रंगमंच: वह 'ऑफलाइन' दुनिया, जहाँ इमोजी नहीं, असली आँसू बहते हैं
रंगमंच: वह 'ऑफलाइन' दुनिया, जहाँ इमोजी नहीं, असली आँसू बहते हैं
(3 अप्रैल हिन्दी रंगमंच दिवस)
हिंदी रंगमंच को लेकर हमारे समाज में एक अजीब सी रूमानी किस्म की सहानुभूति है, जो अक्सर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ही खत्म हो जाती है। 3 अप्रैल का दिन हम 'हिंदी रंगमंच दिवस' के नाम पर दर्ज तो कर लेते हैं, लेकिन क्या हम उस बेचैनी को समझ पा रहे हैं जो इस कला की जड़ों में है? 1868 में जब बनारस के मंच पर 'जानकी मंगल' नाटक खड़ा हुआ था, तो वह कोई मनोरंजन का साधन भर नहीं था। वह एक भाषा का अपने वजूद के लिए किया गया ऐलान था। आज डेढ़ सौ साल बाद, हम उस ऐलान की गूँज को डिजिटल शोर के बीच खो चुके हैं। रंगमंच असल में मनुष्य के भीतर की उस आदिम भूख का नाम है, जो कैमरे की आंख से बचकर सीधे साक्षात इंसान से आंख मिलाना चाहती है। यह कला किसी रीटेक की मोहताज नहीं है और न ही यहाँ कोई एडिटिंग टेबल गलतियों को सुधारने के लिए बैठी है। सिनेमा हमें एक 'निर्मित सत्य' दिखाता है, जहाँ निर्देशक तय करता है कि आपको क्या देखना है। इसके उलट रंगमंच एक 'लोकतांत्रिक अनुभव' है। मंच पर खड़ा अभिनेता अपने पसीने, अपनी कांपती आवाज और अपनी आँखों की नमी के साथ दर्शक के सामने पूरी तरह निहत्था होता है। यही वह 'लाइव' होने का जोखिम है, जो रंगमंच को दुनिया की सबसे जांबाज कला बनाता है। आज के दौर में जब हम पिक्सेल और स्क्रीन की परतों में इतने गहरे धंस चुके हैं कि हमें बगल में बैठे इंसान की सांसों की गर्माहट महसूस होना बंद हो गई है, तब रंगमंच हमें एक सामूहिक चेतना का हिस्सा बनाता है। यह हमें 'कंज्यूमर' से वापस 'इंसान' बनाने की प्रक्रिया है। जब हॉल की लाइटें बुझती हैं और मंच पर रोशनी का एक कतरा पड़ता है, तो वहां बैठा हर दर्शक उस किरदार के दर्द का साझीदार बन जाता है।हिंदी रंगमंच का इतिहास गवाह है कि इसने कभी महलों की चाटुकारिता नहीं की। भारतेंदु से लेकर हबीब तनवीर तक, नाटकों ने हमेशा सत्ता के गलियारों में चुभते हुए सवाल भेजे हैं। 'अंधेर नगरी' का वह टके सेर वाला न्याय आज भी हमारे लोकतंत्र की सड़कों पर बदहवास घूम रहा है। 'आषाढ़ का एक दिन' की मल्लिका का वह अंतहीन इंतज़ार आज भी हर उस व्यक्ति की कहानी है जो अपनी अस्मिता और प्रेम के बीच पिस रहा है। रंगमंच हमें आईना दिखाता है, और आईना कभी सुखद नहीं होता। वह हमें हमारी झुर्रियां दिखाता है, हमारे भीतर की कुंठाएं दिखाता है और हमें मजबूर करता है कि हम खुद से रूबरू हों। यही कारण है कि सत्ताएं हमेशा रंगमंच से डरती रही हैं, क्योंकि यहाँ संवाद केवल जुबानों से नहीं, रूहों से होता है।
लेकिन आज एक बड़ा सवाल यह है कि क्या हम एक दर्शक के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं? हिंदी रंगमंच आज भी उन चंद 'पागलों' के भरोसे जिंदा है जो दिन भर की थकाऊ नौकरी के बाद शाम को रिहर्सल के लिए अंधेरे कमरों में जुटते हैं। उनके पास न तो कॉर्पोरेट की फंडिंग है और न ही चमक-धमक वाले विज्ञापनों का सहारा। उनके पास सिर्फ एक 'ज़ुनून' है जो उन्हें हर शाम फिर से मेकअप रूम में ले आता है। वे जानते हैं कि शो खत्म होने के बाद उन्हें उसी साधारण जिंदगी में लौटना है जहाँ बिल भरने की चिंता है। फिर भी, वे हर रात मंच की वेदी पर खुद को होम करते हैं ताकि संवाद की लौ बुझने न पाए। क्या हमने कभी सोचा है कि एक टिकट खरीदकर नाटक देखना किसी मंदिर में दान देने से कहीं बड़ी सांस्कृतिक सेवा है? रंगमंच हमें 'देखना' नहीं, 'महसूस करना' सिखाता है। डिजिटल दुनिया ने हमें जोड़ा तो बहुत है, लेकिन हमें अकेला कर दिया है। हम अपनी स्क्रीन पर दुनिया भर का दुख देखते हैं और एक इमोजी बनाकर आगे बढ़ जाते हैं। रंगमंच पर ऐसा नहीं होता। वहां अभिनेता के आंसू दर्शक के गालों पर महसूस किए जाते हैं। यह वह जगह है जहाँ मनुष्यता का आखिरी सिरा सुरक्षित है। अगर रंगमंच मर गया, तो समझ लीजिए कि हमारे समाज से 'सहानुभूति' और 'प्रतिरोध' की क्षमता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। संवादहीनता के इस दौर में नाटक ही वह आखिरी खिड़की है जहाँ से ताजी हवा आ सकती है।
आज इस खास दिन पर हमें यह समझना होगा कि नाटक का पर्दा केवल लकड़ी के तख्तों पर नहीं गिरता, वह हमारे भीतर के अंधकार पर भी गिरना चाहिए। हिंदी रंगमंच की ताकत उसकी भव्यता में नहीं, बल्कि उसकी सादगी और सच्चाई में है। यह उत्सव केवल इतिहास की किसी तारीख को याद करने का नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के उस 'दर्शक' को जगाने का है जो भीड़ में अपनी पहचान खो चुका है। आइए, इस 3 अप्रैल को किसी अंधेरे हॉल में बैठें और उस रोशनी का स्वागत करें जो सीधे मंच से हमारे दिलों की ओर आती है। क्योंकि जब तक दुनिया में अन्याय रहेगा और जब तक इंसान के भीतर प्रेम की आग बाकी रहेगी, तब तक रंगमंच की मशाल जलती रहेगी।
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं
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