक और खुली घटनाओं के जरिए सड़कों पर तमाशा बनकर बिखर रहा है। सालों तक दरी बिछाने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं और पुराने वरिष्ठ नेताओं के मन में अब यह गहरा डर बैठ चुका है कि उनके जीवनभर की तपस्या पर दिल्ली का एक फरमान किसी भी दिन पानी फेर सकता है।दतिया का यह बड़ा प्रकरण भले ही वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप और कूटनीति के कारण फिलहाल शांत दिखाई दे रहा हो, लेकिन इसने मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर एक ऐसी गहरी लकीर खींच दी है जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। नेता भले ही शीर्ष संगठन के भारी दबाव में आकर कैमरे के सामने अपने सुर बदल लें, लेकिन उनके आहत समर्थकों और जमीनी कार्यकर्ताओं के दिलों में लगी इस उपेक्षा की आग को बुझाना नामुमकिन साबित होता है। यदि आने वाले समय में केंद्रीय नेतृत्व ने क्षेत्रीय भावनाओं, जमीनी पकड़ और वरिष्ठ नेताओं के आत्मसम्मान के बीच एक स्वस्थ संतुलन नहीं बनाया, तो अनुशासन के इस सबसे मजबूत कहे जाने वाले किले में दरारें और चौड़ी हो सकती हैं, जिसका खामियाजा पार्टी को आगामी चुनावों में भुगतना पड़ सकता है।

दिलीप कुमार पाठक 
लेखक पत्रकार हैं 

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