महान सोहराब मोदी
'हिन्दी सिनेमा का आयरनमैन जिसके सामने भारतीय सिनेमा का जन्म हुआ'
(सोहराब मोदी)
हिन्दी सिनेमा की इज्ज़ताफजाई करवाने में सोहराब मोदी का भी बहुत बड़ा योगदान है. सिल्वर स्क्रीन के शिल्पकारों में सोहराब मोदी उन चुनिन्दा लोगों में शुमार हैं, जिनके सामने हिन्दी सिनेमा पैदा हुआ, बड़ा हुआ, घुटनों के बल चला, और एक पूरा - का पूरा बोलता हुआ मुकम्मिल जहां बन गया जो आज भी अदाकारी करने वालों के लिए एक पूरा का पूरा खुला मंच देता है. इस मंच को गढ़ने वालों में सोहराब मोदी का नाम दादा साहेब फाल्के, केएल सहगल, आदि के साथ अग्रणी रहेगा. सोहराब मोदी के सामने हिन्दी सिनेमा पैदा हुआ क्यों कि उनका जन्म जन्म 2 नवम्बर, 1897 को हुआ. वहीँ भारतीय सिनेमा का जन्म 1913 में हुआ था. भारत की पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र थी, जिसे दादा साहेब फाल्के ने बनाया था.16 वर्ष की उम्र में सोहराब मोदी टाउनहाल में फ़िल्में देखा करते थे. बाद में अपने भाई रुस्तम की मदद से उन्होंने ट्रैवलिंग सिनेमा का व्यवसाय शुरू किया. फिर अपने भाई के साथ ही उन्होंने बंबई में स्टेज फ़िल्म कंपनी की नीव डाली. इस कंपनी की पहली फ़िल्म 1953 में बनी ‘खून का खून’ थी, जो उनके नाटक ‘हैमलेट’ का फ़िल्मी रूपांतर थी. इसमें सायरा बानो की माँ नसीम बानो पहली बार परदे दिखी थीं. ‘सैद –ए-हवस’ भी नाटक ‘किंग जान’ पर आधारित थी. सोहराब मूलतः नाटक से आये थे, उनकी अदाकारी में थियेटर की मूलतः अभिनय की खुशबू महसूस होती है, यही कारण है कि उनकी पहले की फ़िल्मों में पारसी थिएटर की झलक देखी जा सकती है. वैसे भी ऐतिहासिक, मैथालाजिकल फ़िल्मों के पहले अग्रदूत कहे जाते हैं. जो अपनी फ़िल्मों को लार्जर देन लाइफ का रूप दे गए हैं.
सोहराब मोदी के बारे में जानना अपने आप में सौ साल से पहले के भारत में जाना होगा, तब शायद हमारी तीन पीढ़ियां भी पैदा नहीं हुई होंगी. सोहराब मोदी को पहला काम अपने भाई रुस्तम की नाटक कंपनी सुबोध थिएट्रिकल कंपनी में मिला. जिसमें उन्होंने 1924 से काम करना शुरू कर दिया था. वहीं उन्होंने संवाद अदायगी गंभीर और सधी आवाज में बोलने की कला सीखी, जो बाद में उनकी विशेषता बन गयी. कुछ ही समय में नाटकों में सोहराब मोदी प्रमुख भूमिका निभाने लगे. ‘हैमलेट’ और ‘द सोल ऑफ़ डाटर’ उनके लोकप्रिय नाटक थे, जिनमें उन्होंने यादगार अभिनय किया था. कालांतर में उनका परिवार रामपुर से बंबई चला आया. वहां उन्होंने परेल के न्यू हाईस्कूल से मैट्रिक पास किया. सोहराब मोदी ने जब मैट्रिक पास की तो प्रिंसिपल से मार्गदर्शन लिया. प्रिंसिपल ने कहा, "तुम्हारी आवाज सुनकर यही लगता है कि तुम्हें नेता बनना चाहिए या अभिनेता" फिर क्या था. सोहराब अभिनेता बनने की राह में अग्रसर हो गए.
"तुम्हारे ही लिए पैदा हुए दुनिया के नज़ारे ... चमकते है तुम्हारी रोशनी से चाँद और तारे ... तुम्हारा ग़म है गम , औरों का ग़म ख्वाब-ओ-कहानी है ... तुम्हारा खून है खून , हमारा खून पानी
है " जैसे लंबे डायलॉग केवल सोहराब मोदी ही बोल सहते थे.
सोहराब मोदी ने अपनी स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद अपने भाई केकी मोदी के साथ सहायक के रूप में काम किया. सोहराब मोदी ने कुछ मूक फ़िल्मों के अनुभव के साथ एक पारसी रंगमंच से बतौर अभिनेता के रूप में अपनी शुरुआत की .भारतीय सिनेमा में सोहराब मोदी की बुलन्द आवाज़, एवं उनकी संवाद अदायगी अद्वितीय है. उनके जैसा बुलन्द आवाज़ में डायलॉग बोलना, सोहराब मोदी जैसे बड़े - बड़े मुक्तक को डायलॉग के रूप में बोलना हर किसी के बस की बात नहीं है. सोहराब मोदी सिनेमा में लौह पुरुष के नाम से जाने जाते थे.. उनकी आवाज बुलन्द आवाज़ का जादू दर्शकों में कुछ ऐसा था कि नेत्रहीन भी उनकी अदाकारी एवं संवाद अदायगी सुनने के लिए उनकी फिल्में देखने सिनेमाघरों भागते चले आते थे. एक बार फिल्म देखने सिनेमाहॉल में सोहराब मोदी ने देखा कुछ अंधे लोग भी फिल्म का आनन्द ले रहे हैं, उन्होंने नजदीक जाकर पूछा "आप सभी देख नहीं सकते, लेकिन आप फिल्म का आनंद ले रहे हैं इसका राज क्या है"? एक व्यक्ति ने कहा "हम देख नहीं सकते लेकिन सुन तो सकते हैं, और क्या हुआ हमें सोहराब मोदी के डायलॉग बहुत पसंद है इसलिए हम उनकी संवाद अदायगी का आनन्द ले रहे हैं" सोहराब मोदी ने सुनकर इमोशनल हो गए.
आदमी शैक्षणिक रूप से तो ज्ञान, प्राप्त करता है, वहीँ आध्यात्मिक, शैक्षणिक रूप से समृद्ध होने के लिए उसको किताबों का अध्ययन करना बहुत आवश्यक होता है, ख़ासकर एक अभिनेता भाषायी रूप से जितना समृद्ध होगा, उतना ही अधिक बोलने के अंदाज़ से जाना जाएगा. क्योंकि अदाकारी में आकर्षक दिखने से ज्यादा बोलना महत्वपूर्ण होता है. ऐसे ही भाषायी रूप से समृद्ध सोहराब मोदी की संवाद अदायगी एवं उनकी डायलॉग डिलेवरी करने वाला न उनके जैसा कोई हुआ है, और न होगा. भाषायी रूप से उनके समृद्ध होने के पीछे उनकी ज़िन्दगी के अपने अध्ययन, तजुर्बे का तो योगदान है ही, लेकिन इसका एक सकारात्मक पहलू है, जो उन्हें बोलने के अंदाज़ में अमर कर गया. कहते हैं "भविष्य का पौधा अतीत की बेल से फ़ूटता है". दरअसल सोहराब मोदी का बचपन उत्तरप्रदेश के रामपुर में बीता, जहां उनके पिता नवाब के यहां अधीक्षक थे. नवाब रामपुर का पुस्तकालय बहुत समृद्ध था, रामपुर में ही सोहराब मोदी ने फर्राटेदार उर्दू सीखी! चूंकि सोहराब मोदी पारसी थे, जिससे पारसी, हिन्दी, उर्दू आदि भाषाओं पर बेहतरीन स्वामित्व होने के साथ ही उनके संवाद इतने प्रभावी होते थे, कि उनके द्वारा बोले गए मुक्तक आज भी सिने - प्रेमियों को रोमांचित कर देते हैं..
सोहराब मोदी को हिन्दी सिनेमा का पहला शो मैन कहा जाता था. मोदी एक अनोखे अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, थे जो पारसी थे, लेकिन हिन्दुओं के देवी - देवताओं पर ऐसी फ़िल्मों का निर्माण किया, जिनका स्तर वैश्विक था. आज संजय लीला भंसाली एवं आशुतोष गोवारिकर, आदि फ़िल्मकार बड़े - बड़े सेट डिजायन करते हुए एतिहासिक फ़िल्मों का निर्माण करते हैं लेकिन सबसे पहले इस अंदाज को रुपहले पर्दे पर उतारने वाले फ़िल्मकार सोहराब मोदी ही थे. बड़े - बड़े फिल्मी सेट बनाना एतिहासिक फ़िल्मों का ऐसा तानाबाना बुनते थे. एतिहासिक बोध धरातल पर उतारते हुए दर्शकों की एतिहासिक चेतना का प्रसार करते थे.आज के दौर में विशाल भारद्वाज भले ही विलियम शेक्सपियर के दुखांत नाटकों पर फ़िल्मों के निर्माण के लिए जाने जाते हैं, लेकिन बीसवीं सदी के सबसे बड़े थियेटर अभिनेताओं में गिने जाने वाले सर लॉरेन्स ओलिवियर, अभिनीत शेक्सपियर के सबसे मशहूर प्रसिद्ध हैमलेट के लिए जाना जाता है. दुनिया के सबसे बड़े साहित्यकार, नाटककार विलियम शेक्सपीयर के नाटक हैमलेट पर विमर्श पूरी दुनिया में होता है, शायद दुनिया में ऐसी कोई यूनिवर्सिटी नहीं है, जहां अंग्रेजी साहित्य के सिलेबस में इसे न पढ़ाया जाता हो. विलियम शेक्सपियर के साहित्य, उनके नाटकों को समझना किसी के बस की बात नहीं है. शेक्सपियर नाम ही काफ़ी है. 'हैमलेट'इस नाटक पर 1948 में सर लॉरेन्स ओलिवियर ने इसी नाम से एक फिम्ल का निर्देशन किया था. निर्देशक के रूप में यह उनकी दूसरी फिल्म थी. मुख्य किरदार भी लॉरेन्स ओलिवियर ने ही निभाया था. इसमे शानदार प्रोडक्शन डिजायन किया गया था. जिसे उस साल सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ऑस्कर मिला. हैमलेट फिल्म यह इनाम जीतने वाली पहली ब्रिटिश फिल्म थी. इस नाटक पर बनी यह पहली अंग्रेज़ी फिल्म थी. आज के दौर में हिन्दी सिनेमा पर चोरी के या प्रेरित होने के आरोप लगते हैं, आज सोहराब मोदी जैसे शिल्पकार होते तो "सिर पटकते कि हमारा सिनेमा क्या था क्या हो गया". यह बात इसलिए ही नहीं कह रहा हूं क्योंकि भारत में ‘हैमलेट’ पर फिल्म बनाने का एक दशक पहले हो गया था. 1935 में सोहराब मोदी ने शेक्सपियर के इसी महान नाटक को आधार बनाकर ‘खून का खून’ नाम से एक साउंड-फिल्म बना दी थी. बताया जाता है कि यह फिल्म हैमलेट पर बनी सबसे पहली फिल्म थी, इससे सोहराब मोदी की सिनेमाई समझ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, कि कितनी दूरदृष्टि के फ़िल्मकार थे.सर लॉरेन्स ओलिवियर को दुनिया में शेक्सपियर के किरदारों की वजह से पहचान मिली तो शेक्सपीयर को भारत की फिल्मों में लाने का श्रेय सोहराब मोदी को जाता है.खून का खून’ में खुद सोहराब मोदी ने हैमलेट की भूमिका निभाई थी.
फिल्म में अपने समय की बड़ी अदाकारा सायरा बानो की माँ नसीम बानो की यह डेब्यू फिल्म थी, जिन्होंने ओफीलिया की भूमिका निभाई थी. फिल्म के बाकी कलाकारों में शमशाद बाई, गुलाम हुसैन और फज़ल करीम वगैरह थे. ध्यान रहे कि शमशाद बाई नसीम बानू की माँ थीं जिनसे सोहराब मोदी ने हैमलेट की माँ गर्ट्रूड का रोल करने के लिए कहा था, ताकि युवा नसीम को सेट पर काम करने में आसानी हो, उस ज़माने में लड़कियों का फिल्मों में काम करना अच्छी दृष्टी से नहीं देखा जाता था. सोहराब मोदी मानवीय मूल्यों के प्रति महान इंसान थे, अभिनेत्री तबस्सुम बताती हैं, "पचास के दशक में मुझे भी महान सोहराब मोदी की फिल्म में काम करने का मौका मिला था,उस फिल्म में मुझे बाल कलाकार के रूप में काम मिला था, मेरा अंतिम शूट बांकी था, अगर वो हो जाता तो, फिल्म रिलीज के लिए तैयार हो जाती, लेकिन महान सोहराब मोदी ने मुझसे पूछा बेटा "आपकी तबियत ठीक है? मैं कुछ नहीं बोल पाई मेरी अलसाई आँखों से समझ गए कि मेरी तबियत नासाज़ है",सोहराब मोदी साहब ने बोल दिया 'पैकअप' फिल्म की लीड ऐक्ट्रिस पाकिस्तान से ताल्लुक रखती थीं, उन्होंने सोहराब मोदी से अनुरोध किया, "आज शाम को मैं पाकिस्तान जा रही हूँ फिर दो महीने बाद लौट पाऊँगी". सोहराब मोदी ने कहा "कोई बात नहीं आप जाओ छह महीने तक भी इंतजार करूंगा, लेकिन एक बच्ची का शोषण नहीं करूंगा." ऐसे मानवीय मूल्यों को तरजीह देने वाले थे, दरअसल वो दौर ही आदर्श था.
सोहराब मोदी की फिल्म, सिकंदर आई जिसमें पृथ्वीराज कपूर नायक थे. जब भारतीय सैनिक ब्रिटिश शासन के तहत द्वितीय विश्व युद्ध लड़ रहे थे. इसने आजादी के लिए लड़ रहे देश के दिलों की धड़कने बढ़ा दी थीं. भावनाओं का ज्वार जब बढ़ने लगा, एवं स्वतंत्रता की आग और तेज बढ़ने लगी तब बॉम्बे सेंसर बोर्ड के द्वारा फिल्म को कुछ थिएटरों में प्रतिबंधित कर दिया गया था, जिससे विद्रोह की धारा प्रबल न होने पाए.
सोहराब मोदी ने ही भारत की पहली टेकनीकलर फ़िल्म ‘झांसी की रानी’ का निर्माण किया था. यह फ़िल्म सोहराब मोदी की ड्रीम प्रोजेक्ट फिल्म थी. इसके लिए वे हॉलीबुड से तकनीशियन एवं एक्यूपमेंट लेकर आए थे. इस फिल्म में सोहराब मोदी ने बेशुमार पैसा लगाया था, इस फिल्म से उनको बहुत सारी उम्मीदें थीं. इसमें 'झांसी का किरदार उनकी पत्नी महताब ने निभाया था. सोहराब मोदी ने क्रान्तिकारी राजगुरु का किरदार अदा किया था. इस फ़िल्म को उन्होंने बड़ी लगन से बनाया था, भारतीय दर्शकों का अदाकारी, बेहतर कंटेट से रिश्ता थोड़ा बेगाना रहा है, कहते हैं पुरातन से भारत में सतहीपना रहा है, नतीजतन फ़िल्म फ़्लॉप हो गयी. सोहराब मोदी फिल्म की विफलता से टूट गए थे. इस असफ़लता से से उबरने के लिए उन्होंने ‘मिर्जा गालिब’ फिल्म का निर्माण किया, जिसमें सुरैया-भारतभूषण थे. यह फ़िल्म व्यावसायिक तौर पर तो सफल रही बल्कि इसे राष्ट्रपति के द्वारा स्वर्ण पदक मिला. उन्होंने सामाजिक समस्याओं पर भी कुछ यादगार फ़िल्में बनायीं. इनमें शराबखोरी की बुराई पर बनायी गयी फ़िल्म ‘मीठा जहर’ और तलाक की समस्या पर ‘डाईवोर्स’ यादगार फ़िल्में हैं. उनकी सर्वाधिक चर्चित और सफल ऐतिहासिक फ़िल्म थी ‘पुकार’. इसमें चंद्रमोहन (जहांगीर) , नसीम बानो - नूरजहां) , सोहराब मोदी (संग्राम सिंह) और सरदार अख्तर की प्रमुख भूमिकाएँ थीं. इस फ़िल्म को न सिर्फ प्रेस बल्कि दर्शकों से भी भरपूर प्रशंसा मिली. इस फिल्म में पहले जहाँगीर की भूमिका के लिए पहले ट्रेजडी किंग को लिया जाना था, लेकिन दिलीप कुमार ने इसे करने से मना कर दिया था. सिकंदर’ में पोरस और ‘पुकार’ में संग्राम सिंह की भूमिका में सोहराब मोदी के अभिनय की बड़ी प्रशंसा हुई. कालांतर में महारानी पद्मिनी पर फिल्म 'पद्मावत' का निर्माण किया गया था. इससे पहले सोहराब मोदी ने आजादी से पहले ही इस एतिहासिक पृष्टभूमि पर फिल्म बनाने का विचार किया था, लेकिन उन्होंने फ़िल्म लक्ष्मीबाई की असफ़लता के बाद इस फिल्म से किनारा करते हुए प्रोजेक्ट बंद कर दिया, और कारण बताया "फिल्म की कहानी विवाद का कारण बन सकती है, आजादी के बाद लगभग 70 साल बाद इसी फिल्म का निर्माण संजय लीला भंसाली ने बनाया, इसमें वैसा ही विवाद हुआ कि पूरा देश जल उठा था, इससे समझा जा सकता है, सोहराब मोदी की सिनेमाई समझ का आकाश बहुत ऊंचा है.
सोहराब मोदी की एतिहासिक फ़िल्में बनाने की समझ अव्वल थी, मुगल ए आज़म फिल्म के निर्देशक के. आसिफ़ से फिल्म कम्पनी निर्देशन का जिम्मा छीनकर सोहराब मोदी को देना चाहती थी, लेकिन आला इंसान सोहराब मोदी की इन्सानियत किसी का हक़ खाने की इजाजत नहीं देती थी, अतः उन्होंने उस घृणित काम को करना उचित नहीं समझा. अपने बुढ़ापे में सोहराब मोदी अपनी फिल्म पुकार का रीमेक बनाना चाहते थे, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से नहीं बना सके. 1978 तक आते-आते 80 साल के मोदी साहब को चलने-फिरने में छड़ी के सहारे से ही चल पाते थे. 1984 में डॉक्टरों ने यह घोषित कर दिया कि उन्हें कैंसर है. तब तक उन्हें खाना खाने में भी तकलीफ होने लगी थी. 1983 में उन्होंने अपनी आखिरी फ़िल्म ‘गुरुदक्षिणा’ का मुहूर्त किया था. उसे अधूरा छोड़ 28 जनवरी 1984 को मोदी हमेशा के लिए इस दुनिया से रुखसत हो गए. वे बड़े दिल वाले इंसान थे, उनका धैर्य, भी अद्भुत था. कई बार कलाकार कई रिटेक देते, लेकिन सोहराब मोदी ने अपना आपा कभी नहीं खोया.अपने पांच दशकीय सिनेमाई सफर में उन्होंने कुल 38 फिल्मों का निर्माण किया. 27 फिल्मों का निर्देशन किया, जबकि 31 फिल्मों में अमर अभिनय करने वाले सोहराब को भारतीय सिनेमा के 75 वर्ष के स्वर्णिम इतिहास एवं उसके पैदा होने के साक्षी एवं फिल्मों की शुरुआती दौर का सशक्त चश्मदीद गवाह माना जा सकता है. सोहराब मोदी को सन 1980 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. भारत में ऐतिहासिक फ़िल्मों को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय उन्हें ही जाता है. सोहराब मोदी की शख्सियत के लिए ऑस्कर भी छोटा है, उसकी बदकिस्मती थी, जो उनके साथ जुड़ नहीं पाया...
दिलीप कुमार
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