'14 अगस्त: आजादी के जश्न के पीछे छिपा देश के बंटवारे का वो गहरा दर्द'
'14 अगस्त: आजादी के जश्न के पीछे छिपा देश के बंटवारे का वो गहरा दर्द'
हम हर साल 15 अगस्त को तिरंगा फहराते हैं, राष्ट्रगान गाते हैं और आजादी का राष्ट्रीय पर्व मनाते हैं। बेशक, यह हर हिंदुस्तानी के लिए गर्व का सबसे बड़ा दिन है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस ऐतिहासिक खुशी की बुनियाद किस त्रासदी पर रखी गई थी? 15 अगस्त की उस सुबह से ठीक एक दिन पहले, यानी 14 अगस्त 1947 की रात को देश ने एक ऐसी त्रासदी झेली थी, जिसकी कसक आज भी इतिहास के सीने में दफ्न है। यही वजह है कि अब देश हर साल 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाता है। यह दिन उल्लास से पहले उस गहरे सन्नाटे और चीखों को याद करने का है, जिसने हमारे भूगोल के साथ-साथ करोड़ों दिलों को भी दो हिस्सों में काट दिया था।
स्वतंत्रता और विभाजन, दोनों एक साथ आए। यह एक ऐसा अजीब संयोग था जहां एक तरफ बरसों की गुलामी की बेड़ियां टूट रही थीं, तो दूसरी तरफ अपने ही घरों में सदियों से साथ रह रहे लोग अचानक एक-दूसरे के लिए अजनबी बन रहे थे। सरहद पर खींची गई एक मामूली सी लकीर ने रातों-रात करोड़ों लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़ फेंका। जो लोग कल तक जमीन-जायदाद के मालिक थे, वे पलक झपकते ही शरणार्थी बन गए। इतिहास गवाह है कि यह सिर्फ दो देशों का बंटवारा नहीं था, बल्कि यह इंसानी जज्बातों, रिश्तों और साझा संस्कृति का कत्लेआम था। प्रसिद्ध शायर नासिर काज़मी ने इस टीस को इन शब्दों में पिरोया था-
'अपना वतन छोड़ के सरहद के इस पार तो आ गए,
मगर दिल वहीं छोड़ आए, जहां बचपन बीता था'
इस ऐतिहासिक घटना से देश के महापुरुष भी भीतर तक टूट चुके थे। महात्मा गांधी ने इस फैसले पर अपनी गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था-
'भले ही पूरा देश विभाजन को स्वीकार कर ले, लेकिन जब तक मैं जिंदा हूं, इसे कभी दिल से स्वीकार नहीं कर पाऊंगा। यह हमारे इतिहास का सबसे दुखद मोड़ है।'
वहीं देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी इस कड़वी सच्चाई को महसूस करते हुए कहा था-
'आजादी आई तो सही, लेकिन वह अपने साथ एक ऐसा तूफान लेकर आई जिसने हमारे लाखों भाई-बहनों को तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया। यह जश्न अधूरा है क्योंकि हमारे अपनों की आंखें रो रही हैं।'
उस दौर के हालातों को याद करें तो रूह कांप जाती है। बुजुर्ग बताते हैं कि कैसे हंसते-खेलते गांवों में अचानक आग की लपटें उठने लगी थीं। लाशों से पटी ट्रेनें जब स्टेशनों पर पहुंचती थीं, तो वहां सिर्फ मातम पसरा होता था। करीब सवा करोड़ से ज्यादा लोगों को अपना सब कुछ छोड़कर, सिर्फ एक जोड़ी कपड़ों में भागना पड़ा था। उस दौर में मजहबी उन्माद का ऐसा अंधा दौर चला कि लाखों बेगुनाह लोग उसकी भेंट चढ़ गए। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों ने जो यातनाएं सहीं, उनका अंदाजा आज की पीढ़ी शायद कभी नहीं लगा सकती। सबसे बड़ा दर्द यह था कि नफरत की उस आंधी में लोग अपनी इंसानियत ही भूल बैठे।
शायर फैज़ अहमद फैज़ ने इस खंडित आजादी पर तंज कसते हुए लिखा था-
'ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर,
वो इंतेज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं'
आज जब हम एक आत्मनिर्भर और शक्तिशाली भारत की बात करते हैं, तब 14 अगस्त को याद करना किसी पुरानी कड़वाहट को हरा करना नहीं है। इसका असली मकसद उन लाखों गुमनाम लोगों को सच्ची श्रद्धांजलि देना है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता की कीमत अपने खून और आंसुओं से चुकाई थी। यह दिन हमें सचेत करता है कि मजहबी कट्टरता की राजनीति हमेशा तबाही ही लाती है। इतिहास की इन भूलों से सबक लेना इसलिए जरूरी है ताकि भविष्य में कभी दोबारा वैसी परिस्थितियां पैदा न हों।भारत की असली ताकत उसकी 'विविधता' और 'आपसी भाईचारे' में है। अगर हम इस सामाजिक ताने-बाने को कमजोर होने देंगे, तो नुकसान पूरे राष्ट्र का होगा। आज के डिजिटल दौर में जब छोटी-छोटी बातों पर नफरत की दीवारें खड़ी की जाने लगती हैं, तब 14 अगस्त का यह काला पन्ना हमें आईना दिखाता है। यह हमें बताता है कि शांति और सामाजिक सौहार्द को बनाए रखना कितना जरूरी है।
आइए, 15 अगस्त की खुशियां जरूर मनाएं, लेकिन 14 अगस्त के उस दर्द को भी अपने दिल में जगह दें। उन पूर्वजों के संघर्ष और पीड़ा को नमन करें जिन्होंने अपनी कुर्बानियों से इस मिट्टी को सींचा। आज का युवा वर्ग जब इस इतिहास को समझेगा, तभी वह एक संवेदनशील, एकजुट और मजबूत भारत का निर्माण कर पाएगा। आइए संकल्प लें कि हम अपने देश में कभी भी नफरत की लकीरें नहीं खिंचने देंगे और आपसी मोहब्बत से इस वतन को हमेशा अखंड रखेंगे।
दिलीप कुमार पाठक
लेखक पत्रकार हैं
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