'कमाल कर गए 'अमरोही'

कमाल कर गए 'अमरोही'

(कमाल अमरोही) 

कमाल अमरोही 17 जनवरी, 1918 को अमरोहा में जन्मे थे. कमाल अमरोही को याद करना बड़ा तकलीफदेह है, लेकिन रचनात्मक व्यक्ति अपनी कलात्मक कृतियों के जरिए याद किया जाता है. हिन्दी सिनेमा में अपना खास मुकाम रखने वाले विद्वान, महान फ़िल्मकार, कलमकार की ज़िंदगी के किस्से दुःख एवं असंतुलन के साथ संतुलित थे, जो कभी भुलाए नहीं जा सकेंगे. मीना कुमारी के पति के रूप में भले ही वो याद न किए जाएं लेकिन पाकीजा फिल्म के फ़िल्मकार के रूप में सदियों तक याद रहेगे, जब तक कि कायनात है. महल, पाकीज़ा और रज़िया सुल्तान जैसी भव्य कलात्मक फ़िल्मों को सिल्वर स्क्रीन पर काव्यात्मकता के साथ रचना करने वाले फ़िल्मकार थे. कमाल अमरोही बेहतरीन गीतकार, पटकथा और संवाद लेखक, निर्माता एवं निर्देशक के रूप में भारतीय सिनेमा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है. हिन्दी सिनेमा को एक दिशा देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है. व्यक्तिगत रूप से निशाने लगाकर हम उनकी ज़िन्दगी के हसीन कैनवास की यादगार यात्रा को कैसे भूल जाएं? पाकीज़ा उनकी ज़िंदगी का एक ऐसा हसीन ख्वाब था, जिसे उन्होंने खुली आँखों के साथ देखा था. अपने फ़िल्मी जीवन के आखिरी दौर में वह 'अंतिम मुग़ल' नाम से फ़िल्म बनाना चाहते थे, कहते हैं "किसी को मुकम्मिल जहां नहीं मिलता". यह ख्वाब अधूरा ही रह गया. कमाल अमरोही अपने जीवन में बड़े - बड़े कमाल कर गए हैं, लेकिन उनका कमाल करना उनके जीवन के संघर्षों एवं उनके दार्शनिक दृष्टिकोण को दर्शाता है. कमाल अमरोही के अमरोहा से बंबई तक पहुँचने और फिर सफलता का इतिहास रचने की कहानी अपने आप में एक अनसुलझा सवाल है. बचपन तो बचपन ही होता है, चाहे वो शाहजहां हों या कमाल अमरोही एक बार अपनी माँ के डाँटने पर उन्होंने वादा किया कि वह एक दिन इतनी ख्याति कमाएंगे एवं उनके आँचल को चाँदी के सिक्कों से भर देंगे. उनकी शरारतों से तंग होकर एक दिन उनके बड़े भाई ने उन्हें गुस्से में थप्पड़ मार दिया, जिससे कमाल अमरोही नाराज़गी में घर से भागकर लाहौर पहुँच गए. उनका यह अंदाज़ उनके साथ आजीवन रहा, आज के दौर में इस स्वभाव के आदमी को घमंडी कहा जाता है, लेकिन हम किसी को क्या कह सकते हैं, इस धरती पर शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो सांसरिक भावनाओ से परे हो... कमाल अमरोही बेहद प्रतिभाशाली इंसान लेकिन निजी ज़िंदगी में अनसुलझे ही बने रहे. 

कमाल अमरोही के लिए लाहौर जाना उनके जीवन की दिशा बदलने वाला कदम सिद्ध हुआ. वहाँ उन्होंने मास्टर की डिग्री हासिल की और फिर एक उर्दू समाचार पत्र में मात्र 18 वर्ष की आयु में ही नियमित रूप से स्तम्भ लिखने लगे. उनकी प्रतिभा का सम्मान करते हुए अख़बार के सम्पादक ने उनका वेतन बढाकर 300 रुपए मासिक कर दिया, जो उस समय क़ाफी बड़ी रकम थी. अख़बार में कुछ समय तक काम करने के बाद वह कलकत्ता चले गए और फिर वहाँ से बंबई आ गए. लाहौर में उनकी मुलाक़ात महान गायक, अभिनेता के एल सहगल से हुई, जो उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें फ़िल्मों में काम करने के लिए महान अभिनेता एवं फ़िल्मकार सोहराब मोदी से उनकी मुलाकात कराई. इसी समय उनकी एक लघु कथा ‘सपनों का महल’ से निर्माता-निर्देशक और कहानीकार 'ख़्वाजा अहमद अब्बास' प्रभावित हुए थे. प्रतिभा अपना रास्ता स्वयं ही निकाल लेती है. सोहराब मोदी को एक कहानी की तलाश थी. उनकी कहानी पर आधारित फ़िल्म ‘पुकार’ 1939 में सुपरहिट हुई थी. 'नसीम बानो' और 'चंद्रमोहन' अभिनीत इस फ़िल्म के लिए उन्होंने बेहतरीन गीत भी लिखे थे. पटकथा लेखक, गीतकार, शायर, फ़िल्मकार, निर्माता, निर्देशक इतनी सारी नायाब कला के धनी को क्या यह कहकर भुला दें कि वो बहुत जिद्दी थे, क्या हम इतने बेसिस हैं??? इस फिल्म में उनके लिखे कुछ यादगार गीत.... 

धोया महोबे घाट हे हो धोबिया रे, दिल में तू आँखों में तू मेनका, 
गीत सुनो वाह गीत सैयां, काहे को मोहे छेड़े रे बेईमनवा, इसके 
बाद तो फ़िल्मों के लिए कहानी, पटकथा और संवाद लिखने का उनका सिलसिला चल पड़ा और उन्होंने जेलर, मैं हारी, भरोसा, मज़ाक, फूल, शाहजहां, महल, दायरा, दिल अपना और प्रीत पराई, मुग़ले आजम, पाकीज़ा, शंकर हुसैन, और रज़िया सुल्तान भरोसा जैसी फ़िल्मों के लिए कहानी, पटकथा और संवाद लिखने का काम किया. उनकी फ़िल्मों में उनकी मौजूदगी उनको खूब बयां करती है.

महल फ़िल्म की कामयाबी के बाद कमाल अमरोही ने 1953 में 'कमाल पिक्चर्स' और 1958 में कमालिस्तान स्टूडियो की स्थापना की. कमाल पिक्चर्स के बैनर तले उन्होंने अभिनेत्री पत्नी मीना कुमारी को लेकर 'दायरा' फ़िल्म का निर्माण किया, लेकिन कला फ़िल्म मानी जाने वाली यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई. मुगल ए आज़म फ़िल्म के लिए वजाहत मिर्जा संवाद लिख रहे थे,लिहाज़ा 'के. आसिफ' को लगा कि एक ऐसे संवाद लेखक की ज़रूरत है, जिसके लिखे डायलॉग दर्शकों के दिमाग में अंकित हो जाएं. इसके लिए उन्हें कमाल अमरोही से ज्यादा उपयुक्त व्यक्ति कोई नहीं लगा. उन्होंने उन्हें अपने चार संवाद लेखकों में शामिल कर लिया. उनके उर्दू भाषा में लिखे डायलॉग इतने मशहूर हुए कि उस दौरान प्रेमी और प्रेमिकाएं प्रेमपत्रों में मुग़ले आजम के संवादों के माध्यम से अपनी मोहब्बत का इजहार करने लगे थे. इस फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का फ़िल्म फेयर पुरस्कार दिया गया.

कमाल अमरोही ने बेहद चुनिंदा फ़िल्मों के लिए काम किया लेकिन जो भी काम किया पूरी तबीयत और जुनून के साथ किया. उनके काम पर उनके व्यक्तित्व की छाप रहती थी. यही वजह है कि फ़िल्में बनाने की उनकी रफ़्तार काफ़ी धीमी रहती थी और उन्हें इसके लिए आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ता था. आदमी अपनी मेहनत एवं संघर्षों में तो अकेला होता है, लेकिन उसकी सफलता मे सभी उनके साथ होते हैं. कई बार अति ज़हीन आदमी समझ नहीं आते, यह भी देखा गया है कि ज़हीन लोग ज्यादा समझौतों के लिए नहीं जाने जाते, अगर कमाल अमरोही ने नहीं किया तो इससे यह तो बिल्कुल भी नहीं कहा जाना चाहिए, कि उनका प्यार कुछ कमतर था, खुद की जिंदगी में छोटे - छोटे मअसलों के कारण अपने मरहले त्याग देने वाले मलंग के अलावा क्या सच्चा प्यार नहीं हो सकता?? कमाल अमरोही जैसे इंसान को एक नकारात्मक इंसान की छवि का तिलिस्म क्या टूटेगा?? सवाल है! 

महान शायर, गीतकार शकील बदायूंनी ने शाहजहां एवं उनकी प्रेयसी मुमताज की मुहब्बत की निशानी अजूबे ताजमहल पर एक नज़्म लिखते हुए कहा. 

'इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल 
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है 
इस के साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे 
ख़त्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है 
इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल' 

अंततः एक महान फ़िल्मकार कमाल अमरोही जिनको खुदा ने ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी की मुहब्बत से नवाजा था. अपनी हसीन बेगम मशहूर अदाकारा मीना कुमारी को मुहब्बत की निशानी के नाम पर अमर फ़िल्म 'पाकीजा' का निर्माण किया. फ़िल्म 'पाकीजा', आज भी कमाल अमरोही एवं मीना कुमारी की अमर मुहब्बत की कहानी कहती है. पाकीजा फिल्म केवल मीना कुमारी ही नहीं बल्कि कमाल अमरोही की सिनेमाई समझ एवं उनके रूहानी किसी की भी समझ से परे इश्क़ की दास्ताँ सुनाती है. फ़िल्मकार कमाल अमरोही अपनी पत्नी मीना कुमारी से बेइंतिहा मुहब्बत करते थे. कमाल अमरोही हमेशा यही चाहते थे कि वो अपनी पत्नी को लेकर एक ऐसी अमर फिल्म बनाए, जिसको सदियों तक देखा जा सके और उनकी पत्नी का नाम अमर हो सके. इसके बाद ही उन्होंने मीना कुमारी को लेकर ‘पाकीज़ा’‍ फिल्म बनाकर कमाल अमरोही ऐसा कमाल कर गए, कि शायरी के महबूब ग़ालिब, शाहजहां के मुमताज तो पाकीजा के कमाल भी कमाल हैं. जिन्होंने अपनी सिनेमाई समझ एवं मुहब्बत का ऐसा तिलिस्म कायम किया, जिससे कोई निकलना ही नहीं चाहता. 

बादशाह शाहजहां एवं मुमताज की प्रेम कहानी को पढ़ा नहीं जाता बल्कि महसूस किया जाता है. और वो महसूस किया जाना, कि वो अपनी पत्मी मुमताज से बेपनाह मोहब्बत करते थे. वो एहसास हर प्रेमी को एक अनोखी दुनिया की सैर पर ले जाता है. कमाल अमरोही मीना को लेकर एक ऐसी फिल्म बनाने की ख्वाहिश रखते थे. साल 1958 में उन्होंने मीना कुमारी को लेकर ‘पाकीज़ा’‍ फिल्म बनानी शुरू की. इसी बीच साल 1960 में निर्देशक के आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ रिलीज हुई थी. एतिहासिक एवं बगावती मुहब्बत की इस कालजयी फिल्म को बेशुमार प्यार मिला. जिसने दर्शकों का दिल जीत लिया और सुर्खियों में छा गई. खास बात ये है कि इस फिल्म की कहानी कमाल अमरोही द्वारा भी दी गई थी. इसके बाद उन्होंने सोचा कि पाकीज़ा को भी इसी तरह की साज सज्जा के साथ बनाना होगा, यह सिनेमाई अंदाज़ फ़िल्मों को ऊंचा फलक देता है. 

कमाल अमरोही लेखन, एवं असल ज़िन्दगी में भी अमरोहा की उन बचपन की गलियों की उस धूल को अपने वज़ूद से दूर नहीं कर सके. उनके सिनेमा के के इर्द - गिर्द पुरानी हवेलियों के अदब की खुशबू खूब महसूस की जा सकती है. एक शायर, कलमकार, अपने शहर की बचपन की यादों को अपनी ज़िन्दगी में कुछ इस तरह वाबस्ता कर लेते हैं जो उनकी रचनाओं में खुलकर आता है. अमरोहा में उनकी हवेली थी, जिसके नक्शे पर पर पाकीजा का सेट बनवाया गया था. शुरुआत में पाकीजा ब्लैक एंड व्हाइट बन रही थी. साल 1960 के आसपास रंगीन फिल्मों का दौर भी लगभग शुरू हो चुका था. इसलिए पाकीजा को भी रंगीन बनाने का काम शुरू किया गया. कमाल अपनी इस फिल्म में इस कदर खो गए कि उन पर परफेक्शन का भूत सवार हो गया. जरा सी भी कमी होने पर वे फिल्म की शूटिंग नहीं करते थे. सेट पर जरा सी भी खरोंच आने पर वो शूटिंग को रोक दिया करते थे. इतना ही नहीं उस समय सिनेमास्कोप की तकनीक आई तो इसका इस्तेमाल पाकीज़ा में भी किया गया.

अब तक हिन्दी सिनेमा में गुरुदत्त साहब की 'कागज के फूल' और दिलीप साहब की 'लीडर' पहली दो भारतीय फिल्म थी जो सिनेमास्कोप तकनीक पर बनाई गईं थीं. दोनों फ़िल्मों की सिनेमैटिक दार्शनिकता देखी जा सकती है, जो सफल रही. गहनता के साथ फिल्म का काम बेहद धीरे चल रहा था, लेकिन इससे भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा. खास बात यह है कि कमाल अमरोही अपने ताजमहल बनाने के शहंशाह तो थे ही, साथ ही उस पाकीजा ताजमहल के खुद ही कारीगर भी थे. अपनी पूरी कोशिशों के साथ कमाल अमरोही फिल्म को कमाल की बनाने में जुटे हुए थे.होते-होते ऐसे ही 6 साल गुजर गए. साल 1964 तक फिल्म आधी ही बन पाई थी. बड़ी बात यह भी है, कि मुहब्बत भूल जाने नहीं, याद रखने का नाम मुहब्बत है. इसी पाकीजा बनाने वाले कमाल के अपनी पत्नी और खूबसूरत अदाकारा मीना कुमारी से संबंध बेहद तल्ख थे, लेकिन मजाल है कि मुहब्बत जरा भी कम हुई हो. मुहब्बत होती है या नहीं होती.... कम ज्यादा जैसा कुछ नहीं होता. दोनों का एक-दूसरे को बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था. कई तरह की बातें और अफवाहें भी सुर्खियों में आईं. जैसे कि कमाल ने मीना को बेहद परेशान किया. आदि - आदि 

 कमाल अमरोही एवं मीना कुमारी एक दूसरे से अलग हो गए थे. चार साल बीत गए और 'पाकीजा' का कोई काम नहीं हुआ. साथ ही उनकी सेहत भी खराब होती चली गई. साल 1968 के आसपास कमाल को लगा कि पाकीजा को पूरा किया जाना चाहिए. मीना कुमारी तक बात पहुंचाई गई, लेकिन उन्होंने कोई खास रूचि नहीं दिखाई. मीना कुमारी के दोस्तों में सुनील दत्त और उनकी पत्नी नरगिस का नाम जेहन में आता है. वे मीना और कमाल की उन व्यक्तिगत बातों से भी वाकिफ़ थे.उन्होंने उनको मनाया और मीना कुमारी ने फिल्म की शूटिंग शुरू की. वो काफी बीमार थी, लेकिन फिर भी उन्होंने फिल्म की शूटिंग पूरी की और 4 फरवरी 1972 में पाकीजा रिलीज हो गई. शुरू शुरू में तो तो फिल्म को कोई खास मुकाम नहीं मिला. इसका सबसे बड़ा कारण था कि ये फिल्म 14 साल में बन कर रिलीज हुई. जिससे लोगों में फिल्म को लेकर कोई रुचि बांकी नहीं थी. दो हफ्ते में तो फिल्म को ऐसे ही निकल गए. इसके बाद उनकी ये फिल्म देश के बाकी राज्यों में रिलीज हुई और धीरे -धीरे फिल्म उस मुकाम तक पहुंची, जिसको जहां जाना था. लोगों को फिल्म बेहद पसंद आ रही थी और आज के समय में इस फिल्म का नाम और मीना कुमारी का नाम चर्चाओं में बना रहता है, जो कमाल अमरोही चाहते थे. पाकीजा फिल्म कमाल अमरोही की ज़िन्दगी का ऐसा कमाल है जो उनको मीना कुमारी के साथ अनन्त तक जीवित रखेगा.

कमाल अमरोही एवं उनकी प्रेयसी मीना कुमारी एवं उनकी निजी जीवन पर बहुत कुछ नकारात्मक लिखा गया है. किसी ने भी दोनों के निजी जीवन के सकारात्मक रूप की सच्चाई को नहीं लिखा.... इस बात से पूर्णतः संतुष्ट हूं, कि एक बेहद ज़हीन आदमी ज्यादा समझौते के लिए नहीं जाना जाता, लेकिन उनकी जिद के लिए क्या उनकी करिश्माई शख्सियत को भूल जाना मुनासिब है? मंजू तुम्हारा पर्स नहीं उठाऊंगा... तुम्हारा नौकर नहीं हूं, तरह - तरह की बातेँ, मीना कुमारी का घर छोड़कर जाना, आदि, लेकिन यह किसी ने नहीं लिखा कमाल अमरोही जब अंतिम दिनों में अपनी पत्नी मीना कुमारी से मिलने जाते तो मीना कुमारी फूटकर रोने लगती थीं. मीना कुमारी जीना चाहती थीं, कई मैग्जीन आदि में लिखा गया है कि मीना कुमारी अपने स्टारडम के लिए माँ नहीं बनना चाहती थीं, लेकिन इसमे सच्चाई नहीं है!!! मैंने एक कमाल अमरोही के बेटे का एक साक्षात्कार देखा जिसमें कमाल अमरोही के बेटे ने कहा "छोटी अम्मी(मीना कुमारी) माँ बनना चाहती थीं, एक बात वो गर्भवती थीं, तब ही उनका पैर बाथरूम में फिसल गया, जिससे भ्रुण की मौत हो गई, इस हादसे से कमाल अमरोही टूट गए थे", यह बातेँ झूठी हैं कि कमाल अमरोही उन्हें प्रताड़ित करते थे... बहुत गॉसिप लिखी गईं हैं. मीना कुमारी अपने अंतिम दिनों में अपने सौतेले बच्चों से कहती थीं, 'अपने बाबा से कहना मेरे लिए दुआएं करें क्योंकि मैं जीना चाहती हूं, आख़िरकार खुदा को मंजूर नहीं था कि मीना कुमारी जिंदा रहें... अल्पायु में फानी दुनिया से रुखसत कर गईं... अब तक कमाल भी उस तरह सक्रिय नहीं थे, आख़िरकार कमाल अमरोही अपने जीवन में कमाल करते हुए.. 11 फरवरी 1993 को इस दुनिया से अनन्त में चले गए. मीना कुमारी के प्रति कमाल अमरोही का प्रेम शायद आखिर तक जवान रहा. तभी तो उन्हें मौत के बाद उनकी अंतिम इच्छानुसार क़ब्रिस्तान में मीना कुमारी की क़ब्र के बगल में दफनाया गया. कमाल अमरोही अपनी प्रेयसी मीना कुमारी के साथ हमेशा याद रखे जाएंगे..... कलम के इस महान जादूगर, फ़िल्मों के इस नायाब सृजनकार को मेरा सलाम.... 

दिलीप कुमार

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