दिल्ली की साँसें : जहरीली हवा में जहर के घूंट
दिल्ली की साँसें : जहरीली हवा में जहर के घूंट
दीपावली के बाद अक्टूबर को दिल्ली एक बार फिर दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया l इसके पीछे एक बड़ा कारण दिवाली की रात को भारी मात्रा में पटाखे फोड़ना रहा l यूं तो दिल्ली सरकार ने दावा किया था कि इस दिवाली सिर्फ ग्रीन पटाखे जलाए जाएंगे, जिससे कि 20-30% कम प्रदूषण होगा लेकिन हकीकत में यह दावा जमीनी सच्चाई से मेल खाता नहीं दिखा l दिल्ली में सरकार भी बदल गई, परंतु परिस्थितियों में कोई सुधार नहीं हुआ है l एक तरफ जहां दिवाली से पहले पारंपरिक पटाखे धड़ल्ले से बेचे गए तो दूसरी तरफ दिवाली की रात सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध की धज्जियां उड़ाते हुए देर रात तक पटाखे जलाए गए l इस सबका असर यह हुआ कि दिवाली की रात में ही दिल्ली के कई इलाकों में एक्यूआई 999 के पार पहुंच गया l नतीजा आज दीपावली के कई दिन बाद भी दिल्ली की हवा बेहद खराब स्थिति में है, और दिल्ली के लोगों का दम घोंट रही है l इस जहरीली हवा से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं बच्चे और बुजुर्ग l खासकर वो बच्चे जो अस्थमा या सांस की बिमारियों से जूझ रहे हैं l उनके लिए हर एक सांस जहर का घूंट पीने जैसा है l कई बच्चे तो इस दौरान पूरी तरह नेब्युलाइज़र पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं l शारीरिक गतिविधि (खेलना, कूदना, दौड़ना आदि) छोटी उम्र के बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ विकास के लिए भी बहुत जरूरी है, स्कूली शिक्षा भी प्रभावित हो रही है, बढ़ते प्रदूषण के चलते दिल्ली के ज्यादातर बच्चे घरों में रहने को मजबूर हैं l
दीपावली की रात के पटाखों ने भारत की राजधानी को फिर से साँस लेने लायक नहीं छोड़ा। उत्सव के कुछ ही घंटों में दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) “हानिकारक” स्तर तक पहुंच गया, जिससे शहर ऐसा प्रतीत हुआ जैसे, “एक गैस चेंबर” बन गया हो। दिल्ली के हर व्यक्ति, छोटे बच्चों समेत, के फेफड़ों पर असर लगभग 50 सिगरेट रोज़ पीने के बराबर होता है। दिवाली के तुरंत बाद पल्मोनरी मामलों में 20% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह जीवन के लिए असहनीय है। लगातार इस वातावरण में जीना वास्तव में उम्र को काफी कम कर देता है। धुंध के बीच सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और बेरियम नाइट्रेट जैसे प्रदूषक एक घातक मिश्रण में बदल जाते हैं, जिसे अब हम स्मॉग कहते हैं। वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक अपशिष्ट और कचरा प्रबंधन की कमी पृष्ठभूमि है, लेकिन पराली जलाना और पटाखों की आतिशबाजी हर सर्दी में संकट को और बढ़ा देते हैं। इस साल पंजाब और हरियाणा में खेतों की आग में 77% की कमी के बावजूद, दिवाली के बाद शहर की हवा और खराब हो गई, जिससे पटाखों के उत्सर्जन को प्रमुख दोषी माना जा रहा है l वायु प्रदूषण को लेकर संकट राजनीतिक सुस्ती और दोषारोपण के कारण चल रहा है, चूंकि नेताओ की करनी - कथनी में फर्क़ है l राजनेताओ से और क्या उम्मीद करें? वे तथ्यों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं देखते। दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक एयरशेड अप्रोच जरूरी है l दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में समन्वित योजना की आवश्यकता है। नेता तो राज्यों की अपनी समस्या कहकर खुद को बचा लेते हैं परंतु हवा को पता है कि किस राज्य में किसकी सरकार है लेकिन वायु प्रदूषण का खासा असर आर्थिक और मानवीय मूल्यों को प्रभावित करने वाला है l अब दिल्ली में धूम्रपान करने वालों और न करने वालों में कोई अंतर नहीं है। गैर-धूम्रपानकर्ता भी फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित हो रहे हैं। बच्चों की संज्ञानात्मक क्षमता घट रही है, उत्पादकता कम हो रही है, और स्वास्थ्य खर्च बढ़ रहे हैं। फिर भी प्रदूषण कभी भारत में चुनावी मुद्दा नहीं बना। भारत में बुनियादी मुद्दों पर चर्चा बहुत कम ही होती है, और यही सबसे ज़्यादा दुःखद है l
सबसे ज़्यादा दुःखद है कि लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर सजग नहीं है, आज के दौर में संसाधन एवं शिक्षा का स्तर बढ़ गया है साथ ही जागरुकता के माध्यम आदि में बढोत्तरी होने के बाद ज़मीन पर कोई बदलाव नहीं दिखता l सीधी बात हर बात के लिए सरकार को दोष देना ही काफी नहीं है, लोगों का अपना सामाजिक, मानवीय उत्तरदायित्व होता है, आज अगर हम भारतीय लोगों की बेसिक समझ देखें तो काफी कभार दुःख होता है, यही कारण है कि वायु प्रदूषण से विजयी होने के लिए सभी का सहयोग ज़रूरी हो जाता है, ऐसे सामाजिक बदलाव के लिए सभी का सहयोग ज़रूरी होता है जब तक लोगों की सोच परिवर्तित नहीं होगी, तब तक वायु प्रदूषण से निजात नहीं मिलेगी l
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं
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