तेजस्वी की अनभिज्ञता और अहंकार ने इंडिया गठबंधन को बिहार में हार का रास्ता दिखाया
तेजस्वी की अनभिज्ञता और अहंकार ने इंडिया गठबंधन को बिहार में हार का रास्ता दिखाया
बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्ष की हार का प्रमुख कारण तेजस्वी यादव का अहंकार रहा, तेजस्वी यादव ने न अपने भाई को सम्मान दिया और न ही इतने बड़े दल कांग्रेस को उचित सम्मान दिया l तेजस्वी ने पूरा चुनाव अपने नाम पर केंद्रित कर दिया था, जाहिर सी बात है कि तेजस्वी अभी इतने बड़े नाम नहीं है कि चुनाव उनके इर्द गिर्द घूम जाए l अगर हम पिछले चुनाव साल 2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो आरजेडी महज कुछ हजारों के अंतर से ही एनडीए से पीछे रह गई थी l ऐसे मे इस बार उम्मीद लगाई जा रही थी कि महागठबंधन पिछली बार के उस अंतर को पाट कर बिहार की सत्ता हासिल कर लेगा, लेकिन चुनाव परिणाम के दिन तो कहानी कुछ और ही दिखाई दी अब तक के नतीजों में एनडीए लगभग 200 सीटों पर काबिज हो गई है लेकिन जिसमें बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी तो जदयू ज़बरदस्त उछाल के साथ लौट आई है l वहीं आरजेडी संघर्ष करती हुई दिखाई दे रही है, और कांग्रेस के तो कहने ही क्या! बिहार में आखिर जो पार्टी और जो नेता चुनाव के दिन तक एनडीए को बड़ी टक्कर देने का दावा कर रहे थे वो अचानक कैसे धराशायी हो गए!
बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार शुरू होने से पहले ही टिकट बंटवारे को लेकर कांग्रेस और आरजेडी में मतभेद खुलकर आ रहे थे, दिल्ली से लेकर पटना तक गहमागहमी चलती रही l चुनाव के ऐलान के बाद पहले चरण के नामांकन की आखिरी तारीख से एक दिन पहले तक दोनों दलों में सीट शेयरिंग को लेकर रणनीति तय नहीं कर पाए l कई सीटों पर आरजेडी और कांग्रेस दोनों ने उम्मीदवार उतार दिए थे l एनडीए ने उनके बीच हुए इस तनाव को भरपूर फायदा उठाया और उसी समय अपने सहयोगी दलों के साथ सीट शेयरिंग का अनाउंसमेंट कर दिया, सबसे बड़ी यही कमजोरी खुलकर बाहर आई l बिहार चुनाव में आरजेडी की हार के पीछे की एक बड़ी वजह ये भी रही कि इस बार आरजेडी ने महागठबंधन का नेतृत्व करते हुए यादव बिरादरी के 52 उम्मीदवार मैदान में उतार दिए, इससे बिहार की अन्य जातियों में ये साफ मैसेज चला गया कि आरजेडी सिर्फ और सिर्फ अपनी यादव बिरादरी का भला चाहती है l उनके इस फैसले ने जनता की नजरों में आरजेडी को जातिवादी पार्टी साबित कर दिया l ऐसे में बिहार में सबसे बड़ा वोट बैंक यादव बिरादरी का है l बिहार की कुल आबादी का 14 फीसदी वोट यादव समाज से है ऐसे में 144 सीटों में से 52 यादवों (36%) को टिकट देने से बिहार की जनता को यादव राज की धमक दिखाई देने लगी थी जिससे जनता आरजेडी से दूर हो गई l बीजेपी ने आरजेडी के 52 यादव उम्मीदवार मैदान में उतारने को लेकर जातिवाद को लेकर बड़ा कैंपेन छेड़ दिया और पूरे चुनाव के दौरान आरजेडी और यादव राज का नैरेटिव चलाया जिन्होंने बिहार में 2005 से पहले का लालू राज देखा था, यही कारण रहा जनता आरजेडी के उस भयावाह शासन को याद कर डर गई और महागठबंधन से किनारा कर एनडीए की ओर मुड़ गई l तेजस्वी के इस फैसले से बिहार के कुर्मी और मौर्या वोट खिसक गए जो महागठबंधन की ओर चले गए l तेजस्वी की अनुभवहीनता और उनका बड़बोलापन उन्हें ले डूबा l तेजस्वी का सामना अनुभवी नीतीश कुमार के साथ था जो कैसे भी हो, उन्हें बिहार की जनता पसंद करती है, सीधी बात नीतीश कुमार बिहार में हमेशा प्रासंगिक रहने वाले हैं, जिनकी लोकप्रियता से भी इंकार नहीं किया जा सकता, तेजस्वी नीतीश कुमार की ताकत को भूल गए l
तेजस्वी की रणनीति में सबसे बड़ी चूक ये थी कि उन्होंने बिना चुनाव लड़े ही सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी को मान लिया था, चुनाव से पहले ही खुद को सीएम मान लिया था, उन्होंने कांग्रेस सहित अन्य सहयोगी दलों को लगातार दरकिनार रखा और पूरे चुनाव में अपनी ही मनमानी करते रहे l नतीज सबके सामने है l अन्यथा कोई कारण नहीं था कि चुनाव के बीच में राहुल गांधी विदेश दौरे पर चले जाएं, इससे विपक्ष के बीच दूरी दिखाई दी l आरजेडी ने महागठबंधन के मेनीफेस्टो में भी अपनी मनमानी की और जहां कांग्रेस ने 'गारंटी' मेनिफेस्टो पर जोर दिया था तो वहीं तेजस्वी ने 'नौकरी देंगे' पर प्राथमिकता दी l यह बात अन्य सहयोगियों को खराब लगी, इतना ही नहीं तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के मेनिफेस्टो का नाम भी 'तेजस्वी प्रण' रखा था l इसके बाद तो महागठबंधन के नेता एकदम से दरकिनार हो चुके थे, वहीं रैलियों में राहुल गांधी की तस्वीरें कम और तेजस्वी की ज्यादा दिखाई दीं, जो तेजस्वी यादव के अहंकार को साफ दिखाता है l उनकी हार के पीछे ये भी एक बड़ी वजह रही है, हारने के बाद विपक्ष चुनाव को निष्पक्ष नहीं मानता तो भाग क्यों लेता है? ऐसी बातेँ विपक्ष को जनता के सामने कमज़ोर सिद्ध करती हैं l
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं
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