'सावधान! 'घर बैठे कमाई' वाला वो एक मैसेज आपको बना सकता है डिजिटल गुलाम'

'सावधान! 'घर बैठे कमाई' वाला वो एक मैसेज आपको बना सकता है डिजिटल गुलाम'

30 जुलाई (मानव तस्करी विरोधी दिवस) 

घर बैठे मोबाइल से कमाएं रोज के पांच हजार रुपए! आजकल फेसबुक, इंस्टाग्राम या व्हाट्सएप खोलते ही ऐसे लुभावने मैसेज हर तरफ तैरते हुए दिख जाते हैं। मंदी और बेरोजगारी के इस दौर में जब जेब तंग हो, तो ऐसे विज्ञापन किसी वरदान या लॉटरी जैसे लगते हैं। लेकिन जरा ठहरिए! जिस लिंक पर आप एक 'क्लिक' करने जा रहे हैं, वो आपको अमीर बनाने का रास्ता नहीं, बल्कि एक ऐसे दलदल का रास्ता है जहाँ से आप कंगाल और बर्बाद होकर ही बाहर निकलेंगे। हर साल 30 जुलाई को दुनिया भर में 'मानव तस्करी के खिलाफ विश्व दिवस' मनाया जाता है। 

जब भी हम मानव तस्करी का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में पुरानी फिल्मों जैसा कोई सीन आता है - जैसे किसी का जबरन किडनैप कर लेना, किसी मासूम को बंधक बनाकर मजदूरी कराना या भीख मंगवाना। लेकिन आज के इस चमचमाते डिजिटल जमाने में अपराधियों ने अपना तरीका पूरी तरह बदल लिया है। आज का सबसे नया और खतरनाक सच है 'साइबर स्लेवरी' यानी डिजिटल गुलामी। अब इंसानों को किसी अंधेरी कोठरी में नहीं, बल्कि कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठाकर इंटरनेट की अदृश्य जंजीरों से गुलाम बनाया जा रहा है। इस पूरे काले खेल की शुरुआत बहुत ही सीधे और मासूम तरीके से होती है। आपको व्हाट्सएप पर एक अनजान नंबर से मैसेज आएगा कि यूट्यूब वीडियो लाइक करो और घर बैठे पैसे कमाओ। आप उनके कहे अनुसार वीडियो लाइक करते हैं और आपके खाते में सचमुच 200-300 रुपए आ भी जाते हैं। यहाँ पर बड़ी चालाकी से आपका भरोसा जीत लिया जाता है। इसके बाद असली जाल बिछाया जाता है। वो आपसे कहेंगे कि अगर और ज्यादा मोटी कमाई करनी है, तो आपको थोड़ा पैसा इन्वेस्ट करना होगा। घर बैठे रातों-रात अमीर बनने के लालच में लोग अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी, यहाँ तक कि कर्ज लेकर या घर के गहने बेचकर लाखों रुपए इन फर्जी वेबसाइट्स पर लगा देते हैं। जब तक हमें समझ आता है कि हम पूरी तरह लुट चुके हैं, तब तक स्क्रीन के उस पार बैठा ठग अपना डिजिटल बोरिया-बिस्तर समेटकर गायब हो चुका होता है। यह तो इस गंदे खेल का सिर्फ एक हिस्सा है। 

इसका दूसरा और सबसे डरावना रूप वो है जो हमारे देश के पढ़े-लिखे युवाओं के साथ विदेशों में हो रहा है। कंबोडिया, म्यांमार और थाईलैंड जैसे देशों में 'डेटा एंट्री' या 'कंप्यूटर ऑपरेटर' की आलीशान नौकरी का लालच देकर भारतीय लड़कों को बुलाया जाता है। वहां पहुंचते ही उनके पासपोर्ट छीन लिए जाते हैं और उन्हें बंदूक की नोक पर बड़ी-बड़ी इमारतों में बंद कर दिया जाता है। इसके बाद उनसे जबरन भारत में बैठे मासूम लोगों को फोन करके या मैसेज भेजकर ठगने का काम कराया जाता है। जो युवा ऐसा करने से मना करते हैं, उन्हें कई-कई दिनों तक भूखा रखा जाता है, लोहे की रॉड से बेरहमी से पीटा जाता है और करंट के झटके दिए जाते हैं। यानी हमारे ही देश के बेरोजगार लड़कों को बंधक बनाकर, उन्हीं के हाथों दूसरे भारतीयों को लुटवाया जा रहा है। यह स्थिति बेहद भयानक है। सरकार और पुलिस अपनी तरफ से कोशिश कर रही हैं, लेकिन सिर्फ पुलिस के भरोसे इस अदृश्य दुश्मन से नहीं जीता जा सकता। इस डिजिटल गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का एक ही तरीका है - हमारी खुद की समझदारी। हमें यह छोटी सी बात समझनी होगी कि दुनिया में कोई भी कंपनी बिना किसी मेहनत या बिना किसी इंटरव्यू के घर बैठे मुफ्त में पैसे नहीं बांटती। अगर कोई ऑफर जरूरत से ज्यादा अच्छा लग रहा है, तो समझ जाइए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। अगर कभी अनजाने में आप ऐसे किसी जाल में फंस जाएं या आपके साथ कोई ऑनलाइन फ्रॉड हो जाए, तो डरने या समाज के डर से छिपने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। सरकार ने इसके लिए पुख्ता इंतजाम किए हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत भारत सरकार के राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें। जितनी जल्दी आप इस नंबर पर शिकायत करेंगे, आपके पैसे वापस मिलने की उम्मीद उतनी ही ज्यादा होगी, याद रखिए, आपकी एक सावधानी आपको बर्बाद होने से बचा सकती है।

दिलीप कुमार पाठक 
लेखक पत्रकार हैं 

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