'कब होगा राहुल गांधी का निष्पक्ष राजनीतिक मूल्यांकन?'

'कब होगा राहुल गांधी का निष्पक्ष राजनीतिक मूल्यांकन?' 

राजनीति में किसी नेता की छवि को बनाने और बिगाड़ने का खेल नया नहीं है। लेकिन जो खेल राहुल गांधी के साथ खेला गया, उसकी मिसाल पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में नहीं मिलती। एक पूरे तंत्र ने, असीमित पैसे और सोशल मीडिया की ताकत के दम पर, बरसों तक उनकी एक खास तरह की छवि गढ़ने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। सुबह से शाम तक मुख्यधारा के मीडिया और ट्रोल सेना का बस एक ही काम था—राहुल गांधी को खारिज करना। लेकिन वक्त की सबसे अच्छी बात यह है कि वह हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आज जब हम भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों को देखते हैं, तो हवा का रुख बदला हुआ साफ महसूस होता है।एक निष्पक्ष नजरिए से देखें तो यह बात हैरान करती है कि पिछले एक दशक से अधिक समय से जो पार्टी सत्ता में बैठी है, उसके निशाने पर आज भी विपक्ष का एक नेता ही क्यों सबसे ऊपर रहता है? 

देश में कोई भी मुद्दा हो, बेरोजगारी की बात हो या महंगाई की, जवाब सत्ता से मांगा जाना चाहिए, लेकिन यहाँ हर सवाल का रुख मुड़कर राहुल गांधी की तरफ कर दिया जाता है। यह राजनीतिक क्रूरता नहीं तो और क्या है कि एक इंसान को कदम-कदम पर खुद को साबित करने के लिए मजबूर किया जाता है? यहाँ तक कि उनके परिवार के शहीदों तक पर उंगलियां उठाई गईं, लेकिन उस इंसान ने कभी अपनी शालीनता और मर्यादा का दामन नहीं छोड़ा। राहुल गांधी की राजनीति की सबसे बड़ी खूबी उनकी दूरदर्शिता रही है। अतीत में उन्होंने देश की आर्थिक नीतियों, महामारी के खतरों या सीमाओं की सुरक्षा को लेकर जो भी बातें कहीं, शुरुआत में भले ही सत्ता पक्ष ने उनका मज़ाक उड़ाया हो, लेकिन वक्त ने साबित किया कि उनकी एक-एक बात सच थी। राजनीति में अपनी बात का सही साबित होना ही किसी नेता की सबसे बड़ी परिपक्वता होती है। आज यही वजह है कि जनता उन्हें बेहद संजीदगी से सुनने लगी है। इस देश के युवा और किसान आज जिस गहरे संकट से गुजर रहे हैं, उनकी पीड़ा को राहुल गांधी ने बेहद करीब से महसूस किया है। परीक्षाओं के पेपर लीक होने से बर्बाद होते युवाओं के भविष्य की बात हो या रोजगार की तलाश में भटकते डिग्रीधारियों का दर्द, राहुल ने सड़क से लेकर संसद तक हर जगह युवाओं की बेबाक आवाज बनकर सरकार को घेरा है। ठीक इसी तरह, जब कड़कड़ाती ठंड और चिलचिलाती धूप में देश का अन्नदाता दिल्ली की सीमाओं पर अपने हक की लड़ाई लड़ रहा था, तब राहुल गांधी उनके बीच जाकर खड़े हुए। उन्होंने किसानों के दर्द को सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं बनाया, बल्कि उनकी कानूनी गारंटी और एमएसपी की मांग को अपनी राजनीति का मुख्य एजेंडा बनाया। खेतों की पगडंडियों पर किसानों के साथ ट्रैक्टर चलाना हो या कुलियों और मैकेनिकों के साथ बैठकर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को समझना, राहुल ने यह साबित किया कि वे ड्राइंग रूम की राजनीति नहीं, बल्कि पसीने और संघर्ष की सियासत करते हैं।

भारतीय राजनीति का एक और कड़वा सच अवसरवाद है, जहाँ नेता अपनी सहूलियत के हिसाब से रिश्ते बदलते हैं। चाहे वह आम आदमी पार्टी हो, तृणमूल कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी—इन सबने कभी न कभी कांग्रेस की जड़ें खोदने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली में राहुल गांधी के खिलाफ पोस्टर लगाए गए, बंगाल और उत्तर प्रदेश में कड़वाहट घोली गई। लेकिन राहुल गांधी का बड़प्पन देखिए कि जब भी इन क्षेत्रीय क्षत्रपों पर मुसीबत आई, वे सब कुछ भूलकर मदद के लिए आगे आए। अरविंद केजरीवाल के संकट के समय पैरवी के लिए वरिष्ठ वकीलों को खड़ा करना हो या विपक्षी एकजुटता के लिए हर कड़वाहट को पीना हो, राहुल ने हमेशा बड़े दिल का परिचय दिया। यह राजनीति की वह विडंबना है जहाँ मदद पाने वाले ही पीठ पीछे वार करने से नहीं चूकते, फिर भी राहुल अपनी धुन में आगे बढ़ते रहते हैं। उनकी इस सियासी यात्रा का सबसे खूबसूरत मोड़ था 'भारत जोड़ो यात्रा'। बंद कमरों, बयानों और प्रेस कॉन्फ्रेंस की राजनीति को पीछे छोड़कर जब यह इंसान कन्याकुमारी से कश्मीर तक पैदल निकल पड़ा, तो मानो राजनीति की परिभाषा ही बदल गई। तपती धूप, बारिश और बर्फबारी के बीच जब वे आम लोगों, किसानों, मजदूरों और समाज के सताए हुए पीड़ितों से मिले, उन्हें गले लगाया और उनके आंसू पोंछे, तो जनता ने उनके भीतर छिपे एक सच्चे और संवेदनशील इंसान को देखा। यह 'नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान' खोलने का कोई सियासी नारा नहीं था, बल्कि एक ऐसा जज्बा था जिसने करोड़ों लोगों के दिलों को सीधे छुआ। हैरानी की बात यह है कि जिस इंसान पर चौतरफा हमले होते हैं, वह दूसरों के प्रति कितना उदार हो सकता है। चुनाव हारने के बाद जब उनकी धुर विरोधी स्मृति ईरानी को सोशल मीडिया पर बुरी तरह ट्रोल किया जा रहा था, तब राहुल गांधी ही वह अकेले नेता थे जिन्होंने आगे आकर अपने समर्थकों से मर्यादा बनाए रखने की अपील की। यह दिखाता है कि राजनीति में गहरी वैचारिक दुश्मनी के बावजूद एक न्यूनतम मानवीय संवेदना बची रहनी चाहिए। आज सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी खुद को और कितना साबित करें। सवाल यह है कि इस देश का लोकतंत्र आख़िर कब तक एकतरफा नफ़रत और दुष्प्रचार की इस राजनीति को झेलता रहेगा? करोड़ों रुपये फूंकने के बाद भी अगर एक इंसान को जनता के दिलों से नहीं निकाला जा सका, तो इसका सीधा सा मतलब है कि सच को कुछ समय के लिए परेशान तो किया जा सकता है, लेकिन उसे कभी पराजित नहीं किया जा सकता।

दिलीप कुमार पाठक 
लेखक पत्रकार हैं (टीवी 9 नेटवर्क दिल्ली)
सम्पर्क : 9755810517 

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