' मंटो नंदिता दास की कालजयी कृति'
मंटो हिन्दी सिनेमा की कालजयी कृति सआदत हसन मंटो एक ऐसा नाम जो समाज के एक - एक रेशे को खोल कर देते थे. जिसने बिना किसी उम्मीद के अपने कहानियों का सृजन किया था. यथार्थ को आतिश शब्दों का आकार देकर अपनी कहानियां कहीं..मंटो खुद के लेखन के बारे में कहते थे - मैं बाथरूम में बैठकर कहानियां सोचकर लिखने वाला लेखक नहीं हूं, जो देखा, जो समझा, वो काग़ज़ों पर उतार दिया, मैं यथार्थवादी लेखक हूं. मंटो के बारे में एक शब्द कहूँ वो जियाले अंदाज़ के मालिक थे. मंटो को थे कहना इसलिए पड़ रहा है, और यह धृष्टता मैं इसलिए भी कर रहा हूं क्योंकि मंटो शारीरिक रूप से इस दुनिया में नहीं है, लेकिन वो वैचारिक रूप से इस दुनिया में आज भी हैं.. आज बात करने वाला हूं फ़िल्मकार 'नंदिता दास' की फिल्म मंटो की जिन्होंने एक कठिन विषय पर फिल्म बनाने का सोचा था. आज के व्यपारिक दौर में मंटो पर फिल्म बनाना बहुत रिस्क का काम है, क्योंकि दर्शकों को मनोरंजन चाहिए, अब एक लेखक के जीवन पर फिल्म भला कौन देखेगा? जो अधिकांश साहित्य की दुनिया में ही जाना जाता हो!! मंटो फिल्म देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है, कि 'नंदिता दास' ने ...