क्या गुंडागर्दी ही अब नई राजनीति है?

क्या गुंडागर्दी ही अब नई राजनीति है?


पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला बेहद परेशान करने वाला है। लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं हो सकती, फिर चाहे वह किसी भी नेता या दल के खिलाफ क्यों न हो। मतभेद अपनी जगह हैं, राजनीति अपनी जगह है, लेकिन जब बात मारपीट, कपड़े फाड़ने और जानलेवा हमलों तक पहुंच जाए, तो समझ लेना चाहिए कि हमारा समाज और हमारी राजनीति बहुत गलत दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। 

किसी भी सभ्य समाज में ऐसी हरकतों को सही नहीं ठहराया जा सकता। बंगाल को हमेशा से एक बेहद खास राज्य माना गया है। यह रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की धरती है। इस मिट्टी से हमेशा ज्ञान, कला, संस्कृति और बड़े-बड़े विचारों की खुशबू आती रही है। बंगाल के लोग अपनी तेज बुद्धि और वैचारिक बहस के लिए जाने जाते हैं। लेकिन आज उसी बंगाल से जब रोज-रोज राजनीतिक हिंसा, मारपीट और बमबाजी की खबरें आती हैं, तो दिल दहल जाता है। ऐसा लगता है कि जैसे पुरानी पहचान कहीं खो गई है और उसकी जगह सिर्फ सत्ता की भूख ने ले ली है। आखिर ऐसा कैसे हो गया कि जिस धरती को देश का मार्गदर्शक होना चाहिए था, वह आज राजनीतिक रंजिश का अखाड़ा बन चुकी है? आज की राजनीति में एक अजीब सा बदलाव देखने को मिल रहा है। चुनाव आते-जाते रहते हैं, सत्ता बदलती रहती है, लेकिन आज ऐसा माहौल बन गया है कि जैसे हर कोई अपनी पुरानी निष्ठाएं बदलकर सत्ताधारी खेमे में शामिल होना चाहता है। दल-बदल और विचारधाराओं का यह खेल सिर्फ कुर्सी के लिए हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ, जब हम तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का रवैया देखते हैं, तो गंभीर सवाल उठते हैं। 

एक राजनीतिक दल का काम जनता की सेवा करना और अपनी नीतियों से उनका दिल जीतना होता है। लेकिन जब कोई दल अपने विरोधियों को डराने-धमकाने लगे, हर बात का जवाब लाठी और पत्थरों से देने लगे, तो जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह कोई राजनीतिक संगठन है या फिर भय फैलाने वाला कोई गिरोह? 


लोकतंत्र में किसी को भी कानून हाथ में लेने का हक नहीं है।इस हमले के बाद हमेशा की तरह राजनीति भी शुरू हो गई है। टीएमसी इसके लिए सीधे तौर पर भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है, वहीं विपक्ष इसे जनता का गुस्सा बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस और अन्य दलों के बड़े नेताओं ने भी इस घटना का विरोध किया है। सच तो यह है कि जब नेता और पार्टियां एक-दूसरे को सिर्फ राजनीतिक विरोधी न मानकर जानी दुश्मन समझने लगते हैं, तो ऐसी ही हिंसक तस्वीरें सामने आती हैं। नफरत की यह राजनीति हमारे देश के भविष्य के लिए एक बहुत ही खतरनाक मिसाल बन रही है। अगर आज बंगाल में इस तरह की हिंसा को सामान्य मान लिया गया, तो कल को पूरे देश में यही तरीका अपना लिया जाएगा। हमें यह समझना होगा कि लोकतंत्र की असली ताकत उसकी विविधता और शांतिपूर्ण चर्चाओं में है। लाठी-डंडों से किसी की आवाज को दबाया तो जा सकता है, लेकिन किसी का दिल नहीं जीता जा सकता। राजनीति का स्तर इतना नहीं गिरना चाहिए कि इंसानियत ही खत्म हो जाए। चाहे हमला करने वाले किसी भी दल के हों, उन पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए ताकि कानून का डर बना रहे। 
सभी दल और आम जनता मिलकर इस बात पर विचार करें कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं। राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने और सत्ता हथियाने का जरिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका असली मकसद देश और समाज का भला करना होना चाहिए। लोकतंत्र तभी बचेगा जब हम एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करना सीखेंगे और हिंसा के इस रास्ते को हमेशा के लिए छोड़ देंगे।

दिलीप कुमार पाठक 
लेखक पत्रकार हैं (टीवी9 नेटवर्क दिल्ली) 
सम्पर्क : 9755810517 

Comments

Popular posts from this blog

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया

राम - एक युगपुरुष मर्यादापुरुषोत्तम की अनंत कथा

*ग्लूमी संडे 200 लोगों को मारने वाला गीत*