'कांग्रेस पार्टी में कुर्सी की जिद, बगावती बुढ़ापा और बिखरी साख'
'कांग्रेस पार्टी में कुर्सी की जिद, बगावती बुढ़ापा और बिखरी साख'
भारतीय राजनीति का एक सीधा सा नियम है। एक समझदार नेता वह नहीं है जिसे सिर्फ आगे बढ़ना आता हो, बल्कि वह है जिसे यह पता हो कि कब और कितनी इज्जत के साथ दो कदम पीछे हट जाना है। आज की आपाधापी और कुर्सी से चिपके रहने की राजनीति के बीच, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने जो समझदारी दिखाई है, वह काबिले तारीफ है। उन्होंने देश के बाकी बुजुर्ग नेताओं को एक ऐसा सधा हुआ संदेश दिया है, जो न सिर्फ उनकी इज्जत को बढ़ाता है बल्कि दूसरों के लिए एक सबक भी है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि पार्टी अब शायद दिग्विजय सिंह को दोबारा राज्यसभा नहीं भेजेगी। अमूमन ऐसे मोड़ पर बड़े-बड़े नेता या तो बगावत पर उतर आते हैं या फिर कोने में बैठकर नाराजगी जताने लगते हैं। लेकिन दिग्गी राजा ने जिस अक्लमंदी से अपनी साख और सम्मान को बनाए रखा है, वह उनकी राजनीतिक परिपक्वता को दिखाता है। लोकतंत्र में कोई उनकी विचारधारा से अलग सोच रख सकता है, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ और सही टाइमिंग के मामले में वे आज भी बेजोड़ हैं। वे जानते हैं कि जब हवा का रुख बदल रहा हो, तो खुद को कैसे संभाला जाता है। पद पर न रहकर भी संगठन में अपनी साख को कैसे बरकरार रखा जाता है, यह कला दिग्विजय सिंह ने बखूबी दिखाई है।
इसके ठीक उलट, जब हम मध्य प्रदेश की राजनीति में उनके ही समकालीन नेता कमलनाथ को देखते हैं, तो स्थिति बिल्कुल विपरीत नजर आती है। पार्टी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह कमलनाथ पर भरोसा जताकर उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी। लेकिन अपनी जिद और कुंठा के कारण कमलनाथ ने न सिर्फ सरकार गंवाई, बल्कि धीरे-धीरे प्रदेश में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। हाल ही में एक राज्यसभा सीट के लिए दिल्ली से भोपाल तक की गई उनकी भागमभाग को सबने देखा। इतनी दौड़-धूप करने के बाद भी अंत में उन्हें खाली हाथ रहना पड़ा और सीट नहीं मिली, जिससे राजनीतिक गलियारों में उनकी जो किरकिरी हुई वह अलग। खुद को समय के अनुसार न ढालने की यह कुंठा किसी भी कद्दावर नेता के बने-बनाए इतिहास को धूमिल कर देती है।
यही हाल राजस्थान के जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत का भी है। जब कोई नेता यह मान बैठता है कि पूरा प्रदेश उसकी मुट्ठी में है और उसके बिना कुछ नहीं हो सकता, तो वहीं से उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल शुरू होती है। जीवनभर सत्ता के शीर्ष पदों पर रहने के बाद भी जब एक बड़ा नेता युवाओं का रास्ता रोकने लगता है, तो वह खुद अपनी इज्जत कम कर लेता है। राजस्थान में सचिन पायलट के प्रति उनकी नफरत और पदों के लिए कभी न खत्म होने वाली भूख ने उनके कद को बहुत छोटा कर दिया है। सवाल यह है कि जब आप खुद पूरी जिंदगी मलाईदार पदों पर रहे, तो आज बदलाव की उम्मीद रखने वाले युवाओं की महत्वाकांक्षा पर सवाल उठाने वाले आप कौन होते हैं? गहलोत के बदले हुए सुर और उनकी भाषा साफ इशारा कर रही है कि वे अब पार्टी से अलग रास्ता तलाश रहे हैं। अपनी राजनीति बचाने की ज़िद में वे अपनी ही इज्ज़त दांव पर लगा चुके हैं। अब होगा यह कि या तो वे खुद ही बाहर निकल जाएंगे, या फिर ऐसे बयानों के बाद पार्टी उन्हें खुद किनारे लगा देगी। अशोक गहलोत और कमलनाथ का यह रुख कोई पहला उदाहरण नहीं है। कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि जो नेता समय रहते मार्गदर्शक की भूमिका में नहीं आए, उन्होंने अपनी ही जिद से अपना राजनीतिक बुढ़ापा खराब कर लिया। पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह और जम्मू-कश्मीर के कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पूरी जिंदगी पंजाब की सियासत पर राज किया, लेकिन आखिरी वक्त में कुर्सी न छोड़ने की जिद ने उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जहां आज उनकी कोई राजनीतिक पूछ नहीं है। यही हाल गुलाम नबी आजाद का हुआ, जिन्होंने अपनी नई पार्टी तो बना ली, लेकिन आज वे पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं। इन नेताओं ने जीवन भर जो मान-सम्मान कमाया था, वह उम्र के आखिरी पड़ाव में आकर सिर्फ पदों की भूख के कारण मिट्टी में मिल गया। सियासत का यह कड़वा सच है कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जो नेता वक्त की नब्ज को पहचानकर नई पीढ़ी के लिए जगह खाली नहीं करते, इतिहास उन्हें कभी सम्मान से याद नहीं रखता। दिग्विजय सिंह के इस कदम से बाकी वरिष्ठ नेताओं को यह सीखना चाहिए कि राजनीति सिर्फ पद की नहीं, बल्कि कद की होती है और कद कभी कुर्सियों से नहीं, बल्कि सही समय पर गरिमा के साथ पीछे हटने से बड़ा होता है।
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं (टीवी 9 नेटवर्क दिल्ली)
संपर्क : 9755810517
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