संजीव कुमार: अभिनय की रूह, जो दिलों पर राज करती है
संजीव कुमार: अभिनय की रूह, जो दिलों पर राज करती है
महान अभिनेता संजीव कुमार जी आज भी अपनी अदाकारी के ज़रिए जिंदा हैं, और हिन्दी सिनेमा में आज भी टॉप पर हैं.
अपनी विविधतापूर्ण अदाकारी के कारण आज भी अद्वितीय कहे जाते हैं . आज भी उनके आसपास कोई दूसरा नहीं है आज भी जब अदाकारी भाव - भंगिमाओं की बात आती है तो आज भी सभी का नाम संजीव कुमार के बाद ही शुरू होता है . मुझे लगता है, कि अभिनय के लिहाज से संजीव कुमार जैसा प्रतिभाशाली अभिनेता वैश्विक सिनेमा में कोई दूसरा नहीं है. अभी भी समय है, सिनेमा की दुनिया के रहबरों को घोषित कर देना चाहिए, कि अभिनय का कोई भगवान है तो संजीव कुमार जी हैं. अत्यंत महत्वपूर्ण बात उपरवाले को किसी रंगमंच के हरफनमौला अदाकार की ज़रूरत रही होगी, इसलिए उन्होंने महान संजीव कुमार जी को असामयिक बुला लिया. बात संजीव कुमार जी की चली है तो हमें पीछे चलना होगा जानना होगा कि संजीव कुमार ने अपनी अदाकारी की शुरुआत कैसे की... यूं तो संजीव कुमार बहुमुखी प्रतिभा के धनी अदाकार थे. जवानी में भी बुजुर्ग की भूमिका बड़ी सहजता से अदा कर दिया करते थे. अपनी उम्र से बड़े अभिनेताओं के पिता की भूमिकाओं में भी जान डाल देते थे. पहले थिएटर में अभिनय की बारीकियां सीखीं बाद में हिन्दी सिनेमा में पदार्पण किया.
संजीव कुमार शुरुआत में एक दो फ़िल्मों में उतने प्रभावी नहीं रहे. बाद में 1968 में आई फिल्म 'शिकार' से अपना सिक्का जमाया. संजीव कुमार इसके बाद रुके ही नहीं फ़िल्मों में एवं ज़िन्दगी में अनवरत दौड़ते रहे. संजीव कुमार जीते जी ही संतृप्त अवस्था को प्राप्त कर चुके थे. यह मुकाम बहुत कम ही कलाकारों को मिला होगा. बाद में हम हिंदुस्तानी, आओ प्यार करें, निशान, अली बाबा चालीस चोर, स्मगलर, राजा और रंक,पति-पत्नी, बादल, नौनिहाल आदि फ़िल्मों में दमदार अभिनय से खुद को स्थापित किया. फिर हरिभाई जेठालाल जरीवाला से संजीव कुमार बन गए, लेकिन हिन्दी सिनेमा के हरिहर भाई ही थे. जब संजीव कुमार महान अदाकार बन गए थे, तब भी पूरा हिन्दी सिनेमा उन्हें हरि भाई कहकर ही संबोधित करता था.
हरिहर भाई का संजीव कुमार बनना केवल संजीव कुमार बनना नहीं था. संजीव कुमार बनना मतलब अभिनय की नई इबारत लिखना था, जिसे नई नस्लें आकर पढ़ेगी. संजीव कुमार बनना बहुत ही तकलीफदेह है. यूँ ही कोई संजीव कुमार नहीं बन जाता. यूँ तो संजीव कुमार को बचपन से ही अभिनय करने का जुनून था. स्कूल में ड्रामा करते, नाटकों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे, और सभी से अव्वल आते थे. स्कूल टीचर भी संजीव को खूब उत्साहित करते थे. संजीव कुमार अपनी अदाकारी के कारण अपनी सक्रियता के कारण पूरे स्कूल के प्रिय बन चुके थे. तब एक दिन ड्रामा के लिए संजीव कुमार की माँ शांता बेन को संजीव का ड्रामा देखने के लिए बुलाया गया. उनकी माँ ने अपने बेटे संजीव की अदाकारी देखी तो वो बहुत ही खुश हुईं लेकिन उनकी खुशी मिली जुली थी क्योंकि उन्हें अपने बेटे के भविष्य की चिंता भी हुई थी.. संजीव की माँ ने स्कूल के अध्यापकों को कहा- "आप मेरे बेटे को भड़का रहे हैं, उसे पढ़ने की बजाय अदाकारी के लिए प्रेरित कर रहे हैं, मेरा बेटा कोई पृथ्वीराज कपूर का बेटा नहीं है, मुझ विधवा का बेटा है, कौन इसको काम देगा मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा अदाकारी की दीवानगी के कारण रोजी रोटी के लिए तरसे इसलिए उसे पढ़ाएं समझाएं कि हीरो बनना सभी के बस की बात नहीं है." माँ की गुस्सा वाज़िब थी, क्योंकि हीरो बनना वाकई आसान नहीं था, वैसे भी उनकी माँ के पास कोई प्रॉपर्टी तो थी नहीं इसलिए संजीव की माँ का गुस्सा सुनने समझने के बाद स्कूल के अध्यापकों ने समझाया कि हरिहर बहुत होशियार बच्चा है. जो भी किरदार बताया जाता है, वह उस किरदार को जी लेता है. वो बहुत आगे जाएगा, ऐसी प्रतिभा बहुत कम ही बच्चों में होती है. आप मेरे बच्चे का फायदा उठाकर अपने स्कूल के लिए एक ड्रामेबाज चाहते हैं मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा भविष्य में परेशान हो... अतः हरिहर की माँ नहीं मानी, उन्होंने सोचा कि इसकी शादी कर दिया जाए, तो हरिहर सुधर जाएगा, हालांकि हरिहर शादी के लिए तैयार नहीं थे, उनके अंदर तो अदाकारी का कांटा चुभ गया था. स्कूल में मिली तालियां भी हरिहर को सोने नहीं देती थीं, लेकिन अपनी ज़िद की पक्की माँ ने हरिहर यानि संजीव कुमार जी की सगाई करा दी..अब तो हरिहर की सगाई भी हो गई. कई साल तक शादी नहीं हुई संजीव कुमार अपनी शादी तो टालते रहे, अब लड़की वाले भला एक लड़के का इंतज़ार कब तक करते.. अंततः सगाई टूट गई. हरिहर अपनी टूटी हुई सगाई के लिए अन्दर से प्रसन्नता का अनुभव कर रहे थे.
सगाई टूटने के बाद अब हरिहर अभिनय के लिए और भी ज्यादा सीरियस हो गए. उन्हें लगा कि सगाई टूटना वाकई अदाकारी के लिए नया रास्ता खोल गया है. हरिहर को लगा कि अब मुझे केवल अभिनेता बनना है, हालांकि गरीबी में ज़िन्दगी गुज़ार रहे संजीव एक विधवा माँ के बेटे जिनके पास दैनिक जरुरतें पूरी करने की कठिनाई उठानी पड़ती थी, भला उनमे आत्मविश्वास होता तो कैसे होता ! आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहे हरिहर सोचने लगे मेरी आवाज़ उतनी अच्छी नहीं है, उतना अच्छा बोलना नहीं आता वैसे भी अदाकारी के लिए आवाज़ बहुत मायने रखती है. संजीव कुमार ने स्कूल में उच्चारण, एवं आवाज़ सुधारने के लिए एक डायलॉग को कई टोन में बोलने का अभ्यास किया, परंतु अपनी समझ पर सफ़ल नहीं हुए. अब हरिहर को लगा कि मुझे अगर अभिनय में पारंगत होना है, तो मुझे कोई न कोई अभिनय का संस्थान जॉइन करना होगा, वैसे भी बिना गुरु ज्ञान कहाँ? देश में एक सबसे बड़ा संस्थान था. जिसमें पढ़ना अदाकारी सीखना हर बच्चे का ख्वाब होता था. तब हरिहर ने महान अभिनेता दादामुनि अशोक कुमार के बहनोई शशधर मुखर्जी के अभिनय स्कूल फ़िल्मालय में एडमिशन लेना चाहा. हालांकि ज़रूरत से ज्यादा फीस सुनकर हरिहर निराश हो गए.
संजीव कुमार की माँ ने कहा हरिहर मेरे गहने तुम्हारे पिता के जाने के बाद मेरे किसी काम के नहीं हैं, तुम अपना जुनून पूरा करो. अगर तुम अपना ख्वाब पूरे कर पाए तो भला फिर मुझे क्या चाहिए. हरिहर फ़िल्मालय संस्थान में दाखिला लेकर जुड़ गए. अपनी लगनशीलता, समर्पण के कारण पूरे संस्थान के चेहरे बन गए थे. उनके स्कूल के अध्यापकों की बात अब तक सच होती जा रही थी, कि हरिहर बहुत ही प्रतिभाशाली हैं.
अपनी मेहनत एवं प्रतिभा से खूब सारहे गए. फ़िल्मालय में संजीव के दोस्त मैकमोहन हुआ करते थे. शशधर मुखर्जी को लगा कि हरिहर अब बहुत परिपक्व हो गया है, इसको अब बड़े मंच की जरूरत है, फिर संजीव कुमार आईपीटीए पहुंचे, वहाँ संजीव कुमार की पहिचान थिएटर के महान अदाकार एके हंगल से हुई. शुरुआत में एके, हंगल को लगा कि कुर्ता चप्पल पहनने वाला यह लड़का भला क्या ही ऐक्टर नहीं बन पाएगा, तब तक तो खूब सारे गुड लुकिंग अदाकार भी हिन्दी सिनेमा में आ चुके थे.
हालांकि हंगल साहब एक तो क्रांतिकारी दूसरे संवेदनशील इन्सान इसलिए वे संजीव को कहकर टाल देते की तुम्हें काम बताऊँगा. खुशकिस्मती से संजीव कुमार को एक नाटक "मजमा" में काम मिल गया. मजमा में साठ पेज के लंबे संवाद थे, हरिहर ने चार दिन में ही पूरा संवाद रट लिया, और जबरदस्त रोल किया, देखकर एके हंगल बहुत शर्मिंदा हुए, कि अब अपने ड्रामे में हरिहर को काम ज़रूर दूँगा. एके हंगल के नाटक में एक साठ साल के बुजुर्ग का रोल बचा हुआ था. एके हंगल ने संजीव कुमार को वो रोल दे दिया. तब कैफ़ी आज़मी ने कहा "हंगल तुम ये फ्लॉप शो की तैयारी कर रहे हो उन्नीस साल का लड़का भला 60 साल के बुजुर्ग का रोल कैसे कर पाएगा?" हालांकि हंगल साहब मन बना चुके थे कि ये रोल तो हरिहर ही करेगा. हंगल साहब की उम्मीद पर खरा उतरते हुए हरिहर ने उस कठिन रोल को निभाते हुए कैफ़ी आज़मी को गलत साबित कर दिया..ज़िंदगी में संघर्ष करते हुए फ़िल्मालय संस्थान से आधिकारिक अदाकारी सीखने के बाद संजीव कुमार मंझे हुए अदाकार बन चुके थे. नाटकों, थियेटर में उनके अभिनय के कारण एके हंगल, कैफ़ी आज़मी, पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, आदि हरिहर को खूब उत्साहित करने लगे थे परन्तु संजीव कुमार को फ़िल्मों में काम करना था, क्योंकि नाटकों में तालियां तो मिलती हैं, लेकिन पैसा नहीं मिलता. वैसे भी तालियों से पेट नहीं भरता. संजीव कुमार ने फ़िल्मों में आने से पहले बहुत संघर्ष किया, संघर्ष भी ऐसा कि सुनकर ही आंसू आ जाएं. संजीव कुमार ऑडिशन में कुर्ता पायजामा चप्पल पहनकर जाते थे. उनके कपड़े देखकर बिना ऑडिशन ही निर्माता निर्देशक रिजेक्ट कर देते थे. उनके पहनावे के कारण उन्हें कोई अदाकार मानने के लिए तैयार नहीं था.
तब ही फ़िल्मालय के छात्रों की एक फिल्म में कास्टिंग हो रही थी, आख़िरकार हरिहर को पहली फिल्म 'हम हिन्दुस्तानी'1960 में एक छोटा सा रोल मिला, परंतु इस फिल्म में संजीव कुमार का कोई भी रोल संवाद नहीं था. अब बिना संवाद भला कोई क्या ही अपना असर छोड़ सकता था.
फिर 1962 में फिल्म "आरती" आने वाली थी, जिसमें मुख्य भूमिका में अशोक कुमार, मीना कुमारी थीं. संजीव कुमार खुश हो गए, कि दिग्गज अशोक कुमार एवं मीना कुमारी के साथ काम करने का मौका मिलेगा. फिल्म के निर्देशक फणी मजुमदार ने संजीव कुमार के कपड़े पहनने की स्टाइल देखकर कास्ट कर लिया, लेकिन फिल्म निर्माता ताराचंद बड़जात्या ने किसी नए लड़के को लेने से मना कर दिया. आरती फिल्म में संजीव कुमार की जगह प्रदीप कुमार को ले लिया गया. फिल्म से निकाले जाने पर संजीव कुमार को अज़ीब सा कारण बताया गया कि तुम्हारे दांत ठीक नहीं है, सुनकर संजीव कुमार अत्यंत दुःखी हो गए, कि अज़ीब सी फिल्मी दुनिया है, कोई कपड़े देखकर सिलेक्ट तो कोई कपड़े देखकर रिजेक्ट कर देता है. कोई दांत देखकर रिजेक्ट..... लेकिन प्रतिभा कोई नहीं देखना चाहता. जब तक मौका नहीं मिलेगा तो मैं अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कैसे कर पाउंगा.
आख़िरकार सुपरहिट फिल्म 'सरस्वतीचंद्र' से संजीव कुमार को उनके नाम के कारण निकाल दिया गया, कारण बताया गया कि तुम्हारा नाम हरिहर भाई जेठालाल जरीवाला है, तुम्हारा नाम सुनकर ही दर्शक भग जाएंगे. संजीव कुमार सुनकर बहुत दुखी हुए. दोस्तों ने कहा कि हरि तुम अपना नाम बदल लो, तब संजीव कुमार ने कहा कि नाम ही बदलना है तो मेरी माँ का नाम एस से है तो मैं अपना नाम संजय रख लेता हूं, 1964 में फिल्म 'आओ प्यार करें' रिलीज हुई, इस फिल्म में स्क्रीन पर संजय कुमार नाम लिखा आया. 1964 में ही दोस्ती फिल्म सुपरहिट हुई उसमे संजय खान हीरो थे. फिर हरिहर ने अपना नाम बदलकर संजीव कुमार रख लिया, आखिरकार हिन्दी सिनेमा में संजीव कुमार का उदय हुआ.
संजीव कुमार अभी तक बी ग्रेड फ़िल्में कर रहे थे, अचानक संजीव कुमार का कॅरियर फिल्म "संघर्ष" से परवान चढ़ा. हरनाम सिंह रवैल, ने संजीव कुमार को दिलीप कुमार के सामने संघर्ष में अभिनय दिखाने के लिए निगेटिव शेड रोल ऑफर किया. यह रोल अकड़ू जानी राजकुमार मना कर चुके थे. अब कैरियर के शुरुआत में ही उनके सामने थे, ग्रेट अभिनय सम्राट दिलीप साहब, संजीव कुमार ने मौके को भुना लिया. शुरुआती दौर में ही उनके पास अपना अभिनय कौशल दिखाने का सुनहरा मौका था. इससे भी बड़ा चैलेंज था, कि दिलीप कुमार के साथ खुद की प्रतिभा के साथ न्याय कर पाएंगे! अंततः संजीव कुमार ने अपनी अभिनय क्षमता की ऐसी अमिट छाप छोड़ी की दर्शक एवं समीक्षक हैरान रह गए . वहीँ एक ख़बर चलने लगी, जो एंटी दिलीप कुमार थे, कि संजीव कुमार ने ग्रेट दिलीप साहब को असहज कर दिया. उस दौर में एक धारणा थी कि दिलीप कुमार अपने से बेहतर किसी को बर्दाश्त नहीं कर सकते, यह सब निरर्थक बातेँ थीं. हालाँकि वो अपना सुझाव दिया करते थे, तो उनका सुझाव न मानने की वज़ह नहीं हो सकती थीं, क्यों कि दिलीप साहब से ज्यादा सिनेमैटिक समझ किसकी हो सकती थी .... यह उनका कद था. फिर भी ऐसा होता तो संजीव कुमार की दमदार सीन कटवाना उनके लिए बड़ी बात नहीं थी. अगर उन्होंने यह किया होता तो शायद संजीव कुमार को यह प्रतिभा निखारने का मौका न मिलता. ऐसा कुछ भी नहीं है, लेकिन यह दिलीप कुमार ही कह चुके थे, कि हिन्दी सिनेमा को सबसे बेहतरीन अभिनेता मिल चुका है हरफ़नमौला संजीव कुमार.....
सन 1970 में खिलौना फिल्म बन रही थी, स्टारकास्ट बहुत बड़ी थी, फिल्म में संजीव कुमार, मुमताज, शत्रुघ्न, जीतेन्द्र, थे. फिल्म बहुत सोच-समझकर बनाई जा रही थी. 17 महीने में इसकी स्क्रिप्ट तैयार हुई, बाद में निर्देशक को लगा कि शत्रुघ्न सिन्हा ठीक से बिहारी का रोल नहीं कर पा रहे हैं, तो निकाल दिया. संजीव कुमार, मुमताज ने निर्देशक के सामने शर्त रख दिया, कि शत्रुघ्न सिन्हा को जरूर लीजिए. बाद में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई. संजीव कुमार ने मानसिक रूप से विक्षिप्त आदमी की भूमिका निभाई थी. संजीव कुमार सेट पर बहुत लेट आया करते थे, तो निर्देशक ने कहा कि संजीव साहब आप बहुत लेट आते हैं, पुनः ऐसी गलती न हो, लेकिन इसके बाद अगले शॉट पर जबरदस्त ऐक्टिंग बिना रीटेक के दे दिया, वो सीन था, जिसमें पटाखों के शोर के बीच संजीव कुमार पागल हो जाते हैं. बाद में निर्देशक कहते हैं, संजीव साहब आप को जब आना हो आइए, लेकिन बता दिया करिए की कल लेट आऊंगा. संजीव कुमार शांत स्वभाव के थे, लेकिन उन्होंने अपने काम एवं प्रतिभा से निर्देशक का मुँह बंद कर दिया. खिलौना फिल्म के साथ ही संजीव कुमार फिल्मकारों की पहली पसंद बन गए थे. शादीशुदा नूतन को संवेदनशील संजीव कुमार बहुत पसंद आते थे, संजीव कुमार भी नूतन को पसंद करते थे. फ़िर रिश्ता टूट गया, बाद में संजीव कुमार एवं हेमा मालिनी में नजदीकी शुरू हुई, दोनों की शादी भी फिक्स हो गई, लेकिन गलतफहमियां बढ़ी बाद में रिश्ता टूट गया. दोनों अलग हो गए. अभी तक, खिलौना, आँधी, मौसम, त्रिशूल, शोले, ज़िन्दगी, नया दिन नई रात, विधाता, संघर्ष, आदि दमदार फ़िल्मों में अभिनय करते हुए संजीव कुमार अभिनेता के रूप में अमरत्व प्राप्त कर चुके थे. त्रिशूल एवं शोले में हेमा मालिनी थीं, लेकिन संजीव कुमार ने लेखक निर्माता से शर्त रखी थी, कि मेरा कोई शॉट हेमा मालिनी के साथ नहीं होगा, हुआ भी यही..... संजीव कुमार अभिनय के लिहाज से बहुत जहीन थे, उसका कारण था कि वो बहुत अध्ययन करते थे. मुन्शी प्रेमचंद के उपन्यास पर महान सत्यजीत रे फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' बनाना चाहते थे. उन्होंने सबसे बहुमुखी अदाकार संजीव कुमार को कास्ट कर लिया. संजीव ने सोचा कि महान सत्यजीत रे बहुत ही जहीन निर्देशक हैं, उनको समझने के लिए मुझे उनकी सारी फ़िल्में देखना होगा. जल्द ही संजीव कुमार ने महान सत्यजीत की सारी प्रमुख फ़िल्में देख डाली. वो चाहते थे कि मैं सत्यजीत रे की फिल्म में वह करूंगा जो मुझसे वो चाहते हैं. शतरंज के खिलाड़ी फिल्म में कालजयी अभिनय के लिए संजीव कुमार याद किए जाते हैं. प्यार मनुष्य को ईश्वर के द्वारा दिया हुआ एक अनूठा वरदान है. किसी भी व्यक्ति में कोई कमी होती है, शारीरिक, मानसिक वो किसी से कमतर होता है, फिर भी वह सब हासिल कर सकता है. सकारात्मक संदेश देती फिल्म जो जीवन में आपको आगे बढ़ाने के लिए गाइड करती है. कई बार व्यस्तता के कारण हम दिल की बात अपने प्रियजन को नहीं बोल पाते और ऐसा भी होता है, हम प्रियजनों की बातें अनसुनी कर देते हैं. इसकी वजह से रिश्तों में खटास आ जाती है. वार्तालाप न होने या वार्तालाप में अनियमितता के कारण उस खटास को कैसे मधुरता में बदला जाए प्यार - तकरार के बीच गुलज़ार द्वारा निर्देशित यह सिनेमा – कोशिश – आपको परिचित कराएगी एक ऐसी कहानी से जो प्रेम के इस अनुभव को एक अलग ही नायाब ढंग से दर्शाती है.
जया बच्चन एवं हरफ़नमौला संजीव कुमार की फिल्म में आरती और हरी चरण माथुर के अद्भुत रिश्ते की कहानी है. गुलज़ार के संवादों में पिरोई इस कहानी में आरती और हरी चरण के बीच के सहज प्रेम को जिसे संवादों की चाशनी ने नहीं बल्कि भावो की सरलता ने मजबूत किया है. आरती (जया भादुड़ी बच्चन) बचपन में हुए बुखार के बाद से मूक-बधिर है. वह अपनी मां दुर्गा (दीना पाठक) और निकम्मे भाई कन्नू (असरानी) के साथ मुंबई के पास बसे किसी कस्बे में रहती है. कुछ मवाली लड़को से बचते हुए आरती की टक्कर साइकिल से आ रहे हरी चरण से हो जाती है, जो आरती के जैसे ही मूक-बधिर है.साथ-साथ यह सिनेमा 1971 की आर्थिक तंगी से गुजर रहे भारतवासियों को प्रेरणा देते तीन शारीरिक असक्षम लोग आरती-हरी चरण (मूक-बधिर) और नारायण (नेत्रहीन) से परिचित कराता है, जो हर कठिनाई का सामना धैर्य और परिश्रम से करते हैं. फिल्म में संजीव कुमार मूक बधिर हैं सिंगल पैरेंट्स होते हुए भी अपने बेटे को संस्कार, सद्भावना, प्रेम, समानता की शिक्षा देते हैं. फिल्म के अंत में संजीव कुमार जबरदस्त संदेश देते हैं. हिन्दी सिनेमा में आर्ट फ़िल्मों का दौर कभी खत्म नहीं हुआ था, न होगा. स्वः संजीव कुमार हरफनमौला अभिनय उस्ताद थे. उनकी, आँधी, मौसम, शोले, कोशिश, खिलौना, अंगूर, त्रिशूल, विधाता, सीता और गीता, पति पत्नी और वो, अनामिका, शतरंज के खिलाड़ी, सिलसिला, शिकार, दस्तक, ज़िन्दगी, अर्जुन पंडित, यही है ज़िन्दगी, देवता आदि उनकी प्रमुख फ़िल्में आज के दौर में ऐक्टिंग सीख रहे बच्चों के लिए पूरा सिलेबस, यूँ कहें एक ग्रंथ हैं तो शायद कम ही होगा. संजीदा अभिनय में दिलीप कुमार से ज्यादा उम्दा ऐक्टिंग करने का माद्दा संजीव कुमार के पास था, कॉमेडी में वो लाजवाब थे, रोमांस करने में वो अपनी फ़िल्मों में जीवंत अभिनय कर चुके हैं.
संजीव कुमार हरफनमौला जिन्हें एक्टिंग का स्कूल भी कहा जाता था. वो कोई भी रोल हंसते-खेलते निभा लेते थे. इसी की बानगी ‘नया दिन नई रात' फिल्म है ,जिसमें उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि 9 किरदार निभाए थे,यह फिल्म साल 1974 में 7 मई को रिलीज हुई थी. इस फिल्म के पीछे एक दिलचस्प कहानी है,कहा जाता है कि ‘नया दिन नई रात' की कहानी लेकर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर एनपी अली और ए भीम सिंह सबसे पहले एक्टिंग के सबसे बड़े बादशाह ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार के पास पहुंचे. यूं तो दिलीप कुमार ने एक साथ कई रोल निभाए हैं, लेकिन जैसे ही 9 किरदारों वाली कहानी पढ़ीं उन्होंने फिल्म करने से मना कर दिया. दिलीप कुमार ने कहा कि ये मुझसे नहीं हो पाएगा. जिसके बाद डायरेक्ट-प्रोड्यूसर पसोपेश में पड़ गए कि अब क्या करें! दिलीप कुमार ने उनकी परेशानी का हल निकालते हुए कहा कि आप संजीव कुमार के पास जाइए. वहीं एक है जो आपकी फिल्म के साथ न्याय कर पाएगा. वहीं एक है जो 9 तरह के किरदार को एक साथ निभा सकता है. जिसके बाद एनपी अली और ए भीम सिंह संजीव कुमार के पास पहुंचे. फिल्म की कहानी देखते ही 'शोले के ठाकुर' ने हां कर दी. संजीव कुमार ने पूरे 9 रोल निभाकर इतिहास बना दिया था. इस फिल्म में उन्होंने लूले-लंगड़े, अंधे, बूढ़े, बीमार, कोढ़ी, किन्नर, डाकू, जवान और प्रोफेसर का किरदार निभाया था. संजीव में खास बात थी, कि वे अपनी उम्र से भी ज्यादा उम्र के किरदार बड़ी ही सहजता से कर लेते थे, इस फिल्म में संजीव कुमार के अलावा जया भादुड़ी, वी गोपाल, दिलीप दत्त भी थे.
सुभाष घई निर्देशित 'विधाता' की 1982 में सुभाष घई ने विधाता फिल्म के लिए अभिनय सम्राट दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, श्रीराम लागू, अमरीश पुरी, मदन पूरी, सुरेश ओबेरॉय, जैसे दिग्गजों की फौज खड़ी कर दी. फिल्म को दिलीप कुमार के इर्द-गिर्द गढ़ा गया था . यह तो तय ही होता था, कि फिल्म में अगर ग्रेट दिलीप कुमार जैसे उस्ताद हों तो दूसरे किसी किरदार को क्या तव्वजो मिलेगी? बिल्कुल नहीं! क्योंकि दिलीप कुमार जैसे अभिनय उस्तादों के सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराना हर किसी के बस की बात नहीं थी.
विधाता फिल्म में अबु बाबा का किरदार छोटा मगर अभिनय की गहराई से बहुत बड़ा ग्रेट संजीव कुमार के कद एवं उनकी शख्सियत को ध्यान में रखकर ही गढ़ा गया था.जवानी में ही त्रिशूल, कोशिश, ज़िन्दगी, मौसम, आँधी, शोले, आदि फ़िल्मों में उम्र से ज्यादा की दमदार भूमिकाएं निभा कर बॉलीवुड में सबसे ज्यादा बहुमुखी प्रतिभा के धनी अभिनेता माने जाने लगे थे. वहीँ सबसे मजबूत पिलर बन गए थे. वहीँ दिलीप कुमार भी अपनी दूसरी पारी शुरू कर चुके थे. विधाता फिल्म की परफॉरमेंस में दिलचस्पी रखने वालों को बस इंतज़ार था, कि दिलीप कुमार - संजीव कुमार कब आमने-सामने होते हैं, और एक्टिंग का कौन सा नया आयाम स्थापित होता है,य़ह देखने वाली बात होगी.
दादा शमशेर सिंह कहते हैं, अबु बाबा आप अपनी हैसियत से बढ़कर बात कर रहे हैं, मैं आपको कुनाल की जिम्मेदारी की नौकरी से निकालता हूं.... वहीँ संजीव कुमार जवाब देते हैं,"बहुत पैसा कमा लिया साहब जी जहां आप ज़िन्दगी के उसूल ही भूल गए. दो प्यार करने वालों के प्यार को आप अपने रुतबे की भेट चढ़ा देंगे,संजीव कुमार फिर से दोहराते हैं अरे जाओ साहब आप क्या निकालोगे मुझे नौकरी से मैं ही आपको अपने मालिक की हैसियत से बेदखल करता हूँ". यह हिन्दी सिनेमा की सबसे दमदार अभिनय की बानगी है. सीन खत्म होते तक दिलीप कुमार (शमशेर सिंह) जा चुके थे, लेकिन यह दिलीप कुमार की हार एवं संजीव कुमार की जीत नहीं थी, यह केवल अभिनय का एक नायाब नमूना था.इस सीन के खत्म होते ही संजीव कुमार को बेशुमार तालियां मिलीं. तब तक हिन्दी सिनेमा में एक ख़बर फैल गई थी कि संजीव कुमार ने दिलीप कुमार को फीका कर दिया. यह क्लिप विधाता फिल्म की जान थी. अगर यह क्लिप नहीं होती तो शायद फिल्म उतनी तो प्रभावी नहीं होती..... अगर आप फिल्म देखेंगे तो आपको शम्मी कपूर अमरीश पुरी, मदन पूरी संजय दत्त, आदि सब दिखते ही नहीं है... फिल्म में कोई दिखता है तो केवल दिलीप कुमार एवं संजीव कुमार....
फिल्म के क्लाईमेक्स में शमशेर सिंह (दिलीप कुमार), शम्मी कपूर (गुरुबख्श) कुनाल (संजय दत्त) मिलकर अबु बाबा की मौत का बदला लेते हैं. वहीँ पूरी फिल्म में अबु बाबा एक आदर्श मिसाल के रूप में रहे ऐसा लगता था कि फिल्म में अबु बाबा (संजीव कुमार) के बिना क्या दिलीप कुमार का रोल प्रभावी होता?
यूँ तो फिल्म के केन्द्र में दिलीप साहब हैं... लेकिन दिलीप कुमार के होते हुए भी अगर उनके मुकाबले अपनी कड़ी मौजूदगी दर्ज कराने की कला की गहराई केवल संजीव कुमार में ही थी. कई बार दिलीप साहब ने भी कहा था कि जो रोल मैं भी नहीं कर सकता वो रोल बड़ी सहजता से संजीव कुमार कर सकता है. विधाता फिल्म भी संजीव कुमार की बेमिसाल अदायगी का एक नमूना है.... आज भी अगर अभिनय की बारीकियों के लिहाज से देखा जाए तो 'विधाता' फिल्म का अभिनय जोड़ी दिलीप साहब - संजीव कुमार के रूप में पूरा का पूरा सिलेबस है. सिनेमेटोग्राफी सीखने वालों के लिए विधाता फिल्म एक पूरा पीएचडी है. वहीँ सुभाष घई जैसे निर्देशक ही मेढक तौल सकते हैं, क्यों कि एक ही फिल्म में दिलीप कुमार, संजीव कुमार, शम्मी कपूर, अमरीश पुरी, मदन पूरी आदि की फौज के साथ न्याय करना आसान नहीं है. फिल्म को आज भी देखा जा सकता है उससे भी ज्यादा सीखा जा सकता है. '
संजीव कुमार अब नहीं है, तो हिन्दी सिनेमा में संजीव कुमार के हिस्से की ख़ामोशी है, उसको हर कलाकार हर दर्शक महसूस करता है. संजीव कुमार के खानदान में हार्टअटैक की बीमारी थी. कोई भी सदस्य पचास साल की उम्र पूरी नहीं कर सका. संजीव कुमार के पिता पचास साल की उम्र के पहले ही गुज़र गए थे. संजीव कुमार को लगता था कि मैं भी पचास साल की उम्र पूरी नहीं कर पाउंगा. संजीव कुमार को सभी से प्यार था, लेकिन संजीव कुमार खुद से कम प्यार करते थे, खूब शराब का सेवन करते थे, आखिरकार 1975 में संजीव कुमार को हार्ट अटैक आया,लेकिन वो बच गए. 42 साल की उम्र में उनके एक भाई का हार्ट अटैक से देहांत हो गया था. संजीव कुमार अपनी माँ को सबसे ज्यादा प्यार करते थे, 6 नवंबर 1980 को उनकी माँ शांता बेन को अटैक आया, संजीव कुमार हैदराबाद में टक्कर फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. उनकी माँ का देहांत हो गया. संजीव कुमार टूट चुके थे. उन्होंने आजीवन के लिए अपनी ज़िन्दगी का सबसे काला दिन घोषित करते हुए कहा कि 6 नवंबर में मैं कभी कोई काम नहीं करूंगा. भाई एवं माँ के गुजर जाने के बाद टूट गए थे, लेकिन वापिसी की, संजीव कुमार 'प्रोफेसर की पड़ोसन' फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, दूसरी बार संजीव कुमार को फिर से अटैक आया डॉ ने कहा सर्जरी करनी होगी. हिन्दी सिनेमा के उनके दोस्तों ने समझाया कि अमेरिका चले जाइए. संजीव कुमार ने सभी रुके कामों को पूर्ण करने का आश्वासन दिया, कि मैं आकर फिर से काम करूंगा. संजीव कुमार वापस ठीक होकर लौट आए. अमेरिका से लौटने के बाद हिन्दी सिनेमा में संजीव कुमार के लिए स्वागत समारोह रखा गया, संजीव कुमार फिर से ऐक्टिव हुए खूब फ़िल्मों में ऐक्टिव हो गए थे. हालांकि 6 नवंबर 1985 को उनके माँ को ले जाने वाला काला दिन आया जिसको संजीव कुमार ने ब्लैक डे के रूप में घोषित कर रखा था. 6 नवम्बर के दिन 1985 को अपने सेक्रेट्री जमुना दास को बोलकर नहाने चले गए. आधे घण्टे तक संजीव कुमार नहीं लौटे, तो जमुना दास ने देखा कि संजीव कुमार बाथरूम के बाहर बेहोश पड़े थे, डॉ. ने हार्ट अटैक के कारण संजीव कुमार को म्रत घोषित कर दिया. कोई दो राय नहीं है कि संजीव कुमार होते तो उन्होंने हिंदी सिनेमा में अभी तक सैकड़ों अपने अंदाज़ की फ़िल्में बना चुके होते. अभिनय का प्रत्येक रंग जीने में माहिर थे. संजीव कुमार को अभिनय करते हुए देखिए ऐसे महसूस कीजिए जैसे आप कोई पुस्तक पढ़ रहे हैं. यकीन करिए संजीव कुमार जैसा न कोई हुआ है न होगा. ज़िन्दगी के नौ रंगों को संजीव उकेरने में उस्ताद थे. अभिनय सीख रहे बच्चों के लिए संजीव कुमार पूरा का पूरा नौ रंगों से भरा समुन्दर छोड़ कर चले गए हैं, गोता लगाने पर अभिनय नाम का कोई न कोई मोती ज़रूर मिल जाएगा.
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं, जो देश दुनिया के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में सिनेमा, साहित्य, संस्कृति, समसामयिक विषयों पर लिखते हैं वहीँ सिनेमा के विभिन्न विषयों पर गंभीरता से लिखते हैं.
मो : 9755810517
मेल :dileeppathak449@gmail.com
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