"सुरों के दुनिया की मल्लिका "शमशाद बेगम"
"सुरों के दुनिया की मल्लिका "शमशाद बेगम" क दौर था, जब बहुत कम महिलाएं अपने ख्वाबों की ताबीर मुकम्मल कर पाती थीं. भारत की आज़ादी के दौर में ल़डकियों के लिए भविष्य निर्माण जैसा कुछ नहीं होता था. केवल और केवल एक ही सपना ज़बर्दस्ती दिखाया जाता था, घर संभालना!! शमशाद बेगम आज़ादी के साल ही पार्श्वगायन की दुनिया में आईं थीं, यकीनन उनके लिए यह सफ़र आसान नहीं रहा होगा.गाने गाना, गुनगुनाना, शमशाद को बहुत पसंद था. शमशाद के अंदर एक गायिका छिपी हुई है, उनकी गायिकी की प्रतिभा को सबसे पहले उनके स्कूल क अध्यापक ने पहचाना और उन्हें कक्षा की प्रार्थना के लिए मुख्य गायिका बना दिया. लेकिन पुरानी सोच वाले अपने परिवार की वजह से उन्हें अपनी ख्वाहिशें मन में ही दबाए रखनी पड़ीं. दरअसल पुरानी सोच कहना थोड़ा अटपटा है, क्योंकि यह वाक्या आज़दी से पहले के भारत की है, जहां अधिकांश लोगों की सोच ऐसी थी. शमशाद का सितारा बुलन्द होना था, अतः उनके चाचा जिन्होंने उनके पिता को उन्हें गाने देने के लिए मना लिया, लेकिन एक शर्त के साथ कि वह बुर्क पहन कर गाएंगी और अपनी तस्वीर नहीं खिंचवाएंगी. रिकार्डिंग ...