प्रधान का इस्तीफा और सौ सियासी डर: 'जेन ज़ी' के चक्रव्यूह में घिरी मोदी सरकार!

'प्रधान का इस्तीफा और सौ सियासी डर: 'जेन ज़ी' के चक्रव्यूह में घिरी मोदी सरकार'

भारत का लोकतंत्र इस समय एक अभूतपूर्व चौराहे पर खड़ा है। देश के कोने-कोने में छात्रों का एक ऐसा स्वतःस्फूर्त और विशाल आंदोलन खड़ा हो गया है, जिसने सत्ता के गलियारों को हिलाकर रख दिया है। नीट और अन्य बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाओं ने देश के नौजवानों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। यह केवल किसी एक परीक्षा की विफलता का मामला नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं के भरोसे, उनकी दिन-रात की कड़ी मेहनत और सुनहरे भविष्य की सुरक्षा की लड़ाई बन चुका है। इसी गुस्से के बीच देश की संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ है, जो पूरी तरह से इस छात्र आंदोलन की आंच में झुलस रहा है और देश की सर्वोच्च पंचायत पूरी तरह ठप हो चुकी है। मानसून सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष ने छात्रों के समर्थन में संसद के दोनों सदनों में सरकार को पूरी तरह घेरने का कड़ा रुख अपनाया है। सत्र के पहले दिन से ही नीट पेपर लीक और छात्र आंदोलन के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा में भारी हंगामा देखने को मिल रहा है। विपक्ष इस मुद्दे पर किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं है और उसका यह कड़ा रुख विधायी कार्यों पर पूरी तरह भारी पड़ रहा है। अगर अब तक की संसदीय कार्यवाही पर नजर डालें, तो दोनों सदनों में नाममात्र का काम हुआ है। कार्यवाही हर रोज हंगामे की भेंट चढ़ रही है। राज्यसभा और लोकसभा को लगातार स्थगित करना पड़ रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई बार सदन शुरू होने के दस मिनट के भीतर ही बंद करना पड़ता है। विपक्षी सांसद लगातार नारेबाजी कर रहे हैं, वेल में आकर विरोध जता रहे हैं और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। सरकार भले ही सिर्फ चर्चा कराने का दावा कर रही हो, लेकिन विपक्ष की साफ मांग है कि चर्चा से पहले जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिसके कारण यह गतिरोध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।इस पूरे मामले में विपक्ष और आंदोलनकारी छात्रों का रुख बिल्कुल स्पष्ट और कड़ा है। उनका कहना है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कम पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। 

विपक्ष का मानना है कि देश के लाखों छात्रों के भविष्य के साथ जो इतना बड़ा खिलवाड़ हुआ है, उसकी नैतिक जिम्मेदारी सीधे तौर पर शिक्षा मंत्री की बनती है। विपक्षी दलों का साफ कहना है कि जब तक मंत्री अपने पद से इस्तीफा नहीं देते, तब तक वे सदन के भीतर किसी भी चर्चा में शामिल नहीं होंगे। इस बीच संकट को टालने और छात्रों को शांत करने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधी रात को एक वीडियो संदेश जारी कर देश के युवाओं को निष्पक्ष जांच और न्याय का भरोसा दिलाया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि देश के आक्रोशित छात्र अब सरकार के इस डिजिटल आश्वासन और कोरे विश्वास को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। आधी रात को बने इस वीडियो का बेअसर होना सीधे तौर पर मोदी सरकार की साख और उसकी मजबूत छवि पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। एक तरफ जहां छात्र सड़कों पर डटे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं ले रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि कभी न झुकने वाली मोदी सरकार अपनी इस मजबूत और सख्त छवि को हर हाल में बनाए रखना चाहती है। सरकार की यह पुरानी कार्यशैली रही है कि वह किसी भी बाहरी आंदोलन या विपक्ष के दबाव में आकर अपने मंत्रियों के इस्तीफे नहीं लेती, क्योंकि उसे लगता है कि ऐसा करने से उसकी राजनीतिक कमजोरी उजागर होगी। लेकिन इस बार कहानी सिर्फ छवि की नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा राजनीतिक डर भी काम कर रहा है। प्रधानमंत्री यह बखूबी जानते हैं कि आंदोलनकारी छात्रों का यह गुस्सा सिर्फ एक मंत्रालय तक सीमित नहीं रहेगा। यदि सरकार ने दबाव में आकर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार कर लिया, तो आंदोलनकारियों के हौसले और ज्यादा बढ़ जाएंगे। इसके बाद यह आंदोलन थमेगा नहीं, बल्कि विपक्ष और छात्र अन्य मंत्रालयों की नाकामियों को लेकर खुद प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़ जाएंगे। सरकार को डर है कि एक बार इस्तीफे का सिलसिला शुरू हुआ, तो देश भर के युवा इस सत्ता के खिलाफ एक ऐसा मोर्चा खोल देंगे, जिसे संभालना सरकार के लिए नामुमकिन हो जाएगा। डोमिनो इफेक्ट का यही डर सरकार को कदम पीछे खींचने से रोक रहा है। इस आंदोलन की सबसे अनोखी और बड़ी बात यह है कि पूरे देश में यह विरोध प्रदर्शन बेहद तेज और आधुनिक हो चुका है। अब यह लड़ाई सिर्फ दिल्ली की सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के हर राज्य और हर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैल चुकी है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार सत्ताधारी दल भाजपा की पूरी आईटी सेल और उनका विशाल सोशल मीडिया तंत्र इस युवा पीढ़ी यानी 'जेन ज़ी' के आगे पूरी तरह बेअसर और नाकाम साबित हो रहा है। तकनीक और मीम्स के दौर में जीने वाली यह नई पीढ़ी डिजिटल स्पेस में सत्ता के हर नैरेटिव को ध्वस्त कर रही है। भाजपा की आईटी सेल युवाओं के इस गुस्से को भटकाने की जितनी कोशिश कर रही है, जेन ज़ी उतने ही कड़े और तार्किक सवालों के साथ सोशल मीडिया पर भारी पड़ रही है। सड़क से लेकर स्क्रीन तक युवा पूरी तरह हावी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा गंभीर सवाल यह उठता है कि आखिर यह आंदोलन कहां जाकर रुकेगा? एक तरफ देश का भविष्य यानी छात्र सड़कों पर लाठियां और आंसू गैस झेलते हुए अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ सत्ता का अहंकार और राजनीतिक शह-मात का खेल चल रहा है। संसद ठप पड़ी है, जनता के पैसे और समय की बर्बादी हो रही है, लेकिन समाधान की कोई राह नजर नहीं आ रही। जब तक सरकार अपनी अड़ियल छवि से बाहर निकलकर छात्रों के प्रति वास्तविक संवेदनशीलता और जवाबदेही नहीं दिखाएगी, तब तक यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है। यह गतिरोध तब तक बना रहेगा जब तक कि सत्ता छात्रों के भविष्य को अपनी राजनीतिक साख से ऊपर रखना नहीं सीख लेती।

दिलीप कुमार पाठक 
लेखक पत्रकार हैं 

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