फ़ारस: राख से उठता इंकलाब

'ईरान' जिसे हम अक्सर टीवी की चीखती खबरों और हेडलाइन्स के चश्मे से देखते हैं. पर सच ये है कि ईरान सिर्फ एक मुल्क का नक्शा नहीं है, ये तो एक हज़ारों साल पुरानी एक सभ्यता है, इस्फहान की वो नीली टाइलें हों या हाफ़िज़ की पुरानी नज़्में.. 

इस मिट्टी ने दुनिया को खूबसूरती का असली सलीका सिखाया है. 
पर आज का ईरान एक अजीब सी कशमकश में है, एक तरफ वो बेटियाँ हैं जिनकी हँसी पर पहरे लगा दिए गए, और दूसरी तरफ वो देश की संप्रभुता को बचाने की एक बेमिसाल ज़िद भी है. ये कोई धर्म की जंग नहीं है, ये तो बस 'रसूख' और ताकत का एक अंधा खेल है, जहाँ ताकतवर हुक्मरान लोगों को शतरंज की बिसात पर प्यादों की तरह बिछा देते हैं. 


मैं आज उस ईरान के साथ खड़ा हूँ जो अपना सुकून, अपनी खुशियाँ, अपनी आने वाली नस्लें... सब कुछ हार रहा है. पर एक चीज़ है जो उसने अब भी अपनी मुट्ठी में दबाकर रखी है जो है उसका 'स्वाभिमान....
फ़ारस: राख से उठता इंकलाब

गूंजती है आज भी
तख्त-ए-जमशेद के खंडहरों में
वो एक पुरानी आहट
जो याद दिलाती है
कि तख्त बनते और उजड़ते रहते हैं
पर मिट्टी की अना कभी नहीं मरती 

इस्फहान की नीली टाइलों पर
जब कच्ची धूप उतरती है
तो लगता है जैसे खुदा ने खुद
आसमान को ज़मीन पर उतार दिया हो
शीराज़ के बागों में
हाफ़िज़ और सादी की रूहें
आज भी मोहब्बत की नज़्में गुनगुनाती हैं
जहाँ हवा में फूलों की महक नहीं
तारीख की सोंधी खुशबू तैरती है
पर देखो उस 'दमवंद' की खामोशी को
वो गवाह है उस आग का
जो सीने के भीतर सुलग रही है
यह वही सरज़मीं है
जहाँ ज़ैतून के बागों की ओट में
पूरी की पूरी नस्लें खड़ी हैं
जिनकी आँखों में 'आज़ादी' का मतलब
सिर्फ एक शब्द नहीं, एक ज़िद भी नहीं है
एक स्वाभिमान है...
अब दुनिया में एक और खबर है
कि वो बूढ़ा 'लीडर' कुर्बान हो गया 
जिसके साये में
बेटियों की हँसी पर पहरे थे
उसने उनकी राहें आसान नहीं कीं
दामन में हमेशा काँटे ही बोए
मगर जब अपनी ज़मीन की साख पर आंच आई
तो वो खुद को ही कुर्बान कर गया
महज स्वाभिमान की खातिर... 
देखा जाए तो ये कोई मज़हबी जंग नहीं है
ना ही ये कोई शांति बहाली का पैगाम है 
ये तो अंधे रसूख की लड़ाई है
जहाँ ज़्यादा ताकत वाले हुक्मरानों ने
छोटे हुक्मरानों को प्यादों की तरह
शतरंज की बिसात पर बिछा दिया है 
मज़हब तो बस एक बहाना है,
पीछे तो बस ताकत का क्रूर चेहरा है
मैं उस ईरान के पक्ष में खड़ा हूँ,
जो आज सड़कों पर उतरकर लड़ रहा है,
जो अपनी पहचान बचाने की खातिर
सबकुछ हार रहा है
वो हार रहा है अपना सुकून, अपनी खुशियाँ, अपनी कल की नस्लें...
पर एक चीज़ है जिसे उसने बचा लिया है,
वो है उसका स्वाभिमान
वक्त के बेरहम कोड़ों ने
पीठ पर गहरे निशान दिए हैं,
कभी पाबंदियों की जंजीरें
तो कभी सड़कों पर फैलता धुआं
पर ईरान की फितरत है
वो अपनी ही राख से उठना जानता है
हौसला रखना ऐ फ़ारस की पाक मिट्टी,
तेरी चमक को
कोई भी सियासत कैद नहीं कर सकती
बस इतना याद रहे
जहाँ 'रुस्तम' जैसे जिगर पले हों,
वहाँ के लोग
महज़ गोश्त के पुतले नहीं होते,
वे 'फ़िरदौसी' की लिखी वो इबारत हैं
जो कभी मिटाई नहीं जा सकती....

दिलीप कुमार पाठक

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