यूरोप की भयानक गर्मी भारत के लिए आख़िरी अल्टीमेटम है

'यूरोप की भयानक गर्मी भारत के लिए आख़िरी अल्टीमेटम है' 

यूरोप का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में बर्फ के पहाड़, सुहावना मौसम और ठंडी हवाएं आने लगती हैं। लेकिन आज वही यूरोप भीषण गर्मी की आग में बुरी तरह झुलस रहा है। जिन देशों के लोगों ने अपने जीवन में कभी पंखा, कूलर या एयर कंडीशनर की जरूरत तक महसूस नहीं की थी, वहां अब पारा 45 डिग्री के पार जा रहा है। सड़कें पिघल रही हैं, नदियां  सूख रही हैं और जंगलों में भीषण आग लगी हुई है। सबसे डरावनी बात यह है कि इस जानलेवा गर्मी की वजह से वहां हजारों लोग अपनी जान गंवा रहे हैं।

भारत के लोग सोच सकते हैं कि हमारे यहां तो 40 या 45 डिग्री तापमान होना आम बात है, फिर यूरोप में इतना हंगामा क्यों मचा है। असल में यूरोप के सारे मकान ठंड से बचने के हिसाब से बने हैं। ये मकान इस तरह तैयार किए जाते हैं कि बाहर की गर्मी को अंदर ही रोक लें। अब जब वहां अचानक इतनी भयंकर गर्मी पड़ रही है, तो ये मकान भट्टी की तरह तपने लगे हैं। वहां की केवल बीस प्रतिशत आबादी के पास ही घरों में एयर कंडीशनर हैं, इसलिए लोग इस अचानक आई मुसीबत को झेल नहीं पा रहे हैं। यूरोप का यह संकट केवल एक महाद्वीप की कहानी नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए एक खतरे की घंटी है। खासकर भारत जैसे विशाल देश के लिए यह एक ऐसी चेतावनी है जिसे अगर आज हमने नजरअंदाज किया, तो कल हमारे पास पछताने का भी मौका नहीं बचेगा। हाल के वर्षों में भारत खुद इसके गंभीर परिणाम भुगत रहा है। आंकड़ों की बात करें तो अकेले साल 2024 में भारत ने इतिहास की सबसे लंबी हीटवेव का सामना किया, जहां देश के 37 शहरों में तापमान 45 से 50 डिग्री के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया। सरकारी और स्वतंत्र रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दौरान देश में 44,000 से ज्यादा लोग हीटस्ट्रोक का शिकार हुए और हज़ारों लोगों की जान चली गई। 

चिकित्सा शोधकर्ताओं का अनुमान है कि भारत में पांच दिनों की एक भीषण हीटवेव के दौरान सीधे या परोक्ष रूप से लगभग 30,000 अतिरिक्त मौतें तक हो सकती हैं। इसके अलावा चरम गर्मी के कारण काम के घंटों का भारी नुकसान होता है जिससे अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर की चोट पहुंच रही है। हमें समय रहते यूरोप के इस महा-संकट और अपने देश के इन डरावने आंकड़ों से कुछ बहुत बड़े और जरूरी सबक सीखने होंगे। सबसे पहला सबक हमारे शहरों की बनावट को लेकर है। भारत के शहरों में आज हर तरफ सिर्फ सीमेंट और कंक्रीट की बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो रही हैं। विकास के नाम पर धड़ल्ले से पेड़ काटे जा रहे हैं और पुराने तालाबों को पाटकर वहां कॉलोनियां बसाई जा रही हैं। कंक्रीट की ये इमारतें दिनभर सूरज की तेज धूप को सोखती हैं और रात के समय इस गर्मी को बाहर छोड़ती हैं। इसकी वजह से शहर रात में भी ठंडे नहीं हो पाते। यूरोप से हमें यह सीखना होगा कि हरियाली को खत्म करना खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। हमें अपने शहरों में पार्कों, तालाबों और पेड़ों की संख्या को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा, तभी हमारे शहर रहने लायक बचेंगे। दूसरा बड़ा सबक हमारे घरों के डिजाइन का है। भारत में अब बहुमंजिला इमारतों और कांच वाले बड़े-बड़े दफ्तरों का चलन बहुत तेजी से बढ़ गया है। यह पूरी तरह से ठंडे देशों की अंधी नकल है, जो हमारे देश के गर्म मौसम के हिसाब से बिल्कुल गलत है। शीशे वाली ये इमारतें सूरज की गर्मी को सीधे अंदर खींचती हैं, जिससे कमरों को ठंडा रखने के लिए भारी भरकम एयर कंडीशनर चलाने पड़ते हैं। यह मशीनें अंदर तो ठंडक देती हैं लेकिन बाहर की हवा को और ज्यादा गर्म कर देती हैं। भारत को अब अपनी पुरानी और पारंपरिक बनावट की तरफ लौटना होगा। हमें ऐसे घर बनाने होंगे जिनमें हवा का आना-जाना बेहतर हो, जो प्राकृतिक रूप से ठंडे रहें और जिनकी छतों को सफेद रंग से रंगा जा सके ताकि वे धूप को वापस मोड़ दें। तीसरा सबक पानी के संकट से जुड़ा है। यूरोप की इस भयानक गर्मी ने वहां की बड़ी-बड़ी नदियों को सुखा दिया है, जिससे वहां बिजली बनना और व्यापार ठप हो गया है। भारत तो पहले से ही पानी की भारी किल्लत से जूझ रहा है। अगर हमारे यहां ऐसी ही भीषण और लंबी गर्मी पड़ी, तो पीने के पानी के लिए हाहाकार मच जाएगा। 

सबक साफ है कि हमें बारिश के पानी को सहेजने के नियम हर घर के लिए जरूरी करने होंगे। अपनी नदियों और जमीन के नीचे के पानी को बचाने के लिए आज से ही कड़े कदम उठाने होंगे। चौथा और सबसे संवेदनशील सबक हमारे गरीब और मजदूर वर्ग की सुरक्षा का है। भारत में एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो तपती धूप में खुले आसमान के नीचे मजदूरी करती है। इनमें रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाने वाले और मकान बनाने वाले मजदूर शामिल हैं। जब भारत में लू चलती है, तो सबसे पहला और सीधा हमला इन्हीं बेबस लोगों पर होता है। सरकार को गर्मी से बचाव की योजनाओं को सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर उतारना होगा। गर्मी के दिनों में दोपहर के वक्त खुले में काम करने पर पूरी पाबंदी होनी चाहिए और हर चौक-चौराहे पर पीने के साफ पानी और छांव का पूरा इंतजाम होना ही चाहिए। प्रकृति किसी अमीर या गरीब देश में फर्क नहीं करती। अगर आज यूरोप जैसी अमीर और आधुनिक व्यवस्थाएं प्रकृति के गुस्से के आगे बेबस खड़ी हैं, तो भारत के लिए चुनौतियाँ और भी बड़ी हैं। यूरोप की गर्मी हमारे लिए एक आखिरी चेतावनी है। यह समय आँखें मूंदने का नहीं, बल्कि अपनी जीवनशैली, शहरों की बनावट और पर्यावरण को लेकर अपनी आदतों को बदलने का है। अगर हम अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां इस तपती धरती पर जी नहीं पाएंगी।

दिलीप कुमार पाठक 
लेखक पत्रकार हैं 

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