*गृहणी से नायाब चित्रकार तक शालिनी की प्रेरणादायक कहानी*

*गृहणी से नायाब चित्रकार तक शालिनी की प्रेरणादायक कहानी*
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ज़िन्दगी की कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं जो हक़ीक़त के कैनवास में तो होती हैं, लेकिन लोगों के जेहन से दूर होती हैं. या यूं कहें कि लोग समझ नहीं पाते. ऐसी ही एक कहानी सुनाने जा रहा हूं जो अपने आप में एक प्रेरणा है. ये कहानी  छोटे से शहर के एक परम्परागत पारिवारिक मूल्यों वाले परिवार सत्यनारायण - आशा की सुपुत्री की है, जिसने कभी भी खुद को कमज़ोर नहीं होने दिया. खुद को इतना रचनात्मक बनाया कि आज उसकी ज़िंदगी रचनात्मकता में डूबी हुई है. छोटे शहर बरेली की उस लड़की की शादी दिल्ली जैसे विशाल शहर में हो गई... छोटे शहर की मगर ग्रेजुएट लड़की जब दिल्ली आई तो दिल्ली की उस चकाचौंध में खो जाने का डर था, वैसे भी छोटे शहर से दिल्ली जैसे विशाल शहर में खुद को ढालना एक बड़ी चुनौती थी. एक दिन मीडिया संस्थान एनडीटीवी में काम करने का मौका मिला, लेकिन छोटे - छोटे बच्चों को देखकर उस महिला ने अपनी नौकरी अपने सुनहरे भविष्य को छोड़ अपने आप को बच्चों के लिए समर्पित कर दिया. यह लगभग 25 साल पुरानी बात है अगर वो लड़की अब तक उस संस्थान में जुड़ी होती तो अतिशयोक्ति नहीं होगी आज देश प्रमुख पत्रकारों में शुमार होती. लेकिन कहते हैं डेस्टिनी ने कुछ और ही तय कर दिया था. 
वैसे यह सुनना सोचना, आसान लगता ज़रूर है लेकिन इतना बड़ा कॅरियर छोड़ पाना सिर्फ़ एक माँ के लिए ही आसान होता होगा. इसलिए ही कहा जाता है कि माँ की ममता की थाह पाना मुमकिन नहीं . सोचिए जब उस महिला ने अपनी ससुराल में उच्च शिक्षित लोगों के बीच खुद को पाया तो कई तो उन्हें उनके अशुद्ध उच्चारण होने के कारण मज़ाक बनाते, ये सब हास्य भाव कहे जा सकते हैं, लेकिन किसी के लिए आत्मविश्वास को मारने के लिए काफ़ी होते हैं. ऐसे ही त्याग की कहानियां इतिहास में भरी पड़ी हैं, लेकिन ये कहानी अपने आप में खास है. इसलिए ही सुनाने जा रहा हूं. 

इसी नायिका के छोटे - छोटे बच्चे स्कूल जाने लगे, पति अपने ऑफिस जाने लगे, सास ससुर भी ऑफिस जाने लगे. एक हॉउस वाइफ होते हुए सभी के लिए काम करने के बावजूद जब सब अपने - अपने काम पर चले जाते तो उस छोटे शहर की महिला को दिल्ली के इस बड़े से घर में बहुत अज़ीब लगता. अतः उसने फिर से दशकों बाद पढ़ने का सोचा और दिल्ली के एक संस्थान में एमबीए में दाखिला ले लिया. इसी बीच महिला के पति मिस्टर मनोज यानि मेरे बाबा ने दिल्ली जैसे शहर में स्थापित होने में बहुत साथ दिया. ऐसे समर्पित पुरुष भी अपने आप में एक प्रेरणा हैं. दिल्ली में जब उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी हुई. सास - ससुर (उषा - पवन दादा दादी) ने भी छोटे शहर से आई लड़की को अपनी बेटी की तरह सम्भाल लिया था. कहते हैं कि रचनात्मक व्यक्ति कभी भी खुद को अकेला नहीं पाता, शादी, बच्चों के साथ ही बचपन में उकेरी गईं कुछ पेंटिंग्स ने हौसला बढ़ाने में मदद की.. 

*ब्रुश ने बदली ज़िन्दगी की राह*

घर - परिवार की तमाम जिम्मेदारियों के बीच रचनात्मकता के बीच में आड़े आता स्वास्थ्य पेंटिंग को तो जैसे खत्म ही करने वाला था, और बचपन से ही पेंटिग बनाने की कला जैसे खत्म होने वाली थी. पहले मैं अपनी माँ की पेंटिग पर ज़्यादा गौर नहीं करता था, लेकिन मुझे एक बार एक पेंटिग एग्जिबशन
 में आमंत्रित किया गया, मैंने उस पेंटिग एग्जीबिशन को देखकर अपनी माँ की पेंटिग की बहुत ज़्यादा कद्र हुई और मैं मन ही मन भावुक हुआ तब ही मैंने सोचा कि एक दिन माँ की पेंटिग का भी एग्जीबिशन होगा.. घर परिवार में उलझी माँ... ऊपर से गिरता स्वास्थ्य पेंटिग बनाने के बीच रोड़ा था. तब मैंने माँ से कहा - "माँ आप दुनिया की सबसे महान आर्टिस्ट बनने की प्रतिभा रखती हैं लेकिन आपने अपनी प्रतिभा को घर की चार दीवारी में खत्म कर दिया. हमेशा मुझे समझाने वाली माँ को मैंने समझाया कि आप फ़िर से अपनी पेंटिंग बनाना शुरू कीजिए". बहुत सालों बाद माँ ने ब्रश उठाई, और कैनवास पर रंग उतारना शुरू किया, कहते हैं कि प्रतिभा कभी भी खत्म नहीं होती.. जल्द ही माँ के हाथ फ़िर से बैठ गए और एक से बढ़कर एक पेंटिग बनाने लगीं.. माँ की पेटिंग में एक अद्भुत रेंज है. जिनमें ऑइल पेंटिंग्स, वाटर कलर, एक्रेलिक पेंटिंग्स, पेस्टल पेंटिंग्स, पॉप आर्ट पेंटिंग्स, फोटोरियलिज़्म पेंटिंग्स, यथार्थवादी पेंटिंग्स, इंक पेंटिंग्स शामिल हैं जिनमें... कुछ प्रमुख भारतीय पेंटिंग्स जैसे - मधुबनी, जैन, कलमकारी, बंगाल पैट, आदिवासी, पिछवाई, पट्ट चित्र प्रमुख पेंटिंग्स बनाने में पारंगत हैं. 

*ग्लोबल आर्ट मार्केट में पहचान*

माँ के लिए पेंटिग एक जुनून है, यह मैंने आभास भी किया है लेकिन इतने बड़े संयुक्त परिवारों में खुद ही सबकुछ संभालना यहां तक कि किचिन का पूरा काम घर का पूरा काम करना एवं गार्डन संभालना सबसे प्रमुख हैं. अब समय तो सीमित ही होता है, लेकिन मैंने माँ को देर रात तक जागते हुए, अपने स्वास्थ्य की चुनौतियों का सामना करने के बावजूद जब डॉ ने एक ही आसान में ज़्यादा देर तक बैठना, खड़ा होना मना कर रखा है, लेकिन माँ की लगन ने उन्हें एक ऐसे आर्टिस्ट के रूप में खड़ा कर दिया है जिन्होंने अपनी प्रतिभा के लिए काफी कुछ चुकाया है. घर - परिवार, रिश्तेदारों के बार - बार टोकने के बावजूद कि आप ये पेंटिंग्स बनाकर क्या करेंगी ?? ये पेंटिंग्स बनाकर आपको क्या मिलेगा? ज़्यादा पेंटिग में डूबना उचित नहीं है. कभी - कभार बच्चो को माँ - बाप की हौसलाअफजाई करने की आवश्यकता होती है. मैंने माँ को उनकी प्रतिभा बताई और विश्वास दिलाया कि आप दुनिया की महानतम चित्रकारों में शुमार होने की काबिलियत रखती हैं. तब माँ अपनी पेंटिग के लिए फ़िर से समर्पित हो गईं. मैंने देखा कि मेरी और बाबा की तारीफें माँ के हौसले में चार चांद लगा देतीं. देखते ही देखते माँ ने सैकड़ों पेंटिंग्स उकेर ड़ाली.. देखते ही देखते परिचित, रिश्तेदारों की सोच परिवर्तित हुई. मेरी माँ की पेंटिंग्स, प्रतिभा को सराहने के लिए सब मजबूर हो गए. एक न एक दिन प्रतिभा अपने मुकाम पर पहुंच ही जाती है. माँ के फोटो एग्जिबशन लगाने का ख़्वाब अभी दूर होता जा रहा है क्योंकि उतनी पेंटिंग्स उतनी नहीं बना पा रहीं जितनी पेंटिंग्स एक एग्जिबिशन के लिए लगती हैं. उनकी पेंटिंग्स बनने से पहले ही बिक जाती हैं. भारत तो भारत माँ की पेंटिंग्स की प्रतिभा हिन्दुस्तान सहित सात समुन्दर पार ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड, अमेरिका तक रोशन हो रही है. दिल्ली में भी माँ की बहुतेरी पेंटिंग्स ऑनलाइन भी विक्रय हो जाती हैं. पिछले कुछ सालों से माँ न जाने कितने बच्चों को पेंटिंग्स प्रशिक्षण देती हैं, जिनमे से अधिकांश बच्चे निःशुल्क ही सीखते हैं क्योंकि कुछ छात्र गरीबो के बच्चे होते हैं. माँ का उद्देश्य बच्चों को सिखाना है न कि पैसे कमाना.. य़ह आचरण अपने आप में नायाब है. 

*पेंटिंग्स से जुड़े जीवन के ज़न सरोकार*

मेरा और माँ का उद्देश्य है कि देश दुनिया के बड़े से बड़े संस्थान के मुख्यालय में माँ की पेंटिग लगी हुई हो. इसके लिए माँ ने अपनी पेंटिंग्स कुछ बड़े - बड़े संस्थानों में दान भी किया है. 
बहुत सी पेंटिंग्स बड़े बड़े संस्थानों, पुस्तकालयों में पहुंच गईं हैं, एक चित्रकार के लिए यह सबसे बड़ा रिवार्ड होता है. माँ की पेंटिग में विविधता है. मेरी माँ का समर्पण आर्टिस्ट की अपनी प्रतिभा के प्रति इमानदारी एक प्रेरणा है. 

*समाज़ के लिए एक सकारात्मक संदेश*

मेरी माँ घर परिवार, बच्चों के लिए एक समर्पित महिला जिसको मैंने हमेशा काम करते हुए देखा है, जिन्हें मैंने कभी भी आराम करते हुए नहीं देखा. मैंने अपनी माँ को कभी भी शिकायत करते हुए नहीं देखा, हमेशा सभी के लिए तत्पर रहीं. शुरुआती सालों में उनकी प्रतिभा चार - दीवारी में भले ही कैद रही लेकिन अब मेरी माँ की प्रतिभा रोशन हो रही है. किसी भी लड़की का जीवन भारतीय समाज में एक संघर्ष ही है, लेकिन एक प्रतिभा हो और अपने टैलेंट के प्रति समर्पण हो तो एक न एक दिन सर्वोच्च मुकाम हासिल होता है. वैसे इस क्रूर दुनिया में अपने हिस्से का सम्मान कमाना पड़ता है. मैंने वो सम्मान, वो प्रेम कमाते हुए अपनी माँ को देखा है. मैं जब भी एक संघर्षपूर्ण, ईमानदार, मेहनती जीवन को देखता हूं तो माँ के प्रति एक अलग ही सम्मान का भाव प्रस्फुटित होता है. कहते हैं कि प्रत्येक माँ आदरणीय होती है, लेकिन मेरी माँ के लिए मेरे पास कोई माकूल शब्द नहीं हैं जिससे मैं उनके लिए कुछ लिख सकूं. किसी शायर ने खूब कहा है - "अच्छे मर्दों की वज़ह से नहीं बल्कि अच्छी औरतों की वजह से चलती है ये दुनिया" .... कभी - कभार लगता है मेरी माँ शालिनी ही वो अच्छी औरत है, जिनकी वज़ह से चल रही है ये दुनिया.... कम से कम हमारी दुनिया तो चल ही रही है. यह कहानी बताने का उदेश्य सिर्फ इतना है कि हर घर में महिलाएं टैलेंट से भरपूर होती हैं, लेकिन उन्हें कोई सपोर्ट नहीं मिलता और वो टैलेंट चूल्हा, चौका में दफ्न हो जाता है. अतः आप सभी अपनी माँ बहिन, बेटी का भावनात्मक सपोर्ट, सम्मान कीजिए और उनकी प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हो जाइए . किसी भी घर की समृद्धि का सबसे प्रमुख कारण महिलाएं होती हैं. अब अपनी माँ बहिन, बेटियों को आगे बढ़ाने का सही समय है. जब जागे तभी सवेरा.... 

दिलीप कुमार पाठक

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