सोरायसिस: एक अनदेखी पीड़ा
सोरायसिस: एक अनदेखी पीड़ा
सोरायसिस कोई छूत की बीमारी नहीं है, लेकिन इसकी वजह से जो मानसिक और सामाजिक परेशानी होती है, वो काफी गहरी होती है, कई बार व्यक्ति को अपने घर - परिवार में ही अपमानित होना पड़ता है l यही कारण है कि हर साल 29 अक्टूबर को एक ऐसा दिन आता है, जो उन लोगों की आवाज़ बनता है जो सोरायसिस नाम की बीमारी से लड़ रहे हैं lभारत में भी, लगभग 0.5% से 2.8% आबादी सोरायसिस से प्रभावित है और इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं l इसकी शुरुआत 2004 में हुई थी, जब विभिन्न सोरायसिस रोगी संघों ने एक वैश्विक कार्यक्रम की स्थापना के लिए एकजुट होकर काम किया था। यह 30 या 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को प्रभावित करता है, जहां पुरुष महिलाओं की तुलना में दो गुना अधिक प्रभावित होते हैं।
दिलीप कुमार पाठक
सोरायसिस एक ऐसा इंफेक्शन है जो इंसान के शरीर के साथ-साथ उसके सेल्फ कॉन्फिडेंस और सोशल लाइफ को भी प्रभावित करता है l विश्व सोरायसिस दिवस सिर्फ जानकारी फैलाने के लिए नहीं, बल्कि इस बीमारी से जूझ रहे लोगों को समाज में सम्मान और सहयोग दिलाने के लिए भी मनाया जाता है l सोरायसिस एक ऑटोइम्युन समस्या है। जो छूने से बिल्कुल भी नहीं फैलती। सर्दियों में ये समस्या कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। इसमें स्किन पर एक मोटी परत जमने लगती है जो लाल या भूरे रंग की होती है और खुरदरी होती है। जिसकी वजह से हर वक्त खुजली होती रहती है। हाथ-पैर, तलवों, कोहनी, घुटनों पर इसका असर सबसे पहले और ज्यादा देखने को मिलता है। बिडम्बना ये भी है कि इस समस्या को कोई स्थायी इलाज नहीं मिल सका l इस समस्या की सबसे बड़ी वजह है रोग प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना। इसके अलावा शरीर में न्यूट्रिशन की कमी भी। इसके अलावा बॉडी में मॉश्चारइजर की कमी होना भी है। बॉडी में नमी बरकरार रखने के लिए पानी पीने के साथ ही बाहर से भी मॉइश्चराइज़ रखना जरूरी है अगर आप ऐसा नहीं करते तो सोरायसिस की समस्या हो सकती है। अपरस रोग, छाल रोग एक प्रकार का असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार (चर्मरोग) है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। यह रोग उन व्यक्तियों को होता है जो अधिक परेशानियों से घिरे रहते हैं। यह ऐसा दीर्घकालिक विकार है जिसका यह अर्थ होता है कि इसके लक्षण वर्षों तक बने रहेंगे। ये पूरे जीवन में आते-जाते रहते हैं। यह स्त्री-पुरुष दोनों ही को समान रूप से हो सकता है। सोरियासिस में त्वचा में कोशिकाओं की संख्या बढने लगती है। चमडी मोटी होने लगती है और उस पर खुरंड और पपडियां उत्पन्न हो जाती हैं। चिकित्सकों को अभी तक इस रोग की असली वजह का पता नहीं चला है। फिर भी अनुमान लगाया जाता है कि शरीर के इम्युन सिस्टम में व्यवधान आ जाने से यह रोग जन्म लेता है। इम्युन सिस्टम का मतलब शरीर की रोगों से लड़ने की प्रतिरक्षा प्रणाली से है। यह रोग आनुवांशिक (वंशानुगत पूर्ववृत्ति) भी होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। इस रोग का विस्तार सारी दुनिया में है। सर्दी के दिनों में इस रोग का उग्र रूप देखा जाता है। कुछ रोगी बताते हैं कि गर्मी के मौसम में और धूप से उनको राहत मिलती है। लाल खुरदरे धब्बे, त्वचा के अनुपयोगी परत में त्वचा कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाने के कारण पैदा होते हैं। सामान्यतया त्वचा कोशिकाएं पुरानी होकर शरीर के तल से झड़ती रहती है। इस प्रक्रिया में लगभग 4 सप्ताह का समय लग जाता है। कुछ व्यक्तियों को सोरियासिस होने पर त्वचा कोशिकाएं 3 से 4 दिन में ही झड़ने लगती है। यही अधिकाधिक त्वचा कोशिकाओं का झड़ाव त्वचा पर छालरोग के घाव पैदा कर देता है। कुछ कारक है जिनसे छाल रोग से पीड़ित व्यक्तियों में चकते पड़ सकते हैं। इन कारकों में त्वचा की ख़राबी (रसायन, संक्रमण, खुरचना, धूप से जलन) मद्यसार, हार्मोन परिवर्तन, धूम्रपान, बेटा-ब्लाकर जैसी औषधी तथा तनाव शामिल हैं।
हालांकि कुछ उपाय भी किए जा सकते हैं लेकिन धूप तीव्रता सहित त्वचा को चोट न पहुंचने दें। धूप में जाना इतना सीमित रखें कि धूप से जलन न होने पाएं। मद्यपान और धूम्रपान न करें। स्थिति को और बिगाड़ने वाली औषधी का सेवन न करें।
तनाव पर नियंत्रण रखें। त्वचा का पानी से संपर्क सीमित रखें।
फुहारा और स्नान को सीमित करें, तैरना सीमित करें।
त्वचा को खरोंचे नहीं। ऐसे कपड़े पहने जो त्वचा के संपर्क में आकर उसे नुकसान न पहुंचाएँ। संक्रमण और अन्य बीमारियाँ हो तो डाक्टर को दिखाएं। ज़्यादा मिर्च मसालेदार चीज़ें न खाएं। हम सभी को ध्यान रखना चाहिए कि बीमारियां तो आती जाती रहती हैं परंतु मानवता कायम रहना चाहिए, बीमारियो के कारण किसी को समाज में अपमानित न करना चाहिए, होने देना चाहिए, अन्यथा मानवता कलंकित होती है l
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं
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