'सड़क पर छात्र, कठघरे में सिस्टम: शांतिपूर्ण मार्च पर पैलेट गन और लाठियों का प्रहार'
'सड़क पर छात्र, कठघरे में सिस्टम: शांतिपूर्ण मार्च पर पैलेट गन और लाठियों का प्रहार'
लोकतंत्र में अपनी असहमति और असंतोष की आवाज उठाना नागरिकों का सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार है। जब देश के युवा और पढ़े-लिखे छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो वे किसी दंगे, उपद्रव या अशांति के इरादे से नहीं, बल्कि अपने भविष्य, अधिकारों और न्याय की वाजिब मांग के लिए आते हैं। लेकिन हाल ही में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर जो कुछ देखने को मिला, उसने देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने, पुलिसिया कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था के बड़े-बडे दावों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा आयोजित संसद मार्च के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने जो कार्रवाई की, वह केवल भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास नहीं, बल्कि बर्बरता की आखिरी हद थी।
छात्रों का यह मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाने के लिए शुरू हुआ था। लेकिन जैसे ही यह मार्च आगे बढ़ा, दिल्ली पुलिस ने इसे रोकने के लिए बेहद आक्रामक और दमनकारी रुख अपनाया। पुलिस प्रशासन ने बाद में यह नैरेटिव बनाने की पुरजोर कोशिश की कि प्रदर्शनकारियों ने कानून हाथ में लिया, बैरिकेड्स तोड़े और सुरक्षाबलों पर हमला किया। लेकिन फैक्ट-चेक और मौके के वीडियो फुटेज इसके उलट कहानी बयां करते हैं। सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया रिपोर्ट्स में साफ देखा जा सकता है कि छात्र हाथ जोड़कर शांति से खड़े थे, तभी पुलिस ने अचानक उन पर बेरहमी से लाठीचार्ज शुरू कर दिया। इस कार्रवाई में केवल सामान्य लाठियों का इस्तेमाल नहीं हुआ, बल्कि छात्रों पर पानी की तेज बौछारें मारी गईं और आंसू गैस के अनगिनत गोले दागे गए। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह रही कि प्रदर्शन को दबाने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल किए जाने के गंभीर आरोप लगे, जिसकी पुष्टि बाद में सफदरजंग अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट ने भी की।
कई छात्रों के सिर, चेहरे और पीठ पर गंभीर चोटें आईं, जो पुलिस मैनुअल और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे डरावना और गैर-कानूनी पहलू यह था कि भीड़ के बीच सादे कपड़ों में कुछ लोग मौजूद थे, जो छात्रों को बेरहमी से पीट रहे थे। इस बर्बरता का वीडियो वायरल होने के बाद दिल्ली पुलिस प्रशासन को खुद बैकफुट पर आना पड़ा और उन्होंने एक आधिकारिक आदेश जारी किया कि भविष्य में कानून-व्यवस्था की ड्यूटी पर तैनात सभी जवान अनिवार्य रूप से केवल अपनी आधिकारिक यूनिफॉर्म में ही रहेंगे। सवाल यह उठता है कि बिना वर्दी के इन जवानों को छात्रों को पीटने की छूट किसने दी थी? क्या यह प्रदर्शनकारियों को डराने की कोई सोची-समझी रणनीति थी? आम तौर पर यह समझा जाता है कि ग्राउंड पर लाठीचार्ज या आंसू गैस का आदेश वहां मौजूद लोकल मजिस्ट्रेट या डीसीपी देते हैं। लेकिन दिल्ली पुलिस का ढांचा देश के अन्य राज्यों से अलग है। दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है। इतने बड़े और संवेदनशील मार्च को रोकने के लिए पुलिस अपनी मर्जी से इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकती। जब तक उच्च राजनीतिक नेतृत्व या गृह मंत्रालय से किसी भी कीमत पर मार्च रोकने का स्पष्ट या मौन इशारा न मिले, तब तक पुलिस इतनी क्रूरता नहीं दिखाती। पुलिस केवल एक मोहरा बनी, जबकि स्क्रिप्ट ऊपर बैठे नीति-निर्माताओं द्वारा लिखी गई थी। इस बर्बरता के खिलाफ छात्रों और नागरिक समाज ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले का कड़ा संज्ञान लिया है। कोर्ट में दायर याचिका में पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग और अमानवीय व्यवहार के पुख्ता सबूत पेश किए गए हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। युवाओं की आवाज को लाठियों और आंसू गैस के दम पर दबाना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकती। यदि देश का छात्र सुरक्षित नहीं है और उसे अपनी बात शांति से कहने की आजादी नहीं है, तो हमें व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा। कलम पकड़ने वाले हाथों पर लाठियां बरसाकर व्यवस्था कभी अपनी नाकामी को छिपा नहीं सकती। न्याय की इस लड़ाई में अब सबकी नजरें अदालत के फैसले पर टिकी हैं।
दिलीप कुमार पाठक
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