हीमैन धर्मेद्र – हिन्दी सिनेमा का सबसे ख़ूबसूरत सितारा
हीमैन धर्मेद्र – हिन्दी सिनेमा का सबसे ख़ूबसूरत सितारा
भारतीय सिनेमा के सबसे उम्रदराज़ अभिनेताओं की फ़ेहरिस्त में सबसे बुजुर्ग धर्मेंद्र की तबियत बिगड़ी तो मीडिया ने उन्हें जल्दबाज़ी में मृत घोषित कर दिया और उनकी याद में कितने ही सारे प्रोग्राम चला दिए गए l परिणामस्वरूप पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई, हालांकि पुष्टि नहीं हुई तो हमने अपनी जन सरोकार मैग्ज़ीन के रिपोर्टर को रिसर्च के लिए लगाया तो उनकी सुपुत्री ने कहा कि धरम जी बिल्कुल ठीक हैं, हालांकि आज अपने 90 वें जन्मदिन से 13 दिन पहले ही आज 24 नवंबर को दुनिया से अलविदा कह गए, गए भी इतनी ख़ामोशी एवं सादगी से कि पूरे हिन्द को तब पता चला कि धरम जी पंचत्व में विलीन हो गए, जबकि देश के नागरिक सम्मान से सम्मानित शख्सियत थे, फिर भी सादगी के साथ चले गए, यही बात उन्हें शुद्ध मिट्टी का कलाकार बनाती है l
धरम जी के शब्दों में कहें तो - "दोस्तों सबकुछ पाकर भी हासिल-ए-जिंदगी कुछ भी नहीं, कमबख्त जान क्यों जाती है जाते हुए, पता नहीं कहां जाएंगे, कौन ले जाएगा, बहरहाल, आप सभी को प्यार.' धर्मेंद्र ने अपनी इस कविता से जिंदगी के सार को एक लाइन में समझाने काम किया था l उनकी इस कविता का अर्थ है कि लाइफ में कितना ही कुछ पा लो, हासिल कर लो, फिर भी खालीपन है कि जाता नहीं, अंत में सबको जाना है, लेकिन कहां जाएंगे, कुछ पता नहीं, कौन लाएगा, ये भी नहीं पता l ज़िन्दगी की आख़िरी सांसों तक ज़िन्दगी जीना एवं जिन्दादिली की सीख देते हुए चले गए l एक दौर में पीढ़ियां इस बात पर सीना चौड़ा करेंगी कि हीमैन नामक पुष्प हिन्द के आँगन में उगा था.... हिन्दी सिनेमा ही नहीं विश्व सिनेमा के टॉप 10 अभिनेताओं की फ़ेहरिस्त में शामिल ग्रेट धरम जी.... सम्पूर्ण कलाकार थे l
अशोक कुमार, देवानंद साहब, राज कपूर साहब, दिलीप साहब, राजेन्द्र कुमार, जैसे हिन्दी सिनेमा के अग्रदूदूतों के पैर की धूल पेशानी से लगाने वाले धरम जी... अपने साथी मनोज कुमार, शम्मी कपूर, सुनील दत्त, संजीव कुमार, फिरोज़ खान, को बेशुमार इज्ज़त प्यार देने वाले धरम जी... अपने से छोटे शत्रुघ्न सिन्हा, शशि कपूर, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती, आदि की पेशानी चूमकर गले लगाने वाले धरम जी... वहीँ अपने बच्चों की पीढ़ी को बेशुमार प्यार अशीर्वाद देने वाले धरम जी का स्लोगन थी लव यूँ था....धरम जी शारीरिक रूप से दुनिया छोड़ गए परंतु वे अपनी अदाकारी एवं करिश्माई पर्सनालिटी को हिन्द के हर आँगन में छोड़ गए
हैं l
देवानंद साहब कहते थे "धर्मेंद्र जैसा ख़ूबसूरत मैं क्या कोई भी नहीं है l दिलीप कुमार कहते थे - 'धरम काश मैं भी उसी कोख से जन्म लेता जिससे तुमने लिया है तो मैं भी तुम्हारी तरह ख़ूबसूरत होता l जया बच्चन तो उन्हें ग्रीक गॉड कहती हैं l
अगर धरम जी की अदाकारी एवं उनकी फ़िल्मों का अध्ययन किया जाए तो पता लगेगा कि उनके हिस्से कम से कम 10 नेशनल अवॉर्ड एवं 20 फिल्मफेयर होते l भारतीय सिनेमा की बदकिस्मती है कि धरम जी को आजतक दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया, हालांकि हमारे यहां किसी का भी मूल्यांकन मरने के बाद होता है दुःखद यही है l
70 के दशक में धर्मेन्द्र को दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत मर्दों में से एक चुना गया था। यह सम्मान पाने वाले वह भारत के पहले शख्स थे। इसके साथ ही उन्हें विश्व स्तर पर “वर्ल्ड आयरन मैन अवार्ड” भी हासिल है l 8 दिसम्बर 1935 को जन्मे धरम ने दिलीप कुमार को देखकर सिनेमा में आने का ख्वाब देखा था l दिलीप कुमार, देवानंद, राजकपूर, त्रिमूर्ति के बराबर अकेले में अगर किसी के पास प्रतिभा थी तो वे केवल धर्मेद्र ही थे l अपने से बड़े लोगों को इज्ज़त देना, और छोटों को बेशुमार प्यार देना धर्मेद्र की अदा थी जो उन्हें मोस्ट लविंग इंसान बनाती थी, और यही खूबी उन्हें लोकप्रिय बनाती थी l धर्मेद्र हिन्दी सिनेमा के इकलौते ऐसे सुपरस्टार हैं, जिनका कोई दुश्मन नहीं है सारे के सारे उनके मित्र हैं l
धरम जी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता, फ़िल्म निर्माता और राजनीतिज्ञ थे , ये बीकानेर से भारतीय जनता पार्टी के 14वीं लोकसभा में सांसद रहे। धर्मेन्द्र, हिंदी फ़िल्मों में अपनी मज़बूत कद काठी और एक्शन के लिए 'हीमैन' के नाम से भी जाने जाते थे, हिन्दी सिनेमा में अगर अमिताभ बच्चन सदी के महानायक हैं तो धर्मेन्द्र उसी सदी के महा सितारे हैं, जो अपनी अदाओं से ना सिर्फ दर्शकों की पसंद बने थे बल्कि उनकी दमदार शख्सियत का लोहा विदेशों में भी माना गया था। धरम जी भारत के पहले ऐसे सुपरस्टार हैं जिन्होंने रिकॉर्ड सबसे ज़्यादा सुपरहिट फ़िल्में दीं l
हिन्दी सिनेमा की डगर पर चलने के लिए 1958 में उन्होंने फ़िल्मफेयर टैलेन्ट कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया और चल पड़े एक ऐसे सफर पर जहां उन्हें कामयाबी, शोहरत और पैसा सब मिला। धर्मेद्र ने अपने सिनेमा करियर की शुरुआत अर्जुन हिंगोरानी की 1960 में आई फ़िल्म फ़िल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' से की थी। उन्होंने 1960 के दशक के शुरू में कई रोमाटिक फ़िल्मों में काम किया। 1974 के बाद दर्शकों ने उन्हें एक्शन हीरो के रूप में देखा। अपने कैरियर की शुरुआत में उन्होंने कई प्रमुख अभिनेत्रियों के साथ अभिनय किया। वह नूतन के साथ 'सूरत और सीरत' (1962) और 'बंदिनी' (1963) में दिखाई दिए तो 1942 में फ़िल्म 'अनपढ़' और 1964 में आई फ़िल्म 'पूजा के फूल' में वह माला सिन्हा के साथ दिखाई दिए। 1962 की फ़िल्म 'शादी' और 1964 में 'आई मिलन की बेला' में वह सायरा बानो के साथ दिखाई दिए। हिंदी फ़िल्म 'आँखें' में जब उन्हें दर्शकों ने एक शेर से लड़ते देखा तो सभी दांतों तले अंगुली दबा गए और उन्हें नाम मिला शेरों का शेर धर्मेद्र। धर्मेद्र को भारत सरकार ने पद्म भूषण से भी सम्मानित किया।
धर्मेन्द्र को सबसे ज़्यादा “सत्यकाम”, “शोले” "अनुपमा", "चुपके - चुपके "में अभिनय करने के लिए याद किया जाता है। 1975 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'शोले' धर्मेंद्र के कैरियर की सबसे बड़ी हिट साबित हुई। हिंदी सिनेमा के सुनहरे पन्नों में अपना नाम सुनिश्चित करा चुकी रमेश सिप्पी निर्देशित फ़िल्म 'शोले' ने धर्मेंद्र को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलवाई। इस फ़िल्म के बाद धर्मेंद्र की गिनती विश्व के टॉप 10 बेजोड़ अभिनेताओं में होने लगी। अपने कैरियर में धर्मेन्द्र ने हर किस्म के रोल किए। रोल चाहे फ़िल्म सत्यकाम के सीधे-सादे ईमानदार हीरो का हो, फ़िल्म शोले के एक्शन हीरो का हो या फिर फ़िल्म चुपके चुपके के कॉमेडियन हीरो का, सभी को सफलतापूर्वक निभा कर दिखा देने वाले धर्मेंद्र सिंह देओल अभिनय प्रतिभा के धनी कलाकार थे । साल 1966 में आई उनकी फ़िल्म “फूल और पत्थर” को सबसे अधिक सफलता मिली। इस फ़िल्म के लिए धर्मेन्द्र को पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। इसके साथ ही उन्हें फ़िल्म 'नौकर बीवी का' और 'आई मिलन की बेला' जैसी फ़िल्मों के लिए भी फ़िल्मफेयर पुरस्कार नामित किया गया
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हिन्दी सिनेमा का इतिहास जब भी लिखा जाएगा धर्मेद्र को एक कम्प्लीट हीरो के रूप में याद किया जाएगा, चूंकि धर्मेद्र जैसे सुपरस्टार बार - बार जन्म नहीं लेते l
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं
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