"कंक्रीट के जंगलों में बेघर होती गौरैया: संरक्षण की गुहार"



"कंक्रीट के जंगलों में बेघर होती गौरैया: संरक्षण की गुहार"

(20 मार्च विश्व गौरैया दिवस) 

सुबह की पहली किरण के साथ जब खिड़की की मुंडेर पर 'चूं-चूं' की आवाज गूंजती थी, तो लगता था कि दिन की शुरुआत सकारात्मकता और नई ऊर्जा के साथ हुई है। वह नन्हीं सी जान, फुदकती हुई गौरैया, बरसों से हमारे भारतीय घरों का अटूट हिस्सा रही है। कभी रसोई के पुराने रोशनदान में तिनके फँसाती, तो कभी आंगन में बेखौफ घूमती यह चिड़िया हमारे परिवार की एक सदस्य जैसी थी। वह अनाज के दानों पर अपना हक जताती और बच्चों के साथ लुका-छिपी खेलती थी। लेकिन आज, वक्त के साथ वह चिर-परिचित चहचहाहट कहीं आधुनिकता के शोर में खो गई है। गौरैया अब हमारे आंगन की जीवंत सदस्य नहीं, बल्कि केवल यादों और कहानियों का हिस्सा बनती जा रही है। हर साल 20 मार्च को पूरी दुनिया 'विश्व गौरैया दिवस' मनाकर औपचारिकता तो पूरी करती है, लेकिन क्या हम वाकई इस नन्हीं चिड़िया के वजूद को बचाने के लिए गंभीर हैं?

आज के दौर में हमने विकास की अंधी दौड़ में 'कंक्रीट के ऊँचे जंगल' तो खड़े कर लिए, मगर उन मासूम परिंदों के लिए बने-बनाये कुदरती आशियाने बेरहमी से छीन लिए हैं। पुराने वक्त के घरों में मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छतें और लकड़ी के झरोखे होते थे, जहाँ यह छोटी सी गौरैया बड़ी आसानी से अपना सुरक्षित घोंसला बना लिया करती थी। आज के आधुनिक फ्लैट्स, बंद शीशों वाली इमारतों और मॉल की चकाचौंध में इनके लिए कोई जगह नहीं बची है। न तो वहां बैठने के लिए कोई कोना बचा है और न ही तिनका फँसाने की कोई गुंजाइश। हमने अपनी भौतिक सुख-सुविधा के लिए प्रकृति के उन नन्हे इंजीनियरों को बेघर कर दिया, जो सदियों से हमारे पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में मदद करते थे। गौरैया का गायब होना केवल एक पक्षी का जाना नहीं, बल्कि हमारी सहज जीवन संस्कृति का अंत है। सिर्फ रहने की जगह ही नहीं, गौरैया के सामने अब पेट भरने का भी बड़ा संकट खड़ा हो गया है। पहले के समय में घर की महिलाएं आंगन में बैठकर अनाज साफ किया करती थीं, जिससे गिरने वाले छोटे दानों से गौरैया का परिवार अपना पेट आसानी से भर लेता था। अब डिब्बाबंद अनाज और सुपरमार्केट की पॉलिथीन संस्कृति ने उसे दाने-दाने के लिए मोहताज कर दिया है। खेती में मुनाफे के लिए इस्तेमाल होने वाले जहरीले कीटनाशकों ने भी इस पर बड़ा कहर ढाया है। इन रसायनों ने उन छोटे कीटों को खत्म कर दिया है, जो गौरैया के चूजों का मुख्य आहार होते थे। जब नन्हे बच्चों को प्रोटीन युक्त भोजन नहीं मिलता, तो उनकी नस्ल आगे नहीं बढ़ पाती। इसके साथ ही, मोबाइल टावरों से निकलने वाली अदृश्य तरंगों और बढ़ते ध्वनि प्रदूषण ने भी इनकी संख्या को भारी चोट पहुँचाई है।

गौरैया का कम होना हमारे पर्यावरण के 'बीमार' होने का सबसे बड़ा प्राथमिक संकेत है। यह पक्षी पर्यावरण का सूचक है; अगर यह नहीं बची, तो समझ लीजिए कि हमारा वातावरण अब सांस लेने लायक भी नहीं रहा है। यह गौरैया ही थी जो फसलों के हानिकारक कीटों को खाकर किसानों की प्राकृतिक मित्र बनी रहती थी। हमने अपने बच्चों को रोबोटिक खिलौने तो दे दिए, पर उन्हें जीव-जंतुओं से प्रेम करना नहीं सिखाया। गौरैया से हमारा रिश्ता केवल जैविक नहीं, बल्कि भावनात्मक और रूहानी रहा है। कई लोकगीतों और दादी-नानी की कहानियों में गौरैया को घर की बेटी का दर्जा दिया गया है। हमने बचपन में देखा है कि हमारी दादी, माँ गौरैया के लिए स्पेशल तौर पर पकवान बनाकर रख देती थीं, पूरे दिन गौरैया खुद एवं अपने बच्चों, मित्र टोली को लेकर आँगन में फुदकती रहतीं, गौरैया हमारी माँ - दादी की दोस्त होती थी, उस सादगी भरे रिश्ते को हमने आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया है, जो बेहद चिंताजनक है।

अच्छी बात यह है कि सुधार की उम्मीद अभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। गौरैया को वापस अपने घरों में बुलाना कोई बहुत मुश्किल या खर्चीला काम नहीं है, बस थोड़ी सी संवेदनशीलता की जरूरत है। हम अपनी बालकनी या छतों पर लकड़ी के छोटे कृत्रिम घोंसले लटका सकते हैं, जो उन्हें कंक्रीट के बीच सुरक्षित आशियाना देंगे। मिट्टी के सकोरों में साफ पानी और थोड़ा सा अनाज रखना उनकी जान बचा सकता है। कोशिश करें कि घरों के आसपास देसी और झाड़ीनुमा पेड़ लगाएं, जहाँ वे छिप सकें। यह प्रयास केवल सरकारों के भरोसे नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन बनना चाहिए। इस 20 मार्च को आइए संकल्प लें कि हम अपने बेजान घरों में प्रकृति की इस चहक के लिए फिर से जगह बनाएंगे। याद रखिए, जिस घर के आंगन में चिड़िया नहीं चहकती, उस घर की रौनक हमेशा अधूरी ही रहती है।


दिलीप कुमार पाठक 
लेखक पत्रकार है 






Comments

Popular posts from this blog

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया

राम - एक युगपुरुष मर्यादापुरुषोत्तम की अनंत कथा

*ग्लूमी संडे 200 लोगों को मारने वाला गीत*