बिरसा मुंडा : धरती बाबा से बिरसा भगवान तक
बिरसा मुंडा : धरती बाबा से बिरसा भगवान तक
(भगवान बिरसा मुंडा जयंती 15 नवंबर 2025)
बिरसा मुंडा एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे। ये मुंडा जाति से सम्बन्धित थे। वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को अब 'बिरसा भगवान' कहकर याद करते हैं। मुंडा आदिवासियों को अंग्रेज़ों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके बिरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था। 19वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे। कहा जाता है कि 1895 में कुछ ऐसी आलौकिक घटनाएँ घटीं, जिनके कारण लोग बिरसा को भगवान का अवतार मानने लगे। लोगों में यह विश्वास दृढ़ हो गया कि बिरसा के स्पर्श मात्र से ही रोग दूर हो जाते हैं।
बिरसा मुंडा का जन्म 1874 ई. में झारखण्ड राज्य के राँची में हुआ था। कहा जाता है कि उनके पिता, चाचा, ताऊ सभी ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। बिरसा के पिता 'सुगना मुंडा' जर्मन धर्म प्रचारकों के सहायक थे, बिरसा का बचपन अपने घर में, ननिहाल में और मौसी की ससुराल में बकरियों को चराते हुए बीता। बाद में उन्होंने कुछ दिन तक 'चाईबासा' के जर्मन मिशन स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। परन्तु स्कूलों में उनकी आदिवासी संस्कृति का जो उपहास किया जाता था, वह बिरसा को सहन नहीं हुआ। इस पर उन्होंने भी पादरियों का और उनके धर्म का भी मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। फिर क्या था। ईसाई धर्म प्रचारकों ने उन्हें स्कूल से निकाल दिया। इसके बाद बिरसा के जीवन में एक नया मोड़ आया। उनका स्वामी आनन्द पाण्डे से सम्पर्क हो गया और उन्हें हिन्दू धर्म तथा महाभारत के पात्रों का परिचय मिला।
जन-सामान्य का बिरसा में काफ़ी दृढ़ विश्वास हो चुका था, इससे बिरसा को अपने प्रभाव में वृद्धि करने में मदद मिली। लोग उनकी बातें सुनने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे। बिरसा ने पुराने अंधविश्वासों का खंडन किया। लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी। उनकी बातों का प्रभाव यह पड़ा कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेज़ीसे घटने लगी और जो मुंडा ईसाई बन गये थे, वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे। बिरसा मुंडा ने किसानों का शोषण करने वाले ज़मींदारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी लोगों को दी। यह देखकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लोगों की भीड़ जमा करने से रोका। बिरसा का कहना था कि मैं तो अपनी जाति को अपना धर्म सिखा रहा हूँ। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार करने का प्रयत्न किया, लेकिन गांव वालों ने उन्हें छुड़ा लिया। शीघ्र ही वे फिर गिरफ़्तार करके दो वर्ष के लिए हज़ारीबाग़ जेल में डाल दिये गये।
कहा जाता है कि नवंबर, 1897 में जब बिरसा मुंडा को पूरे 2 साल 12 दिन जेल में बिताने के बाद रिहा किया जा रहा था, तब उनके दो और साथियों--डोंका मुंडा और मझिया मुंडा-को भी छोड़ा जा रहा था l ये तीनों साथ-साथ जेल के मुख्य गेट की तरफ़ बढ़ रहे थे, जेल के क्लर्क ने रिहाई के कागज़ात के साथ कपड़ों का एक छोटा-सा बंडल भी दिया l बिरसा ने अपने पुराने सामान पर एक नज़र डाली और वो ये देख कर थोड़े परेशान हुए कि उसमें उनकी चप्पल और पगड़ी नहीं थी l
जब बिरसा के साथ डोंका ने पूछा कि बिरसा की चप्पल और पगड़ी कहाँ है, तो जेलर ने जवाब दिया कि कमिश्नर फ़ोर्ब्स के आदेश हैं कि हम आपकी चप्पल और पगड़ी आपको न दें क्योंकि सिर्फ़ ब्राह्मण, ज़मींदारों और साहूकारों को ही चप्पल और पगड़ी पहनने की इजाज़त है l इससे पहले कि बिरसा के साथी कुछ कहते बिरसा ने अपने हाथ के इशारे से उन्हें चुप रहने को कहा l जब बिरसा और उनके साथी जेल के गेट से बाहर निकले तो क़रीब 25 लोग उनके स्वागत में खड़े थे l
उन्होंने बिरसा को देखते ही नारा लगाया, 'बिरसा भगवान की जय'! बिरसा ने कहा आप सबको मुझे भगवान नहीं कहना चाहिए. इस लड़ाई में हम सब बराबर हैं l तब बिरसा के साथी भरमी ने कहा हमने आपको एक दूसरा नाम भी दिया था 'धरती आबा.' अब हम आपको इसी नाम से पुकारेंगे l
जेल से छूटने के बाद उन्होंने अपने अनुयायियों के दो दल बनाए। एक दल मुंडा धर्म का प्रचार करने लगा और दूसरा राजनीतिक कार्य करने लगा। नए युवक भी भर्ती किये गए। इस पर सरकार ने फिर उनकी गिरफ़्तारी का वारंट निकाला, किन्तु बिरसा मुंडा पकड़ में नहीं आये। इस बार का आन्दोलन बलपूर्वक सत्ता पर अधिकार के उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ा। यूरोपीय अधिकारियों और पादरियों को हटाकर उनके स्थान पर बिरसा के नेतृत्व में नये राज्य की स्थापना का निश्चय किया गया । 24 दिसम्बर, 1899 को उलगुलान आन्दोलन आरम्भ हुआ। तीरों से पुलिस थानों पर आक्रमण करके उनमें आग लगा दी गई। सेना से भी सीधी मुठभेड़ हुई, किन्तु तीर कमान गोलियों का सामना नहीं कर पाये। बिरसा मुंडा के साथी बड़ी संख्या में मारे गए। उनकी जाति के ही दो व्यक्तियों ने धन के लालच में बिरसा मुंडा को गिरफ़्तार करा दिया। 9 जून, 1900 ई. को जेल में उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उन्हें जहर दे दिया गया था तो कई इतिहासकार बुखार या संक्रमण भी मौत का कारण मानते हैं l बिरसा मुंडा की मृत्यु तो हो गई थी, लेकिन उनकी महान शख्सियत लोक गीतों और जातीय साहित्य में बिरसा मुंडा आज भी जीवित हैं।
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं
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