प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी : अपने इरादों से स्वर्णिम इतिहास लिखने वाली शक्ति

इंदिरा गांधी का नाम शक्ति का पर्याय बन गया है, आज देश दुनिया की कोई भी लड़की इंदिरा गांधी को अपना आदर्श मानती है, इंदिरा केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थीं, बल्कि हर एक लड़की के ख्वाबों को हवा देने वाली एवं उसे साकार करने की हिम्मत देने वाली शक्ति का भी नाम है l बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वो एतिहासिक कारनामे किए हैं कि कोई पुरुष प्रधानमन्त्री भी नहीं कर पाए l आज के दौर की पीढ़ियो
 को जानना चाहिए कि हमारे देश में एक ऐसी आधुनिक दुर्गा ने अवतार लिया था, जिसने दुनिया में स्वर्णिम इतिहास तो लिखा ही साथ ही भूगोल भी बदल कर रख दिया l इंदिरा तेज तर्रार नेता के रूप में जरूर जानी जाती हैं, परंतु वो कुलीन, सुसंस्कृत, जिनके व्यक्तित्व में पिता पण्डित जी जी एवं माँ कमला नेहरू का अक्स दिखता था l 

आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया की सबसे सशक्त हस्ताक्षर के रूप में इंदिरा गांधी अमरत्व को प्राप्त कर चुकी हैं, यही कारण है कि जब तक भारत है तब तक इंदिरा का नाम एक शक्ति के रूप में दुनिया के क्षितिज पर गुंजायमान रहेगा l 

इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी न केवल भारतीय राजनीति पर छाई रहीं बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वे एक प्रभाव छोड़ गईं। इंदिरा भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की इकलौती पुत्री थीं। आज इंदिरा गाँधी को सिर्फ़ इस कारण नहीं जाना जाता कि वह पंडित नेहरू की बेटी थीं बल्कि इंदिरा गाँधी अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता एवं प्रशासनिक कार्यकुशलता के लिए 'विश्वराजनीति' के इतिहास में जानी जाती हैं और इंदिरा गाँधी को 'लौह-महिला' के नाम से संबोधित किया जाता है। ये भारत की प्रथम महिला एवं अब तक की इकलौती प्रधानमंत्री रही हैं l


पिता एवं दादा दोनों वकालत के पेशे से संबंधित थे और देश की स्वाधीनता में इनका प्रबल योगदान था। इनकी माता का नाम कमला नेहरू था जो दिल्ली के प्रतिष्ठित कौल परिवार की पुत्री थीं। इंदिराजी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जो आर्थिक एवं बौद्धिक दोनों दृष्टि से काफ़ी संपन्न था। अत: इन्हें आनंद भवन के रूप में महलनुमा आवास प्राप्त हुआ। इंदिरा जी का नाम इनके दादा पंडित मोतीलाल नेहरू ने रखा था। यह संस्कृतनिष्ठ शब्द है जिसका आशय है कांति, लक्ष्मी, एवं शोभा। इनके दादाजी को लगता था कि पौत्री के रूप में उन्हें माँ लक्ष्मी और दुर्गा की प्राप्ति हुई है। पंडित नेहरू ने अत्यंत प्रिय देखने के कारण अपनी पुत्री को प्रियदर्शिनी के नाम से संबोधित किया जाता था। चूंकि जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू स्वयं बेहद सुंदर तथा आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे, इस कारण सुंदरता के मामले में यह गुणसूत्र उन्हें अपने माता-पिता से प्राप्त हुए थे। इन्हें एक घरेलू नाम भी मिला जो इंदिरा का संक्षिप्त रूप 'इंदु' था।

आजकल की पीढ़ी को लगता है कि इंदिरा जी का बचपन बहुत मजे के साथ बीता होगा हालांकि पण्डित नेहरू की बेटी होने की कुछ कीमत तो चुकानी ही होगी, इंदिरा को जन्म के कुछ वर्षों बाद भी शिक्षा का अनुकूल माहौल नहीं उपलब्ध हो पाया था। पाँच वर्ष की अवस्था हो जाने तक  इंदिरा ने विद्यालय का मुख नहीं देखा था। पिता जवाहरलाल नेहरू देश की आज़ादी के आंदोलन में व्यस्त थे और माता कमला नेहरू उस समय बीमार रहती थीं। घर का वातावरण भी पढ़ाई के अनुकूल नहीं था। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का रात-दिन आनंद भवन में आना जाना लगा रहता था। यही कारण था कि पंडित नेहरू ने पुत्री की शिक्षा के लिए घर पर ही शिक्षकों का इंतज़ाम कर दिया था।  इंदु को आनंद भवन में ही शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता था।


पंडित जी  शिक्षा का महत्त्व काफ़ी अच्छी तरह समझते थे। यही कारण है कि उन्होंने पुत्री इंदिरा की प्राथमिक शिक्षा का प्रबंध घर पर ही कर दिया था। लेकिन अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अन्य विषयों में इंदिरा कोई विशेष अधिकार नहीं प्राप्त कर सकी। तब इंदिरा को शांति निकेतन स्कूल में पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ उसके बाद उन्होंने बैडमिंटन स्कूल तथा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अध्ययन किया।

पंडित नेहरू के बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बनाए गए। उन्होंने कांग्रेस संगठन में इंदिरा जी के साथ मिलकर कार्य किया था। शास्त्रीजी ने उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंपा। अपने इस नए दायित्व का निर्वहन भी इंदिराजी ने कुशलता के साथ किया। यह ज़माना आकाशवाणी का था और दूरदर्शन उस समय भारत में नहीं आया था। इंदिरा गाँधी ने आकाशवाणी के कार्यक्रमों में फेरबदल करते हुए उसे मनोरंजन बनाया तथा उसमें गुणात्मक अभिवृद्धि की। 1965 में जब भारत- पाकिस्तान युद्ध हुआ तो आकाशवाणी का नेटवर्क इतना मुखर था कि समस्त भारत उसकी आवाज़ के कारण एकजुट हो गया। इस युद्ध के दौरान आकाशवाणी का ऐसा उपयोग हुआ कि लोग राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत हो उठे। भारत की जनता ने यह प्रदर्शित किया कि संकट के समय वे सब एकजुट हैं और राष्ट्र के लिए तन-मन धन अर्पण करने को तैयार हैं। राष्ट्रभक्ति का ऐसा जज़्बा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी देखने को नहीं प्राप्त हुआ था। इंदिरा गाँधी ने युद्ध के समय सीमाओं पर जवानों के बीच रहते हुए उनके मनोबल को भी ऊंचा उठाया जबकि इसमें उनकी ज़िंदगी को भारी ख़तरा था। कश्मीर के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में जाकर जिस प्रकार उन्होंने भारतीय सैंनिकों का मनोबल ऊंचा किया, उससे यह ज़ाहिर हो गया कि उनमें नेतृत्व के वही गुण हैं जो पंडित नेहरू में थे।



दरअसल कुछ समय बाद ही इलाहाबाद में इंदिरा की माता कमला नेहरू का स्वास्थ्य काफ़ी ख़राब हो गया। वह बीमारी में अपनी पुत्री को याद करती थीं। पंडित नेहरू नहीं चाहते थे कि बीमार माता को उसकी पुत्री की शिक्षा के कारण ज़्यादा समय तक दूर रखा जाए। उधर अंग्रेज़ों को भी कमला नेहरू के अस्वस्थ होने की जानकारी थी। अंग्रेज़ चाहते थे कि यदि ऐसे समय में पंडित नेहरू को जेल भेजने का भय दिखाया जाए तो वह आज़ाद रहकर पत्नी का इलाज कराने के लिए उनकी हर शर्त मानने को मजबूर हो जाएंगे। इस प्रकार वे पंडित नेहरू का मनोबल तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। पंडित नेहरू जब अंग्रेज़ों की शर्तों के अनुसार चलने को तैयार न हुए तो उन्हें गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। जब पंडित नेहरू ने गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के नाम शांति निकेतन में तार भेजा गुरुदेव ने वह तार इंदिरा को दिया जिसमें लिखा था। इंदिरा की माता काफ़ी अस्वस्थ हैं और मैं जेल में हूँ। इस कारण इंदिरा को माता की देखरेख के लिए अविलम्ब इलाहाबाद भेज दिया जाए। माता की अस्वस्थता का समाचार मिलने के बाद इंदिरा ने गुरुदेव से जाने की इच्छा प्रकट की।


इलाहाबाद पहुँचने पर इंदिरा ने अपनी माता की रुग्ण स्थिति देखी जो काफ़ी चिंतनीय थी। भारत में उस समय यक्ष्मा का माक़ूल इलाज नहीं था। उनका स्वास्थ्य तेज़ीसे बिगड़ता जा रहा था। यह 1935 का समय था। तब डॉक्टर मदन अटल के साथ इंदिरा जी अपनी माता को चिकित्सा हेतु जर्मनी के लिए प्रस्थान कर गईं। पंडित नेहरू उस समय जेल में थे। चार माह बाद जब पंडित नेहरू जेल से रिहा हुए तो वह भी जर्मनी पहुँच गए। जर्मनी में कुछ समय तक कमला नेहरू का स्वास्थ्य ठीक रहा लेकिन यक्ष्मा ने फिर ज़ोर पकड़ लिया। इस समय तक विश्व में कहीं भी यक्ष्मा का इलाज नहीं था। हां, यह अवश्य था कि पहाड़ी स्थानों पर बने सेनिटोरियम में रखकर मरीज़ों की ज़िंदगी को कुछ समय के लिए बढ़ा दिया जाता था। लेकिन यह कमला नेहरू के रोग की प्रारंभिक स्थिति नहीं थी। यक्ष्मा अपनी प्रचंड स्थिति में पहुँच चुका था लेकिन पिता- पुत्री ने हार नहीं मानी।

पंडित नेहरू और इंदिरा कमलाजी को स्विट्जरलैंड ले गए। वहाँ उन्हें लगा कि कमला जी के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। लेकिन जिस प्रकार बुझने वाले दीपक की लौ में अंतिम समय प्रकाश तीव्र हो जाता है, उसी प्रकार स्वास्थ्य सुधार का यह संकेत भी भ्रमपूर्ण था। राजरोग को अपनी बलि लेनी थी और फ़रवरी 1936 में कमला नेहरू का निधन हो गया। 19 वर्षीया पुत्री इंदिरा के लिए यह भारी शोक के क्षण थे। माता की जुदाई का आघात सहन कर पाना इतना आसान नहीं था। उन पर माता की रुग्ण समय की स्मृतियाँ हावी थीं। पंडित नेहरू को भय था कि माता के निधन का दु:ख और एकांत में माता की यादों की पीड़ा कहीं इंदिरा को अवसाद का शिकार न बना दे। इंदिरा में अवसाद के आरंभिक लक्षण नज़र भी आने लगे थे। तब पंडित नेहरू ने यूरोप के कुछ दर्शनीय स्थलों पर अपनी पुत्री इंदिरा के साथ कुछ समय गुजारा ताकि बदले हुए परिवेश में वह अतीत की यादों से मुक्त रह सके। इसका माक़ूल असर भी हुआ। इंदिरा ने विधि के कर विधान को समझते हुए हालात से समझौता कर लिया।

 
























इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कई ऐसे बड़े साहसिक फैसले लिए, जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा l 

इंदिरा तब भारत की प्रधानमंत्री बनी थीं, जब कांग्रेस में एक मजबूत सिंडिकेट था l उन्हें लगता था कि लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद अगर उन्होंने किसी दमदार कांग्रेस नेता को प्रधानमंत्री बनाया तो उसे अपनी कठपुतली बनाकर नहीं रख सकेंगे l इसी के चलते तब प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मोरारजीभाई देसाई का पत्ता सिंडिकेट ने काट दिया l 
कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष कामराज ने इंदिरा को इसलिए प्रधानमंत्री बनाया क्योंकि वो देश के सबसे लोकप्रिय नेता रहे जवाहर लाल नेहरू की बेटी थीं और उन्हें शांत, सुसंस्कृत लगती थीं. प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा ने लगातार अपनी स्थिति मजबूत की l समय आने पर उन्होंने इस दमदार कांग्रेस सिंडिकेट को छिन्न-भिन्न करके अपने दम पर समानांतर कांग्रेस खड़ी की, जिसने बाद में असली कांग्रेस की जगह ली l

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चीन को जिस तरह से धूल चटाई थी वह आज भी इतिहास में याद किया जाता है। दरअसल, इंदिरा गांधी भूटान को सपोर्ट करने की वजह से चीन के निशाने पर आ गई थीं। चीन इसका बदला लेने के लिए घुसपैठ की कोशिश में लग गया। लेकिन वह तो थीं आयरन लेडी इंदिरा गांधी जिन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके खुले तौर पर साफ कर दिया कि भारत भूटान की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहेगा।

एक तरीके से कहें तो यह चीन के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती थी। सितंबर 1967 में, चीन ने सिक्किम के नाथूला पास पर हमला किया था। उस समय सिक्किम भारत का हिस्सा नहीं था, बल्कि वहां राजशाही का शासन था। भारत ने नाथू ला और चो ला पास पर चीनी सेना को पीछे धकेल दिया।

इस लड़ाई में भारत के 88 सैनिक शहीद हुए, जबकि चीन के साढ़े तीन सौ से ज्यादा सैनिक मारे गए और 500 से अधिक घायल हुए। कुछ अन्य आंकड़ों के अनुसार, चीन के मारे गए सैनिकों की संख्या इससे भी अधिक थी। इंदिरा गांधी के इस कदम के चलते ही चीन सिक्किम पर कब्जा नहीं कर सका। 16 मई 1975 में जनमत संग्रह के आधार पर सिक्किम भारत में शामिल हो गया था।


वर्ष 1971 में, पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के कारण लाखों बंगाली शरणार्थी भारत आ गए, जिससे देश पर भारी दबाव पड़ा। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मानते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाई। 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान द्वारा पश्चिमी मोर्चे पर हमला करने के जवाब में भारत ने युद्ध की घोषणा की और मात्र 13 दिनों में निर्णायक जीत हासिल की, जिसके परिणामस्वरूप 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम को राजनीतिक और मानवीय दोनों स्तरों पर समर्थन दिया।


देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई 1969 में 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कराया था। इनमें पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बरौदा समेत अन्य बैंक शामिल थे। राष्ट्रीयकरण से पहले बैंक सिर्फ शहरों और अमीर लोगों तक सीमित थे। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण इलाकों में शाखाएं खुलीं। पहले बैंक मुख्यतः बड़े उद्योगपतियों को ही कर्ज देते थे। अब किसानों, छोटे व्यापारियों और स्वरोज़गार योजनाओं को भी कर्ज मिलने लगा

प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने अमेरि के साथ खाद्यान समझौता किया था, क्योंकि उस समय देश में अनाज का भारी संकट था। इंदिरा गांधी के प्रयास के चलते ही अमेरिकी राष्ट्रपति जानसन ने तुरंत 6.7 मिलियन टन खाद्यान्न की खेप भारत भेजी। जिससे भारत को राहत मिली


इंदिरा गांधी ने परमाणु परीक्षण के लिए काफी प्रयास किए। चीन के बढ़ती ताकतों को देखते हुए उन्होंने वैज्ञानिकों को लगातार उत्साहित करना शुरू किया। उन्होंने वैज्ञानिक संस्थाओं को बढ़ावा दिया। इसके चलते 18 मई 1974 में भारत ने पहली बार पोखरण में स्माइलिंग बुद्धा आपरेशन के नाम से सफलतापूर्वक भूमिगत परीक्षण किया। इस परमाणु परीक्षण को पोखरण-I के नाम से जाना जाता था और इसका कोड-नाम 'स्माइलिंग बुद्धा' था।


इंदिरा गांधी ने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए हरित क्रांति को गति दी। इसके बाद भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनने लगा। इंदिरा गांधी ने किसानों के लिए कई खास योजनाएं चलाईं। किसानों को बढ़ावा देने के लिए वह खुद किसानों से मिलती थीं।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्व रियासतों के शासकों को मिलने वाले विशेषाधिकार और भत्ते खत्म कर दिए। प्रभाव: समानता के सिद्धांत को बल मिला, परंतु विवाद भी हुआ। हालांकि, इंदिरा गांधी के इस फैसले से गरीबों और मध्यम वर्ग को बहुत बड़ी राहत मिलने लगी।


इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनाव में “गरीबी हटाओ” का नारा दिया था। इसका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक सुधार और गरीबों के लिए योजनाएं शुरू करना था।




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