"कल्ट फ़िल्मों के अग्रदूत महान विमल रॉय"

'भारतीय सिनेमा में कल्ट फ़िल्मों के अग्रदूत, फिल्म इंस्टीट्यूट' 

(विमल रॉय) 

क्लासिकल कल्ट फिल्मी सफर के पहले अग्रदूतों में शुमार विमल रॉय जिनकी महानता के लिए कहा जाता है. 

Vimal Roy the man who speak in film's

विमल रॉय को समझने के लिए उस दौर में जाना पड़ेगा, जब हमारे दौर से पहले की तीन पीढ़ियों का भी उदय नहीं हुआ था. हमेशा हम बादशाहों को याद रखते हुए, भीष्म पितामहों को भूल जाते हैं. हम सभी किंग को याद करते हैं, लेकिन किंगमेकर को भूल जाते हैं. ऐसा बिल्कुल भी मुमकिन नहीं है, कि इतिहास हर बार अपने आप को दोहराए और किंग मेकरो को भूल कर दफ्न कर दे. भारतीय इतिहास में जिस तरह किंग मेकर चाणक्य को कोई नहीं भूल सकता, उसी प्रकार से सिनेमा में बादशाहों को तैयार करने वाले विमल रॉय (दादा) को भूल पाना नामुमकिन है. आज का दिन है हिन्दी सिनेमा के उस किंगमेकर साइलेंट मास्टर(विमल दा) को याद करने का जिसकी सिनेमाई समझ का कैनवास इतना बड़ा था, कि एक ही फ़िल्म देवदास से दिलीप कुमार को ट्रेजडी किंग के सिंहासन पर काबिज करा दिया. विमल दा की फिल्म देवदास से बनी इमेज को दिलीप साहब भी कभी बदल नहीं सके, दिलीप साहब की सिग्नेचर स्टाइल को पर्दे पर उतारने वालों में महान विमल दा ही हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा की सिग्नेचर स्टाइल को बयां करना हो तो विमल दा की क्लासिकल कल्ट फिल्मी को ज़रूर याद करना होगा.

क्लासिकल कल्ट फ़िल्मों के बादशाह विमल दा ने पुनर्जन्म पर एक ऐसी फिल्म मधुमति का निर्माण कर कॉमर्शियल फ़िल्मों का ऐसा जलवा बिखेरा. मधुमति फिल्म ने उस साल सबसे ज्यादा फ़िल्म फेयर के नौ अवॉर्ड जीते. इस फिल्म की बेशुमार कमाई का रिकॉर्ड 37 साल तक कोई तोड़ नहीं सका. मधुमति फिल्म की सफलता ने हिन्दी सिनेमा का एक एक नई धारा से परिचय हुआ. इसके बाद व्यवसायिक हिन्दी सिनेमा में पुनर्जन्म पर बनने वाली फ़िल्मों की बाढ़ सी आ गई थी. 1977 में फिल्म मिलन, सन 1981 में नीलकमल 1968, फिल्म कर्ज, कुदरत, उसके बाद करन-अर्जुन इसके बाद ओम शांति ओम जैसी सुपरहिट फ़िल्मों का निर्माण हुआ, लेकिन ये सब फ़िल्में विमल रॉय की फिल्म मधुमति के आस-पास भी नहीं पहुंच सकीं. बिमल रॉय की दूरदर्शी सिनेमाई समझ का नायाब नमूना यह भी देखा जा सकता, विमल दा ने अपनी डेब्यू फिल्म उदय पाथे (1944) में जो समाजवादी सपना को साकार करती हुई फिल्म बिमल रॉय की यथार्थवादी समाजवाद पृष्ठभूमि पर बनाया. साहित्य की दुनिया की अनमोल विरासत रबीन्द्रनाथ टैगोर की रचना जन - गण - मन - अधिनायक इस महान कविता को अपनी पहली फिल्म में ही उपयोग किया. याद रखने योग्य बात यह है कि तब तक न अपना भारत आज़ाद हुआ था, राष्ट्रगान जैसे किसी शब्द का भारत में जिक्र ही नहीं होता, जिस गीत को आजादी के पहले विमल दा ने अपनी फ़िल्म में फ़िल्माया. महान विमल दादा की सिनेमाई समझ का कैनवास फलक से भी ऊंचा है. फिल्म उदय पाथे को सन 1945 में न्यू थियेटर ने हमराही नाम से बनाया, जिसे विमल रॉय ने ही निर्देशित किया.

विमल दा की फ़िल्मों का स्तर बहुत अद्भुत था, जिसने हिन्दी सिनेमा को उसके फिल्मी क्राफ्ट को उसकी तकनीक को यथार्थवाद, एवं सामाजिक सुधार से जोड़ दिया. एक ऐसा भी दौर था, जब हमारे हमारे सामाजिक ताने - बाने में स्त्रियों की भागीदारी न के बराबर थी. तब क्लासिकल निर्देशक विमल दा ने स्त्री प्रधानता पर ढेर सारी क्लासिकल कल्ट फ़िल्मों का निर्माण किया. देश की आजादी के बाद हिन्दी सिनेमा अपने नायकों के महिमामंडित करने की पराकाष्ठा कर रहा था, तब विमल दा ने बंदिनी, सुजाता, मधुमति, परख, आदि स्त्री विमर्श पर फ़िल्में बनाकर पुरुष नायकत्व के बने तिलिस्मी असंतुलन को खत्म कर दिया था. विमल दा की स्त्री वेदना को स्पर्श करती हुई सिनेमाई समझ को देखकर महान दादा मुनि अशोक कुमार को परिणीता फिल्म के निर्देशन का जिम्मा सौंपा था. इन फ़िल्मों की कहानी का क्राफ्ट इतना बड़ा, क्लासिकल था, इससे मेल खाता मानवीय संवेदनात्मक गीत - संगीत, एवं स्त्री के अंदर के दुःख, दर्द, खुशी एवं उस अंतर्द्वद्व को पर्दे पर ऐसे उकेरा था. विमल दादा की इन फ़िल्मों को सदियों तक भुलाया नहीं जा सकता.

विमल दादा को फिल्म निर्देशन का विद्यालय कहा जाता है. ऑस्कर, भारतरत्न पुरूस्कार से सम्मानित फ़िल्मकार महान सत्यजीत रे विमल दादा को अपने गुरु समान दर्जा देते थे. जिन्होंने विमल दादा की महान कल्ट फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' को देखकर महान पाथेर पांचाली का निर्माण किया. महान सत्यजीत रे ने विमल दादा की शख्सियत के लिए जिन शब्दों से नवाजा वो ये थे

 " दादा ने अपनी पहली फिल्म से ही परंपरागत फिल्मी के मकड़जाल को साफ़ कर दिया था, जिनका अवार्ड जीतने में कोई सानी नहीं था .भारतीय सिनेमा में सबसे पहले दादा का नाम सबसे पहले लिया जाएगा. विमल दादा की सिनेमाई समझ का ही परिणाम है कि हम जैसे फ़िल्मकार अस्तित्त्व में आए. पूरी दुनिया में सिनेमाई शख्सियत जो पूरे विश्व में भारतीय सिनेमा की पहिचान थे. उनके लिए महान सत्यजीत रे ने इन शब्दों से नवाजा था, इससे समझा जा सकता है, कि विमल दादा का ऑरा कितना बड़ा था. विमल दादा की बात करें तो सबसे ज्यादा जेहन में आती है. "दो बीघा ज़मीन" यह एक ऐसी वाहिद फिल्म थी, जिसे उस समय वेनिस, मेलबोर्न, रूस, कांस, कार्लोवी वेरी, चाइना आदि फिल्म फेस्टिवल में अलग - अलग पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया.

दो बीघा ज़मीन को देखकर ग्रेट शोमैन राज कपूर साहब ने कहा था, 'दो बीघा ज़मीन' जैसी महान कल्ट फिल्म शायद ही कोई दुनिया में दोबारा बना सके. जब भी कभी सदियों, या युगों बाद, भारतीय सिनेमा की सबसे महानतम फ़िल्मों का जिक्र होगा, तब सबसे पहले पायदान पर 'दो बीघा ज़मीन' का नाम होगा. यह फिल्म विमल दादा की महान शख्सियत की गवाही देती रहेगी". विमल दादा को भारतीय सिनेमा का संस्थान कहा जाता है, विमल दादा के शिष्यों में महान संगीतकार, सलिल चौधरी, लेखक, गीतकार, निर्माता, निर्देशक, गुलजार, महान फ़िल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी, वासु भट्टाचार्य, आदि महान शख्सियतें आज अपनी- अपनी विधा के बादशाह चमक रहे हैं. महान विमल दादा ज़िन्दा रहते हुए ही उस ऊंचाई पर पहुंच चुके थे, जहां से नीचे देखने पर क्या अभिनेता, क्या निर्माता, क्या निर्देशक सभी उनके हुज़ूर में सजदा करते दिखाई देते थे. फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' से समानान्तर सिनेमा एवं व्यवसायिक सिनेमा की लकीर को ही मिटा कर रख दिया. विमल दादा ने हिन्दी सिनेमा के कई मिथकों को तोड़ दिया था. एक आम धारणा थी, कि अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में केवल सत्यजीत रे की फ़िल्में ही जाने लायक होती हैं. विमल दादा की कामयाबी में उनकी कहानी एवं उसका चुस्त - दुरुस्त स्क्रीनप्ले, बेहतरीन संगीत, के साथ कलाकारों का सौ फीसदी अभिनय निकलवाने की कला वो भी बड़ी ही असानी से, एवं साहित्य में उनकी रुचि भी खूब थी. इसीलिए उनको फ़िल्मों का साइलेंट मास्टर कहा जाता है. सन 1952 से 1964 तक विमल दादा ने हिन्दी सिनेमा के कैनवास पर क्लासिकल कल्ट फ़िल्मों का ऐसा जादू बिखेरा, कि उनकी हर फिल्म के संगीत एवं उनकी प्रत्येक फिल्म अमर हो गई, जिसने हिन्दी सिनेमा के मिलो ड्रामेटिक सिस्टम को ज़मीदोज कर दिया.

व्यवसायिक सिनेमा में यथार्थवाद को स्थापित करने वाले अमर निर्देशक बिमल रॉय 12 जुलाई 1909 को अविभाजित ढाका जिले, पूर्वी बंगाल में पैदा हुए. अपनी सिनेमाई यात्रा में व्यपारिक फ़िल्मों में क्लासिकल फ़िल्मों के पर्याय के रूप में जाने वाले विमल दादा को ये ख्यातिय़ाँ ऐसे ही नहीं मिल गईं. इसके पीछे जीवन के अच्छे - बुरे अनुभव, जीवन की सच्चाइयों, ख़ासकर उनका भावात्मक सागर जिस आदमी के लिए अपने भावनाओं के ज्वार को बहाने के लिए और कोई चारा नहीं था. एक जागीरदार का बेटा, जिसे पिता की मृत्यु के बाद जायदाद से बेदखल कर दिया गया. सभी को अपने हिस्से का संघर्ष भी करना होता है. विमल दादा ने भी यही किया. धोखा मिलने के बाद, अविभाजित बांग्लादेश के ढाका से हिजरत करते हुए होते हुए, हावड़ा, कोलकाता में धूल फाकने के बाद 'दो बीघा ज़मीन' के शंभू के दर्द को को उसकी सच्चाई एवं सामाजिक असंतुलन को पर्दे पर उकेर सके.

विमल दादा को समझने के लिए हमे ब्लैक & व्हाइट वाले गोल्डन एरा के सुनहरे इतिहास को खंगालना पड़ेगा जहां विमल दादा की सिनेमाई यात्रा के दस्तावेज यानी उनकी फ़िल्में मौजूद गवाही दे रही हैं. तीस, चालीस के दशक में कलकत्ता , मद्रास,बंबई, कि बड़ी - बड़ी फिल्म कंपनियाँ, आदि को ही सिनेमा के लिए जाना जाता था. इनके साथ ही शुरुआती दौर से विमल दादा का अंतर्संबंध है. ढाका से आने के बाद विमल रॉय ने अपनी सिनेमाई यात्रा के लिए कोलकाता में न्यू थियेटर में कैमरामैन के रूप में जुड़ गए. बाद में फ़िल्मकार नितिन बोस के असिस्टेंट बनकर सिनेमा की बारीकियों को सीखने लगे. यूँ तो विमल दादा बहुत कम बोलने वाले इंसान थे, नपा तुला ही बोलते थे, बाद में सिनेमैटोग्राफी में अपना सिक्का जमाया. सन 1935 में न्यू थियेटर कम्पनी ने देवदास फिल्म का बांग्ला में निर्माण किया, जिसमें विमल दादा ने फोटोग्राफर के रूप में काम किया. सन 1936 में पीसी बरुआ के निर्देशन में एक बार फिर से देवदास हिन्दी में के एल सहगल को लेकर बनाई गई, यह फिल्म भी सुपरहिट हुई. इसके बाद असमिया भाषा में भी पीसी बरुआ के ही निर्देशन में फिल्म बनी, लेकिन इसके बाद विमल दादा को निर्देशक बनने में लगभग आठ साल से अधिक समय लग गया. इसके बाद सन 1944 से भारतीय सिनेमा में विमल दादा का तिलिस्मी सफर की शुरुआत होती है. आज भारत का राष्ट्र गान के रूप में जो रचना गाई जाती है, उस रचना को विमल दादा ने अपनी डेब्यू फिल्म में ही उपयोग किया. उसका संगीत आज भी बदला नहीं गया है. इसी फिल्म के रीमेक हमराही फिल्म की सफलता एवं द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी फ़िल्मों के बाद रोमांटिक, यथार्थवादी सिनेमा के अग्रदूत के रूप में स्थापित कर दिया.
विमल दादा ने इसके बाद पहला आदमी, मंत्रमुग्ध,अंजनगढ़, आदि युद्ध पृष्ठभूमि पर बनाई जिसमे युद्ध के दंश महानतम फ़िल्मों को डायरेक्ट किया. पहला आदमी फिल्म में एक युद्घ के दृश्य को एक इंडोर स्टुडियो में ही फ़िल्माया था, यह उनकी सिनेमाई समझ, सिनेमैटोग्राफी स्किल कैमरा प्लेसमेंट आदि, का सटीक संयोजन है, जिसको आजतक तमाम निर्देशन सीख रहे बच्चों के लिए अजूबा बना हुआ है. आजादी के बाद भारत अपनी ताबीर गढ़ने में लगा हुआ था. पचास के शुरुआती दशक में बंबई, कलकत्ता, कि बड़ी - बड़ी फ़िल्म कंपनिया घाटे में चल रही थीं. अब तक का सिनेमा केवल आर्ट जन सरोकार पर टिका हुआ था. भारतीय सिनेमा समान्तर सिनेमा के साथ थियेटर, नाटक के साथ आर्थिक समन्वय स्थापित करने में सफल नहीं हो पा रहा था. कला जन सरोकार आदि तो ठीक है, लेकिन सभी के लिए आवश्यक पैसे की जरूरत होती है. न्यू थियेटर लिमिटेड, बाम्बे टॉकीज जैसे प्रमुख फिल्म कंपनिया बंद होने के कगार पर खड़ी थीं. बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री में कामयाबी के शिखर को छूने वाले विमल दा को हिन्दी सिनेमा ने बंबई बुलाया. पहली बार बॉम्बे टॉकीज के लिए फ़िल्म माँ का निर्देशन किया. आख़िरकार फिल्म सुपर फ्लॉप हुई... विमल दा हिन्दी सिनेमा से जुड़े रहे. हिन्दी सिनेमा में सफलता के लिए एक साल का इंतज़ार करना पड़ा. विमल दादा की तिलिस्मी शख्सियत लाजवाब थी. उनके साथ बड़े - बड़े विद्वान जुड़े हुए थे. उनके साथ दिग्गजों की फौज, वो सब विमल दादा के शिष्य थे. जिसमें थे एडिटर ऋषिकेश मुखर्जी, वासु भट्टाचार्य, सलिल चौधरी, नवेंदु घोष, बाल महेंद्र, असित सेन, नाजिर हुसैन, आदि दिग्गजों के गुरु विमल दादा थे. विमल दा यूँ तो बहुत कम नपा - तुला बोलते थे, लेकिन वो अपने विद्वान शिष्यों से खूब विमर्श करते थे. जापान के महान फ़िल्मकार रायटर, 'अकीरा कुरोसावा' की एक बहुचर्चित फिल्म 'राशोमोन' देखने के लिए पूरी टीम को कहा कि यह फिल्म आप सब देखना, लेकिन ध्यान रहे ऐसी फ़िल्में केवल देखी नहीं जाती, इनको देखते हुए आप सब अपना मत प्रस्तुत करना. शाम सब फिल्म देखकर लौटे, विमल दादा ने पूरी टीम से कहा क्या ऐसी महान फिल्म हम कब बनाएंगे. ऋषिकेश मुखर्जी ने कहा दादा आप भारतीय सिनेमा के शिल्पकार हैं , 'अकीरा कुरोसावा' से आपकी तुलना करते हुए आपके कद को दायरे में नहीं समेट सकता, लेकिन आप खुद सिनेमा का पूरा का पूरा आकाश हैं. विमल दादा ने कहा "यह सब छोड़ो बताओ क्या बना सकते हैं"? ऋषिकेश मुखर्जी ने कहा ज़रूर बनाएंगे. विमल दादा ने पूछा "स्क्रिप्ट कौन लिखेगा" ? ऋषिकेश मुखर्जी ने कहा स्क्रिप्ट की चिंता छोड़ दीजिए मैं लिखूँगा. यही से गोल्डन एरा में नायाब मोती जुड़ना शुरू हुए. तब ही विमल दादा ने अपनी फिल्म कम्पनी विमल रॉय प्रोडक्शन कम्पनी खोली. विमल दादा हीरा पहिचानने वाले जौहरी थे. उन्होंने अपनी एवं हिन्दी सिनेमा की महानतम फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' की स्क्रिप्ट लिखने की जिम्मेदारी सलिल चौधरी की दी गई. सलिल चौधरी ने भी विमल दा को निराश नहीं किया. इस फिल्म के निर्माण से विमल दादा ने भारतीय सिनेमा की पहली कल्ट फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' बनाने के बाद एक मानक तैयार हो गया कि हिन्दी सिनेमा में कल्ट फिल्म का सबसे ऊंचा आसमान 'दो बीघा ज़मीन' जितना होता है. शंभू के किरदार की वेदना, दुःख पलायन का दंश हर मन को अंदर तक छू गया. बलराज साहनी के अभिनय को धरातल पर उतार लाने वाले विमल दादा ही थे. इस फिल्म से प्रेरित होकर महान गुरुदत्त साहब ने फिल्म 'प्यासा' का निर्माण किया. महान सत्यजीत रे ने' पाथेर पांचाली' का निर्माण किया. विमल दादा की इस फिल्म ने भारत सहित पूरी दुनिया में अवॉर्ड जीतने की सारी सीमाएं लांघ दीं. हिन्दी सिनेमा में समानान्तर सिनेमा के प्रणेता विमल दादा सूर्य की भांति चमकने लगे थे. भगवान बुद्ध पर बनाई गई उनकी डाक्यूमेंट्री भी विश्व प्रसिद्ध हुई. हिन्दी सिनेमा एक तरफ बेहतरीन संगीत से सुसज्जित आजादी के बाद गरीबी, बेरोजगारी पर फ़िल्में बना रहा था, वहीँ महान विमल दादा साहित्य एवं पीछे छूट गए सरोकार एवं स्त्री नायकत्व को पर्दे पर समेट कर फ़िल्मों का निर्माण करते हुए अपनी फ़िल्मों को 'लार्जर देन लाइफ' की शक़्ल दे रहे थे. स्त्री नायकत्व का सुनहरा दौर जो हिन्दी सिनेमा ने विमल दादा के द्वारा देखा पुनः वो दौर कभी लौट नहीं सका. आज भी स्त्री नायकत्व के लिए अभिनेत्रियों को विमल दादा की फ़िल्में देखकर उसकी महत्ता को समझने के लिए पूरा सिलेबस मानी जाती है.

विमल दादा की फ़िल्मों का नायक भी जमीन से जुड़ा हुआ होता था... आज भी देवदास का दर्द टूटे हुए दिलों के लिए मरहम का काम करता है.अब तक शरतचंद्र चटोपाध्याय के उपन्यास देवदास पर 18 भाषाओ पर देवदास फिल्म का निर्माण किया जा चुका है, लेकिन देवदास का नाम जेहन में आते ही सबसे पहले दिलीप साहब का चेहरा याद आता है... यही साइलेंट मास्टर विमल दादा का कमाल है. विमल दादा ने बतौर एडिटर कालजयी फ़िल्मों में योगदान दिया. महल, कल्पना, उम्मीद, नर्तकी, मेरी आखें जैसी फ़िल्में अमर हैं. भारतीय सिनेमा में किसी भी महान फ़िल्मकार को महान कहने की परंपरा है, लेकिन विमल दादा की शख्सियत का मुकाम बतौर फ़िल्मकार सभी से ऊंचा है. यूँ लगता है कि विमल दादा अभी बहुत कुछ अपनी फ़िल्मों के माध्यम से कहना चाहते थे, वहीँ समाज निर्माण में साहित्य, कला के माध्यम से अपना योगदान देना चाहते थे, लेकिन यह भी तय है कि अगर वो पूरा जीवन जीते तो पूरे वैश्विक सिनेमा में फिल्म कारों में उनका रुतबा सबसे अलग होता.... मैं आज भी इस उम्मीद में हूँ कि सिनेमा में उनके योगदान के लिए क्या उनको ऑस्कर, नॉवेल पुरूस्कार देने की क्या कोई गुंजाइश है क्या अगर है तो देर नहीं होना चाहिए. यूँ तो विमल दादा किसी भी सम्मान के से बड़े हैं, लेकिन फिर भी भारत सरकार उनको भारतरत्न से नवाजे तो यह भारत के द्वारा उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता सिद्ध होगी. आज ही दिन 8 जनवरी सन 1966 में मेरे ही नहीं पूरी दुनिया के सबसे महानतम फ़िल्मकार विमल दादा बहुत जल्दी इस फानी दुनिया से रुखसत कर गए,और छोड़ गए अपने पीछे साहित्य, कला फ़िल्मों इस संसार जिसका न आदि न अंत.

दिलीप कुमार

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