ऑस्कर में लापता लेडीज
*ऑस्कर में लापता लेडीज*
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आख़िरकार किरण राव की फिल्म लापता लेडीज को ऑस्कर 2025 के लिए एंट्री मिल गई है. 'लापता लेडीज' फ़िल्म की चर्चा पहले नहीं हुई लेकिन इस फिल्म को माउथ पब्लिसिटी खूब पॉजिटिव मिली थी, अतः पब्लिसिटी के बाद देश में ख़ासी चर्चित रही. हिन्दी सिनेमा में भी फ़िल्म ख़ासी सराही गई. वहीँ फ़िल्म समीक्षकों की भरपूर सराहना मिली यही कारण है कि कम बजट में बनने वाली फ़िल्म कल्ट फ़िल्मों की फेहरिस्त में शामिल हो गई. अब जहां 'लापता लेडीज' ऑस्कर में जाने वाली है तो इस फ़िल्म के टाइटल को निर्माताओं ने पहले ही लापता कर दिया है. वहीं, ऑस्कर मिलने पहले ही निर्माताओं ने फिल्म का अंग्रेजी शीर्षक साझा किया है. बता दें कि लापता लेडीज को किरण राव ने डायरेक्ट किया था और इसे प्रोड्यूस आमिर खान ने किया था. इसमें प्रतिभा रांटा, स्पर्श श्रीवास्तव और नितांशी गोयल लीड रोल में थे. लापता लेडीज को 29 अन्य फिल्मों के मुकाबले चुना गया. 13 जूरी सदस्यों ने भारत की सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म ऑस्कर के लिए चुनने के लिए 12 हिंदी फिल्मों, छह तमिल और चार मलयालम फिल्मों पर विचार किया. स्पर्धा में शामिल अन्य फिल्मों में 'एनिमल', 'किल' , 'कल्कि 2898 ई' , 'श्रीकांत' , 'चंदू चैंपियन', 'जोरम' , 'मैदान' , 'सैम बहादुर', 'आर्टिकल 370' , 'मलयालम फिल्म' आट्टम' ने तो इस साल सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता - और पायल कपाड़िया की ऑल वी इमेजिन एज़ लाइट, जो कान्स विजेता है, वो भी शामिल रहीं हैं, लेकिन 'लापता लेडीज' ने इन सभी को पछाड़कर अपनी जगह बनाई है.
'आमिर खान'' मिस्टर परफेक्शनिस्ट' कहे जाते हैं. आमिर अपनी फ़िल्मों का बड़ी बारीकी से तानाबाना बुनते हैं. वे अपनी फिल्मों में जान लगा देते हैं, जल्दबाज़ी नहीं करते बल्कि एक फ़िल्म में सालों लगा देते हैं. आमिर अपनी फ़िल्मों में डूब जाते हैं. यही कारण है कि उनकी फ़िल्में सोचने पर मज़बूर करती हैं. सरोकार सिनेमा में उनका योगदान अपने दौर के फिल्मकारों से कहीं अधिक है. आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म 'लापता लेडीज' में आमिर खान का टच साफ नजर आता है, डायरेक्टर 'किरण राव' ने वैसा ही मैजिक क्रिएट किया है जिसके लिए आमिर जाने जातें हैं वो भी बिना बड़े सितारों, बड़े सेट, महंगे कॉस्ट्यूम के बिना किरण ने दिखा दिया है. उन्होंने आमिर से परफेक्शन बड़े अच्छे से सीखा है, किरण राव आमिर के साथ मिलकर सरोकार सिनेमा में एक नई इबारत लिख सकती हैं.
किरण राव अपनी फिल्म 'लापता लेडीज' में औरतों को लेकर पितृ सत्तात्मक सोच, लैंगिक असमानता, शिक्षा, दहेज प्रथा, आत्मनिर्भरता, घरेलू हिंसा, हीनता जैसे तमाम मुद्दों को परत दर परत खोलती हैं. उनकी फिल्म की खूबी ये है कि वे न सिर्फ औरतों से जुड़ी समस्याओं को सामने लाती हैं, हल्के - फुल्के अंदाज़ में उनका समाधान देने का प्रयास भी करती है.
फिल्म की कहानी कुछ इस तरह शुरू होती है. 1 ट्रेन में 2 ऐसे जोड़े चढ़ते हैं जिनकी अभी अभी शादी हुई है. दोनों दुल्हनों के चेहरे पर बड़ा सा घूंघट है, बल्कि दोनों का लिबास भी एक जैसा है. ट्रेन से उतरने की जल्दी में ये दोनो कैसे लापता हो जाती हैं. कहानी 2001 के आसपास की है. दीपक, एक किसान, अपनी नई दुल्हन, फूल कुमारी को ब्याह करके अपने साथ लेकर ट्रेन से अपने गांव वापस जा रहा है. दीपक एक और नवविवाहित जोड़े के साथ एक अच्छी खासी भीड़ में अपनी पत्नी 'फूल' के साथ चढ़ता है. अच्छी ख़ासी भीड़ होने के बाद भी नई दुल्हन 'फूल' को बैठने की जगह मिल जाती है. वहीँ दीपक पेशाब के लिए अपनी घूंघट में छिपी पत्नी को बैठाकर चला जाता है. उसके जाने के बाद उसकी बीवी की जगह एक और नई दुल्हन पुष्पा बैठ जाती है जगह सीमित होने के कारण अन्य लोग प्रबंधन कर लेते हैं. चूंकि सभी दुल्हनें एक ही रंग की दुल्हन की पोशाक पहनती हैं और अपने चेहरे को पूरी तरह से घूंघट से ढकती हैं , जैसी परंपरा है. दीपक को नींद आ जाती है और रात में उसे एहसास होता है कि वह अपने गंतव्य पर पहुँच गया है. जल्दी-जल्दी निकलने की वजह से अंधेरे और भ्रम में, वह गलत दुल्हन के साथ उतर जाता है और फूल दूसरे दूल्हे, प्रदीप के साथ ट्रेन में ही रह जाती है.
नव विवाहित जोड़े का उसके परिवार में बढ़िया द्वारा स्वागत किया जाता है, लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि यह गलत दुल्हन है, तो वे चौंक जाते हैं. बच्चा चिल्लाता है चाची बदल गई... चाची बदल गई. वह उन्हें अपना गलत नाम पुष्पा बताती है और झूठ बोलती है कि वह कहाँ से है. इस बीच, एक अलग स्टेशन पर, दीपक की पत्नी 'फूल' को इस गड़बड़ी का एहसास होता है, लेकिन स्टेशन मास्टर उसकी मदद करने में असमर्थ है क्योंकि उसे दीपक के गाँव का नाम नहीं पता है. कम उम्र में ब्याह दी गई फूल को अपने गांव एवं पति के गांव का नाम भी नहीं पता...जैसा कि लड़कियों को सिखाया जाता था कि ससुराल से अकेले मत आना जब आना तो अर्थी में आना, मतलब मर जाना लेकिन कभी ससुराल को छोड़कर मत आना. वह अपने परिवार को शर्मिंदा नहीं करना चाहती, इसलिए वह घर वापस जाने से भी इनकार कर देती है. वह दीपक के आने की स्थिति में स्टेशन पर ही रहने का फैसला करती है, और उसे एक महिला मंजू द्वारा मदद मिलती है, जो प्लेटफ़ॉर्म पर एक चाय की दुकान चलाती है. मंजू दादी फूल को ज़िन्दगी की सच्चाइयों से परिचय कराती हैं मगर प्यार से... कहती हैं: “जो आदमी तुमसे प्यार करता है, उसे तुम्हें मारने का अधिकार है” और “एक दिन, मैंने भी अपने अधिकार का प्रयोग किया”. दूसरे दृश्य में फूल मंजू दादी से पूछती है: “हम लड़कियों को कोई अवसर क्यों नहीं दिया जाता दादी?” मंजू दादी कहती हैं: “महिलाएँ खेती कर सकती हैं और खाना बना सकती हैं. हम बच्चे पैदा कर सकती हैं और उनका पालन-पोषण कर सकती हैं. अगर आप इसके बारे में सोचें, तो महिलाओं को वास्तव में पुरुषों की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है, लेकिन, अगर सभी महिलाओं को यह पता चल जाए, तो पुरुष बर्बाद हो जाएँगे, है न?” छोटा सा टी स्टॉल चलाने वाली मंजू पूरी फ़िल्म का सबसे जानदार संवाद बोलती हैं, जो पूरे पुरूष प्रधान समाज को आईना दिखाता हुआ संवाद है.
फूल की मदद करने वाले छोटू ने जब फूल को बताया कि मेरा दोस्त दिनभर दिव्यांग बनकर भीख मांगता है, लेकिन जब फूल ने पूछा "ये सब क्या है" - "तब छोटू कहता है -"फूल दुनिया बड़ी अज़ीब है यहां जो दिखता है अक्सर वो होता नहीं है, लेकिन जो होता नहीं है वह दिखता है " ये संवाद छोटी सी फूल की समझ से तो बाहर का था लेकिन जब दर्शक देखते हैं तो एक लाइन में दुनिया की हक़ीक़त को समझ जाते हैं. इस हल्की - फुल्की फ़िल्म में बहुत ही कमाल डायलॉग बोले जाते हैं. दीपक, फूल की तलाश में बेचैन होकर एसआई श्याम मनोहर (रवि किशन) के पास रिपोर्ट दर्ज कराता है. मनोहर को लगता है कि पुष्पा चोर हो सकती है, वह उसका पीछा करता है और उसे आभूषण बेचते, मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते और बस टिकट खरीदते देखता है. पुष्पा दीपक के परिवार के साथ घुलमिल जाती है और अपनी दोस्ती प्रगाढ़ कर लेती है. इस बीच फूल चाय की दुकान पर काम करती है, मंजू माई की मदद करती है, कलाकंद बनाती है और आत्मनिर्भर बनना सीखती है.
यह सोचकर कि पुष्पा चोरों के गिरोह से संबंधित है, मनोहर उसे गिरफ्तार कर लेता है जब उसे पता चलता है कि उसका असली नाम जया है. जया बताती है - "वह देहरादून में जैविक खेती का कोर्स करना चाहती थी , लेकिन उसके परिवार ने उसे जबरदस्ती प्रदीप से शादी करवा दी, और यह भी कि प्रदीप उसके प्रति अपमानजनक व्यवहार करता था इसलिए वह वापस नहीं लौटना चाहती. प्रदीप पुलिस स्टेशन आता है, वह पुलिस के सामने उसे थप्पड़ मारता है और उसकी माँ से पूरा दहेज वसूलने की धमकी देता है. जया का पति एक क्रूर व्यक्ति है, जिसने अपनी पहली पत्नी को मार डाला है, इस लिहाज से, जया का लापता होना उसके लिए एक वरदान था. वह अब देहरादून में जैविक खेती का अध्ययन करने के अपने सपनों को पूरा करने के बारे में सोच सकती थी, हालांकि इतना भी आसान नहीं होता. उसके लिए कई बाधाएं हैं. एक है पुलिस (रवि किशन द्वारा अभिनीत), जो भ्रष्ट है - लेकिन अंत में, सिद्धांतवादी ईमानदार पुलिस अफ़सर निकलते हैं.
मनोहर इंस्पेक्टर कहते है- उसकी हरकतें अपराध हैं और चूँकि जया वयस्क है, इसलिए उसे किसी के साथ जाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. वह जया को छोड़ देते हैं. और प्रदीप को चेतावनी देते हैं कि अगर उसने कभी जया को ढूंढकर परेशान करने की कोशिश की, उसे प्रताड़ित करने का प्रयास किया तो तो वह उसे घरेलू हिंसा और अपनी पिछली पत्नी को जलाकर मार डालने के आरोप में गिरफ्तार कर लेगा. जया ने दीपक की भाभी पूनम से फूल का एक स्केच बनाने को कहा था और उसके पोस्टर बनाकर सार्वजनिक स्थानों पर चिपका दिए थे, जिसमें लिखा था कि वह खो गई है, साथ ही अगर वह मिल जाए तो उसका संपर्क विवरण भी दिया था. इसकी मदद से फूल आखिरकार अपना रास्ता खोज पाती है और दीपक से फिर से मिल पाती है, जैसे ही फिल्म खत्म होती है, जया दीपक से माफ़ी मांगती है, लेकिन, दीपक कहता है: "सपने देखने के लिए माफ़ी मत मांगो"जबकि जया अपनी पढ़ाई के लिए देहरादून चली जाती है.
ये ऐसी फिल्म है जो ये बताती है कि अगर कहानी को सही तरीके से पेश किया जाए तो कुछ मायने नहीं रखता, न बड़ा बजट, न सुपरस्टार, न बड़ा सेट.. जब कहानी सिल्वर स्क्रीन पर आती हैं और उसका कथानक सही तरीके से पेश कर दिया जाए तो माउथ पब्लिसिटी के ज़रिए फिल्म चल जाती है.
ये फिल्म एक बेहद अहम मुद्दे को इतने एंटरटेनिंग तरीके से बताती है कि अहसास भी नहीं होता की हमें ज्ञान दिया जा रहा है जबकि फ़िल्म अपना संदेश दे चुकी होती है. यही तो सिनेमा की खासियत है या फिर कहें अच्छे और सधे हुए सिनेमा की खासियत है. फिल्म का हर किरदार जरूरी है. चाहे वो एक होटल में बर्तन धोने वाला छोटा सा लड़का ही क्यों ना हो. ये फिल्म आपसे बहुत कुछ कह जाती है लेकिन इतने हल्के फुल्के अंदाज में कि यकीन नहीं होता. श्रीवास्तव इससे पहले वेब सीरीज जामतारा में दिख चुके हैं लेकिन फिल्म उनकी ये पहली है और वो खूब जमे हैं. स्पर्श श्रीवास्तव ने एक गांव के लड़के के लहजे को खूब स्पर्श किया है जो उनकी अदाकारी में दिखता भी है. जया (प्रतिभा रांटा) ने एक गांव की लड़की जो अनपढ़ है, उसने शब्द उच्चारण एवं अदायगी से अपना प्रभाव छोड़ा है. रवि किशन पुलिसवाले के किरदार में हैं. ट्रेलर से ही उनका रंग जम गया था और फिल्म में वो नई जान डाल देते हैं. वो जब स्क्रीन पर आते ही बहुत उम्दा अभिनय करते हैं, कुल मिलाकर रवि किशन इस फिल्म की रीड की तरह फिट हो जाते हैं. रवि किशन का अभिनय बहुत समय तक याद रखा जाएगा.
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