सायबर क्राइम

*किसका करें यक़ीन? जब अपने ही बन जाएं सायबर अपराधी*


एक दिन मेरी दोस्त अनुप्रिया को उनके प्रिय मित्र अरुण ने फोन करके बताया - 'अनुप्रिया एक बात बताने जा रहा हूं ध्यान से सुनना. तुम्हारा एक दोस्त है न' सोमेश' नागपुर वाला उसने तुम्हारे नाम से किसी जापानी कम्पनी से तुम्हारे नाम से लोन ले लिया है, और गारंटी के तौर पर तुम्हारी तस्वीर और तुम्हारा नंबर दे दिया है. अच्छा एक बात सुनो उसे मेरा नंबर कहाँ से मिला? क्योंकि उसने तुम्हारा और मेरा नंबर दे दिया है. अब चूंकि तुम्हारा नंबर नहीं लगा तो उन्होंने मुझे कॉल किया था और मुझसे पूछा कि क्या आप अनुप्रिया के दोस्त हैं? मैंने कहा हाँ.... अब उन्होंने कहा है कि 'सोमेश' ने आपकी गारंटी से लोन लिया है तो आपको चुकाना पड़ेगा. और उन्होंने दो लाख रुपए 24 घण्टे के अंदर माँगा है. अन्यथा वे तुम्हारी तस्वीरों का नाजायज इस्तेमाल करेंगे... और हाँ तुम प्लीज परेशान मत होना किसी से घर पर बताना मत. तुम अभी पैसे मत भेजो मैं कुछ जुगाड़ करके पैसे चुका देता हूं, फिर तुम मेरे वापस कर देना. अभी तो मेरे पास हैं तो नहीं लेकिन मैं कुछ करता हूँ, तुम चिंता मत करो. सुनकर मेरी दोस्त अनुप्रिया के पैरों तले से जमीन खिसक गई. भय के कारण कुछ बोल नहीं पाई... पहले तो जल्दी से कॉल कट कर दिया... ज़मीन खिसकना लाज़िमी था, चूंकि वो सबसे अच्छा दोस्त था जो हमेशा दुःख /सुख में साथ खड़ा रहा.


रोते हुए डर से एकदम कांपती हुई आवाज़ में अनुप्रिया ने यह वृतांत मुझे सुनाया. मैं हैरत में पड़ गया कि विदेश की कोई कम्पनी भला भारत में बैठे किसी व्यक्ति को लोन कैसे दे सकती है? ग़र लोन भी दे दिया तो किसी अन्य व्यक्ति की रजामंदी के पैसे कैसे भेज सकती है? और फिर ऐसा कोई व्यक्ति जब फ्रॉड का काम करेगा तो दोस्त के दोस्त का नंबर क्यों देगा? मैंने इतने सवाल करते हुए कहा... और आख़िरी बात मैंने अपनी दोस्त अनुप्रिया से पूछा - 'आप खुद ही बताओ क्या यह मुमकिन है? ग़र कोई कम्पनी लोन देगी भी तो क्या ऐसी धमकी दे सकती है कि आपकी तस्वीरों का नाजायज इस्तेमाल करेगे! और कोई 24 घण्टे की मोहलत थोड़ा ही देता है ये तो डायरेक्ट वसूली हुई. और आपके दोस्त ने ये क्यों कहा कि किसी को बताना मत ! इतनी बड़ी घटना क्या आप अपनों से साझा नहीं करेंगीं? क्या आप पैसे चुका देंगीं? मैंने पूछा... 

सबूत के तौर पर उस अरुण ने स्क्रीन शॉट भेजा था.. वाकई वो नंबर कोई जापानी था. वो सबकुछ उन स्क्रीन शॉट में था... जो उसने बताया था.. ये भी अचम्भित करने वाला था. 

मेरे पास तो अभी 2 लाख रुपए हैं भी नहीं कैसे चुका पाऊँगी, और मैं कहीं से जुगाड़ करूँ. भला मुझे कौन देगा इतने सारे रुपए'. अनुप्रिया मे कहा....

मेरा विश्वास करती हैं आप और आपने यह बात मुझसे शेयर की तो मैं आपसे एक बात बोलूँ?  

उन्होंने कहा हाँ बोलो मैंने कहा सबसे पहले उस दोस्त अरुण को ब्लॉक कर दीजिए बिना कुछ बोले' इतना पुराना घनिष्ठ मित्र था तो ब्लॉक करने में तकलीफ़ तो हुई होगी, मैं समझ सकता था. फिर मैंने कहा कि आपके घर का एड्रेस उसको पता है क्या? बोलीं हाँ पता तो है, मैंने कहा -'आपको डर तो लग रहा होगा लेकिन डरके काम चलेगा नहीं.. ये एक सायबर ठगी का मामला है, कितना बड़ा है यह जांच का विषय है. आप भूल जाओ सबकुछ.... मैं देखता हूं जल्द ही बताता हूं. 

मैंने अपने एक एक्सपर्ट दोस्त से बात की सबकुछ साझा किया तो पाया कि यह अपनी दोस्त के भोलेपन का फायदा उठाने का कुचक्र था. कई बार लोग अपने दोस्तों पर शक नहीं कर पाते. 

मैंने जल्द ही अनुप्रिया से उस शख्स अरुण का नंबर लिया और कॉल किया.... भाई मैं फलाने बात कर रहा हूं... अनुप्रिया जी की तबियत बहुत ज़्यादा बिगड़ गई है वो अभी हस्पताल में हैं मैं अभी देखकर आ रहा हूं, उन्होंने आपको ब्लॉक कर दिया है लेकिन वो आपके लिए चिंचित हैं. तब ही उन्होंने मुझे आपका नंबर दिया है, और कहा है कि मेरे दोस्त को समझाओ कि मैं उसके साथ हूँ. मेरे घर वालों को पता न चल जाए इसलिए ही मैंने ब्लॉक किया है. मैं जल्दी बात करूंगी नॉर्मल हो जाने के बाद.. और पैसे भी चुका दूंगी... वो आदमी बोला भाई आप लोग अनुप्रिया जी का ख्याल रखना... मैंने पैसे चुका दिया है. अब कोई मसला नहीं है. 

मैंने कहा भाई आपका बहुत - बहुत धन्यवाद आपने ये मामला इतनी बुद्धिमानी से सुलझाया. मैं अंदर ही अंदर गालियाँ दे रहा था कि कितना गिरा हुआ इंसान है मेरी दोस्त ने इसे क्या समझा था ये क्या निकला....मैंने आश्वासन दिया और अपनी बात को विराम दे दिया. दो दिन बाद मैंने फ़िर कॉल किया... हालचाल जानने के लिए कि कहीं कोई मंसूबा तो नहीं पाल बैठा... हालांकि बेहद नॉर्मल था... बहुत दिनों तक मैंने उससे कई बार बात किया कि कहीं मंसूबे तो नहीं बना रहा.. हालचाल लेता रहा.. जिस दोस्त के साथ इतनी घनिष्ठा थी, अचानक से ब्लॉक कर देने पर हो सकता है, अब गुस्सा हो गया हो खुद को अपमानित महसूस कर रहा हो. 

कुछ दिनों तक तो उसने हौसला रखा फिर वो समझ गया होगा कि जानबूझकर मुझे ब्लॉक कर दिया गया है... फ़िर उसने एक दिन मुझे कॉल किया और बोला - अनुप्रिया ने मुझ पर विश्वास नहीं किया जबकि उसके कारण मेरे 2 लाख रुपए चले गए मैंने उसकी हिफाजत के लिए पैसे कर्ज़ लेकर चुकाए, ऐसा नहीं है कि मैं अनुप्रिया तक पहुंच नहीं सकता मुझे उसके घर का एड्रेस भी पता है मैं चाह लूँ तो उससे पैसे आज ले लूँ, और मैं उसे छोड़ूँगा नहीं.... वो निहायत ही धोखेबाज है मुझे मंझधार में छोड़कर चली गई. मैं पूरे पैसे तो ले ही लूँगा, लेकिन उसे बहुत रोना पड़ेगा. 


तुम एक गिरे हुए इंसान हो अपनी सीधी सी महिला दोस्त को ठगना चाहा, और कल तक तुम्हें उसकी फिक्र थी, आज तुम्हें उसकी फिक्र तो छोड़ो उसके प्रति तुम्हारे अंदर एक नफ़रत एक द्वेष है.... तुम कुछ नहीं कर सकते उन्होंने शहर ही छोड़ दिया है. दूसरी बात तुम मेरी पहुंच से दूर नहीं हो अपने बचने का इन्तजाम करो..... ये तुम्हारा आख़िरी दांव था. इतने में ही उसने कॉल काट दिया.. चार साल हो गए, न तस्वीरों का कोई बेजा इस्तेमाल हुआ और न कोई कॉल आया... क्योंकि मैंने अनुप्रिया की सिम चेंज करा दिया था.. और उन्होंने घर तो बदल ही दिया था... इस कारण नहीं उन्हें घर बदलना ही था. 

हाँ अनुप्रिया के अंदर एक कसक है, एक दर्द तो है कि मेरे सबसे अच्छे दोस्त न चंद पैसे के लिए मेरे साथ फ्रॉड करने की कोशिश की... लेकिन मेरे गुरूर को मिट्टी में मिला दिया. लेकिन सच तो ये है कि ज़िंदगी में आगे बढ़ना ही पड़ता है. 

आज सायबर क्राइम खूब बढ़ गया है, कितने ही पढ़े - लिखे लोग इसके सबसे ज़्यादा शिकार हो रहे हैं. हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्ट फोन उससे जुड़े सारे के सारे डाक्यूमेंट्स ने आदमी को सायबर लूटपाट के अड्डों में खड़ा कर दिया. आपसे थोड़ी सी चूक हुई, कि लुट गए.... हमारे देश में समाज में आसपास ऐसी लूटपाट, अपराध की कहानियां बिखरी पड़ी हैं.. जब इतने अच्छे दोस्त ऐसे मंसूबे बना सकते हैं तो फिर किसका विश्वास किया जाए... हमारे देश में सायबर क्राइम से बचा कैसे जाए अभी उस तरह की जागरुकता नहीं है, जिसकी दरकार है. 

दिलीप कुमार पाठक 







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