" दिलीप साहब की समर्पित परिणीता सायरा बानो"
दिलीप साहब की समर्पित परिणीता
(सायरा बानो)
हिन्दी सिनेमा की सबसे अमर प्रेम की दास्ताँ जहां न उम्र की सीमा है, और न स्टारडम की धौंस, न कोई उम्मीद, न कोई आसरा बस साथ जिए जाते जाते हैं जिए जाते हैं, साथ होता है तो बस प्रेम... सायरा बानो दिलीप साहब का इश्क़ मिसाल है, दिलीप साहब की ट्रेजडी सिल्वर स्क्रीन पर जब अपने फ़लक पर थी, तो करोड़ों ल़डकियों की तरह सायरा बानो भी दिलीप साहब की आँखों के तिलिस्म में खुद को कैद करती गई.. हिन्दी सिनेमा की पहली ब्यूटी क्वीन 30-40 के दशक की सबसे बड़ी स्टार नसीम बानो की बेटी सायरा बानो, लन्दन में पली बढ़ी... 17 साल की कमसिन सायरा हिन्दी सिनेमा में शम्मी कपूर के साथ ब्लॉक बस्टर फिल्म जंगली में चमकी, सायरा के स्टारडम की गूंज पूरे हिन्दी सिनेमा में सुनाई दी.
पहली ही फिल्म से ब्यूटी क्वीन का खिताब जीतने वाली सायरा बानो.. हिन्दी सिनेमा के जुबली कुमार के साथ फ़िल्में करने लगीं... सायराबानो राजेन्द्र कुमार में ही दिलीप साहब की छवि देखती हैं, तब राजेन्द्र कुमार को डुप्लीकेट ट्रेजडी किंग कहा जाता था, सायरा बानो तो राजेन्द्र कुमार के साथ फ़िल्में करती हुईं, उनकी आँखों में दिलीप साहब को ढूढ़ रहीं थीं... दिलीप साहब मिले नहीं मिले, वो तो दूसरी बात है, लेकिन दोनों का प्यार परवान चढ़ा..
दिलीप कुमार की नजदीकी दोस्त सायरा बानो की माँ नसीम बानो दिलीप साहब की पड़ोसन बन चुकी थीं, नसीम बानो ने दिलीप साहब से कहा "सायरा बानो आपकी बहुत बड़ी प्रसंशक है, आपसे ज्यादा शायद वो दुनिया में किसी को नहीं मानती, आप समझाओ कि दो बच्चों के पिता राजेन्द्र कुमार से इश्क़ करना उचित नहीं.. भारी मन से दिलीप साहब ने कहा बात करूंगा "दिलीप साहब सायरा बानो को ज्यादा जानते नहीं थे, लेकिन उन्होंने सायरा से मिलने के लिए हाँ कर दी. मिलने के बाद उन्होंने समझाने की कोशिश की - "राजेन्द्र कुमार दो बच्चों के पिता हैं, उनका भी घर ख़राब होगा, एवं आपका कॅरियर भी खराब हो जाएगा, आपको अपने परवान चढ़ते कॅरियर पर ध्यान देना चाहिए ". दिलीप कुमार ने कहा फिर भी आपको लगता है, तो आप राजेन्द्र कुमार से कहिए की आपसे शादी कर लें ".. अगले ही दिन राजेन्द्र कुमार जी ने कोई फिल्म सक्सेस पार्टी दी थी, तब सायरा ने राजेन्द्र कुमार से कहा "शादी कर लेते हैं, इस पार्टी में आप अनाउंस कर दीजिए, जाहिर है प्रेम में आसक्त होना एवं अपना घर तबाह कर लेना हर आदमी के बस में नहीं होता.. राजेन्द्र कुमार जी मुकर गए. सायरा बानो को मिला पहला फरेब... वहीँ दिलीप साहब के शब्द उन्हें ज़िन्दगी में उलझाए जा रहे थे, सायरा बानो ने दिलीप साहब से एक लोंग ड्राइव की गुज़ारिश की..
दिलीप साहब अपनी आत्मकथा में लिखते हैं "लॉन्ग ड्राइव पर हम दूर निकल गए, कमसिन सायरा बानो ने कहा.. राजेन्द्र कुमार ने तो मना कर दिया, फिर मुझसे कौन करेगा शादी? आप करेंगे मुझसे शादी? मैंने जब पहली फिल्म की थी तो, सायरा बानो तब पैदा हुई थी, जब वो अदाकारा भी बन गई थी, तो मुझे बहुत से उसके साथ फ़िल्मों के ऑफर भी आए थे, लेकिन मुझे वो छोटी सी बच्ची लगती थी, और मैं मना कर देता था, लेकिन आज वही लड़की इस वीरान ज़िन्दगी को गुलज़ार करना चाहती है, मैं तब तो कुछ नहीं कह सका, लेकिन सायरा की बातों ने मुझे खुद की वीरान ज़िन्दगी में झांकने के लिए प्रेरित किया.. मुझे ख्याल आया कि मैं जब जवान होता था, तो मुझे बहुत आमंत्रण मिलते थे, लेकिन अब तो उम्र के आधे पडाव में हूँ, फिर भी मुझे कोई ऐसे कह रहा है, और तब शायरा बच्ची नहीं रहीं थीं, वो साड़ी में एक खूबसूरत लड़की लग रही थी, जिस पर मैं आसक्त हो गया था.. और मैंने सायरा बानो के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए अपनी वीरान ज़िन्दगी आबाद कर ली थी".. दिलीप साहब एवं सायरा दोनों ने हर सुख-दुःख में एक दूसरे का साथ दिया और यह ऐसी लव स्टोरी है, जिसमें कपल के बीच 22 साल का अंतर है, वैसे भी मुहब्बत उम्र कहाँ देखती है.
आदमी कितना भी महान हो, उसे हमेशा दिलफेंक ही कहा जाता है, लेकिन दिलीप साहब का विराट व्यक्तित्त्व होने के कारण उन्हें कोई दिलफेंक कहने की ज़रूरत भी न कर सका.. महिलाओ के लिए कोई ख़ास गुंजाईश होती ही नहीं है. दोनों का दाम्पत्य जीवन सुखमय बीत रहा था, दोनों का बेटा पैदा तो हुआ लेकिन ज़िन्दा न रह सका, यहां संवेदना तो सायरा के लिए ज्यादा होना चाहिए था, कि उनके शरीर का एक कतरा कट कर अलग हो गया.. दोनों एक दूसरे को संभालते हुए ज़िन्दगी एक अदावत तक पहुंच गई थी, इस अदावत का नाम था 'आसमाँ रहमान' यही वो नाम है, जिसके लिए दिलीप साहब सायरा बानो को छोड़कर तीन बच्चों की माँ आसमाँ रहमान के प्रेम में पड़े और शादी कर ली... हालाँकि दिलीप साहब ने कभी भी इस शादी को स्वीकार नहीं किया. दिलीप साहब जल्द ही तंग आकर सायरा बानो के पास आ गए.. सायरा बानो का ज़र्फ वाकई बड़ा था, उन्होंने दिलीप साहब को अपने प्रेम के छांव में फिर से पनाह दे दी... इस संस्मरण को दिलीप साहब ने अपनी आत्मकथा में लिखते हुए अपने जीवन का सबसे बड़ा गुनाह माना है, उन्होंने माना है कि सायरा बानो के साथ मेरा किया गया कृत्य मुझे हमेशा खटकता है. दिलीप साहब भी बड़े ज़र्फ के इंसान थे, जिन्होंने अपने इस संस्मरण को याद किया एवं अपनी गलती स्वीकार की, गलतियां सभी करते हैं, लेकिन स्वीकार करने, एवं खुद को खारिज करने का ज़ज्बा किसी-किसी में होता है..
सायरा ने इस अदावत को आजीवन के लिए भुलाकर आगे बढ़ जाना उचित समझा.. दिलीप साहब की समर्पित परिणीता सायरा बानो दिलीप साहब के लिए अथाह मुहब्बत समेटे हुए इसलिए ही तो हिन्दी सिनेमा में आईं थीं कि दिलीप साहब को बता सके कि आपकी मैं कितनी बड़ी प्रसंशक हूं. ब्यूटी क्वीन खिताब जीत लेने के बाद, कॅरियर उफान पर था, लेकिन सायरा बानो ने हिन्दी सिनेमा से लगभग खुद को अलग कर लिया था.. एवं दिलीप साहब के लिए खुद को समर्पित कर दिया....सायरा बानो कहती थीं "मैं यह नहीं जानना चाहती कि दिलीप साहब मुझे कितना प्यार करते हैं, लेकिन मैं साहब को इतना प्यार करती हूं कि दोनों के लिए काफी है". दिलीप साहब बुज़ुर्ग होते जा रहे थे, लेकिन सायरा बानो की मुहब्बत और भी परवान चढती जा रही थी, दिलीप साहब किसी को पहिचान सकने की क्षमता खो चुके थे, लेकिन सायरा बानो को खूब पहिचानते थे.....इस दुनिया से दूसरी दुनिया सब को जाना होता है, दिलीप साहब भी चले गए... चले जाने के बाद सायरा बानो लिखती हैं
सुकून-ए-दिल के लिए कुछ तो एहतेमाम करूं,
जरा नजर जो मिले फिर उन्हें सलाम करूं,
मुझे तो होश नहीं आप मशवरा दीजिए,
कहां से छेड़ूं फसाना कहां तमाम करूं
सायरा बानो ने अपनी निजी जिंदगी में बहुतेरे लोगों को खोया है.. कहती हैं उनकी ज़िन्दगी में अपना कोई नहीं था, माँ पिता, भाई, बेटा, सब दुनिया से चले गए थे, जाहिर है इंसान को अपने लोगों की याद आती है, साहब को संभालते हुए कभी कभी मैं भी अपनों को याद करती तो तो मेरे पास एक कन्धा था, दिलीप साहब का... साहब के समझाने का अंदाज़ बहुत अच्छा था, लगता था, मेरे पास कोहिनूर हैं तो क्या कमी हैं, लेकिन उनके जाने के बाद सब कुछ बदल गया है. अब मेरे पास साहब की यादो के अलावा कुछ भी नहीं है, लेकिन मैं अभी भी उनकी यादो को समेटे हुए अपनी ज़िन्दगी गुजार सकती हूं, क्योंकि मेरे पास ढेर सारी यादे है, लेकिन मेरी गुलज़ार दुनिया अब शांत है... सो रही है..
"अपनी जुंबिश-ए-मिजगान से ताजा कर दे हयात,
कह रुका रुका कदम-ए-कायनात
हैं साकी मेरा प्यार नींद में है,
इसलिए मेरी पूरी दुनिया शांत है
कोहिनूर दिलीप साहब का जाना सबसे ज्यादा सायरा बानो को तकलीफ दे रहा है, दिलीप साहब जब भी बीमार हुए साए की तरह सायरा उनके साथ रहीं. दोनों के बीच उम्र का फासला था, फिर भी दोनों की मोहब्बत एक मिसाल रही. 55 साल दोनों साथ साए की तरह रहे. बेजोड़ मुहब्बत की दास्ताँ सायरा जी कहती हैं कि मेरे साहब आज भी मेरे साथ हैं. सायरा जैसी समर्पित महिला पूरी मानवीय सभ्यता के लिए एक मिसाल है कि कैसे निस्वार्थ प्रेम किया जाता है. सायरा जी का समर्पण इस बात की तस्दीक करता है... किसी शायर ने क्या खूब कहा है कि- " यह दुनिया अच्छे मर्दों की वज़ह से नहीं चलती बल्कि अच्छी औरतों की वज़ह से चलती है ये दुनिया" शायरा जी ने शायर के कलाम को चरितार्थ कर दिया..
सायरा जी के जीवन में ऐसे कई पड़ाव आए जहां कोई भी टूट सकता है लेकिन उन्होंने परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाया एवं हर बार खुद के प्रेम को साबित किया कि उनका प्रेम कितना निस्वार्थ है. कई बार दिलीप साहब को उम्र के आखिरी पड़ाव में उम्र की तकलीफें होतीं तो हर महीने एक सुर्खी बनती, कि ट्रेजडी किंग हस्पताल में भर्ती, तो हमारे जैसे उनके फैन्स दुआएं करने लगते, हम सभी प्रशंसक देखते थे बुजुर्ग सायरा जी साए की तरह दिलीप साहब की केयर करतीं दिखती थीं, तो हम सभी सोचते थे, कि दिलीप साहब जल्द ही स्वस्थ हों जाएंगे और वो हो जाते थे. इसमे कोई बहुत ख़ास बात नहीं है, कोई पत्नी अपने पति के लिए इतनी समर्पित है, लेकिन सायरा जी ने सिर्फ प्यार किया, बिना उम्मीद, बिना ख्वाहिश, उम्र के आखिरी पड़ाव तक वो प्यार करती रहीं, आज भी लगता नहीं है, कि दिलीप साहब चले गए हैं. वो आज भी सायरा जी के साथ हैं, सायरा जी के होंठो पर बार - बार साहब का जिक्र ऐसे फ़ूट पड़ता है, जैसे सायरा जी साँस ले रही हैं.. और दिलीप साहब उनकी साँसों में साँस ले रहे हैं.. निस्वार्थ प्रेम की महानायिका दिलीप साहब की समर्पित परिणीता सायरा बानो जी को मेरा सलाम...
दिलीप कुमार
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