मोस्ट लविंग पर्सन इन दी यूनिवर्स"
"मोस्ट लविंग पर्सन इन दी यूनिवर्स"
किसी भी फिल्म एवं अभिनेता के सफल होने के लिए अच्छी कहानी, उम्दा संगीत एवं निर्देशक की दूरदर्शी सोच का होना जरूरी होता है. अपने शुरुआती दौर से ही शाहरुख कहानियों का चयन बहुत सोच-समझकर करते थे. शाहरुख फ़िल्म की कहानी समझते, देखते थे, इस फिल्म की कहानी से दर्शक जुड़ पाएंगे क्या? डीडीएलजे, वीर - जारा दोनों फ़िल्मों का चयन शाहरुख की सिनेमाई समझ को दर्शाता है. इसमे शाहरुख ऐक्टिंग को यथार्थवाद से जोड़ने में सफल दिखते हैं. डीडीएलजे, वीर - जारा की कहानी एक उदेश्य के तहत लिखी गईं. डीडीएलजे का राज लंदन में पला-बढ़ा जो बहुत आधुनिक था. अपनी प्रेमिका के कहने पर भी सिमरन को भगाने के लिए तैयार नहीं था. वह उसके पिता की आज्ञा चाहता है. लंदन में पला बढ़ा राज भारतीय संस्कृति को बचाने की बात कर रहा था, हालांकि उससे हो नहीं पा रहा था, फिर भी वो गिरते - पड़ते सभी का दिल जीत गया.. यही कारण रहा शाहरुख खान को सिने प्रेमियों ने पलकों पर बिठा लिया था. लोग जानना चाहते हैं कि डीडीएलजेे की आपार सफ़लता का राज क्या है, आम तौर पर फ़िल्मों में हीरो मार - धाड़ करके नायिका को प्राप्त कर लेता है, लेकिन शाहरुख ने एक अलग अंदाज पेश किया. हालाँकि यह करिश्मा तो लेखकों का था, लेकिन कहानी के चयन में शाहरुख की समझ रही होगी. जिसे उन्होंने अपने अभिनय से यादगार बना दिया.
वीर - जारा का कैप्टेन वीर प्रताप 27 साल पाकिस्तानी जेल में रहते हुए भी अपना मुँह नहीं खोलता, क्योंकि उसकी प्रेमिका बदनाम हो जाएगी. कैप्टन वीर प्रताप वहाँ की जेल तोड़कर भी नहीं भागता, क्योंकि वो अतिशयोक्ति होती. शाहरुख खान यहीं अपने समकालीन अभिनेताओं से बहुत आगे निकल चुके थे.
क्योंकि शाहरुख ने अभिनय को रियल बनाने की कोशिश की... हमेशा एक रोल को सहज बनाने की कला में प्रवीण होते गए जबकि उनके समकालीन अभिनेता सहज भाव से कोसों दूर हो गए थे. वीर - जारा में शाहरुख का कालजयी अभिनय देखा जा सकता है, फिल्म में किरण खेर शाहरुख जो पाकिस्तान की नायिका के माँ की भूमिका में होती हैं वो पूछती है कि - 'वीर क्या हिन्दुस्तान में हर बेटा तुम्हारे जैसा ही है, तब शाहरुख जवाब देते हैं, और कहते हैं' 'मुझे नहीं पता कि हर बेटा ऐसा है, लेकिन हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया में हर माँ तुम्हारे जैसे ही है. फ़िर जो किरन खेर की आँखों से निर्झर प्रवाह बहता है उसके साथ ही क्या भारत क्या पाक दोनों तरफ के सिने प्रेमी फिल्म एवं शाहरुख के साथ जुड़ते चले गए.
हालाँकि फिल्म कईयों को स्लो लग सकती है, लेकिन फिल्म के अंत में कैप्टन वीर प्रताप (शाहरुख खान) द्वारा पढ़ी गई नज्म मैं कैदी न. 786 जेल की दीवारो से बाहर देखता हूं" फिल्म का सन्दर्भ स्पष्ट कर देती है.
कई बार "स्वदेश "जैसी कल्ट फ़िल्में भारतीय दर्शकों को ज्यादा समझ नहीं आती, बाद में फिल्म को वो मुक़ाम ज़रूर मिलता है, जो मिलना चाहिए. गुरुदत्त साहब की प्यासा, राजकपूर की मेरा नाम जोकर, तीसरी कसम, देव साहब की गाइड, फौरन लोगों को समझ नहीं आईं थीं, यही हस्र शाहरुख की फिल्म 'स्वदेश' के साथ हुआ. आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो स्वदेश को महानतम फिल्म का दर्ज़ा दिया जाता है. फ्लॉप फ़िल्म स्वदेश में यादगार अभिनय के लिए भी शाहरुख को फिल्मफेयर का खिताब मिला है. फिल्म की सफ़लता बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से तात्कालिकता में देखी जाती है.
हालांकि बाद में देखा जाता है, कि उस फिल्म का समाज पर क्या असर रहा. अभिनय की बारीकियों से देखा जाए तो शाहरुख के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म स्वदेश है.
नब्बे के दशक से हिन्दी सिनेमा को दुनिया भर में शोहरत एवं उसकी ख्याति बढ़ाने का सबसे ज्यादा श्रेय शाहरुख खान को ही जाता है. हिन्दी सिनेमा में कोई ग्लोबल सुपरस्टार है तो वो शाहरुख हैं, भारतीय एवं वैश्विक सिनेमा में आज भारतीय सिनेमा के अघोषित रूप से ब्रांड एंबेसडर शाहरुख ही हैं. अमिताभ बच्चन की जो जगह खाली हुई थी, उसको भरना आसान नहीं था. गैर फिल्मी बैकग्राउंड से आए शाहरुख ने अमिताभ बच्चन की जगह को भरने की सफल कोशिश की, लेकिन अभी शाहरुख को अपनी दूसरी पारी से यह सिद्ध करना होगा. हिन्दी सिनेमा में पहली पीढ़ी देवानंद साहब, दिलीप कुमार, राज कपूर की त्रिमूर्ति ने घुटनों के बल चल रहे, भारतीय सिनेमा को चलना - दौड़ना तो सिखाया ही, लेकिन वैश्विक स्तर पर पहिचान दिलाया. उसके बाद राजेन्द्र कुमार, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, शम्मी कपूर, ने खूब संभाला, कालांतर में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, आदि ने खूब सम्भाला, अब शाहरुख को दूसरी पारी से सिद्ध करना है, कि वो क्यों हिन्दी सिनेमा के किंग क्यों कहे जाते हैं.
शाहरुख इसलिए भी सबसे अलग दिखते हैं. सामजिक जीवन में या आम जीवन में अभिनेता नेता, आदि का चरित्र, इस तरह से ज़रूर देखा जाता है, कि इसका रवैय्या महिलाओ के प्रति कैसा है. हिन्दी सिनेमा में शाहरुख खान के महिलाओं के साथ मित्रवत संबन्ध एवं सुरक्षात्मक रवैय्या आदरणीय है. किसी भी अभिनेत्री को एवं कहीं मैंने देखा-सुना, पढ़ा नहीं है, कि कोई भी अभिनेत्री या कोई महिला उनके बारे में नकारात्मक भाव रखती है. आपकी सबसे बड़ी ताकत यह भी होती है. महिलाएं आपके लिए खड़ी होती हैं मुसीबत में यह आपके व्यक्तित्व को दर्शाता है. शाहरुख से हर व्यक्ति सीख सकता है. आप कितने भी बड़े हो जाओ महिलाओं के सामने नज़र ज़रा झुकी होनी चाहिए. सच्चे पुरुषार्थ की निशानी है. मार-धाड फ़िल्में न करने के बाद भी शाहरुख को बादशाह कहा जाता है, शाहरुख की विनम्रता, उनको बादशाह बनाती है.
चालीस के दशक से सत्तर का दशक भारतीय सिनेमा का गोल्डन एरा माना जाता है, चालीस के दशक से सत्तर के दशक तक एक - एक फिल्म अभिनय की बारीकियों को सीख रहे लोगों के लिए पूरा का पूरा सिलेबस हैं. सत्तर से अस्सी के दशक के अंत तक हिन्दी सिनेमा संघर्ष कर रहा था. शुरुआती नब्बे के दशक में एक दुबला - पतला लड़का हिन्दी सिनेमा के लिए उम्मीद बनकर आता है, जो अमिताभ बच्चन की तरह लम्बा नहीं था, जिसकी आवाज़ बुलन्द नहीं थी.. जो न सहज अभिनय की परिभाषा जानता था, औसतन शरीर का दुबला लड़का सन 1992 में राज कंवर निर्देशित फिल्म दीवाना में द नज़र आते हैं. दिग्गज ऋषि कपूर के सह अभिनेता के रूप में फिल्म का एंटरवल हो जाता है, फिर शाहरुख एक रईस बिगड़े बाप की औलाद के रूप में अपने जीवन में पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर आते हैं, लेकिन बाद में पता लगता है कि शाहरुख बहुत ही संवेदनशील युवा की भूमिका में होते हैं. शाहरुख ने पहली ही फिल्म में अपनी अभिनय क्षमता का नायाब नमूना पेश किया. दीवाना फिल्म का संगीत सुपरहिट रहा.दिग्गज ऋषि कपूर के सामने शाहरुख खुद को बेहतरीन प्रस्तुत करते हैं, पहला सर्वश्रेष्ठ फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला. यूँ तो दुबले-पतले शाहरुख ने ऋषि कपूर के साथ सह - अभिनेता का किरदार निभाया था. ऋषि कपूर ने कभी नहीं सोचा होगा कि यह लड़का मुझे फिल्म में दरकिनार कर देगा, एवं पूरी तालियां समेट कर ले जाएगा. ऋषि कपूर के हाथों से बेस्ट एक्टर फिल्म फेयर अवार्ड भी खुद के नाम कर लेगा. हालाँकि यह सब इतना आसान नहीं था शाहरुख के संघर्ष, मेहनत की पराकाष्ठा थी.
शाहरुख खान अपनी रोमांटिक हीरो वाली भूमिकाओं के कारण ही टॉप पर पहुंचे. डीडीएलजे फ़िल्म में शाहरुख काजोल के साथ हिट रहे. डीडीएलजे हिन्दी सिनेमा की महानतम फ़िल्मों में गिनी जाती है. इस फ़िल्म ने मुंबई के मराठा मंदिर में लगातार 25 वर्षों तक चलते रहने का अनूठा कीर्तिमान कायम किया. इसने शोले के अनूठे रिकॉर्ड को तोड़ा था. शोले फिल्म लगातार छह वर्षो तक चली थी. Kovid-19 के आने के बाद डीडीएलजे के निरंतर चलने का सफ़र रुक गया, अन्यथा चल ही रहा था. काजोल एवं शाहरुख हिन्दी सिनेमा की सुपरहिट जोड़ियों में कायम हुए. दिल तो पागल है, देवदास , ओम शांति ओम, रब ने बना दी जोड़ी, और कभी खुशी कभी ग़म, कुछ कुछ होता है, कल हो ना हो, वीर ज़ारा , कभी खुशी कभी गम और मुहब्बतें ऐसी सुपरहिट फिल्में थी, जिनमें रोमांटिक हीरो की भूमिका में शाहरुख ने लोगों के दिलों में अपनी जगह बना ली. खासकर लड़कियां उनपर उसी तरह जान.छिड़कने लगीं जैसा किसी जमाने में देवानंद साहब एवं राजेश खन्ना पर छिड़कती थीं.
सुनील दत्त, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा के बाद शाहरुख विलेन की भूमिकाएं भी खूब करते रहे, विलेन होते हुए भी लोगों की पहली पसंद बने रहे. जैसा पहले ही बताया कि शाहरुख ने कहानी के चयन में हमेशा ध्यान रखा है, शाहरुख जब विलेन बनते थे, तो उसके पीछे वाज़िब कारण होते थे.
यश चोपड़ा निर्देशित डर अभिनय के लिहाज से शाहरुख को उच्चतम मानकों पर खड़ा करती है. डर फिल्म में शाहरुख खान ने ऐसी तालियां बटोरी की उस वक़्त के सुपरहिट सनी देओल भी दरकिनार हो गए थे. ऋषि कपूर, सनी देओल को दीवाना, डर, फिल्म में दरकिनार करने के बाद शाहरुख स्थापित हुए थे, इस परिस्थिति में निदा फाजली का शेर सटीक बैठता है....
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो,
अंजाम, बाजीगर फिल्म में शाहरुख ने जैसा रोल किया था, लोग उनसे नफ़रत करने लग जाते, लेकिन तब तक आम भारतीय दर्शकों में समझ आ चुकी थी, कि पर्दे पर जिया जाने वाला रोल आभासी होता है, बल्कि हक़ीक़त नहीं. अंजाम फिल्म में माधुरी से एकतरफ़ा जुनून की हद तक प्यार करना, डर में जुनून की हद तक पागलपन ने शाहरुख को आम भारतीय दर्शकों को रोमांचित कर दिया. इतने नकारात्मक रोल करने से भारतीय दर्शक शाहरुख से घृणा कर सकते थे, लेकिन तब तक भारतीय दर्शकों में इतनी चेतना आ गई थी, कि फ़िल्में आभासी होती हैं, जबकि अभिनेताओं की वास्तविक दुनिया अलग होती है, जानने के बाद दर्शकों ने शाहरुख को पलकों पर बिठा लिया.
देवदास फिल्म का अपना इतिहास यूँ तो शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास से शुरू होता है, उसको सिल्वर स्क्रीन पर मेथड एक्टर ग्रेट दिलीप साहब ने ऐसी कोई गुंजाईश नहीं छोड़ा था, कि देवदास को सिल्वर स्क्रीन पर फिर से जिया जाए, किसके इतनी कुव्वत थी, कि वो दिलीप साहब से अच्छी या उनके समकक्ष अभिनय कर सके. शाहरुख खान खुद कहते हैं, कि मैं क्या कोई ऐसा नहीं है, जो महान दिलीप साहब के जूतों में पैर डाल सके, शाहरुख देवदास पर काम करना अपने जीवन की सबसे बड़ी गुस्ताख़ी मानते हैं, कि मैंने दिलीप साहब की शान में गुस्ताख़ी की, हालांकि शाहरुख खान की इतनी विनम्रता से कम कुछ अच्छा भी नहीं लगता, इतना बोलना उन्हें छोटा नहीं बल्कि बड़ा बनाता है. दिलीप साहब के सामने शर्माते हुए शाहरुख ऐसे ही बोला करते थे. दोनों फ़िल्मों को तुलनात्मक रूप से देखेंगे तो खुद समझ आता है कि शाहरुख खान दिलीप साहब के जैसे तो कुछ नहीं कर सके, जो दिलीप साहब कर सकते थे, वो कोई नहीं कर सकता था, लेकिन शाहरुख ने जो किया वो आज के दौर में दूसरों के लिए करना मुश्किल है. दिलीप साहब कहते थे, कि हिन्दी सिनेमा में शाहरुख तुम भी तुम ही हो, तुम्हारे जैसा कोई नहीं हो सकता, दिलीप साहब के द्वारा बोले गए शब्द शाहरुख के लिए ऑस्कर से कहीं ज्यादा है. दिलीप साहब कहते थे. मेरा कोई बेटा होता तो शाहरुख के जैसा होता. शाहरुख की विनम्रता है जो ऐसे कह रहा है अन्यथा उसने देवदास में बहुत ही कमाल अभिनय किया है.
नब्बे के दशक से शाहरुख खान के सितारे बुलंदियों तक पहुंचे जो सन 2012 तक रहे, शाहरुख ने रोमांचित कर देने वाला सुपर स्टारडम देखा. नब्बे के दशक से इक्कीसवी सदी के पहले दशक तक शाहरुख के अलावा कोई दिखती भी नहीं है. शाहरुख की बेशुमार सफलता की कुंजी उनकी फ़िल्मों की कहानियां रहीं, जिनका वो चुनाव करते थे, आज फिर से शाहरुख को वीर - जारा जैसी कहानियों की दरकार है, जो आम दर्शकों को खुद के साथ जोड़ सकें, एक दौर के बाद ऐक्टर को कुछ नया लाने की आवश्यकता होती है, लेकिन उम्र के दायरे में रहकर वैसे शाहरुख को अब कैरेक्टर रोल फ़िल्में करना चाहिए, डियर ज़िन्दगी में उनकी भूमिका कैरेक्टर रोल के लिए बानगी है, कि दूसरी पारी देर सवेरे ही सही, अपनी दूसरी पारी शुरू करेंगे. जवान, पठान जैसी व्यापारिक फ़िल्मों से मुझे कोई रुचि नहीं है, शाहरुख को अब दमदार रोल चुनने चाहिए. शाहरुख आज भी उतने ही प्रतिभाशाली हैं, तब से भी ज्यादा मेहनती, लेकिन कहानियों के चयन में शाहरुख फिट नहीं हो रहे हैं हालांकि किसी में इतनी जरूरत नहीं कि कोई शाहरुख को बताए कि उनको क्या करना चाहिए, क्योंकि कोई आलोचना से परे नहीं है. मुझे लगता है कि शाहरुख जल्द ही कैरेक्टर रोल वाली फ़िल्में करते दिखेंगे, और फिर से बताएंगे की लोग उनको क्यों इतना पसंद करते हैं. लेकिन मुझे शाहरुख की ऐक्टिंग, रोमांस, खुलापन, सादगी, बहुत पसंद है, हालांकि शाहरुख खान का संघर्ष भी प्रेरणा है.......
दिलीप कुमार पाठक
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